पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव
हिन्दुत्ववादी फासिस्टों और रंग-बिरंगे लुटेरे चुनावी मदारियों के बीच जनता के पास चुनने के लिए क्या है?

सम्‍पादक मण्‍डल 

पाँच राज्यों – उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखण्ड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में हिन्दुत्ववादी  फासिस्‍ट भाजपा और संघ परिवार इन चुनावों में जीत के लिए पूरा ज़ोर लगाये हुए थे और पिछले कई महीनों से बेहिसाब पैसे खर्च कर रहे थे, लेकिन 8 नवम्बर की नोटबन्दी ने फिलहाल उनका खेल बिगाड़ दिया है। भले ही 98 प्रतिशत जनता नोटबन्दी के पक्ष में होने के दावे किये जा रहे हैं, लेकिन वास्तव में भाजपा के शिविर में घबराहट है। ऐसा न होता तो ”सर्जिकल स्ट्राइक” को लेकर देशभर में होर्डिंग लगवाने वाले अब तक इसका श्रेय लेने के लिए आपस में होड़ लगा रहे होते।

इन चुनावों से जनता को क्या मिलेगा और इनके प्रति मज़दूर वर्गीय रुख क्या हो, इस पर बात करने से पहले आइये ज़रा चुनाव वाले राज्यों की स्थिति पर एक नज़र डाल लें।

उत्तर प्रदेश 403 विधानसभा सीटों के साथ देश का सबसे बड़ा राज्य और भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पिछले लोकसभा चुनाव में मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के ज़रिए किये गये धार्मिक ध्रुवीकरण और मोदी के झूठे वादों के अन्धाधुन्ध प्रचार की बदौलत भाजपा यहाँ 73 सीटें जीत गयी थी। ऐसी हवा बनाने की कोशिश की जा रही थी कि विधानसभा में भी पार्टी ऐसी ही सफलता दोहरायेगी। मगर मोदी के ढाई साल के कुशासन, वादाख़िलाफ़ी, भयंकर महँगाई, बढ़ती बेरोज़गारी से परेशान लोगों का मोहभंग तेज़ी से हो रहा था, रही-सही कसर नोटबन्दी ने पूरी कर दी। शहरी मध्‍यवर्ग का एक हिस्‍सा भले ही अब भी विमुद्रीकरण और मोदी के गुण गा रहा हो, लेकिन आम मेहनकश लोगों और छोटे शहरों तथा ग्रामीण इलाकों में से इसे लेकर भारी गुस्‍सा है। हालाँकि भाजपा ने अपनी ओर से ज़ोर लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। मोदी सरकार आने के बाद से उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक हिंसा की छोटी-बड़ी 400 घटनाएँ हो चुकी हैं। जातीय ध्रुवीकरण कराने और छोटी-छोटी जातियों को भाजपा के पक्ष में करने के लिए आरएसएस के लोग और अमित शाह लगातार जोड़तोड़ में लगे रहे हैं। बसपा को तोड़ने में उन्‍हें शुरू में सफलता भी मिली थी लेकिन अब लगता है कि स्‍वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं की हालत बिहार में जीतन राम माँझी से अलग नहीं होने वाली है। मोदी लहर के उतार और नोटबन्दी के झटके के बाद भाजपा के लिए कोई चाल कामयाब होती नज़र नहीं आ रही है। ऐसे में साम्प्रदायिक कार्ड खेलने के अलावा उसके पास और तरकीब नहीं है। पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ पार्टी नेतृत्व से भले ही नाराज़ चल रहे हों लेकिन उसकी हिन्दू युवा वाहिनी के लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश में पिछले लम्बे समय से साम्प्रदायिकता की आग सुलगाने में लगे रहे हैं। पश्चिमी उ.प्र. में मुज़फ्फ़रनगर-कैराना की आँच को लगातार ज़िन्दा रखने की कोशिशें जारी हैं। चरणसिंह की विरासत पारम्परिक किसान राजनीति के विघटन के बाद, अपनी वर्ग प्रकृति से निरंकुश ग़ैर-जनवादी प्रकृति वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुलकों-फ़ार्मरों के बड़े हिस्से में हिन्दुत्ववादी फासीवाद का समर्थन-आधार बना है। भाजपा इसे भुनाने की पूरी कोशिश कर रही है। मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के मुख्य आरोपियों में से एक, संगीत सोम की गाड़ी से दंगों की दर्जनों सीडी पकड़े जाना तो बस एक बानगी है।

