अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जीत का मतलब क्या है?

शिवार्थ

बॉलीवुडिया और हॉलीवुडिया फिल्में देख कर ऐसा प्रतीत हो सकता है कि अमेरिका और यूरोप के फ्रांस, इंग्लैंड जैसे उन्नत देशों में राजनीति और आम जनजीवन में उतनी घोटालेबाज़ी, धनलोलुपता और नंगई नहीं है जितनी कि हमारे देश में है। लेकिन नवउदारवादी नीतियों के पिछले पच्चीस-तीस सालों में पूँजीवादी पतनशीलता ने तीसरी दुनिया के देशों के अलावा अमेरिका और यूरोप के देशों में भी नंगई के ऐसे नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं कि वे अब इस क्षेत्र में भी हमारे देश के नेता-मंत्रियों को राह दिखा रहे हैं। अमेरिका में नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस नंग नीति का नया झण्डाबरदार है! ट्रम्प कोई ज़मीनी स्तर से राजनीति करता हुआ राष्ट्रपति पद तक नही पहुँचा है, बल्कि कुछ अजीब परिस्थियों में आकस्मिक तरीके से राष्ट्रपति बन गया है। ज्यादातर विश्लेषकों का मानना था कि विभिन्न राज्यों मे होने वाले प्राथमिक चुनावों में ही हार कर ट्रम्प बाहर हो जायेगा। चुनावी भाषणों और अन्य खुलासों के पहले भी उसकी छवि एक अय्याश किस्म के अरबपति की थी जो काफी हद तक मसखरा माना जाता था। यहाँ तक कि रिपब्लिकन पार्टी के ही काफी लोगों ने चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बहुत देर बाद नवम्बर के शुरुआती दिनों में ही जाकर ट्रम्प को उम्मीदवार के तौर पर स्वीकार किया।

राष्ट्रपति उर्फ़ खरबपति डोनाल्ड ट्रम्प

ट्रम्प कोई भी सामान्य दक्षिणपंथी नहीं है। जॉर्ज बुश जो बिल क्लिंटन के बाद अमेरिका का राष्ट्रपति बना वह भी एक प्रतिकियावादी पार्टी (रिपब्लिकन पार्टी) का एक प्रतिक्रियावादी नेता था। थोड़े बहुत अन्तर के साथ अमेरिकी राजनीति में मौजूद दूसरी प्रतिक्रियावादी पार्टी, डेमोक्रेटिक पार्टी से 2008 में चुनकर आया पहला अमेरिकी-अफ्रीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी एक प्रतिक्रियावादी शासक था। लेकिन ‘ट्रम्प’ इन दोनों से ही अलग है। डोनाल्ड ट्रम्प, बिल क्लिंटन या बराक ओबामा जैसा कोई पेशेवर राजनीतिज्ञ नहीं है। वह अमेरिका के खरबपतियों में से एक है जिसकी पूँजी रियल-एस्टेट, शेयर-बाज़ार से लेकर कई उद्योगों में लगी है। 1971 में न्यूयॉर्क शहर में अपने पिता से प्राप्त रियल-एस्टेट व्यापर के साथ उसने अपने व्यवसाय की शुरआत की। 1973 में अपनी कम्पनी द्वारा बनाये घरों की बिक्री में और किरायदारों के साथ नस्ली आधार पर भेदभाव करने के लिए सरकार ने उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर किया जिससे बाद में वह बरी हो गया। इसके बाद उसने अपने व्यापार का विस्तार करते हुए ग्रैंड हयात नामक होटल खड़ा किया और अपने भाई के साथ मिलकर जुए के कारोबार की शुरुआत की। उसने ताज महल नाम से दुनिया का सबसे बड़े होटल और कैसिनो बनाना शुरू किया लेकिन 1990 तक उसकी कम्पनी और वह स्वयं दिवालिया होने की कगार तक आ गये। फिर दस साल बाद उसके रियल-एस्टेट व्यापार में दोबारा तेज़ी आई और उसी दौरान उसने पहली बार रिपब्लिकन उम्मीदवार के तौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने का मन बनाया। लेकिन कैलिफ़ोर्निया के प्रारम्भिक चुनाव में बुरी तरह हारने के कारण उसे पीछे हटना पड़ा। इसी के बाद, अपने पैसे और मीडिया एवं फिल्म जगत के लोगों से करीबी के दम पर उसने 2004 में ‘द अप्रेंटिस’ नामक एक रियलिटी टीवी शो में पैसा लगाया। इस शो में विभिन्न प्रतिभागी ‘ट्रम्प आर्गनाईजे़शन’ का सदस्य बनने के लिए आपस में होड़ करते थे। इस शो में ट्रम्प द्वारा इन कलाकारों को बुरी तरह ज़लील करना उसके स्टाइल के तौर पर प्रस्तुत किया गया। लेकिन इसी रियलिटी टीवी शो से ट्रम्प को देश में ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल हुई और 2012 आते-आते उसने दोबारा रिपब्लिकन उम्मीदवार के तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए तैयारी शुरू कर दी। अन्ततः 2016 में वह चुनाव लड़ा और जीत भी गया। परन्तु इस जीत का कारण अगर हम सिर्फ ट्रम्प के व्यक्तिगत अतीत में ढूँढ़ेंगे तो हम ग़लत नतीजों पर पहुँचेंगे। व्यक्तियों को इतिहास बनाता है न कि इतिहास को कोई अकेला व्यक्ति! ऐसा कैसे हुआ कि ट्रम्प जैसा व्यक्तित्व दुनिया की महाशक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति बन गया? यह समझने के लिए हमें इतिहास की उन शक्तियों को समझना होगा जो ट्रम्प जैसी कठपुलियों को संचालित करती हैं। ट्रम्प की जीत को समझने के लिए अमरीकी राजनीति के अन्तर्विरोधों की पड़ताल कनी होगी। वे आर्थिक व राजनितिक कारण क्या हैं जिन्होंने ट्रम्प सरीखे मसखरे को अमरीकी चुनाव में विजय दिलायी?

