2 सितम्बर की हड़ताल जैसे वार्षिक अनुष्ठानों से क्या होगा?
पूँजीवादी मुनाफे का चक्का जाम करने के लिए मज़दूरों को अपनी एकता को मज़बूत कर लम्बी लड़ाई लड़नी होगी!

सम्पादक मण्डल

पिछली बार की तरह इस बार भी 2 सितंबर को 10 बड़ी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा एक दिवसीय हड़ताल का आयोजन किया गया। इसे लेकर काफी शोर मचाया गया और विदेशों तक में इसकी दुनिया की सबसे बड़ी हड़ताल के रूप में चर्चा हुई। मगर ऐसे वार्षिक आयोजनों की हक़ीक़त क्‍या है और इस एकदिनी हड़ताल की रस्म से आखिर होगा क्या?

पिछले 25-26 वर्षों में, जबसे उदारीकरण-निजीकरण-भूमण्‍डलीकरण की नीतियों का कहर मज़दूरों पर बरपा हो रहा है, तब से ऐसी रस्मी कवायदें बार-बार होती रही हैं। लेकिन मज़दूरों-कर्मचारियों पर होने वाले हमलों में कोई कमी आयी है? क्‍या उनके अधिकारों पर होने वाली डकैती में रत्तीभर भी कमी आयी है? उल्‍टे मज़दूरों को जो भी क़ानूनी अधिकार और सुरक्षाएँ मिली हुई थीं – जो लम्‍बे संघर्षों से हासिल की गयी थीं, वे सब एक-एक करके छीनी जा चुकी हैं। देश के 93 प्रतिशत मज़दूरों के लिए आज श्रम क़ानूनों का कोई मतलब ही नहीं रह गया है। ठेका, कैज़ुअल, दिहाड़ी या पीसरेट मज़दूर के रूप में बेहद कम मज़दूरी और बिना किसी सुरक्षा के काम करते हुए उनकी हालत ग़ुलामों से भी बदतर हो गयी है। स्‍थायी नौकरी में बचे हुए मज़दूरों-कर्मचारियों पर भी छँटनी की तलवार लगातार झूल रही है। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को पूँजीपतियों के हाथों मिट्टी के मोल बेचा जाता रहा है और मज़दूरों को धक्‍के मारकर बाहर निकाला जाता रहा है। फिर आ‍ख़ि‍र इन सालाना अनुष्‍ठानों को लेकर इतना तूमार क्‍यों बाँधा जाता है?

असल में एकदिनी हड़तालें करना इन तमाम यूनियनों के अस्तित्व का प्रश्न है। ऐसा करने से उनके बारे में मज़दूरों का भ्रम भी थोड़ा बना रहता है और पूँजीपतियों की सेवा करने का काम भी ये यूनियनें आसानी से कर लेती हैं। यह एकदिनी हड़ताल कितनी कारगर है यह इसी बात से पता चलता है कि ऐसी हड़तालों के दिन आम तौर पर तमाम पूँजीपति और कई बार कुछ सरकारी विभाग तक खुद ही छुट्टी घोषित कर देते हैं। और कई इलाकों में मालिकों से इनकी यह सेटिंग हो चुकी होती है कि दोपहर तक ही हड़ताल रहेगी और उसके बाद फैक्ट्री चलेगी। गुड़गाँव में इस हड़ताल की “छुट्टी” के बदले इससे पहले वाले हफ्ते में ओवरटाइम काम करवा लिया जाता है। इसे रस्म नहीं कहा जाये तो क्या कहें? ऐसी रस्म-नुमा हड़तालों से पूँजीपतियों के मुनाफे़ पर कोई असर नहीं पड़ता है। ये केंद्रीय ट्रेड यूनियनें यदि वास्तव में मज़दूरों के हितों और श्रम विरोधी नीतियों को लेकर चिंतित हैं तो पूरी तैयारी और संगठन के साथ ये लम्‍बी या अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा क्यों नहीं करतीं? वे तब तक जुझारू लड़ाई का ऐलान क्‍यों नहीं करतीं जब तक कि श्रम के ठेकाकरण की प्रक्रिया समाप्त नहीं की जाती? ये यूनियनें तब तक के लिए काम ठप्प क्यों नहीं कर देती जब तक कि सभी ठेका-केजुअल-एप्रेंटिस-मज़दूरों को उनके अधिकार न मिल जाएँ? भारत के असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के संघर्षों में ये यूनियनें क्यों नहीं हड़ताल पर उतरतीं और अपनी 5 करोड़ सदस्यता को काम बंद करने को क्यों नहीं कहती? ज़ाहिर है कि यूनियनें दलाल हो चुकी हैं और मज़दूर वर्ग से गद्दारी कर चुकी हैं!