प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में महीनों से चल रहा पारिवारिक ड्रामा ऐन चुनाव से पहले बेहद योजनाबद्ध ढंग से निपट गया है और सारी गोटियाँ सही-सही जगहों पर फिट हो गयी हैं। अखिलेश यादव की छवि चमकाने के लिए हुए इस नाटक की असलियत भी बहुत से लोगों की समझ में आने लगी है। खींचतान, रूठने-मनाने आदि की रस्मों के बाद कांग्रेस के साथ गँठजोड़ भी पक्का हो गया है। बहुत से लोगों को इस ”धर्मनिरपेक्ष” गठबन्धन से बड़ी उम्मीदें हैं लेकिन उन्‍हें मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के समय सपा की भूमिका, दंगों के बाद राहत शिविरों पर चले बुलडोज़र और सैफ़ई में करोड़ों के खर्च से हुए अश्लील  जश्न, जेलों में बन्द निर्दोष मुस्लिम युवकों के साथ सपा सरकार की वादाख़िलाफ़ी और प्रदेश भर में जनान्दोलनों पर बर्बर सरकारी दमन को ज़रूर याद कर लेना चाहिए।

बहुजन समाज पार्टी जो कुछ समय पहले तक अपने दलित वोटबैंक के साथ एकमुश्‍त मुस्लिम वोटों को जोड़कर जीत के प्रति काफ़ी आश्वस्त ‍नज़र आ रही थी, सपा के इस नये पैंतरे से थोड़ा परेशान है क्योंकि मुस्लिम वोटों के बँटने से उसका गणित गड़बड़ा सकता है। भाजपा को रोकने के लिए जो लोग महाभ्रष्‍ट ”बहनजी” के जीत की उम्मीदें लगाये हुए हैं उन्‍हें यह भी याद रखना चाहिए कि भाजपा के साथ बसपा उत्तर प्रदेश में तीन बार सरकार बना चुकी है। 2002 के गुजरात दंगों के बाद नरेन्द्र मोदी को फौरन क्लीनचिट देकर भाजपा के समर्थन में प्रचार करने वाली भी मायावती ही थीं। बसपा के शासन में ‘कानून-व्यवस्था’ ठीक होने की बातें करने वालों को यह भी याद रखना चाहिए कि मायावती के पिछले शासन में दलितों पर बर्बर अत्‍याचारों के नये रिकॉर्ड बने थे। सैकड़ों निर्दोष मुस्लिम नौजवानों को आंतकवाद के नाम पर झूठे मुकदमों में भी उन्हीं के शासन में फँसाया गया था।

जहाँ तक संसदीय वामपंथियों का सवाल है, तो साम्प्रदायिक फासीवाद को रोकने के नाम पर वे हर प्रकार के सिद्धान्तहीन मोर्चे बनाने के लिए हरदम तैयार रहते रहे हैं। मगर एक तो इस बार कोई उन्‍हें घास नहीं डाल रहा, दूसरे अपने कैडर और समर्थकों की बढ़ती नाराज़गी दूर करने के लिए उन्‍हें इस बार स्वतंत्र वाम विकल्प की हास्यास्पद नौटंकी करनी पड़ रही है। पिछले ढाई साल के दौरान सरकारी नीतियों या भाजपा की साम्प्रदायिक हरकतों के विरुद्ध कोई जुझारू आन्दोलन खड़ा करना तो देर, जुझारू और व्यापक प्रचार अभियान तक न चला पाये ये पिलपिली बहादुर संसदीय वाम दलों का ”महागठबन्धन” बनाकर उत्तर प्रदेश चुनाव में 155 उम्मीदवार खड़े करने जा रहे हैं। वैसे इनकी सबसे बड़ी चुनौती सभी उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्‍त होने से बचाने की होगी।