वैश्विक आर्थिक मन्दी और दुनिया भर में प्रतिक्रियावादी राजनीति का उदय

आज सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में धुर प्रतिक्रियावादी और दक्षिणपंथी राजनीति का उभार हो रहा है और कई देशों ऐसी ताक़तें सत्ता में भी आ रही हैं। दरअसल पूँजीवादी व्यवस्था का के आर्थिक संकट की राजनीतिक अभिव्यक्ति इन प्रतिक्रियावादी सरकारों के रूप में हो रही है। डोनाल्ड ट्रम्प जैसे धुर प्रतिक्रियावादी एवम दक्षिणपंथी व्यक्ति का अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में चुना जाना इसी का एक विशिष्ट उदहारण है। पिछले एक दशक में यूरोप, ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के कई उन्नत देशों में, जो आज से तीस-चालीस पहले उदारवादी नेताओं और पार्टियों के लिए जाने जाते थे, धुर दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी ताक़तें या तो सत्तासीन हुई हैं या फिर अप्रत्याशित तौर पर उनको जनता के बीच समर्थन प्राप्त हुआ है। मज़दूर बिगुल के पन्नों पर हम समय-समय पर इसकी चर्चा करते रहे हैं। पाठकों को याद होगा कि अभी चार महीने पहले ही, यानी जुलाई में ब्रिटेन की जनता ने वहाँ पर हुए एक जनमतसंग्रह में ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से अलग करने के पक्ष में मतदान किया है। इसी को दुनिया भर में ‘ब्रेग्जि़ट’ के नाम से जाना गया। डोनाल्ड ट्रम्प का राष्ट्रपति बनना भी इसी कड़ी का ही अगला हिस्सा है। इसके केन्द्र में 2006 में अमेरिका में ‘सब-प्राइम’ संकट से शुरू हुई वैश्विक आर्थिक मन्दी है। लाख पसीना बहाने के बाद और दुनिया भर के नीम-हक़ीमी नुस्खों की झाड़-फूँक करने के बावजूद हर आने वाले साल के साथ यह मन्दी और गहराती हुई नज़र आती है। भूमण्डलीकरण के दौर में पूरी दुनिया के बाज़ारों की ख़ाक छानने के बावजूद पूँजीपतियों को अपने माल के ख़रीदार नहीं मिल रहे हैं। अर्थशास्त्र की भाषा में जिसे “अतिउत्पादन” का संकट कहते है, उसने पूरे पूँजीवादी विश्व को अँधेरी गली के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। मुनाफ़े की घटती दरों को बनाये रखने के लिए एशिया-अफ्रीका-लातिनी अमेरिकी देशों के मजदूरों का सस्ते से सस्ता श्रम ख़रीदकर उन्हें लगभग भुखमरी और बदहाली की स्थिति तक पहुँचा देने के बाद, अब इस तंगी की मार अमेरिका और यूरोपीय देशों की जनता के निम्न-मध्यम और मध्य वर्गीय संस्तरों तक भी पहुँच रही है ।