पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा मज़दूरों की निर्मम हत्याएँ बदस्तूर जारी हैं
हैदराबाद में कबाड़ गोदाम में लगी आग में झुलसकर 11 मज़दूरों की मौत, एक की हालत गम्भीर

– आनन्द

गत 23 मार्च को हैदराबाद के भोईगुड़ा इलाक़े में एक कबाड़ गोदाम में भोर के क़रीब 3 बजे आग लग गयी जिसमें झुलसकर 11 मज़दूरों की मौत हो गयी। एक अन्य मज़दूर अपनी जान बचाने के लिए गोदाम की पहली मंज़िल पर स्थित कमरे से नीचे कूद गया और उसे बेहद गम्भीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बताया जा रहा है कि आग इलेक्ट्रिक शॉर्ट-सर्किट की वजह से लगी थी। गोदाम में आसानी से आग पकड़ने वाली तमाम ज्वलनशील चीज़ें (जैसे केबल, अख़बार, प्लास्टिक आदि) पड़ी हुई थीं जिसकी वजह से आग जल्द ही पूरी इमारत में फैल गयी। बिहार के कटिहार और छपरा ज़िले से आकर गोदाम में काम करने वाले 12 मज़दूर गोदाम की पहली मंज़िल पर एक छोटे-से कमरे में रहते थे। पूरे गोदाम में बाहर निकलने के लिए सिर्फ़ एक रास्ता था और गोदाम के ऊपर जिस कमरे में मज़दूर रहते थे उस तक पहुँचने का गोदाम से एक घुमावदार और सँकरी सीढ़ी के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। जब आग लगी तो मज़दूर सो रहे थे और जब तक उन्हें आग का पता चला तब आग बुरी तरह से फैल चुकी थी और बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था। घटनास्थल के आसपास उपस्थित लोगों से बातचीत करने पर पता चला कि सुबह आठ बजे तक तो वहाँ पर सिर्फ़ एक दमकल भेजी गयी थी। अग्निशमन विभाग का कहना है कि उन्हें किसी ने बताया ही नहीं कि अन्दर मज़दूर रहते थे और कम से कम चार-पाँच घण्टों बाद जब आग बुझी, तब अन्दर पहुँचने पर उन्हें बुरी तरह से झुलसे हुए शरीर दिखाई दिये। स्पष्ट है कि गोदाम चलाने वाले से लेकर उस जगह के मालिक समेत अग्निशमन और पुलिस विभाग व समूचे स्थानीय प्रशासन की अनदेखी साफ़ तौर पर इन मौतों के लिए ज़िम्मेदार है। इसके बावजूद अभी तक इस मामले में कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है। पुलिस का कहना है कि गोदाम चलाने वाले सम्पत नामक व्यक्ति का स्वास्थ्य सही नहीं है इसलिए उसकी गिरफ़्तारी नहीं हुई है।
ज़ख़्मी मज़दूर प्रेम कुमार 20 वर्ष का है और उसकी हालत बेहद गम्भीर बनी हुई है। प्रेम कुमार ने पुलिस को दिये अपने बयान में कहा कि जब उन्हें आग लगने का पता चला तब तक ऊपर के कमरे से नीचे जाने का कोई रास्ता नहीं बचा था इसलिए मज़दूर कमरे में ही रुके हुए थे लेकिन जल्द ही आग उस कमरे तक पहुँच गयी और वे उसमें जलकर राख हो गये। मृतकों में प्रेम कुमार का एक भाई भी शामिल था। ग़ौरतलब है कि मज़दूरों के शरीर इतनी बुरी तरह जल चुके थे कि उनकी शिनाख़्त करना मुश्किल था। प्रेम कुमार ने ही पुलिस के सामने उनकी शिनाख़्त की।