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा के महाभ्रष्‍ट और अत्‍याचारी कुशासन से जनता में भारी नाराज़गी है। भाजपा शुरू में तो अकालियों को किनारे करके महाराष्‍ट्र की तरह अलग चुनाव लड़ने के मंसूबे बाँध रही थी, लेकिन फिर उसकी हिम्‍मत जवाब दे गयी। हालाँकि इसी इरादे से पंजाब में आर.एस.एस. ने हिन्दू आबादी में अपनी सक्रियता बहुत अधिक बढ़ा दी थी। तमाम डेरों के धर्मगुरुओं की मदद से भाजपा ग़ैर-जाट सिख आबादी को साथ लेने की फ़िराक में थी और दलित सिखों के बीच कांग्रेस के आधार को खिसकाने के लिए जुगत भिड़ा रही थी। पिछले वर्ष संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पंजाब के कई चक्कर काटे। पंजाब के कई शहरों में इनके “शिक्षा शिविर” हुए और जालन्धर व मलेरकोटला में संघ ने हथियारबन्द “रूट मार्च” किये और बरनाला, जैतो आदि शहरों में संघ के काडरों ने पिस्तौलें, बन्दूकें लहराते हुए मार्च आयोजित किये। लेकिन पंजाब में संघ की फिरकापरस्त राजनीति सिरे नहीं चढ़ पा रही। कुछ जगहों पर तो दंगा कराने की कोशिश करने पहुँचे संघियों को लोगों ने पीटकर खदेड़ दिया। सत्तारूढ़ गठबन्धन से जनता की नाराज़गी का फ़ायदा पिछले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिला था। पंजाब में बारी-बारी से राज करते आ रहे कांग्रेसियों और अकालियों से अलग किसी ”साफ-सुथरे” विकल्प को आज़माने के चक्‍कर में विधानसभा चुनाव में भी आप को व्यापक समर्थन मिलता लग रहा था। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आता जा रहा है, ‘आप’ का नशा कम होता दिखायी दे रहा है। जगह-जगह आप ने पुराने कां‍ग्रेसियों को या फिर कई बदनाम चेहरों को टिकट दिये हैं। टिकट पाने वालों में ‘आम आदमी’ तो गिनती के ही हैं, ज्‍़यादातर धनी किसान, व्यापारी, ठेकेदार आदि ही हैं। एक बड़ी आबादी को अब लगने लगा है कि जब ‘आप’ और दूसरी चुनावी पार्टियों में कोई फ़र्क ही नहीं है तो क्यों न कांग्रेस को ही फिर आज़माया जाये।

उत्तराखण्ड बनने के बाद से वहाँ बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस का शासन रहा है और विभिन्‍न छोटी क्षेत्रीय पार्टियाँ सत्ता की मलाई चाटने के लिए बेशर्मी से कभी इसका कभी उसका दामन थमती रही हैं। इस बार भी स्थिति कुछ अलग नहीं होने वाली है। हरीश रावत सरकार की नाकामियों और कांग्रेस के पिछले मुख्यमंत्री रहे विजय बहुगुणा सहित कई कांग्रेसि‍यों को फोड़ लेने से भाजपा कुछ उत्‍साहित है लेकिन नोटबन्दी से जनता की नाराज़गी ने यहाँ भी उसे डरा रखा है। हालत यह है कि ब्राह्मण वोटरों को लुभाने के चक्‍कर में भाजपा ने कांग्रेस और सपा से परित्‍यक्‍त 91 साल के नारायणदत्त तिवारी को शामिल करा लिया है।

गोवा में भाजपा और कांगेस के बीच मुख्य मुकाबला है, हालाँकि ‘आप’ यहाँ भी ”नये विकल्प” का अपना सिक्‍का चलाने की कोशिश कर रही है। गोवा के वोटरों को लुभाने के लिए भाजपा गोमांस खाने को उनका अधिकार बताने से भी नहीं चूकी है लेकिन पिछले पाँच साल के भाजपाई शासन से लोगों की नाराज़गी बहुत अधिक है। ऊपर से आरएसएस का एक बड़ा हिस्‍सा पिछले दिनों बग़ावत करके संघ से अलग हो चुका है। कांग्रेसी तो भ्रष्‍टाचार के कीर्तिमान क़ायम करने में सबसे आगे ख़ैर हैं ही। तमाम छोटे राज्यों की तरह गोवा में भी प्राकृतिक संसाधनों की अन्धी लूट और भ्रष्‍टाचार में सभी पार्टियाँ आपस में होड़ करती रहती हैं।

