श्रीलंका का संकट : नवउदारवादी नीतियों की ख़ूनी जकड़ का विनाशकारी परिणाम

– लता

श्रीलंका की आम जनता अपने सबसे भयंकर दु:स्वप्न से गुज़र रही है। सभी मूलभूत सुविधाओं से एक-एक कर वह वंचित होती जा रही है। वह आज ईंधन, बिजली, रसोई गैस, पेट्रोल की समस्या से जूझते हुए दाने-दाने को मोहताज है। देश की एक बड़ी मेहनतकश आबादी दिन में एक समय भोजन कर रही है। कइयों को वह भी नसीब नहीं है। जीवनरक्षक दवाइयों के अभाव  में अस्पतालों में लोग बे-मौत मर रहे हैं। दवाइयों और बिजली के अभाव में ऑपरेशन और अन्य चिकित्सा प्रक्रिया स्थगित करनी पड़ रही है जिससे हज़ारों की मौत हो रही है।
पिछले कुछ वर्षों में एक के बाद एक आत्मघाती नीतियों को अपनाने वाली महिन्दा राजपक्षे की सरकार जनता का क्रोध झेल रही है। प्रधानमंत्री आवास और कई मंत्रियों के आवास को जनता गुस्से में जला चुकी है और राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे की इस्तीफ़ा की माँग करती लगातार सड़कों पर प्रदर्शन कर रही है। बिजली, गैस, अनाज, पेट्रोल आदि की माँग करती जनता को कोई उपाय नज़र नहीं आ रहा। यह संकट अभी आने वाले समय में और ग़हरा होने जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र और उसके जैसे तमाम अन्य संगठन जो पूँजीवादी विश्व का मानवतावादी मुखौटा हैं मूक दर्शक बने श्रीलंका की जनता को तिल-तिल कर मरता देख रहे हैं लेकिन किसी भी तरह की मदद के लिए कोई आगे नहीं आ रहा। बस कुछ खोख़ले आश्वासनों और नाममात्र के सहयोग के अलावा कहीं से कोई राहत आती नहीं दिख रही है। प्रधानमंत्री महिन्दा राजपक्षे को पद से हटाने के बाद श्रीलंका की जनता राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को भी पद से हटाना चाहती है। ऐसा करने में वह शायद सफल भी हो जाए लेकिन श्रीलंका की जनता के पास राजनीतिक विकल्पहीनता है इसलिए कोई ठोस राजनीतिक व आर्थिक परिवर्तन के आसार नहीं दिखते हैं।
रानिल विक्रमसिंघे के प्रधानमंत्री चुने जाने से यह बात और अधिक पुख़्ता हो जाती है। रानिल विक्रमसिंघे भी उसी सम्भ्रान्त सत्ता वर्ग से आता है जिसने श्रीलंका के मज़दूर-किसानों का शोषण किया है, देशी-विदेशी पूँजी की सेवा पूरी निष्ठा से की है। इनके कार्यकाल में ही देश ने सोलहवाँ अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से कर्ज़ लिया था और यह पहले भी उद्योग, विज्ञान, तकनोलॉजी आदि के मंत्री रह चुके हैं। ऐसे स्थिति में किसी भी प्रकार के जनपक्षधर परिवर्तन की उम्मीद नामुमकिन ही दिख रही है।
पिछले बीस सालों से राजपक्षे परिवार ने देश के तमाम महत्वपूर्ण पदों पर कब्जा जमाया हुआ है। 2010 में श्रीलंका के संविधान के 18वें संशोधन के बाद राष्ट्रपति के हाथों में पहले से बहुत अधिक राजनीतिक और आर्थिक बदलाव की शक्ति दे दी गई थी। अभी भी गोटाबाया राजपक्षे ही राष्ट्रपति हैं। यानी राजपक्षे परिवार का अभी भी श्रीलंका की राजनीति पर नियंत्रण बना हुआ है। एक बार फिर इस परिवार के चले जाने के बाद भी, अगर ऐसी स्थिति पैदा होती है तो, कोई और विकल्प सामने आता नज़र नहीं आ रहा जो कि जनपक्षधर हो और देशी-विदेशी पूँजी के शोषण से मज़दूर और आम मेहनतकश जनता को राहत दे। इस शोषण से मुक्ति तो एक सर्वहारा क्रान्ति के ज़रिए ही हो सकती है, जिसे नेतृत्व देने के लिए आज कोई सर्वहारा वर्ग की पार्टी श्रीलंका में मौजूद नहीं है।