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1950 और 60 के दशक के दौरान विश्व पूँजीवाद ने लम्बे समय बाद ज़बरदस्त उछाल का दौर देखा। इसी के साथ 150 साल से जारी साम्राज्यवादी लूट के बलबूते अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देश की सरकारें अपने यहाँ के मज़दूरों और निम्न-मध्यवर्गीय आबादी को आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि की बेहतर सुविधाएँ दे सकती थीं। यही कारण था कि इस दौरान जहाँ भारत सरीखे तीसरी दुनिया के देशों की ग़रीब जनता दिन-रात खटने के बाद भी बमुश्किल अपने लिए दो जून की रोटी जुटा पा रही थी वहीं पश्चिमी देशों में आबादी का बड़ा हिस्सा अपेक्षतया इन समस्याओं से मुक्त था (हालाँकि इन ‘उछाल के दिनों’ में भी वहाँ पर ग़रीब देशों से आये प्रवासी मजदूरों का, अश्वेत आबादी के बड़े हिस्से का भयंकर शोषण बदस्तूर जारी था)। 1980 के दशक से शुरू हुए नवउदारवादी भूमण्डलीकरण के दौर में मुनाफे़ की घटती दरों को बनाये रखने के लिए पूँजी सस्ते से सस्ते श्रम की खोज में पूरी दुनिया को रौंद रही थी। अमेरिका और यूरोप की बड़ी कम्पनियों ने अपने कारख़ाने तीसरी दुनिया के देशों में स्थानान्तरित करने शुरू कर दिये जहाँ की सरकारों की मिली-भगत से उन देशों के मज़दूरों के सस्ते श्रम को आसानी से निचोड़ा जा सकता था। इसी की एक बानगी है कि कभी ऑटोमोबाइल उद्योग का केन्द्र माने जाना वाला अमेरिका का डेट्रॉयट शहर आज लगभग उजाड़ हो गया है।

लेकिन पिछली सदी के आखिरी दशक और नई सदी में प्रवेश के साथ एक के बाद एक कई संकटों ने विश्व-पूँजीवाद की कमर तोड़ दी। दरअसल, 1973 के तेल संकट के समय से ही जारी संकटों की श्रृंखला की अगली कड़ी थी, 2006 में अमेरिका में शुरू हुआ सब-प्राइम (यानि ख़राब ऋणों का) संकट जो 1930 की महामन्दी के बाद आज दूसरी वैश्विक पूँजीवादी महामन्दी का रूप ले चुका है। इस संकट के चलते बड़े-बड़े बैंकों के दिवालिया होने की शुरुआत हो गयी जिन्हें अमेरिका और यूरोप के देशों की सरकारों ने अरबों रुपये के बेल-आउट पैकेज देकर बचाया। ऐसे में अब इन उन्नत देशों की पूँजीवादी सरकारों के लिए यह मुमकिन नहीं रह गया कि वह जनता को आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, इत्यादि सुविधाओं का खर्च पहले की तरह उठा सकें। इसी दौरान इन देशों में बेरोज़गारी काफी तेज़ी से बढ़ी और सरकारों की तरफ से दिये जाने वाले बेरोज़गारी भत्ते में भी भारी कटौती की गयी। इन देशों की सरकारें पहले की तरह अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा इन सुविधाओं पर खर्च करेंगी तो मुनाफे़ की घटती दर से जूझ रहे बड़े-बड़े पूँजीपति घराने और बैंक सड़क पर आ जायेंगे। इस समस्या को हल करने का एकमात्र तरीका जो इन पूँजीवादी देशों के हुक्मरानों को नज़र आ रहा है, वह यह है कि वे अपना उदारवादी मुखौटा उतार फेंके और जनता के ऊपर इस पूरे संकट का बोझ डाल दें। यही कारण है कि अमेरिका और यूरोप के लगभग सभी देशों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पेंशन सहित सामाजिक सुरक्षा के तमाम मदों में भारी कटौती की गयी है जिसके विरोध में वहाँ ‘ऑक्युपाई वॉल स्ट्रीट’ जैसे आन्दोलन उभरे हैं।

