गुड़गाँव में मज़दूरों के एक रिहायशी लॉज की चिट्ठी, मज़दूर बिगुल के नाम! 

अनन्त

मैं एक लॉज हूँ। आप भी सोच रहे होंगे की कोई लॉज कब से बात करने लगा, और आपके अख़बार में चिट्ठी भेजने लगा। अरे भाई मैंने भी पढ़ा है आपका यह अख़बार ‘मज़दूर  बिगुल’, मेरे कई कमरों में पढ़ा जाता है यह, तो भला में क्यों नहीं पढूँगा? इसीलिए मैंने सोचा कि क्यूँ न मैं भी अपनी कहानी लिख भेजूं।

मैं गुड़गाँव मानेसर के पूरे इलाके में खटने-पिसने वाले लाखों लोगों की शरणस्थली हूँ। मैं गुड़गाँव के कापसहेड़ा, मौलाहेड़ा से लेकर शक्तिपार्क, गांधीनगर, हरी नगर, खटोला, कादीपुर व अन्य गाँव से लेकर नरसिंहपुर, मानेसर के अलग-अलग गाँवों में मौजूद रहता हूँ। जब से गुड़गाँव-मानेसर-धरुहेडा-बवाल के इलाके में दुनिया भर से ऑटोमोबाइल सेक्टर, गारमेंट सेक्टर व अन्य कारखाने आये, तब इनमे काम करने के लिए अलग-अलग राज्यों के दूर-दराज़ के गाँव-कस्बों से उजड़ कर भारी संख्या में मज़दूर आये। फिर उन मज़दूरों के रिहायश के प्रबंध के रूप में मेरा अस्तित्व आया। हम एक मंजिले से लेकर बहु मंजिले तक हैं। हम सब की कमोबेश एक ही कहानी है। एक रेल के डिब्बे नुमा कमरे जिसमे कोई खिड़की न हो, तीन तरफ से बंद, हर कमरा एक कम्पार्टमेंट की तरह, जिसके अन्दर गुजरती है दुनिया को बनाने, चलाने, चमकाने वाले मज़दूरों की ज़िन्दगी। अन्दर से बदरंग, कमज़ोर दीवारों के ऊपर बीम डाल कर तैयार की गयी छत, बेहद ही सस्ते दामों में तैयार किया जाता हूँ मैं। भूकंप के झटकों की ख़बर सुनते ही मैं थरथरा जाता हूँ; न जाने तब क्या होगा जब मेरे पैरों तले जलजला आएगा। ख़ैर मेरा क्या! मेरे द्वारा कमाए गए बेइन्तहा मुनाफ़े से मेरा मालिक मुझे फिर से खड़ा कर लेगा, अपना भला तो वो सोचें जो मुझमे वास करते हैं। हाँ, अब कहीं-कहीं मेरे कुछ नए भाई-बन्दों के अन्दर टाइल्स बिछाये जा रहे हैं, जहाँ उनके मालिकों ने पुरानी लॉजों से खूब मुनाफ़ा लूटा है। और उन लॉजों में रह पाना अधिकांश मज़दूरों के बूते की बात नहीं है। मेरे दम पर मेरा मालिक बैठे-ठाले हज़ारों-लाखों रुपए मासिक कमाता है। इसीलिए उसे पसंद नहीं कि कोई भी उसकी इस कमाई की राह में रोड़ा बने, ख़ासकर मज़दूर, इसीलिए बात-बेबात उसका मज़दूरों को गलियाँ देना और यहाँ तक कि हाथ छोड़ना आम बात है। मैं कारखानेदारों-मालिकों-ठेकेदारों-दुकानदारों-दलालों का यार हूँ। मैं मीलों दूर गाँव-कस्बों से आकर मेहनत-मजूरी करने वाले लोगों के लिए जहन्नुम का दूसरा पता हूँ। गंदगी मेरा गहना है, मैं किसिम-किसिम के बीमारियों का ठिकाना हूँ। मेरे 10 गुणा 8 के कमरे में ठूँसे होते हैं 3-6 लोग, कहीं-कहीं तो 5-6 तक रहते हैं। एक के ऊपर दूसरा, जैसे बोरे हो गोदामों में, ठीक वैसे ही मज़दूर रहते हैं मेरे कमरों में। जिनके पास होता है बस बिछाने को बिछावन, कुछ कपडे, और खाना पकाने के लिए कुछ बर्तन, कमोबेश यही तस्वीर हर कमरे में दिखेगी, बस जीवन जीने के लिए कुल इतने ही असबाब बचते हैं उनके पास। मैं भले ही सस्ते लागत में तैयार किया गया हूँ, किन्तु मज़दूरों के लिए मैं बेहद ही ख़र्चीला, बड़ा महँगा हूँ. मेरे छोटे-छोटे मुर्गी के दड़बेनुमा कमरों का किराया किसी राजमहल से कम नहीं है। मेरे एक कमरे का किराया एक मज़दूर के आधे महीने की पगार से कम नहीं, मज़दूर पूरे महीने कई-कई घंटे खट-पिस कर जो अदनी सी पगार पाते हैं, उसपर मेरी पूरी नज़र रहती है। मेरा किराया, बिजली-बिल, सफ़ाई, राशन को चुकता करने के बाद बिरले ही कोई होगा जो अपने हाथ में कुछ बचा पाता होगा। सुविधा के नाम पर औसतन 50-50 लोगों पर मिलता है 2 से 3 शौचालय, और एक स्नानघर, काफ़ी है यह! और इनकी सफ़ाई हफ्ते-दो हफ्ते में एक बार। और पानी की क्या बात करूँ, इस मामले में मुझसे ज़्यादा किफ़ायतशार कौन होगा भला, आज पूरी दुनिया की सरकार मेरी मिसाल अपनी जनता के आगे पेश कर सकती है, कह सकती है कि गुड़गांव के लॉज की तरह तुम भी किफ़ायती बनो। ख़ामख्वाह में बेकार ख़पत करते रहते हो। अरे मैं हज़ार-हज़ार लीटर की दो टंकी से रोज़ाना 80 से 100 लोगों की ज़रूरतें पूरी कर देता हूँ। लोगों को अनुशासित बनाती हूँ, सुबह आधे घंटे में सारे ज़रूरी काम निपटा लो, उसके बाद पानी सप्लाई बंद। ऊपर से, सुबह 9 के बाद जो पानी आएगा वह भी गटर वाला बदबूदार, जिससे न तो तुम बर्तन धो सकते हो, न ही कपडे, बीमारियाँ अलग से।