संकट का इतिहास

संकट के कारणों की पड़ताल करते हुए हमारे देश की मीडिया से लेकर विश्व की मीडिया महिन्दा राजपक्षे की कई नीतियों को ज़िम्मेदार बता रही है। साथ ही चीन के कर्ज़ और निर्माण कार्य की शर्तों को इस संकट के महत्वपूर्ण कारणों में गिना जा रहा है। चाय, कॉफी, रबर, मसालों आदि के निर्यात के अलावा मुख्यत: विदेशों से आने वाले आय-प्रेषण (रेमिटेंस) और पर्यटन पर आधारित श्रीलंका की अर्थव्यवस्था लम्बे समये से संकट से गुज़र रही थी जिसे कोरोना काल ने एकदम तबाही के कगार पर ला कर खड़ा कर दिया। महिन्दा राजपक्षे की नीतियों और कोरोना काल के तात्कालिक कारणों ने निश्चित ही आग में घी डालने का काम किया है। लेकिन वर्तमान परिस्थिति लम्बे समय से चले आ रहे संकट की मुखर अभिव्यक्ति है। नवउदारवादी नीतियों के कुचक्र और आईएमएफ (अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश) व विश्व बैंक के खूनी पंजों की छाप हमें श्रीलंका की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर साफ़ नज़र आएँगे। लेकिन मीडिया चीन के निर्माण कार्यों और कर्ज़ को वर्तमान संकट के प्रमुख करणों की तरह दर्शा रही है। निश्चित ही चीन द्वारा दिये गये कर्ज़ या निर्माण परियोजनाओं का उद्देश्य श्रीलंका की जनता को संकट से उबारने या उनकी आर्थिक मदद है, ऐसा नहीं है। अपने विश्व स्तर के व्यापक ‘बेल्ट एण्ड रोड’ परियोजना के हिस्से के तौर पर ने श्रीलंका में निर्माण परियोजनाओं की शुरुआत की थी। यह महत्वकांक्षी परियोजना विश्व राजनीति में चीन-रूस के बढ़ते दख़ल और अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने की नीति का हिस्सा है। चीन की नीतियों का भी कोई मानवीय पहलू नहीं है, वैसे ही जैसे विश्वबैंक और आईएमएफ का कभी नहीं था। चीन भी चीनी कर्ज़ तले दबे होने की स्थिति में श्रीलंका के साथ उन्हीं नीतियों का अमल करेगा जो आईएमएफ या कोई भी साम्राज्यवादी देश करता, यानी नवउदारवादी नीतियों को धड़ल्ले से लागू करना। लेकिन आज की स्थिति के लिए चीन को मुख्यत: दोषी ठहराने के पीछे पश्चिम की मीडिया का उद्देश्य है पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों, विश्व बैंक और आइएमएफ की नीतियों पर पर्दा डालना जो श्रीलंका की वर्तमान संकट के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार हैं।
श्रीलंका दक्षिण एशिया में नवउदारवादी नीतियों की पहली प्रयोग भूमि बना। आईएमएफ के कर्ज़ तले श्रीलंका 1965-66 से दबा चला आ रहा था। लेकिन 1970 और 1980 के दशक में तीन प्रमुख कर्ज़ की शर्तों के साथ देश में नवउदारवादी नीतियों की शुरुआत हुई। जैसा कि हमने ऊपर जिक्र किया है श्रीलंका की अर्थव्यवस्था प्राथमिक उपभोक्ता माल जैसे कॉफी, चाय, रबर, मसालों आदि के निर्यात पर बड़े तौर पर निर्भर है। 