अमेरिका में आर्थिक मन्दी से पैदा हुई प्रतिक्रियावाद की ज़मीन

डोनाल्ड ट्रम्प जैसे धुर प्रतिक्रियावादी व दक्षिणपंथी व्यक्ति का अमेरिकी राष्ट्रपति चुना जाना आर्थिक मन्दी से जन्म ले रहे प्रतिक्रियावाद का एक विशिष्ट उदहारण है। 2006 के बाद से जारी वैश्विक आर्थिक मन्दी ने अमेरिकी सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और रोज़गार जैसे मदों में किये जाने वाले सरकारी खर्च में भारी कटौती के लिए मजबूर कर दिया। इसके चलते मज़दूर और निम्न-मध्यवर्गीय आबादी भयंकर बदहाली का शिकार है। 2008 में चुनकर आये डेमोक्रैट उम्मीदवार बराक ओबामा से जनता को काफी उम्मीदें थी। लेकिन उसके आठ साल के कार्यकाल ने लोगों के सामने यह स्पष्ट कर दिया अगली सरकार डेमोक्रैट या रिपब्लिकन, किसी की भी हो, इन समस्याओं से उन्हें छुटकारा नहीं दिला सकती। ऐसे में पूँजीवादी व्यवस्था और उसके नेताओं से जनता के इस मोहभंग का इस्तेमाल कोई ऐसी ताक़त कर सकती थी जो उनके समक्ष इस मरणासन्न और मानवद्रोही बन चुकी पूँजीवादी व्यवस्था की कलई खोल कर रख देती और एक क्रान्तिकारी विकल्प प्रस्तुत करती। रिपब्लिकन, डेमोक्रैट या सामाजिक-जनवादी शैली के डेमोक्रैट बर्नी सैंडर्स ऐसा नहीं कर सकते थे, जनता इससे वाकिफ़ थी। क्रान्तिकारी विकल्प प्रस्तुत करने वाली कोई मज़बूत शक्ति अमेरिकी राजनीति में मौजूद है नहीं। ऐसे में ट्रम्प जैसे व्यक्ति ने तरह-तरह के लोकलुभावन नारों और जुमलों के ज़रिए जनता के इस ग़ुस्से का इस्तेमाल अपने पक्ष में कर लिया। यहाँ यह बात ग़ौर करने वाली है कि इस चुनाव में करीब 45 प्रतिशत मतदाताओं ने किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं दिया। यानि ट्रम्प की जीत मुख्य तौर पर जनता की हताशा को दिखलाती है और हताशा हमेशा प्रतिक्रिया की ज़मीन पैदा करती है।