gurgaon lodgeकई जगह मेरे रखवाले इतने मुस्तैद हैं कि क्या मजाल की कोई परिन्दा भी पर मार जाए। कईयों ने तो सी.सी.टी.वी. कैमरे तक लगा रखे हैं। मेरा ठेकेदार, ठेकेदार क्या है, लगता है जैसे सीधे यमलोक का कोई यमदूत हो, और मेरा मालिक साक्षात् यमराज। बड़े सख्त नियम क़ायदे हैं मेरे, क्या मजाल कि कोई माई का लाल इन्हें तोड़ जाए, अरे भारत सरकार का कोई श्रम कानून थोड़े ही न है कि जैसे चाहे तोड़ो-मरोड़ो। महीने की फलां तारीख़ तक पैसा मिल जाना चाहिए, चाहे तुम्हे तुम्हारा ठेकेदार समय पर पैसा दे या नहीं, लेकिन तुम्हे लॉज के ठेकेदार को समय पर पैसा देना ही पड़ेगा। नहीं तो मिलेगी जिल्लत, गाली और पिटाई, वो भी थोक भाव में। तुम्हारे कमरे पर ताला जड़ दिया जाएगा, और आधी रात को तुम्हारे ही कमरे से तुम्हें बेदख़ल कर दिया जायेगा। चप्पल गिने जायेंगे तुम्हारे कहीं तुम चार बता कर पांच-छह लोग तो नहीं रह रहे। अगर कमरे में तीन से ज़्यादा लोग रहोगे तो प्रति व्यक्ति 500 से 700 रुपए अलग से लगेगा। अरे किस बात के, वही पानी जो आता नहीं शौचालय जो साफ़ नहीं होता इसके इस्तेमाल के लिए। कहीं-कहीं ग़र तुम्हारा रात भर के लिए भी कोई मेहमान आया हो तो उसके भी लग जायेंगे तुम्हे 500 रूपए, दो वरना आधी रात को निकलो! वसूला जायेगा मनमाने दर से तुमसे बिजली-बिल, भले ही तुम्हारा मीटर ठीक ना हो। तुम्हे राशन भी मेरे ही दुकानों से लेना है, वो भी ऊँचे, मेरे ठेकेदार के मनचाहे, दाम पर। क्या हिम्मत तुम्हारी की तुम बाज़ार से कहीं सस्ता माल खरीदने का प्रयास करो। यहाँ तक कि कई जगह तुम्हें मेरे ही दुकानों से ही मोबाइल रिचार्ज अदि भी करवाना पड़ेगा। ग़र कारख़ाने में हो रहे शोषण-उत्पीडन के ख़ि‍लाफ़ आवाज़ उठाई तो भी तुम्हें अपना कमरा गँवाना पड़ सकता है, पिटाई भी की जा सकती है। आखिर मेरा मालिक और कारखानेदार एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। दोनों ही हाड़-गला कर काम कर रहे लोगों को ही लूट कर ज़ि‍न्दा रहते हैं। मज़दूरों की जिंदगी को जेल में बंद करने का काम करता हूँ मैं। मज़दूरों के लिए कारखाना एक किस्म का जेल है, वहीं मैं दूसरे किस्म की जेल, जो दि‍खता तो बाहर से खुला है लेकिन मेरे अन्दर है बाध्यताओं, पाबंदियों, मजबूरियों की सलाखें, जिनके पीछे कैद होती है एक मज़दूर की ज़ि‍न्दगी।

