भाजपा के सत्ता में आने के बाद से अल्पसंख्यकों व दलितों के ख़ि‍लाफ़़ अपराधों की रफ़्तार हुई तेज़

बिन्‍नी

भारत में धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा आदि के नाम पर विभिन्न हुक्मरान वर्गीय पार्टियाँ अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकती आयी हैं। भाजपा भी मौक़ा मिलते ही देश में लगातार फासीवादी माहौल को अच्छा खाद-पानी दे रही है। मोदी 2014 के चुनावों में देश के अच्छे दिन लेकर आने के नारों की गूँज के साथ देश के बहुपक्षीय विकास का ऐलान करता पूरे देश में छाया रहा था। क्या भाजपा के चुनाव जीतने से देश की साधारण जनता की बेहतर ज़िन्दगी की उम्मीद की जा सकती है? इसका जवाब बिना संकोच के न में दिया जा सकता है। भाजपा किस मक़सद के लिए सत्ता पर विराजमान हुई है यह इसका कार्यकाल ख़त्म होने से पहले ही घोषित किया जा सकता है। मोदी सरकार देश के पूँजीपतियों के संकट की घड़ी में उसका हाथ बँटाने के लिए ही आयी थी और इसके लिए ही अपनी पूरी ताक़त लगा रही है।

भाजपा ने अपने घोषणापत्र में अल्पसंख्यकों (मुस्लिम और ईसाई) और दलितों के लिए आर्थिक और सामाजिक बराबरी के मौक़े, रोज़़गार, सामाजिक एकता और न्याय की गारण्टी, अछूत जैसी पिछड़ी मूल्य-मान्यताओं का ख़ात्मा करने, शान्तिपूर्ण और सुरक्षा का माहौल उपलब्ध करवाने का एजेण्डा घोषित करके बेवजह ही कई काग़ज़ काले किये, क्योंकि पिछले दो वर्षों के दौरान मोदी को अभी तक इन मामलों पर सोचने-विचारने का समय नहीं मिल सका और पूरी उम्मीद है कि आने वाले दिनों में भी मोदी पूँजीपतियों की सेवा में ही व्यस्त रहेंगे।

ऊना, गुजरात में चार दलित नौजवानों को लाठियों से पीटता हुआ तथाकथित गौरक्षक

हम रोज़़ देखते हैं कि आये दिन अल्पसंख्यकों और दलितों के साथ भेदभाव की कोई न कोई घटना हमारे सामने होती है। 21वीं सदी में भारत में अभी भी दलितों को अछूत या अपवित्र आदि कहकर नकार दिया जाता है और समाज का हिस्सा नहीं माना जाता। अल्पसंख्यकों के ख़ि‍लाफ़ तमाम तरह के झूठ प्रचारकर लगातार ज़़हर घोला जाता रहा है। यह भेदभाव इतना भयंकर है कि जाति या धर्म के नाम पर तो आपके जीने का अधिकार भी छीना जा सकता है। हाल ही की एक घटना में उत्तराखण्ड के एक गाँव पिथौरागढ़ में आटा चक्की ‘‘अपवित्र’’ करने के कारण एक उच्च जाति के अध्यापक ने हँसिया से दलित का गला काट दिया। पिछले समय में देखें तो संघ के गौ-भक्तों ने भी कई बेगुनाह मुसलमानों और दलितों को मौत के घाट उतारा है। हाल ही में गुजरात के ऊना ज़िले में दलितों के साथ हुई घटना को कौन भुला सकता है?

कुछ और तथ्यों पर नज़र डालते हैं। लोक सभा में पेश की गयी गृह मन्त्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2016 के पहले पाँच महीनों में ही 278 साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएँ हो चुकी हैं। इन घटनाओं में 903 लोग ज़ख्मी हुए और 38 लोगों की मौत हुई। उत्तर प्रदेश राज्य  साम्प्रदायिक हिंसा की 61 घटनाओं के साथ सबसे आगे रहा है। 2014 में यह आँकड़ा 644 था जो 2015 में 17% बढ़कर 741 हो गया था। दलितों की हालत देखें तो राष्ट्रीय अनुसूचित और जनजाति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक़ गुजरात राज्य में दलितों के ख़िलाफ़ अपराध 2014 में 27.7% से 2015 में 163.3%, और छत्तीसगढ़ राज्य में 2014 में 32.6% से 2015 में 91.9% बढ़े हैं। गुजरात, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तीनों राज्य जहाँ भाजपा की सरकार है दलित के ख़िलाफ़़ अपराधों में सबसे आगे हैं।

ये तथ्य दर्शाते हैं कि भाजपा के आने से फासीवादी तत्वों और दलित के ख़िलाफ़़ अपराधियों को छूट मिली हुई है। आरएसएस की विचारधारा में दलितों, अल्पसंख्यकों, स्त्रियों के विरुद्ध नफ़रत फैलाना शामिल है। मोदी जो कि 2002 में ख़ुद फासीवादी हिंसा में मुसलमानों के क़त्लेआम में शामिल रहा था, से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है? इसलिए, आज ज़रूरत है कि जितने भी उत्पीड़ित वर्ग चाहे वे अल्पसंख्यक,दलित या स्त्रियाँ हों उन्हें समूची जनता के अंग के तौर पर अपनी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सुरक्षा के लिए, भारत की समूची मेहनतकश जनता की पूँजीपतियों के ख़िलाफ़़ वर्गीय लड़ाई को मज़बूत बनाते हुए अपने उत्पीड़न का डटकर विरोध करना पड़ेगा।

 

 

मज़दूर बिगुल, दिसम्‍बर 2016

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