16 दिसम्बर की बर्बर घटना के पाँच साल बाद 
बलात्कार पीड़िताओं को इंसाफ के झूठे वादे

रणबीर

दिसम्बर 2013 में हुए बहुचर्चित दिल्ली बलात्कार काण्ड के बाद बहुत शोर-शराबे के साथ सरकारों ने दावे किए थे कि बलात्कार पीड़ित स्त्रियों को जल्द इंसाफ़ दिलाने के लिए व स्त्रियों के ख़िलाफ़ अपराधों को लगाम कसने के लिए तुरन्त पुख्ता क़दम उठाए जाएँगे। जल्द इंसाफ तो क्या मिलना था लेकिन जल्द ही केन्द्र व राज्य सरकारों का, अदालतों, पुलि‍स-प्रशासन का स्त्री विरोधी चरित्र और भी सामने आ गया है। न तो स्त्रियों के साथ बलात्कार, छेड़छाड़, अपहरण, तेजाब फेंकने, व अन्य धक्केशाहियों में कमी आई है, न ही इस सम्बन्धी पुलिस-प्रशासनिक ढाँचे को दरुस्त किया गया है। कहा गया था कि बलात्कार के हर मामले की फास्ट ट्रेक अदालतों में सुनवाई होगी। कुछ मामलों को छोड़कर बाकी केसों में पीड़ित अदालतों की सालों-साल खाक छानने को मज़बूर हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में रोजाना लगभग बलात्कार के 100 केस दर्ज होते हैं। कहने की ज़रूरत नहीं है कि बलात्कार पीड़ितों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक होगी। अपराधियों द्वारा डराये-धमकाने, बदनामी, पुलिस द्वारा केस दर्ज न करने या टालमटोल, इंसाफ की नाउम्मीद आदि अनेकों कारणों से बहुसंख्यक पीड़ितों द्वारा तो केस दर्ज ही नहीं हो पाते। दर्ज केसों में सिर्फ़ चौथा हिस्सा केसों में ही सज़ा सुनाई जाती है। इन मामलों में भी बड़ी बहुसंख्यक मामलों में लम्बे इन्तज़ार के बाद ही सज़ा सुनाई जाती है। इसके बाद ऊपर की अदालतों में फिर से सालों-साल केस लटकता रहता है। देरी से मिला इंसाफ भी वास्तव में बेइंसाफी ही होता है।

फास्ट ट्रेक केस चलाने के वादों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई गयी हैं। यहाँ तक कि जिन मामलों की समाज में बड़े स्तर पर चर्चा भी होती है उन मामलों में भी फास्ट ट्रेक केस नहीं चलाए जाते। सन् 2014 की आखि‍री तिमाही में लुधियाना में घटित शहनाज़, अगवा, बलात्कार व कत्ल काण्ड इसकी बड़ी उदाहरण है। लुधियाना के ढण्डारी इलाके में 17 वर्ष की शहनाज को अक्टूबर महीने में इलाके के एक गुण्डा गिरोह ने अगवा करके सामूहिक बलात्कार किया था। गुण्डा गिरोह द्वारा डराने-धमकाने, मामला दर्ज करने में पुलिस की टालमटोल, दर-दर की ठोकरें खाने के बावजूद शहनाज और उसके परिजनों ने एफ.आई.आर. दर्ज करवाई। गुण्डा गिरोह कुछ दिनों के लिए जेल में रहने का बाद जमानत पर रिहा हो गया। चार दिसम्बर को घर में घुस करक मिट्टी का तेल डालकर शहनाज को जिन्दा जला दिया गया। चार दिन बाद उसकी मौत हो गयी। मौत से पहले उसने पुलिस व मेजिस्ट्रेट के सामने ब्यान दर्ज करवाए जिसमें उसने सात व्यक्तियों के नाम लिए। कारखाना मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में बनी ढण्डारी बलात्कार व कत्ल काण्ड विरोधी संघर्ष कमेटी के नेतृत्व में हज़ारों लोगों के संघर्ष के दबाव में पुलि‍स ने सारे दोषी (सात) गिरफ्तार कर लिए। पहले तो चालान पेश करने में देरी की गयी, झूठी कहानियाँ गढ़ी गयीं (प्रेम कहानी और परिजनों द्वारा इज़्ज़त के नाम कत्ल) लेकिन जनसंघर्ष के दबाव में ये साजिशें फेल हो गयीं। लेकिन चालान पेश करने में ही तीन महीने का समय लगा दिया गया है। पुलि‍स-प्रशासन ने वादा किया था कि केस फास्ट ट्रेक कोर्ट में चलाया जायेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दो साल होने वाले हैं लेकिन अब तक इस केस का निपटारा नहीं हो पाया है।

जल्द इंसाफ मिलने की सम्भावनाएँ यहाँ बहुत कम हैं। सारी सरकारी व्यवस्था स्त्री विरोधी सोच से ग्रस्त है। जब कोई स्त्री हिम्मत करके पुलिस के पास शिकायत लेकर जाती है तो सबसे पहले उसे ही गुनाहगार ठहराने की कोशिश की जाती है। पुलिस की पूरी कोशिश रहती है कि मामला दर्ज न हो। कोशिश की जाती है कि घूस लेकर मामला रफा-दफा कर दिया जाये। अगर रपट दर्ज भी होती है तो देरी कार कारण मेडीकल करवाने पर बलात्कार साबित करना मुश्किल हो जाता है। अस्पताल के डॉक्टर गवाहियाँ दे के बचने के लिए मामले को रफा-दफा करने या खुद को मामले से दूर रखने के लिए तिकड़मबाजियाँ भिड़ाने लगते हैं। अदालतों में भी स्त्री विरोधी सोच हावी है। पीड़ित स्त्रियों को ही किसी न किसी रूप से गल्त समझा जाता है। वैसे तो जजों और अन्य मुलाजिमों की कमी के कारण अदालतों में अधिकतर मामले लम्बे समय तक लटके रहते हैं लेकिन स्त्री विरोधी अपराधों के मामलों में अदालती व्यवस्था में स्त्रियों के प्रति असंवेदनशीलता हावी होने के कारण भी इंसाफ या तो मिल ही नहीं पाता या देरी से मिलता है।
स्त्रियों के ख़िलाफ़ अपराधों की कमी और इंसाफ़ के लिए सरकारी व्यवस्था में चुस्ती-दरुस्ती पर ही भरोसा नहीं रखा जा सकता। बेशक इसके लिए सरकारी व्यवस्था में चुस्ती-दुरुस्ती आनी चाहिए लेकिन ऐसा भी एक हद तक तब ही हो सकता है जब समाज में स्त्रियों के अधिकारों का एक बड़ा आन्दोलन मौजूद हो। कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस आन्दोलन में स्त्रियों की भागीदारी मुख्य होगी। स्त्रियों की व्यापक भागीदारी वाले इस आन्दोलन के बिना उनके विरुध अपराधों में कमी नहीं आ सकती और न ही अपराधियों को जल्द सज़ाएँ करवाई जा सकती हैं। स्त्री के ख़िलाफ़ अपराधों में कमी के लिए ज़रूरी है कि समाज में स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता का प्रसार हो। ऐसा भी स्त्रियों के व्यापक आन्दोलन के बिना नहीं हो सकता।

मज़दूर बिगुल, दिसम्‍बर 2016

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