मेरे संकरे-अँधेरे गलियारे में दौड़ते हैं कुपोषित-बीमार बच्चे, जिनकी आँखों को देखने के लिए होता है मेरी पपडीदार, फूली हुई दीवारें और कूड़ा। इनके लिए जो स्कूल हैं उनकी हालत उतनी ही अच्छी है जितनी मेरी। ऊपर से वहाँ दाखिला लेना कोई आसान काम नहीं। मेरे माहौल में पढना-लिखना तक़रीबन नामुमकिन है। इस तरह मैं तय करता हूँ मज़दूरों के बच्चों का भविष्य। मैं सुनिश्चित करता हूँ कि इस प्रकार वो भी इन कारखानों में खटने वाले आधुनिक गुलाम बनें। मैं अपने कमरों में चौबीसों घंटे रहने वाली महिलाओं के लिए बेबसी और गुलामी की नयी परिभाषा गढ़ता हूँ। मेरे बाहर यानी जिन इलाकों में मैं बसता हूँ, वहाँ बहती हैं बदबूदार नालियाँ, ऊबड़-खाबड़ सडकें, जिन पर उडती रहती है सुबह-शाम, दिन-रात अल्हड़ धूल। हर नुक्कड़ चौराहे पर रहता है बदबूदार कूड़ों का ढेर। हर रोज़ अहले सुबह कारखानों को भागते तेज़ क़दमों के लिए चुनौती पेश करता है सीवर से अनवरत बहता गटर का पानी, इससे बना कीचड़, गड्ढे और टीले। इसके आगे घूमते रहते हैं सडकों पर गुंडे और लफ़ंगे, देर रात को काम से लौटते मज़दूरों के लिए चुनौती बन कर। बीमारी के इलाज़ के नामपर हर तरफ़ झोला-छाप डॉक्टरों का गोरखधंधा चलता है। किसी ज़माने में किसी राजा ने कश्मीर के बारे में कहा था कि अगर दुनिया में कहीं स्वर्ग है तो यहीं है। आज के ज़माने में, कोई भी, गुड़गाँव मानेसर की इन बस्तियों के बारे में, जहाँ मैं हूँ, कह सकता है कि गर दुनिया में कहीं नरक है तो यहीं है। मेरा यह भयंकर साम्राज्य चलता है सरकार-प्रसाशन, भद्र जनों के नाक के नीचे। देश-दुनिया में, अख़बारों, टी.वी-रेडियो चैनलों पर दिखाया जाता है चमचमाता शहर, मेट्रो, मॉल्स, अपार्टमेंट्स, अदि-अदि। मेरा कहीं कोई ज़िक्र नहीं, चुपचाप चलता रहता है मेरा साम्राज्य।