मणिपुर में नगा और कुकी समुदायों के बीच भयंकर कलहपूर्ण संघर्ष के चलते महीनों से जारी आर्थिक नाकाबन्दी के बीच हो रहे चुनाव में भाजपा एक बार फिर वही ख़तरनाक खेल खेल रही है जिसके दम पर वह पिछले दिनों असम में चुनावी जीत हासिल कर चुकी है। असम में अलग-अलग समुदायों के स्‍थानीय निवासियों के बीच नफ़रत फैलाकर जीतने के बाद भाजपा मणिपुर में भी इस आग को हवा दे रही है और इस खेल में कांग्रेस अपनी गोटियाँ खेल रही है। सेना के दमन के विरोध में और सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (आफ्सपा) हटाने की माँग को लेकर 16 साल तक भूख हड़ताल करने वाली इरोम शर्मिला भी अपनी पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में उतरी हैं लेकिन अभी वहाँ कांग्रेस का ही पलड़ा भारी लग रहा है।

कुल मिलाकर, तस्‍वीर बिल्‍कुल साफ़ है। इस देश में पिछले 70 साल से चल रहे लोकतंत्र के खेल में हर बार की तरह इस बार भी, एक चीज़ पहले से तय है – तमाम चुनावी मदारियों में से जीते चाहे कोई भी, हारेगी फिर जनता ही!

कुछ लोग इन चुनावों को फासीवाद के विरुद्ध जंग के तौर पर पेश करने की कोशि‍श करते हुए तर्क दे रहे हैं कि अन्‍य चुनावों के मुकाबले ये चुनाव विशेष महत्व रखते हैं क्योंकि इनमें भाजपा की हार से मोदी सरकार कमज़ोर होगी और 2019 में उसकी सत्ता से बेदखली का रास्ता साफ हो जायेगा। बेशक, आगामी विधानसभा चुनावों में हारने से भाजपा कमज़ोर होगी लेकिन इसे ही फासीवाद के विरुद्ध लड़ाई मान लेना और लुटेरों के दूसरे गिरोहों का समर्थन करने लगना जनता को उसी भ्रमजाल में उलझाये रखना है जिसमें वह आज़ादी के बाद से फँसी हुई है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस सहित तमाम अन्‍य दलों द्वारा लागू की गयी नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने ही वह ज़मीन तैयार की है जिस पर हिन्दुत्ववादी फासीवाद की विषबेल फलीफूली है। विकल्प केवल एक ही है, इस अन्‍यायी पूँजीवादी व्यवस्था और इसके नकली लोकतंत्र को उखाड़ फेंककर एक ऐसी व्यवस्था क़ायम करना जिसमें उत्‍पादन, राजकाज और समाज के पूरे ढाँचे पर वास्तव में उत्‍पादन करने वाले वर्गों का कब्‍ज़ा हो। यह एक लम्बी लड़ाई है और इसके लिए ज़रूरी है कि नकली लोकतंत्र की असलियत को हर मेहनतकश को समझा दिया जाये।

दूसरे, यह भी समझ लेने की ज़रूरत है कि बुर्जुआ संसदीय प्रणाली में अल्पमत-बहुमत का खेल कितना भ्रामक होता है और इस विधि से प्राप्त जनादेश वस्तुत: बहुसंख्यक जनसमुदाय की वास्तविक आकांक्षाओं को सटीकता के साथ अभिव्यक्ति कर ही नहीं सकता। अक्‍सर संसदीय वाम दलों के प्रवक्ता, नेता और विश्लेषक तथा कुछ सामाजिक जनवादी मिजाज के वाम बुद्धिजीवी बिहार और कुछ अन्‍य चुनावों में भाजपा की हार या उसके वोटों में गिरावट के हवाले देकर खुद को तसल्ली देने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपाई लहर अब उतार पर है। इस तसल्ली के साथ ऐसी कथित वाम धारा के लोग आँखों में घूरती सच्चाई से मुँह मोड़कर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में जनता को यह सन्देश देने लगते हैं कि अगले लोकसभा चुनावों में भाजपा पराजित हो जायेगी और इस प्रकार हिन्दुत्ववादी फासीवाद को धूल चटा दी जायेगी। नोटबन्दी के बाद से ऐसी आवाज़ें और तेज़ हो गयी हैं जिन्‍हें लगता है कि मोदी ने तो ”सेल्‍फ़ गोल” मार लिया और अब उनका काम आसान हो गया है।