जनता को अगर भविष्य का विकल्प नहीं मिलेगा तो वह उसे अतीत में तलाशेगी और ट्रम्प ने इसी का इस्तेमाल किया। उसने “महान” अमेरिकी राष्ट्र के पुराने दिनों को वापस लाने का नारा दिया। उसने बेरोज़गारी से तंगहाल जनता को यह समझाया कि उसकी इस हालात के ज़िम्मेदार वे प्रवासी हैं जो मेक्सिको और एशिया-अफ्रीका के देशों से आकर उनकी नौकरियाँ खा जाते हैं। इसलिए वह इन प्रवासियों को देश से बाहर कर देगा और उनके आने पर रोक लगा देगा। उसने कहा कि हमारी कम्पनियाँ और पूँजीवादी घराने इसलिए मुनाफ़ा नहीं कमा पाते क्योंकि पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर उन्हें ज़्यादा खर्च करना पड़ता है। इसलिए पर्यावरण सुरक्षा के नियमों को किनारे लगाकर, वह कोयला जैसे उन ऊर्जा स्रोतों का और दोहन करेगा जो बहुत ज़्यादा प्रदूषण करते हैं। पूँजीपतियों को ज्यादा मुनाफ़ा मतलब जनता की बेहतरी! इराक-अफ़ग़ानिस्तान और मध्य-पूर्व में अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों के कारण हुए आर्थिक नुकसान के चलते पिछली सरकारें थोड़ा बचाव की मुद्रा में थीं, मगर ट्रम्प ने ज़्यादा आक्रामक रवैया अपनाते हुए कहा कि अमेरिका को दोबारा महान बनाने के लिए इन्हें और तेज़ करना होगा। अमेरिका को अपनी खोई हुई महानता वापस पाने के लिए दुनिया को डराकर रखना होगा। उसने मुस्लिमों, महिलाओं, अश्वेत नागरिकों, प्रवासियों उन सबको निशाने पर लिया जो अमेरिकी गोरे टुटपुँजिया वर्ग व मज़दूर आबादी के एक हिस्से के पुरुषों के लिए ‘पराये’ थे। ट्रम्प के अनुसार ये सभी ‘पराये’ उसकी बदहाली के लिए ज़िम्मेदार हैं, इसलिए इन्हें ‘ठीक’ करना पड़ेगा। उसने एक बेहद लोकरंजक लेकिन आक्रामक शैली अपनायी जिसने जनता के एक हिस्से में उसकी छवि ”निर्णायक और मज़बूत” व्यक्ति की बनायी। टुटपुँजिया वर्ग (जो कि आज अमेरिकी गोरी आबादी का बड़ा हिस्सा है) को एक तारणहार की ज़रूरत होती है और ट्रम्प में उसे इसकी सम्भावना नज़र आयी।

पर डोनाल्ड ट्रम्प फासीवादी नहीं है!

अमेरिका समाज का इतिहास यह बताने के लिए काफी है कि ऐसा देश जहाँ लम्बे समय से कोई सशक्त मज़दूर आदोलन मौजूद नहीं है, जहाँ का ट्रेड-यूनियन आन्दोलन लम्बे समय से नस्लवाद से ग्रस्त रहा है और जहाँ आम आबादी के बीच वर्ग-चेतना का भारी अभाव है, जहाँ उपभोक्तावाद की संस्कृति अपने चरम पर हो, स्त्रियों और बच्चों के प्रति अपराध एक आम बात हो, उस देश के टुटपुँजिया वर्ग का नायक और तारणहार ट्रम्प जैसा ही कोई व्यक्ति हो सकता था। लेकिन क्या इसका मतलब ट्रम्प एक फासीवादी है और उसका सत्ता में आना अमेरिकी राज्य को एक फासीवादी शासन में तब्दील कर देता है? हिलेरी क्लिण्टन और बर्नी साण्डर्स की हार पर रुदाली और स्यापा करने वाले ‘भद्रजनों’ के एक बड़े तबके से लेकर वाम दायरे के कुछ धड़ों में भी ट्रम्प को फासीवादी साबित करने का प्रयास किया जा रहा है। दूसरे क्या आम मेहनतकश जनता को यह जानने से कोई फर्क पड़ता है कि ट्रम्प फासीवादी है या नहीं? या यह सिर्फ़ एक किताबी सवाल है?