कई जगह मेरे मालिकों ने दुकानें भी खोल रखी हैं और मज़दूरों के लिए वहीं से सामान खरीदने की मजबूरी है, भले ही बाज़ार से ज़्यादा दाम देने पड़ें। मना करें तो फिर कमरे से निकालने की धमकी।

मेरी बदूसरती को तब चार चांद लग जाते हैं जब आप गुड़गांव में पैसेवालों के रिहायशी इलाकों पर ऩजर डालते हैं। ऐसे-ऐसे आलीशान अपार्टमेंट, मॉल और सिनेप्लेक्स कि देखकर लगता ही नहीं आप हिन्दुस्तान में हैं। लगता है सीधे यूरोप या अमेरिका में पहुंच गये हैं। गुड़गांव आने-जाने वालों को तो विकास की यही जगमगाती तस्वीर दिखती है। मैं और मेरे जैसे सैकड़ों दूसरे लॉज तो मुख्य सड़कों से दूर, ऊंची इमारतों के पीछे छिपे रहते हैं ताकि इस मनभावन तस्वीर पर कोई धब्बा न लगे। वैसे भी, मेरे कमरों में रहने वाले भी इन अपार्टमेंट में रहने वालों की आंखों में ऐसे ही चुभते हैं जैसे कोई कलंक हों। उनका बस चले तो इन लोगों को उठाकर दूर फेंक दें। मगर मजबूरी है, इनके बिना शहर और तरक्की चल भी नहीं सकते।

लेकिन आजकल मेरे कान कुछ खड़े हो गए हैं। आपके इस अख़बार को पढने वाले कुछ सिरफरे बहकी-बहकी बातें करने लगे हैं। वो कहते हैं कि ऐसे लॉज, इसके कमरे रहने लायक नहीं हैं। हमें भी रहने के लिए चाहिए साफ़-सुथरा परिवेश, हमें भी चाहिए हवादार–रौशनी से भरपूर, खुले वातवरण वाली रिहायश। हमारे बच्चों के लिए भी हो बड़े, लम्बे-चौड़े, सुन्दर पार्क ताज़ी-स्वच्छ हवा। इसीलिए हमें सरकार से रिहायश की माँग करनी चाहिए। आखिरकार हम मेहनतकश हैं, हमारे मेहनत के दम पर ही सारी दुनिया चलती है, सब ऐशोआराम संभव होते हैं। जब हमने ही औरों के रहने का इंतजाम किया, आलीशान महलों को बनाया, तो हम क्यूँ रहे ऐसे हाल में। सरकारें हमारे दम पर चलती हैं, पूँजीपति हमारे दम पर मुनाफ़ा कमाता है। तो हमारे साथ ही ऐसा अन्याय क्यों? इसके लिए हमें इलाकाई आधार पर एकता बनाकर संघर्ष करना चाहिए।

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2016


 

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