1950 के दशक में प्राथमिक माल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के कारण श्रीलंका के पास व्यापार अधिशेष व विदेशी मुद्रा भण्डार था। यानी निर्यात से आने वाला राजस्व आयात पर हुए ख़र्च की तुलना में अधिक था। लेकिन 1960 के पूर्वार्ध में विश्व बाज़ार में प्राथमिक माल की कीमतों में गिरावट आने लगी जिसका सीधा असर श्रीलंका की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। 1965-66 में श्रीलंका भयंकर भुगतान संतुलन के संकट से गुज़र रहा था। यानी देश में आने वाले धन की तुलना में देश से बाहर जाने वाला धन अधिक था। राशन, दूध, चीनी और दवा जैसी बुनियादी चीज़ों पर भी आयात पर निर्भर रहने वाले देश में विदेशी मुद्रा भण्डार कम होना अर्थव्यवस्था के लिए भयंकर स्थिति पैदा कर सकता था। श्रीलंका को ऐसी स्थिति में अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज़ लने की नौबत आ गई। कर्ज़ की शर्तों के अनुसार श्रीलंका को अपने राजकोष के घाटे को कम करने, सबसिडी कम करने, सख़्त मुद्रा नीति का पालन करने और देशी-विदेशी पूँजी पर कर कम करने को कहा गया। 1960 के उत्तर्राध में श्रीलंका की मुद्रा का 20 प्रतिशत अवमूल्यन हुआ और दोहरी एक्सचेंज रेट व्यवस्था की शुरुआत हुई। यानी आज के दिन की मुद्रा दर जिसे ‘स्पॉट रेट’ कहते हैं और भविष्य की किसी तारीख़ की दर जिसे ‘फारवर्ड रेट’ कहते हैं विनिमय दर इन दोनों पर आधारित होगी यानी दोहरा एक्सचेंज रेट। यहाँ से हम श्रीलंका की अर्थव्यवस्था पर आईएमएफ और विश्व बैंक के बढ़ते दख़ल को देख  सकते हैं।
हालाँकि 1970 के पूर्वार्ध में आईएमएफ द्वारा शुरू किये गये इन सुधारों को सिरीमावो भण्डारनायके की सरकार ने अपने कार्यकाल में आंशिक तौर पर ख़त्म करने का प्रयास भी किया था। भण्डारनायके की सरकार ने भूमि सुधारों, उद्योगों के राष्ट्रीकरण और सामाजिक क्षेत्र के निवेश को बढ़ाने का प्रयास किया था। राजकोषीय घाटे को काम करने पर बल देने वाले आईएमएफ और विश्व बैंक भण्डारनायके की नीतियों से नाखुश थे। विदेशी पूँजी के लिए पूँजी संचय की राह में कुछ बाधा पैदा करने वाली इस तरह की नीतियों की आईएमएफ और विश्व बैंक के लिए कोई जगह नहीं है। 1973 के पेट्रोल संकट ने श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भण्डार को लगभग खाली कर दिया। औद्योगिक विकास ठप्प पड़ा था, ज़रूरी उपभोक्ता सामग्री (दूध, दाल, चीनी, दवाइयाँ आदि ) का आयात मुश्किल हो रहा था और ऐसे में सामाजिक क्षेत्र के निवेश को बनाये रखना भी कठिन हो रहा था। विदेशी वित्तीय संस्थान पहले से ही भण्डारनायके की सरकार की ओर दुश्मनाना रुख़ अपनाए थे। और देशी पूँजीपति वर्ग भी अब मुनाफ़ा कमाने के लिए ज्यादा खुला हाथ और नवउदारवादी नीतियों पर अमल चाहता था। ऐसे में भण्डारनायके की सरकार पर भारी दबाव बनने लगा। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी के दबाव में 1977 में सरकार गिर गई। जयवर्धने की नई सरकार ने कर्ज़ के बदले नवउदारवादी नीतियों का खुले तौर पर स्वागत किया।