हम इस सवाल से अपनी बात शुरू करेंगे कि हमारे लिए क्यों यह जानना बेहद ज़रूरी है कि ट्रम्प एक फासीवादी है या फिर वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में अमेरिका की विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में पैदा हुआ एक धुर प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी? यह इसलिए ज़रूरी है कि सिर्फ किताबी लोग सड़कों पर उतरकर फासीवाद का मुकाबला नहीं करते बल्कि अपने वास्तविक नेताओं और संगठनों के मार्गदर्शन में यह काम आम मेहनतकश जनता करती है। अगर हर प्रतिक्रियावादी शक्ति को हम फासीवादी करार दे देंगे तो जब वाकई फासीवादी सत्ता में आयेंगे तो हम बगलें झाँक रहे होंगे। जो रोज़ भेड़िया आया, भेड़िया आया करता है; वह सच में भेड़िये के आ जाने पर कुछ नहीं कर पाता! फासीवाद के विरुद्ध जनता के संघर्ष की रणनीति अलग होती है व आम प्रतिक्रियावादी काल में अलग।

आखिर हम ट्रम्प को फासीवादी क्यों नहीं मान सकते? पूँजीवाद के वैश्विक आर्थिक संकट के जिस दौर में आज हम जी रहे हैं, उसमें उदारवादी और कल्याणकारी बुर्जुआ राज्य के लिए सम्भावनाएँ ख़त्म हो चुकी हैं। यही कारण है कि आज दुनिया भर में प्रतिक्रियावादी सत्ताएँ क़ायम हो रही हैं जो जनता को ज़्यादा से ज़्यादा निचोड़कर, उसके हर विरोध को कुचलकर वित्तीय और इजारेदारी पूँजी के हितों की रक्षा कर सकें। लेकिन ऐसी हर प्रतिक्रियावादी ताक़त फासीवादी नहीं हो सकती, क्योंकि फासीवाद एक आधुनिक विचारधारा है जो मुख्यतः वित्तीय और इजारेदार पूँजी की सेवा करती है और टुटपुँजिया वर्गों के समर्थन के दम पर सत्ता में काबिज़ होती है। फासीवाद को तीन प्रमुख चीज़ों के आधार पर ही पहचाना जा सकता है—कैडर आधारित संगठन, फासीवादी विचारधारा और टुटपुँजिया वर्गों के समर्थन की लहर पर उभरा व्यापक सामाजिक आधार वाला आन्दोलन। एक कैडर आधारित संगठन एक सुनिश्चित फासीवादी विचारधारा (जो मूलतः व्यवहारवादी होती है) के आधार पर ही खड़ा किया जा सकता है। इसी संगठन के बलबूते पूँजीवादी संकट के काल में टुटपुँजिया वर्गों के बीच जीवन की बदहाली से उद्धार के लिए ‘पहले वाली महानता’ का स्वप्न दिया जाता है और उन्हें विश्वास दिलाया जाता है कि ”मज़बूत नेता” के  रूप में उनका तारणहार इसे लाकर देगा। इन वर्गों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि उन्हें सत्ता के प्रति बिलकुल वफ़ादार होना होगा और इस तारणहार का विरोध करने वाले हर किसी का सफाया करना होगा; चाहे वो ट्रेड-यूनियन संगठन हो, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता हो या मानवाधिकार कर्मी हो। अपनी वर्गीय महत्वाकांक्षाओं और संकुचित दृष्टि के चलते टुटपुँजिया वर्गों की एक बड़ी आबादी और यहाँ तक कि हताशा से ग्रस्त मज़दूर वर्ग के एक हिस्से को भी कुछ समय के लिए स्वर्ग की प्राप्ति की उम्मीद होने लगती है। कहने की ज़रूरत नहीं कि इस भरोसे का आगे चलकर क्या हश्र होता है!!