किसी भी बुर्जुआ संसदीय प्रणाली के अन्तर्गत चुनाव जीतकर यदि फासिस्ट सत्ता में आते हैं तो इसका मतलब यह कत्तई नहीं होता कि बहुसंख्यक जनता उसके साथ है, लेकिन इतना तो ज़ाहिर है कि चुनावी जीत भी बताती है कि फासिस्ट उभार उठान पर है और समाज में इस धुरप्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन का आधार विस्तारित हो रहा है। अत: इस तथ्य से आँखें कत्तई नहीं मूँदी जा सकती कि भाजपा के वोट प्रतिशत में इज़ाफ़ा फासिस्ट संकट की चुनौती की गम्भीरता को रेखांकित कर रहा है। यदि 2011 और 2016 की भी तुलना करें तो असम में भाजपा के वोट प्रतिशत में 11.5 प्रतिशत से 29.5 प्रतिशत, केरल में (गठबन्धन  के दलों सहित) 6.0 से 14.4 प्रतिशत, पं.बंगाल में 4.1 प्रतिशत से 10.3 प्रतिशत और तमिलनाडु में 2.2 प्रतिशत से 2.8 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। 2011 में देश के 6 राज्यों  में अकेले और 3 राज्यों में गठबन्धन बनाकर भाजपा सत्ता में आयी थी, कांग्रेस 11 राज्यों में अकेले और 2 में गठबन्धन बनाकर सत्तासीन हुई थी तथा 6 राज्यों में क्षेत्रीय दलों की व एक में वाम दलों की सरकार बनी थी। 2016 में 9 राज्यों में भाजपा अकेले और 4 में गठबन्धन के दलों के साथ सत्ता रूढ़ है, कांग्रेस 6 राज्यों में सिमट गयी है, क्षेत्रीय दलों के कब्जे में 9 राज्य हैं और दो पर संसदीय वाम काबिज है। 2017 में पंजाब, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, मणिपुर में तथा 2018 में हिमाचल, मेघालय, कर्नाटक, और मिजोरम के विधान सभा चुनाव होने हैं। इनमें से कर्नाटक, हिमाचल और उत्तराखण्ड में भाजपा की ही सरकार बनने की अधिक सम्भावना है। पंजाब में आप पार्टी और कांग्रेस के बीच मत विभाजन के बावजूद यदि अकाली-भाजपा गठबन्धन  दुबारा सत्ता  में नहीं आ पाया, तो भी भाजपा के वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी की सम्भावना है। असम के बाद भाजपा अब पूर्वोत्तर को लेकर दूरगामी रणनीति पर काम कर रही है, जिसमें विशेषकर हिन्दुत्व की राजनीति के साथ-साथ विभिन्न उपराष्ट्रीयताओं की पहचान राजनीति को हवा देने और उनके आपसी टकरावों का लाभ उठाने के साथ ही कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के स्थानीय क्षत्रपों को साथ मिला लेने की जोड़-तोड़ भी शामिल है।

कुल मिलाकर, भाजपा की चुनावी सफलताएँ और आज़ादी के बाद पहली बार सबसे बड़े राष्ट्रीय दल के रूप में उसका उभरकर सामने आना भारतीय राजनीति में संघ परिवार की हिन्दुत्ववादी फासीवादी राजनीति के प्रचण्ड  उभार का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, लेकिन चुनाव परिणामों के इस विश्लेषण से यह कत्तई नहीं समझा जाना चाहिए कि कांग्रेस और क्षेत्रीय बुर्जुआ पार्टियाँ यदि तालमेल करके चुनावों में भाजपा को शिकस्त दे दें या 2019 के आम चुनावों में जीतकर यदि कांग्रेस गठबन्धन फिर से केन्द्र में सत्तासीन हो जाये तो हिन्दुत्ववादी फासीवादी लहर को पीछे धकेल दिया जायेगा। बुर्जुआ संसदीय चुनावों में हराकर नहीं, बल्कि व्यापक मेहनतकश जन समुदाय को लामबन्द करके सड़कों पर आर-पार की लड़ाई में ही फासीवाद को निर्णायक शिकस्त दी जा सकती है। फासीवाद को निर्णायक शिकस्त देने का मतलब एक ही हो सकता है और वह है उसे नेस्तनाबूद कर देना।

