घरेलू कामगारों के विरुद्ध लगातार बढ़ते आपराधिक मामले
दिल्ली में एक दस वर्षीय घरेलू कामगार लड़की के साथ मारपीट एवं प्रताड़ना की एक और शर्मनाक घटना

आशीष

प्रमुख श्रम संगठनों के आँकड़ों के हिसाब से देशभर में लगभग पाँच करोड़ से अधिक घरेलू कामगार हैं जिसमें अधिकतर महिलाएँ हैं। इनमें लगभग दो-तिहाई शहरी इलाक़ों में हैं। नवउदारवाद की नीतियों को लागू करने के बाद घरेलू कामगारों की संख्या में एक सौ बीस फ़ीसदी बढ़ोतरी हुई है। कामगारों की इस आबादी की जीवन-स्थिति के बारे में आमतौर पर समाचार चैनलों और अख़बारों में चर्चा बेहद कम होती है। घरेलू कामगारों के विरुद्ध होने वाली किसी जघन्य घटना के बाद ही कोई बात हो पाती है। घरेलू कामगारों में नाबालिग बच्चों की काफ़ी संख्या है। दिल्ली की जिस भयानक घटना की हम बात करने जा रहे हैं, उसमें भी कामगार नाबालिग ही है।

दिल्ली के द्वारका में रहने वाले कौशिक बागची व पूर्णिमा बागची नामक एक दम्पत्ति अपने यहाँ काम करने वाली एक नाबालिग घरेलू कामगार को बुरी तरह प्रताड़ित करते थे। यह दम्पत्ति “सम्भ्रान्त” कहे जाने वाले लोग हैं। पूर्णिमा इण्डिगो एयरलाइंस में पायलट है और उसका पति कौशिक भी एयरलाइंस में कर्मचारी है। धन-दौलत की अकड़ में ऐसे लोग अमानवीयता की सारी हदें पार कर जाते हैं। इनके यहाँ वह लड़की पिछले दो महीने से काम कर रही थी। यह दम्पत्ति उस कामगार के साथ लगातार मारपीट करते थे। अभी हाल में ही फिर से जब ठीक से साफ़-सफ़ाई नहीं करने का आरोप लगाकर उसे बुरी तरह पीट रहे थे, तब उसी समय बगल से गुज़रते हुए लड़की के किसी परिजन ने उसकी चीख़ें सुन हल्ला मचाना शुरू किया और आसपास के लोगों को एकजुट किया। उस नाबालिग लड़की के शरीर पर मारपीट के काफ़ी निशान थे, आँखें सूजी हुई थीं और प्रेस से जलाये जाने के भी ज़ख्म थे। इस अमानवीय कृत्य का पता चलने पर गुस्साए लोगों ने मालकिन पूर्णिमा और उसके पति की जमकर पिटाई कर दी। इसके बाद आरोपी पति-पत्नी को गिरफ़्तार कर लिया गया है।

घरेलू कामगारों के साथ प्रताड़ना की यह कोई अकेली घटना नहीं है। देश के महानगरों में ऐसी घटनाओं की भरमार है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के अनुसार घरेलू कामगारों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। हाल में ही गुड़गाँव में एक घरेलू कामगार महिला के साथ ठीक ऐसी ही घटना हुई थी। गुड़गाँव में 14 साल की घरेलू कामगार को उसके नियोक्ता ने कई महीने तक मारपीट, यौन हिंसा, ब्लेड एवं अन्य गर्म धातु से दागने जैसी दरिन्दगी को अन्जाम दिया था। हर प्रकार के अपराध और कुकृत्यों के समान इस तरह के कुकृत्यों में भी भाजपाई और संघी सबसे आगे हैं। झारखण्ड में भाजपा महिला कार्यकारिणी की भूतपूर्व सदस्य महिला नेत्री सीमा पात्रा ने अपने यहाँ काम करने वाली घरेलू कामगार को बेहद निर्ममतापूर्वक पीटा था। सीमा पात्रा ने अपने यहाँ काम करने वाली महिला को फर्श पर पड़े पेशाब को चाटने के लिए मजबूर किया था। यह घटना जब तेज़ी से वायरल हुई और ख़बर बनी तो भाजपा ने इसे अपनी पार्टी से निकाल दिया।