पिछले साल भी इसी दिन इन यूनियनों ने मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों में किये जा रहे मज़दूर-विरोधी संशोधनों के खिलाफ हड़ताल की थी। क्या इससे मोदी सरकार ने मज़दूर-विरोधी संशोधनों को वापस ले लिया? सच तो यह है कि इन संशोधनों को पूरे देश में धड़ल्ले से लागू किया जा रहा है। 1990 में नवउदारवाद और निजीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद से करीब 17 बार पहले भी इसी तरह का ‘भारत बंद’, ‘आम हड़ताल’, ‘प्रतिरोध दिवस’ का आह्वान ये केंद्रीय ट्रेड यूनियनें कर चुकी हैं। मगर इन 26 वर्षों के दौरान ही मज़दूर-विरोधी नीतियों और मज़दूर संघर्षों के दमन में बेतहाशा बढ़ोतरी हुयी है। साफ़ है कि एक दिन की हड़ताल का मकसद होता है मज़दूरों और मेहनतकशों के भीतर पनप रहे गुस्से को थोड़ा-थोड़ा करके निकालना ताकि मज़दूरों का गुस्सा ज्वालामुखी के समान फट न पड़े।

आज देश के तमाम औद्योगिक क्षेत्रों में किसी भी फैक्टरी में न्यूनतम वेतन नहीं दिया जाता। ई.एस.आई. और पी.एफ. से भी सभी मज़दूर वंचित रहते है। लेकिन ये केंद्रीय ट्रेड यूनियनें पूरे साल इन मुद्दों पर कुछ भी नहीं करतीं। लाल झंडे की आड़ में यह मज़दूरों के बीच में मालिकों और पूँजीपतियों के लफ़्फ़ाज़ होते हैं। संसद में बैठे इनके बड़े नेता मज़दूर-हितों पर भाषण-वाषण देने के अलावा सारी मज़दूर-विरोधी नीतियों के बनने में साथ देते हैं। दूसरी तरफ़ निचले स्‍तरों पर इन यूनियनों के नेता मज़दूरों से कमीशन तो खाते ही हैं, समझौते के नाम पर मालिकों से भी पैसा लेते है। कुंभकरण की नींद सोये इन ट्रेड यूनियनों के मज़दूर संगठनों की नींद खुलती है हर साल हड़ताल का दिन आने पर। तब यह लोग मज़दूर एकता कायम करने की बात करते है। एकदिनी हड़ताल करने वाली इन केंद्रीय ट्रेड यूनियनों से पूछा जाना चाहिए कि जब इनकी आका पार्टियां संसद-विधानसभा में मज़दूर-विरोधी क़ानून पारित करती हैं, तो उस समय ये चुप्पी मारकर क्यों बैठी रहती हैं? सीपीआई और सीपीएम जब सत्ता में रहती हैं तो खुद ही मज़दूरों के विरुद्ध नीतियां बनाती हैं, तो फिर इनसे जुडी ट्रेड यूनियनें मज़दूरों के हकों के लिए कैसे लड़ सकती हैं? पश्चिम बंगाल में टाटा का कारखाना लगाने के लिए गरीब मेहनतकशों का कत्लेआम हुआ तो सीपीआई व सीपीएम से जुडी ट्रेड यूनियनों ने इसके खिलाफ कोई आवाज़ क्यों नहीं उठायी? जब कांग्रेस और भाजपा की सरकारें मज़दूरो के हकों को छीनती हैं तो भारतीय मज़दूर संघ और इंटक जैसी यूनियनें चुप्पी क्यों साधे रहती हैं? यही कारण है कि चुनावी पार्टियों से जुडी ट्रेड यूनियनें ज़्यादा से ज़्यादा इस तरह की रस्मी हड़तालें ही कर सकती हैं। और वह भी इसलिए कि आम मेहनतकश जनता के बीच और वह भी संगठित क्षेत्र के 7-8 प्रतिशत मज़दूरों के बीच उनकी कुछ ज़मीन बची रहे। देश के 50 करोड़ असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों और के बीच न तो इनकी पहुँच है और न ही उनके बारे में ये यूनियनें चिंतित है। असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों यानी ठेका, केजुअल, एप्रेंटिस मज़दूरों की मांग इनके मांगपत्रके में निचले पायदान पर जगह पाती है और इस क्षेत्र के मज़दूरों का इस्तेमाल महज भीड़ जुटाने के लिए किया जाता है।