जे.आर. जयवर्धने की के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्रीय पार्टी (यूएनपी) की सरकार 1977 में बनी। आर्थिक संकट से निपटने के लिए जयवर्धने ने तीन बड़े कर्ज़ आईएमएफ से लिये: पहला 1977-78, दूसरा 1979-82 और तीसरा 1983-84। इसके साथ श्रीलंका ”मुक्त अर्थव्यवस्था” वाली नवउदारवादी नीतियों के मातहत आ गया। मूलत: उपभोक्ता वस्तुओं के निर्यात पर आधारित अर्थव्यवस्था की निर्भरता विश्व बाज़ार पर सापेक्षत: ज्यादा बनती है। आधारभूत औद्योगिक क्षेत्र के विकसित नहीं होने और विश्व बाज़ार पर बनी निर्भरता अर्थव्यवस्था को बेहद अरक्षित और वैश्विक बाज़ार के उछाल-गिरावट के मातहत कर देती है। विश्व बाज़ार से पैदा अनिश्चितता को सम्भालने के लिए यदि सशक्त औद्योगिक व अवरचनागत ज़मीन नहीं होती हैं तो संकट से निपटने के लिए आईएमएफ और विश्व बैंक या साम्राज्यवादी देशों पर निर्भरता ज्यादा बनती है। ऐसी कमज़ोर अर्थव्यवस्था वाले देशों के पास साम्राज्यवादी पूँजी के समक्ष मोलभाव की क्षमता कम होती है। यही श्रीलंका में भी हुआ। आईएमएफ की शर्तों में उदार विनिमय दर, रुपये के अवमूल्यन, मूल्य नियंत्रण का उन्मूलन, खाद्य सब्सिडी में कटौती, मज़दूरी पर नियंत्रण, सख्त मुद्रा नीति, निजी उद्यमों को प्रोत्साहन और अधिक विदेशी मदद शामिल थे। अफ़्रीका, लातिन अमेरिका या एशिया के जिन देशों में भी नवउदारवादी नीतियों के साथ आईएमएफ और विश्व बैंक की दखल शुरू हुई उसके साथ ही निरंकुश, तानाशाही, दक्षिणपंथी और साम्प्रदायिक राजनीति को हवा दी गई। चाहे लातिन अमेरिका के देशों की बात हो, अफ़्रीका या एशिया, सभी जगह नवउदारवादी नीतियों के आगमन ने विनाशकारी राजनीतिक परिदृश्य का निर्माण किया है।
नवउदारवादी नीतियों ने देश स्तर पर भयंकर आर्थिक ध्रुविकरण को जन्म दिया। ग़रीब-अमीर की खाई लगातार बढ़ती गई है। आर्थिक असंतोष राजनीतिक असंतोष में परिवर्तित न हो जाए इसके लिए दक्षिणपंथी, साम्प्रदायिक राजनीति को हवा दी गई। जैसे भारत में हिन्दू-मुसलमान के बीच सम्प्रदायिक नफ़रत की आग भड़काई गई वैसे ही श्रीलंका में तमिल अल्पसंख्यकों के खि़लाफ़ नफ़रत और सिंहला अन्धराष्ट्रवाद को हवा दी गयी। बेहद सोची-समझी योजना के तहत तमिल अल्पसंख्यकों के खि़लाफ़ भेदभाव किया गया और उन पर हमले करवाये गये। इस दौरान ही तमिल ईलम की माँग उठने लगी। वी.प्रभाकरन के नेतृत्व में एक समूह ने सिंहला सैनिकों पर हमला किया। इन जटिल राजनीतिक परिस्थिति में जुलाई 1983 में तमिलों के खि़लाफ़ नरसंहार की शुरुआत हुई और इसके साथ ही 2009 तक चले गृहयुद्ध की भी शुरुआत हुई।