भाजपा हिन्दुत्ववाद का मात्र संसदीय मोर्चा है। हिन्दुत्ववाद हर फासीवादी आन्दोलन की तरह एक धुरप्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन है। यह मुख्यत: मध्य वर्ग का सामाजिक आन्दोलन है, जिसके साथ उत्पादन प्रक्रिया से कटे हुए विमानवीकृत मज़दूर भी खड़े हैं और जिसे बड़े-छोटे पूँजीपतियों और कुलकों-फार्मरों के बहुलांश का- यानी बुर्जुआ सत्ता के सभी छोटे-बड़े हिस्सेदारों के बहुलांश का समर्थन हासिल है। इस प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन का संघ परिवार का कैडर आधारित सांगठनिक ढाँचा हरावल दस्ता है। इसका कारगर प्रतिरोध एक क्रान्तिकारी सामाजिक आन्दोलन ही कर सकता है जिस पर मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी राजनीति का वर्चस्व एक कैडर आधारित सांगठनिक ढाँचे के माध्यम से स्थापित हो। इस लड़ाई की प्रकृति का सादृश्य निरूपण यदि सामरिक संघर्ष से करें तो कहा जा सकता है कि यह छापामार युद्ध (गुरिल्ला वारफेयर) या चलायमान युद्ध (मोबाइल वारफेयर) जैसी न होकर दीर्घकालिक स्थितियों के युद्ध (पोजीशनल वारफेयर) जैसी होगी। फासिस्टों ने विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के रूप में समाज में अपनी खन्दकें खोद रखी हैं और बंकर बना रखे हैं। हमें भी अपनी खन्दकें  खोदनी होगी और बंकर बनाने होंगे। बेशक यह काम मेहनतकश जन समुदाय के राजनीतिक और आर्थिक संघर्षों के साथ-साथ होगा और मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी राजनीति का केन्द्र यदि संगठित हो तो रणकौशल के तौर पर बुर्जुआ संसदीय चुनावों के मैदान में भी फासिस्टोंे से भिड़ंत की जा सकती है, लेकिन यह मुगालता पालना आत्मघाती होगा कि चुनावी हार-जीत से फासिस्टों को पीछे धकेला जा सकता है। मेहनतकश जन समुदाय (शहरों-गाँवों के सर्वहारा और अर्द्धसर्वहारा) के सभी हिस्सों का फासीवाद-विरोधी साझा मोर्चा आज की सर्वोपरि ज़रूरत है। इसके बाद ही निम्न मध्य वर्ग के रैडिकल, सेक्युलर तत्वों- विशेषकर छात्रों-युवाओं की जुझारू आबादी को, मजबूती से साथ लिया जा सकेगा। बुर्जुआ वर्ग का कोई भी हिस्सा या बुर्जुआ वर्ग की कोई भी पार्टी फासीवाद विरोधी संघर्ष में मेहनतकश जनता का रणनीतिक मित्र नहीं हो सकती। संसदीय वाम जब फासीवाद विरोधी संघर्ष को चुनावी संघर्ष और प्रतीकात्मक प्रतिरोधों तक सीमित कर देता है, जब वह मज़दूर वर्ग की राजनीतिक शिक्षा और राजनीतिक संघर्षों को तिलांजलि देकर उसकी राजनीतिक चेतना को कुन्द करता है, जब वह मुट्ठीभर संगठित कुलीन मज़दूरों तक सिमटकर 95 प्रतिशत अतिशोषित असंगठित सर्वहाराओं को पूँजीवादी निर्बन्ध लूट और बुर्जुआ राजनीतिक वर्चस्व की अधीनस्थता के लिए अरक्षित छोड़ देता है, तो वह एक ऐतिहासिक अपराध और ऐतिहासिक विश्वासघात करता है।

ग़ौरतलब है कि 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध से ही, भाजपा चाहे सत्ता में रहे या न रहे, हिन्दुत्ववादी फासीवादी लहर थोड़ा आगे-पीछे होते हुए, कभी कुछ तेज तो कभी मद्धम गति से लगातार आगे बढ़ती रही है। आगे भी भारतीय बुर्जुआ समाज में यह लगातार अपनी ज़्यादा से ज़्यादा आक्रामक उपस्थिति तब तक बनाये रखेगी, जबतक क्रान्तिकारी राजनीति संगठित होकर इसका प्रतिरोध नहीं करेगी।