नोएडा में अपने यहाँ पूरे समय काम करने वाली एक महिला के साथ मालकिन ने लिफ़्ट से खींचकर जमकर पिटाई की थी। इसका भी वीडियो वायरल हुआ था। कुछ साल पहले लखनऊ में एक रिटायर्ड डिप्टी एसपी ने अपने यहाँ काम करने वाली महिला को धमकी देकर कई महीनों तक उसके साथ बलात्कार किया था। कुछेक घटनाएँ बीच-बीच में सामने आ जाती हैं, लेकिन बड़े से छोटे शहरों तक में रोज़ बन्द दीवारों के भीतर क़ैद लाखों घरेलू कामगारों की चीख़ें आख़िर कब तक अनसुनी रहेंगी! घरों में काम करने वाली महिलाओं के साथ मारपीट, यौन हिंसा, चोरी का इल्ज़ाम लगाना, बिना किसी कारण के काम से कभी भी निकाल देना आदि घटनाएँ बहुत आम बात है। कुछ अपवाद को छोड़कर ज़्यादातर जगहों पर घरेलू कामगारों को सरकारों ने कामगार का दर्ज़ा ही नहीं दिया है। घरेलू कामगारों के लिए कोई न्यूनतम वेतन, छुट्टी, सामाजिक सुरक्षा, मातृत्व अवकाश, तयशुदा काम के घण्टे आदि निर्धारित नहीं हैं। स्थिति यह है कि अपने परिवार का पेट पालने के लिए घरेलू कामगार महिलाओं को कई घरों में काम करना पड़ता है।

जब कभी ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं तो पुलिस की ओर से तात्कालिक तौर पर कुछ क़दम उठाकर सन्तोष कर लिया जाता है, लेकिन यह सिलसिला थमने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। वैसे तो जब तक मुनाफ़ा आधारित व्यवस्था क़ायम है, तब तक मेहनतकशों के बर्बरतम शोषण को रोकना सम्भव नहीं है। घरेलू कामगार भी समूची मज़दूर आबादी का ही अंग हैं। वे भी अपनी श्रमशक्ति धनिक व उच्च मध्यवर्ग के परिवारों को बेचते हैं। वे माल उत्पादन में नहीं लगे होते और उनका श्रम कोई मूल्य व बेशी मूल्य नहीं पैदा करता है। वह एक उपयोगी सेवा, एक उपयोग-मूल्य पैदा करता है। बेरोज़गारी की भयंकर स्थिति और बेहद कम मज़दूरी और साथ ही औरतों की ग़ुलामी के कारण एक विशाल आबादी आज घरेलू कामगारों के तौर पर काम करती है। इनमें से अच्छी-ख़ासी संख्या स्त्रियों की है और अक्सर इन स्त्रियों के पति या अन्य पारिवारिक सदस्य किसी अन्य पेशे में मज़दूर के तौर पर काम करते हैं, जैसे कि किसी कारख़ाने में, रिक्शा-ठेले खींचने वाले मज़दूर के तौर पर या निर्माण मज़दूर के तौर पर। घरेलू कामगारों का शोषण समूचे मज़दूर वर्ग के पूँजीपति वर्ग व धनिक व उच्च मध्यवर्ग के धनपशुओं का द्वारा शोषण का ही एक हिस्सा है।

चूँकि घरेलू कामगार अलग-अलग अकेले-अकेले काम करते हैं, इसलिए अक्सर उनके अन्दर गहरी वर्ग चेतना उन्नत नहीं हो पाती है। उनके बीच सर्वहारा वर्ग के हिरावल तत्वों को सतत् प्रचार करना चाहिए और उन्हें मौजूदा शोषणकारी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के बारे में बताना चाहिए। घरेलू कामगारों को इस व्यवस्था की असलियत को समझना होगा। घरेलू कामगारों की भी लड़ाई देश की अन्य मेहनतकश लोगों के संघर्ष के साथ ही जुड़ी हुई है। अपने धन और ताक़त के बल पर मेहनतकश का ख़ून चूसने वाला धन्नासेठों का पूरा वर्ग ही मज़दूर वर्ग का दुश्मन है। मज़दूरों द्वारा अपने वर्ग के आधार पर संगठित तथा एकजुट होकर ही मेहनत की लूट पर टिकी इनकी सत्ता को ध्वंस  किया जा सकता है। आज तात्कालिक तौर पर घरेलू कामगारों की माँग बनती है- कामगारों के लिए अलग लेबर एक्सचेंज का गठन किया जाये, जिसमें कि उनका पंजीकरण हो और किसी भी व्यक्ति को घरेलू कामगार की ज़रूरत पड़ने पर इस एक्सचेंज द्वारा घरेलू कामगार मुहैया कराये जायें। घरेलू कामगारों पर न्यूनतम मज़दूरी समेत श्रम क़ानूनों में दिये गये सभी अधिकार लागू हों। उनके लिए एक अलग विशेष क़ानून बनाया जाये जिसमें कि उनके सम्मान, घरों में उनके साथ बराबरी के बर्ताव और उनकी रोज़गार-सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाये। न सिर्फ़ घरेलू कामगारों की पहचान और पंजीकरण को सुनिश्चित किया जाये, बल्कि उनके नियोक्ताओं की भी जाँच के साथ ही उनका भी पंजीकरण किया जाये।

घरेलू कामगारों को इन माँगों को लेकर तथा आज के फ़ासिस्ट दौर में मज़दूर वर्ग पर होने वाले हमले के ख़िलाफ़ एकजुट होकर संघर्ष करना होगा।

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2023


 

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