नवउदारवादी नीतियों का प्रतिरोध करने वाले ट्रेड यूनियनों और वाम आन्दोलनों का भी बड़े स्तर पर दमन किया गया। निरंकुशशाही को और भी अधिक बढ़ावा मिला जब संसद को स्थगित कर राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। मज़दूरों की आम हड़तालों का बर्बर दमन हुआ। यहाँ तक कि मज़दूरों के दमन के लिए सेना की अतिरिक्त टुकडि़यों का प्रयोग किया गया और राष्ट्रीय अपातकाल की घोषणा कर दी गई। अगस्त 1980 में जयवर्धने ने मज़दूरों की हड़ताल के बर्बर दमन के बाद राष्ट्रीय संचार के माध्यम से कहा था कि ”अभी तो हाथी ने मात्र अपनी सूँड़ झटकी है, पूरी शक्ति का इस्तेमाल भी नहीं हुआ है”। यह मज़दूरों और आम मेहनतकशों की हड़तालों और किसी भी तरह के प्रतिरोध प्रदर्शन के खि़लाफ़ खुली धमकी थी। हाथी जयवर्धने की पार्टी, यूएनपी (संयुक्त राष्ट्रीय पार्टी) का चुनाव चिन्ह था।
1983 से 2009 तक चले गृह युद्ध ने देश की अर्थव्यस्था को झकझोर कर रख दिया था। इस दौरान सरकारी बजट का भारी हिस्सा रक्षा क्षेत्र की और मोड़ा जाता रहा। इसकी वजह से देश की उत्पादकता में भारी गिरावट आई और राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी हुई। एक बार फिर इतिहास ने अपने आप को दुहराया। 2008 के सबप्राइम संकट के प्रभाव और युद्ध से क्षतविक्षत अर्थव्यवस्था को सम्भालने के लिए और महिन्दा राजपक्षे की सरकार ने आईएमएफ से 260 करोड़ रुपये का कर्ज़ लिया।
2009 से 2012 तक के काल में जीडीपी के विकास दर में उछाल देखा गया। लेकिन अर्थव्यवस्था अभी भी उपभोक्ता माल निर्यात आधारित थी। औद्योगिक और अवरचनागत आधारित विकास की ओर प्रयास बेहद सीमित रहे। यह विकास इतना नहीं था कि विश्व बाज़ार के झटके सम्भाल सके। अधिकतर विकास पर्यटन आधारित ही रहे। 2012 में एक बार फिर विश्व स्तर पर उपभोक्ता माल की कीमतों में गिरावट ने श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भण्डार में गिरावट आई, भुगतान संतुलन की संकट पैदा हुई। साथ ही श्रीलंका को विशाल अवरचनागत विकास के लिए हासिल कर्ज़ का भी भुगतान करना था। एकबार फिर 2016 में आईएमएफ पर निर्भरता बनी। 2016 से 2019 तक तीन सालों की अवधि के लिए 150 करोड़ का कर्ज़ आईएमएफ से लिया गया। 1965-66 से लेकर 2016-19 तक का लोन श्रीलंका का आईएमएफ से लिया गया 16वाँ कर्ज़ था। इन सभी कर्ज़ों के लिए शर्तें वही थी – राजकोषीय घाटे को कम से कम करना। ऐसा करने के लिए सभी सब्सिडी, विशेषतौर पर खद्य सब्सिडी समाप्त करना, कल्याणकारी नीतियों पर कम से कम ख़र्च साथ ही श्रीलंका को अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से अधिक राजस्व जुटाने की सलाह दी गई जैसे कि वैट, सर्विस टैक्स, राष्ट्र निर्माण कर आदि। सब्सिडी की जगह सीधे नकद देना, एक लचीली विनिमय दर व्यवस्था को अपनाना, और व्यापार व निवेश को उदार बनाना।