पिछले वर्षों की तरह इस वर्ष भी हड़ताल में मुख्य तौर पर बैंक, बीमा, रेलवे व अन्य पब्लिक सेक्टर के कर्मचारी शामिल हुए। असंगठित क्षेत्र यानी ठेका, केज़ुअल, अप्रेंटिस मज़दूरों के बीच इस तरह की हड़ताल का कोई ख़ास असर नहीं रहा। पिछले साल भी इसी दिन इन यूनियनों ने मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों में किये जा रहे मज़दूर-विरोधी संशोधनों के खिलाफ हड़ताल की थी।

साफ़ है कि 2 सितंबर की हड़ताल महज इस व्यवस्था के अंदर दमन और उत्पीडन झेल रही मज़दूर जनता के गुस्से को निकालने वाली हड़ताल थी।  इस हड़ताल में विरोध को और उसके कारण पड़े असर के दृश्य को सरकार और ट्रेड यूनियनों ने बाकायदा नाटकीयता के साथ अदा किया। इन नौटंकीबाजों की पोल खोलने की चुनौती आज हर क्रान्तिकारी संगठन के सामने है। परंतु कई ऐसे संगठन भी हैं जो इनकी इस एक दिन की हड़ताल को रस्म बोलते हैं और इनकी राजनीति का क्रान्तिकारी विकल्प देने की बात करते हैं, मगर इनकी रस्मी हड़तालों में पूरे जी जान से हिस्सेदारी भी करते हैं। जैसे इस ”विकल्प” के लिए एक सेमिनार का आयोजन दिल्ली में 28 अगस्त को किया गया जिसमें मज़दूरों के ‘इंकलाबी’ केंद्र, और ‘क्रन्तिकारी’ सभा सरीखे अराजकतावादी संघाधिपत्यवादी शामिल हुए। इस सम्मलेन में  तमाम संगठनों ने सवाल उठाया कि पिछले 25 सालों से केंद्रीय ट्रेड यूनियनें मज़दूरों के हक़ नहीं बचा पायी लेकिन इसपर इन्होंने चुप्पी साध ली कि दरअसल केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों की राजनीती मज़दूरों को महज आर्थिक संघर्ष के दायरे में उलझाये रखना है और मज़दूरों की राजनीतिक चेतना को कुंद करना है। कहा गया कि केंद्रीय ट्रेड यूनियनें ने इस हड़ताल को रस्मी बना दिया है। लेकिन फिर यही लोग कहते हैं कि उन्हें इस हड़ताल यानी इस रस्म को सफल बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए! यह कैसी समझदारी है? इनका समर्थन अंत में केंद्रीय ट्रेड यूनियनो द्वारा मज़दूरो के गुस्से को एक दिन की रस्मी हड़ताल में निकालकर इस व्यवस्था की ही एक सुरक्षा पंक्ति की भूमिका में इन्‍हें  ला खड़ा करता है।  फिर इसमें नया क्या हुआ? यह नयापन है नया अर्थवाद, पिछलगुआपन और क्रान्तिकारी पार्टी की ज़रूरत को तिलांजलि। हालांकि मज़दूर वर्ग के बीच ये अपनी पकड़ नहीं बना पाये हैं लेकिन उन्हें दिग्भ्रमित करने का काम ज़रूर करते हैं।

2 सितंबर की हड़ताल पर तमाम अराजकतावादी संघाधिपत्यवादी, नव अर्थवादी व अवसरवादी संघटनों ने विकल्प के नाम पर केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की पूँछ पकड़ी!