बीसवीं शताब्दी में बुर्जुआ राजनीति में धुर दक्षिणपन्थी और फासिस्ट प्रवृत्तियाँ विशेषकर उन दौरों में मजबूत होकर सिर उठाती थीं जब पूँजीवाद आवर्ती चक्रीय क्रम में आने वाले आर्थिक संकट और मन्दी के दौर से गुजरता था। 1920-30 के दशकों की महामन्दी और महाध्वंस को समझे बिना हिटलर और मुसोलिनी को एक परिघटना के रूप में नहीं समझा जा सकता। उस समय पश्चिम के सभी देशों में फासीवाद एक आन्दोलन  के रूप में फैला था। अब विश्व पूँजीवाद 1970 के दशक से ही जिस दीर्घकालिक मन्दी को झेल रहा है, उससे वह वस्तुत: कभी उबर पाया ही नहीं। पूँजीवाद का यह संकट ‘पीरियॉडिक’ न होकर ‘स्ट्रक्चरल’ (ढाँचागत) है। यह एक ‘टर्मिलन’ व्याधि है जो मृत्यु के साथ ही इसका पिण्ड छोड़ेगा। नवउदारवाद की आर्थिक नीतियों से किसी प्रकार के ‘कीन्सियन रिट्रीट’ का स्पेेस लगभग न के बराबर बचा है। इन नीतियों को प्रभावी ढंग से कोई निरंकुश सत्ता ही लागू कर सकती है। यही कारण है कि आज बुर्जुआ जनवाद और नग्न‍ निरंकुश सत्ता के बीच की विभाजक रेखाएँ धूमिल होती जा रही हैं और पूरी दुनिया में, पश्चिम से पूरब तक, अधिकांश देशों में फासीवादी आन्दोलन  विभिन्न रूपों में सिर उठा रहे हैं और अपने सामाजिक आधारों का विस्तार कर रहे हैं। भारत में भी संघ परिवार 1925 से निरन्तर काम करता रहा है और समय-समय पर दंगों में तथा मज़दूर आन्दोलन विरोधी सरगर्मियों में अहम भूमिका भी निभाता रहा है, लेकिन नवउदारवाद का दौर ही वह काल रहा है जब रथयात्रा-बाबरी मस्जिद ध्वंस, गुजरात-2002 आदि अहम मुकामों से होता हुआ यह इस मुकाम तक आ पहुँचा है कि भाजपा आज सबसे बड़ी बुर्जुआ राष्ट्रीय पार्टी के रूप में केन्द्र में और देश के कई राज्यों में सत्ता सम्हालते हुए निरंकुश दमनकारी तरीके से नवउदारवादी नीतियों को लागू कर रही है और दूसरी ओर उसकी फासिस्ट गुण्डा वाहिनियाँ सड़कों पर उत्पात मचा रही हैं, धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित कर रही हैं तथा अन्धराष्ट्रवाद का उन्माद फैला रही हैं।

भाजपा सत्ता में रहे या न रहे, फासीवाद के विरुद्ध लड़ाई की योजनाबद्ध, सांगोपांग, सर्वांगीण तैयारी क्रान्तिकारी एजेण्डे पर हमेशा प्रमुख बनी रहेगी, क्योंकि फासीवाद राजनीतिक परिदृश्य  पर अपनी प्रभावी उपस्थिति तबतक बनाये रखेगा, जबतक राज, समाज और उत्पादन का पूँजीवादी ढाँचा बना रहेगा। इसलिए फासीवाद विरोधी संघर्ष को हमें पूँजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी क्रान्तिकारी संघर्ष के एक अंग के रूप में ही देखना होगा। इसे अन्य किसी भी रूप में देखना भ्रामक होगा और आत्मघाती भी।

जनता के लिए नये विकल्प का निर्माण लिल्‍लीघोड़े पर सवार गत्ते की तलवारें भाँजते हुए नकली लाल सूरमा भोपालियों के बस की बात नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है मज़दूर वर्ग की एक नयी क्रान्तिकारी पार्टी का निर्माण, देश भर में मेहनतकश जनता की समानान्तर सत्ता के रूप में क्रान्तिकारी लोकस्वराज्य पंचायतों की स्थापना और साथ ही एक नये क्रान्तिकारी ट्रेड यूनियन आन्दोलन का निर्माण। यह एक लम्बा रास्ता है, लेकिन हमारे पास यही विकल्प है! और हमें इसी को चुनना चाहिए। 70र्ष वर्ष मौजूद पूँजीवादी जनतन्त्रा की असलियत को पहचानने के लिए काफ़ी होते हैं! 70 वर्ष नींद से जागने के लिए काफ़ी होते हैं!

 

 

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2017

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