अगर इस विश्लेषण के आधार पर ट्रम्प के सत्ता तक पहुँचने की प्रक्रिया को देखें और सवाल करें कि क्या वह वाकई किसी कैडर आधारित संगठन व फासीवादी विचारधारा से टुटपुँजिया वर्गों के बीच से उभरे हुए आन्दोलन के बलबूते सत्ता तक पहुँचा है तो इसका जवाब होगा नहीं। इसका मतलब यह कत्तई नहीं कि फासीवादी चुनाव के रास्ते से सत्ता तक नहीं पहुँचते। हिटलर से लेकर मोदी तक चुनाव जीत कर ही सत्ता तक पहुँचे, लेकिन चुनावों के पहले लम्बे समय तक उनके फासीवादी संगठन ने टुटपुँजिया वर्गों और मज़दूर वर्ग के कुलीन तबकों के अच्छे-खासे हिस्से में काम करते हुए फासीवादी लहर पैदा की थी। इसके उलट, अमेरिका में ट्रम्प के पीछे कोई सामाजिक आन्दोलन नहीं है। ट्रम्प नस्ली या जातीय आधार पर व्यापक दंगा या कत्लेआम कराकर विरोधियों का सफाया करना तो दूर चुनावों से पहले कहे गये अपने बेहद मूर्खतापूर्ण लेकिन जनता के बीच लोकप्रिय हुए जुमलों के एक हिस्से को भी लागू करवाने में मुश्किल का सामना करेगा। मसलन क्या वह प्रवासियों, विशेषकर लातिनी-अमेरिकी प्रवासियों के अमेरिका में प्रवेश पर पूरी रोक लगा सकता है? कत्तई नहीं, क्योंकि इन प्रवासियों के सस्ते श्रम की लूट, अमेरिकी पूँजीपतियों की ज़रूरत है। इसी तर्ज़ पर क्या वह विदेशों में शिफ्ट हुए अमेरिकी कम्पनियों के उत्पादन को वापस अपने देश में ला सकता है, जिससे बेरोज़गारी से ग्रस्त अमेरिकी श्वेत आबादी के लिए नये रोज़गार पैदा हो सकें? यह हो ही नहीं सकता, वित्तीय पूँजी के वर्चस्व के इस दौर में मुनाफ़े की दर जहाँ ज़्यादा से ज़्यादा होगी (और यह वहीं होगा जहाँ लूटने के लिए सस्ते से सस्ता श्रम होगा), उत्पादन के केन्द्र वहीं स्थापित किये जायेंगे। यहाँ तक कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई के नाम पर ट्रम्प ने जिस किस्म के मुस्लिम विरोध की बात की है वह भी महज़ एक जुमला ही साबित होगी। ज़ाहिरा तौर पर कोई फासीवादी शासक भी अपने सभी जुमलों को लागू नहीं करवा पाता लेकिन वह जनता को लम्बे समय तक छलावे में रख पाता है क्योंकि समाज में उसकी पहुँच ज़्यादा गहरी होती है। ट्रम्प के लिए ऐसा करना भी मुमकिन नहीं होगा।

कुल मिलाकर देखा जाये तो ट्रम्प का उभार अमेरिकी सत्ता के फासीवादी हो जाने का प्रतीक नहीं है, लेकिन साथ ही यह भविष्य में ऐसी किसी सम्भावना के पैदा होने के ख़तरों के लिए भी आगाह करता है। यह सही है कि वैश्विक आर्थिक संकट का यह दौर आज जगह-जगह पर बुर्जुआ वर्ग की धुर प्रतिक्रियावादी पार्टियों और शासकों के सत्तासीन होने के लिए उपजाऊ ज़मीन प्रदान कर रहा है, लेकिन साथ ही यही संकट एक क्रान्तिकारी विकल्प के निर्माण और जनता के बीच उसका आधार बनाने के लिए भी ज़मीन उपलब्ध करा रहा है। अगर मज़दूर वर्ग और उसके हिरावल ने समय की इस आहट को अनसुना किया, अगर उन्होंने इस त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार मरणासन्न और मानवद्रोही बन चुकी पूँजीवादी व्यवस्था का जनता के बीच पर्दाफाश नहीं किया तो हम यह ज़मीन फासीवादियों को उपहारस्वरूप भेट कर देंगे। आज मज़दूर वर्ग और उसके हिरावल को आम जनता और विशेषकर मज़दूर वर्ग और टुटपुँजिया वर्ग से आने वाले नौजवानों को उनकी दुःख-तकलीफो के लिए वास्तव में ज़िम्मेदार इस मौजूदा आर्थिक-सामाजिक ताने-बाने की असलियत उजागर करनी होगी और भविष्य का ठोस विकल्प उनके सामने प्रस्तुत करना होगा।

 

मज़दूर बिगुल, दिसम्‍बर 2016


 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
   
 

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन

Related Images:

Comments

comments