ग़ौरतलब है कि हैदराबाद में ऐसे अनगिनत अस्थायी गोदाम और कारख़ाने बिना किसी लाइसेंस के चल रहे हैं और राज्य सरकार के पास इसका कोई आँकड़ा नहीं है कि ऐसी असुरक्षित जगहों पर कितने मज़दूर काम करते हैं और रहते हैं। जब कोई भयावह दुर्घटना घट जाती है तो एक दिन मीडिया में कवरेज होती है और नेता-मंत्री मज़दूरों की मौत पर घड़ियाली आँसू बहाते हैं। लेकिन उसके बाद कोई और ख़बर सुर्ख़ियों में आ जाती है और लोग उसे भूल जाते हैं। ऐसी अस्थायी जगहों पर सुरक्षा के कोई इन्तज़ाम नहीं किये जाते जिसकी वजह से इस प्रकार की दुर्घटनाएँ बदस्तूर जारी रहती हैं।
देश के विभिन्न इलाक़ों से ऐसे तमाम मज़दूर काम की तलाश में हैदराबाद जैसे शहरों की ओर रुख़ करते हैं। कई मालिक इन मज़दूरों के नाज़ुक आर्थिक हालात का फ़ायदा उठाते हुए उन्हें एक छोटी-मोटी रहने की जगह देकर एहसान जताते हैं, मगर इसके पीछे मालिकों को फ़ायदा ये होता है कि काम करने के लिए उन मज़दूरों की उपलब्धता बढ़ जाती है जिससे वे उनसे ज़्यादा काम कराते हैं और रहने की जगह देने की आड़ में मालिक उन्हें मज़दूरी भी कम देते हैं। बढ़ती महँगाई और कमरों के लगातार बढ़ते भाड़े की वजह से कई मज़दूरों को भी लगता है कि गोदाम या फ़ैक्टरी में रहने से उनकी जेब में थोड़ा पैसा बचेगा क्योंकि भाड़े का ख़र्च बच जायेगा। ग़ौरतलब है कि मालिक ख़ुद कभी भी काम करने वाली जगह पर नहीं रहते, क्योंकि अक्सर ऐसी जगहें इन्सानों के रहने लायक़ नहीं होती हैं। जहाँ पर एक आदमी भी बमुश्किल रह सकता हो, उन जगहों पर कई-कई मज़दूर साथ में रहने के लिए मजबूर होते हैं। इन जगहों पर अव्वलन तो सुरक्षा का कोई भी इन्तज़ाम नहीं होता है, और अगर वह होता भी है तो वह मालिक की सम्पदा के लिए होता है, नाकि मज़दूरों के लिए।
मालिकों की मुनाफ़ाख़ोरी की हवस में ये कोई पहला हादसा नहीं हुआ है और न ही यह हैदराबाद तक सीमित है। नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, दिल्ली से लेकर चेन्नई और बंगलूरू तक पूरे देश में हर साल इस तरह के हादसों में मज़दूर अपनी जानें गँवाते रहते हैं। हादसों के बाद उपजे असन्तोष को क़ाबू करने के लिए सरकारें छोटी-मोटी आर्थिक मदद करके किनारा कर लेती हैं और साल-दर-साल हादसे बदस्तूर जारी रहते हैं। इस हादसे के बाद भी तेलंगाना की टीआरएस सरकार ने हताहत हुए सभी मज़दूरों के परिवारों को पाँच-पाँच लाख रुपयों की भीख देने की घोषणा कर दी है, पर असलियत यह है कि ख़ुद मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव समेत सरकार के कई विधायक पूँजीपति मालिक वर्ग से आते हैं और उनकी सामाजिक-आर्थिक नीतियाँ भी मालिक वर्ग की सेवा में होती हैं। यही वजह है कि ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की सनक में कारख़ानों और गोदामों में मज़दूरों की सुरक्षा के लिए कोई इन्तज़ाम नहीं किये जाते हैं। इसलिए हैदराबाद में गोदाम में लगी आग से मज़दूरों की हुई मौत महज़ हादसा नहीं, बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था के द्वारा की गयी ठण्डी निर्मम हत्याएँ हैं।

मज़दूर बिगुल, अप्रैल 2022


 

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