 खुद को केंद्रीय ट्रेड यूनियन का विकल्प बताने और इनसे अपने को अलग साबित करने में अंत में  ये लोग भी इन केंद्रीय ट्रेड यूनियनों की पूँछ में कंघी ही करते हैं और क्रान्तिकारिता और आंदोलन को मजबूती देने के प्रयास के नाम पर अवसरवादियों के साथ राजनीतिक सम्बन्ध कायम करते हैं। अपने को इनका विकल्प कहने के बाद भी इनके खिलाफ खुलकर कहीं भी संघर्ष नहीं करते और इनकी गद्दारी के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाते। बस अपनी आलोचना को ये सेमीनार कक्षों और कानाफूसी तक ही सीमित रखने में यकीन करते हैं। आन्दोलनों में हर जगह केंद्रीय ट्रेड यूनियन के नेताओं की चाटुकारिता करके ही ये लोग आंदोलन में अपने लिए जगह बनाते हैं। इस बार अपनी क्रान्तिकारिता का प्रणाम देने के लिए हड़ताल के समर्थन में मुँहजुबानी सतत संघर्ष और ठेका मज़दूरों की बात जोड़ दी गयी।  यह भी पिछले साल की अपनी राजनीतिक समझदारी से 180 डिग्री की कोण से पलटी मारने के बाद था। मुँहजुबानी इसलिए कि इन्होंने इस ‘सतत संघर्ष’ के लिए मज़दूरों को कभी ललकारा ही नहीं, इस आधार पर मज़दूरों को लड़ने के तरीके बताये ही नहीं।  सतत संघर्ष कहकर भी इन्होंने असल में सिर्फ 2 सितंबर की हड़ताल में ही अपना नाम चमकाने की कोशिश की। खैर कहने के लिए ही सही, यह इल्हाम इन्हें कैसे हुआ यह जानना भी बड़ा दिलचस्प है। असल में यह चौर्य लेखन की इनकी कला के बिना संभव नहीं है और इस बात में सबसे आगे नौजवानों की ‘क्रन्तिकारी’ सभा बनाने वाले और ‘इंकलाबी’ केंद्र संगठन हैं जो पहले 2 सितंबर सरीखी रस्मी हड़ताल का पूर्ण समर्थन करते थे और जिन्होंने  मज़दूर बिगुल के पन्नों पर आलोचना होने के बाद बिना कुछ कहे अपनी अवस्थिति बदल ली है।  बदली हुयी अवस्थिति में भी अंत में  ये क्रान्तिकारिता को ओढ़ते हैं और अर्थवादी राजनीति की ही नुमाइन्दगी करते हैं।

इंकलाब में नहीं चौर्य कला में माहिर ‘केंद्र’

गौरतलब बात है कि “इंकलाबी” केंद्र और नौजवानों की “क्रान्तिकारी” सभा सरीखे संगठन लम्बे समय तक मज़दूरों की लड़ाई को सिर्फ फैक्ट्री आधारित संघर्ष के आधार पर एकजुट करने की बात करते रहे और इलाकाई आधार व सेक्टरगत आधार पर मज़दूरों की एकजुटता, परमानेन्ट व कॉन्ट्रेक्ट के बीच पैदा हुए विभाजन को अस्वीकार करते रहे और आज अचानक इनके हर नारे और हर पोस्टर पर इलाकाई एकता और ठेका मज़दूरों के अधिकारों की बात आ गयी है। आज तमाम सेमिनारों में ये इलाकाई आधार पर मज़दूरों को यूनियन में एकजुट करने की बात कर रहे हैं और ठेका मज़दूरों के अधिकारों को लडाई का मुख्या मुद्दा बता रहे हैं । परंतु आज से कुछ साल पहले इसे यह सुधार की राजनीति कह रहे थे। मारुति के आंदोलन में भी इनकी ठेका मज़दूरों को कभी साथ न लेने और इलाकाई आधार पर संघर्ष को एकजुट न करने के कारण आन्दोलन को हार का सामना करना पड़ा। परन्तु अब अचानक ये इलाकाई और ठेका मज़दूरों की मांगों को अपने पोस्टरों और पर्चों पर लिखने लगे हैं। ये अगर ईमानदारी से इस निष्कर्ष पर पहुँचते और अपनी गलत समझदारी के लिए अपनी आलोचना रखते तब भी यह स्वागत योग्य बात होती परन्तु न इन्होने इस पैंतरा पलट पर कहीं कोई बात की है और न ही कोई चूं तक की है। असल में इनमें भारतीय मध्य वर्ग के कमजोर मानस की सारी प्रवृत्तियां  हैं।

