निराशा, अवसाद और पस्तहिम्मती छात्रों को आत्महत्या की तरफ धकेल रही है
अविनाश (मुम्बई )
इस साल कोटा में रिकॉर्ड स्तर पर छात्रों द्वारा आत्महत्या करने की रिपोर्ट सामने आई है। 2022 में कोटा में 15 छात्रों ने आत्महत्या की थी, वही 2023 में अबतक 26 छात्रों द्वारा आत्महत्या करने की रिपोर्ट सामने आई है। एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है की देश की कुल आत्महत्याओं में से 8 प्रतिशत छात्रों का होता है। कोटा में आम तौर पर दो से ढाई लाख छात्र देश के कोने-कोने से मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के लिए आते है। 2023 में 1.4 लाख एमबीबीएस/बीडीएस सीट के लिए 20 लाख से ज्यादा छात्रों ने परीक्षा दी थी, वही 17 हजार आईआईटी की सीट के लिए 8.6 लाख बच्चों ने फॉर्म भरा था। एक ऐसी प्रतिस्पर्धा जहाँ एक दूसरे के ऊपर चढ़ कर आगे पहुँचना ही ‘सफलता की कुंजी’ बताई जाती है। सब लोग चूहा-दौड़ में लगे है, जिसकी वजह से पस्तहिम्मती, निराशा, अवसाद और युवा पीढ़ी को अन्धकार में धकलेने का काम लगातार हो रहा है। उन्हें बताया जाता है कि तुम सफल नहीं हुए क्योंकि ‘तुम मूर्ख व नालायक हो’ क्योंकि तुमने फलाँ परीक्षा नहीं पास की! तब इन आत्महत्याओं के बढ़ने के कारणों की पड़ताल समाज में की जानी चाहिए।
एक तरफ शिक्षा में बढ़ते बाजारीकरण व ‘नयी शिक्षा नीति’ के तहत अब गुणवत्तापूर्ण अच्छी शिक्षा आम जनता की पहुँच से लगातार दूर होती जा रही है। उसके ऊपर से इस शिक्षा से एक अदद नौकरी पाना भी मुश्किल होता जा रहा है। ठेका प्रथा की वजह से कही भी पक्का काम नहीं मिलता है। एक आँकड़े के अनुसार कोरोना में 4 करोड़ नौकरी वैसे ही चली गयी थी, उसके बाद से अबतक काम मिलना मुश्किल ही रहा है। साथ-साथ मोदी सरकार ने जिस बेशर्मी और नंगई के साथ भारत के कारपोरेट पूँजीपति वर्ग की सेवा की है, वह अभूतपूर्व है। सरकार में आने से पहले इन्होने वायदे किए थे कि ‘हर साल दो करोड़ नौकरी देंगे’, मगर फासीवादी मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों को जिस गति से लागू किया है, उसकी आज़ाद भारत के इतिहास में कोई मिसाल नहीं है। रेलवे के निजीकरण, ओएनजीसी के निजीकरण, एयर इण्डिया के निजीकरण, बीएसएनएल के निजीकरण, बैंक व बीमा क्षेत्र में देशी-विदेशी पूँजी को हर प्रकार के विनियमन से छुटकारा, पूंजीपतियों को श्रम कानूनों, पर्यावरणीय कानूनों व अन्य सभी विनियमनकारी औद्योगिक कानूनों से छुटकारा, मज़दूर वर्ग के संगठन के अधिकार को एक-एक करके छीनना लगातार जारी है। यह सारी नीतियाँ भी छात्रों- युवाओं में निराशा और अवसाद पैदा करने के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर उतने ही ज़िम्मेदार है।
ऐसे में आत्महत्या के मामलों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ प्रशासन लिए उठाए गए कदम, जिसमें पंखों में एक एण्टी-हैंगिंग डिवाइस लगाना और कोचिंग संस्थानों को दो महीने तक कोई परीक्षा न लेने का आदेश देना, यह अपने आप में इस समस्या का समाधान नहीं है। इस अन्धकारमय और निराशाजनक माहौल में, सभी को अपनी सामाजिक भूमिका को पहचानने की ज़रूरत है। करियर के लिए अन्धी दौड़ में युवाओं के जीवन की बलि चढ़ने की इस त्रासदी के पीछे वास्तव में मुनाफ़ा-केन्द्रित व्यवस्था है। जब तक यह पूँजीवादी व्यवस्था कायम रहेगी, तब तक करियर के पीछे जारी यह अमानवीय चूहा-दौड़ भी जारी रहेगी और युवाओं का जीवन भी तबाह होता रहेगा।
मज़दूर बिगुल, अक्टूबर 2023













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