संकट के वर्तमान कारक

पहले से लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को कई तात्कालिक झटके लगे। पहला अप्रैल 2019 में कई चर्च और लक्ज़री होटलों में बम विस्फोट हुए जिसमें लगभग 250 लोग मारे गए। इन विस्फोटों ने अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटकों के आगमन को गम्भीर रूप से प्रभावित किया। पर्यटकों का अगमन लुढ़कता हुआ नवम्बर 2019 तक 47 प्रतिशत तक गिर गया। इस गिरावट ने 2019 में विदेशी मुद्रा भण्डार को गम्भीर रूप से प्रभावित किया।
2019 में गोटाबाया राजपक्षे चुनावों में जीत कर सत्ता में आने के बाद श्रीलंका की जनता को दो बड़े वायदे किये। पहला करों में  भारी कटौती और दूसरा किसानों को भारी छूट। गैट/वैट कर 2019 से 2020 के बीच में लगभग आधे रह गए। फिर जनता पर कोरोना महामारी का कहर बरपा हुआ। पर्यटन बुरी तरह प्रभावित रहा, कॉफी, रबर, चाय, मसालों और कपड़ो का निर्यात बुरी तरह से प्रभावित रहा। महामारी के दौरान पर्याटन भी प्रभावित रहा और विदेशों में काम कर रहे श्रीलंका के प्रवासियों की नौकरियाँ जाने या आय कम होने की स्थिति में रेमिटेंस भी प्रभावित रहा। वहीं दूसरी ओर महामारी ने अधिक सरकारी खर्च को अनिवार्य कर दिया। 2021 में राजकोषीय घाटा 10 प्रतिशत से ऊपर जाता रहा और जीडीपी की तुलना में सार्वजनिक ऋण 119 प्रतिशत अधिक था।
अर्थव्यवस्था की ऐसी गम्भीर स्थिति में गोटाबाया राजपक्षे ने विदेशी मुद्रा भण्डार को तेज़ी से समाप्त होने से बचाने के लिए एकाएक बिना रासायनिक खाद के ऑर्गेनिक खेती करने की नीति अपनाने का निर्णय लिया। मंत्रीमण्डल के कई मंत्री रासायनिक खाद से होने वाले नुकासन के विशेषज्ञ बन गए। रासायनिक खाद के खि़लाफ़ एक के बाद एक झूठे दावे और अफ़वाहें फैलाई गईं। तमाम कृषि विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की चेतावनियों को अनसुना करते हुए गोटाबाया राजपक्षे ने बिना रासायनिक खाद के खेती करने की घोषणा कर दी और रासायनिक खाद पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यह निर्णय कृषि उत्पादकता के लिए विनाशकारी साबित हुआ। चाय, मसाले, नारियल, फल, आदि का उत्पादन पचास प्रतिशत से भी कम रहा। लम्बे समय से चावल उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर श्रीलंका को कुल उपभोग का 54 प्रतिशत चावल विदेशों से आयात करना पड़ा। इतना ही नहीं किसानों को छूट देने का वायदा कर शासन में आये गोटाबाया राजपक्षे को किसानों के आन्दोलन के आगे झुकना पड़ा और उन्हें मुआवज़ा देना पड़ा। रासायनिक खाद पर प्रतिबंध श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को दो तरह से प्रभावित कर गया। एक कृषि उत्पाद विशेषकर चावल का आयात करना पड़ा जो पहले से खाली हो चुके विदेशी मुद्रा भण्डार पर प्रहार ही था। दूसरा किसानों को मुआवज़ा देने में 4000 करोड़ श्रीलंकाई रुपया खर्च हो गया जबकि रासायनिक खाद पर ख़र्च का हिसाब 3600 करोड़ श्रीलंकाई रुपया था।
इस तरह श्रीलंका के पूरे संकट को हम श्रीलंकाई अर्थव्यवस्था में मुनाफे की गिरती औसत दर के संकट, असंतुलित आर्थिक संरचना, विश्व बाज़ार पर निर्भरता और फिर आईएमएफ द्वारा नवउदारवादी नीतियों को थोपने के रोशनी में देख सकते हैं। नवउदारवादी नीतियों के साथ निरंकुश राजनीतिक सत्ताओं का आना और जनता के आर्थिक व राजनीतिक अधिकारों का हनन यह उस पूरी प्रक्रिया को दर्शाता है जिससे एशिया, अफ्रिका और लातिन अमेरिका के देश गुज़र रहे हैं। नवउदारवादी नीतियों के समक्ष श्रीलंका की अरक्षिता उसकी अर्थव्यवस्था के चरित्र की वजह से अधिक है। जल्द ही श्रीलंका आईएमएफ से या चीन-रूस से कर्ज़ लेने के लिए मज़बूर होगा और इस मज़बूरी का फायदा अपने अपने तरीके से सभी उठाऍंगें। जनता के बीच से प्रतिरोध लगातार जारी है लेकिन राजनीतिक विकल्पहीनता की वजह से जनता के कष्टों का कोई निकट समाधान नज़र नहीं आ रहा। आने वाला समय श्रीलंका की जनता के लिए और कठिन साबित होने जा रहा है।

मज़दूर बिगुल, जून 2022


 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
   
 

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन

Related Images:

Comments

comments