इन्हें यह इलहाम किसी यज्ञ उपासना से नहीं बल्कि इनकी चौर्य कला से हासिल हुआ है ।  इनके इस चौर्य लेखन पर हम अगली बार और विस्तारपूर्ण तरीके से इनके पर्चों और इनके मुखपत्र में छपे लेखों के हिस्से प्रकाशित कर इनकी राजनीतिक बेईमानी से परिचित करवाएंगे। यहाँ इस बात को इंगित करने का अर्थ था कि इनकी अवसरवादिता आज इतनी बढ़ चुकी है कि इनसे यह उम्मीद करना भूल होगी कि इन्होंने यह गलतियां अपनी कम समझ के कारण की हैं। इनकी अवसरवादिता से हमें परिचित होना चाहिए।  क्योंकि इनकी राजनीति मज़दूरों के स्वतःस्फूर्त संघर्षों पर टिकी हुयी है और ये हर स्वतःस्फ़ूर्त आन्दोलन का जश्न मानते हैं। 2 सितम्बर पर होने वाली रैलियां देखकर इनके अन्दर तूफ़ान हिलोले मारने लगता है और ये फेसबुक से ही आने वाले तूफ़ान का आह्वान तक करने लगते हैं।

निष्कर्ष के तौर पर कहें तो हमारे सामने सवाल यह है कि हम कब तक इन केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और इन दिग्भ्रमित नौसिखि‍यों की बात में आते रहेंगे और इनके बरक्स कब अपना क्रान्तिकारी विकल्प खड़ा करेंगे। हमें लगता है कि ऐसा विकल्प एक स्वतंत्र क्रान्तिकारी यूनियन ही बन सकती है जो संघर्ष के आधार पर एकता बनाती हो न कि चापलूसी और गलत बातें सहने के आधार पर बनाती हो। 1990 में नवउदारवाद और निजीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद से करीब 17 बार पहले भी इसी तरह का ‘भारत बंद’, ‘आम हड़ताल’, ‘प्रतिरोध दिवस’ का आह्वान ये केंद्रीय ट्रेड यूनियनें कर चुकी हैं। मगर इन 26 वर्षों के दौरान ही मज़दूर-विरोधी नीतियों और मज़दूर संघर्षों के दमन में बेतहाशा बढ़ोतरी हुयी है। साफ़ है कि एक दिन की हड़ताल का मकसद होता है मज़दूरों के भीतर पनप रहे गुस्से को थोड़ा-थोड़ा करके निकालना ताकि मज़दूरों का गुस्सा ज्वालामुखी के समान फट न पड़े। इस भूमिका को तमाम नव क्रान्तिकारी और ‘इंकलाबी’ केंद्र इस मैनेजमेंट में भी भागीदार हैं।

हमारा मानना है कि हड़ताल मज़दूर वर्ग का एक बहुत ताकतवर हथियार है जिसका इस्तेमाल बहुत तैयारी और सूझबूझ के साथ किया जाना चाहिए। हड़ताल का मतलब होता है पूँजीवादी उत्पादन का चक्का जाम करना। लेकिन ऐसी एकदिनी रस्मों से पूँजीवाद की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि उलटे इस रस्म को भारतीय पूँजीवाद ने सहयोजित कर लिया है। मज़दूरों को आज अपने हकों की हिफाज़त के लिए जुझारू संघर्ष की लंबी तैयारी करनी होगी। अगर हम एकजुट होकर संघर्ष करें तो अपने हक़ हासिल कर सकते हैं लेकिन संघर्ष के नाम पर एक दिन की रस्मी कवायद से पूँजीवाद के राक्षस को खुजली तक नहीं होती।

मज़दूर बिगुल, अगस्‍त-सितम्‍बर 2016

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