अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियाँ और जनता का प्रतिरोध

लता

ट्रम्प जैसे निहायत ओछे, लम्पट और नारी विरोधी व्यक्ति का विश्व -पूँजीवाद के शिखर पर अासीन होना पूँजीवाद के पतन की चरम सीमा की अभिव्यक्ति है। पतनशील पूँजीवादी व्यवस्था जनवाद और मानवता का झीना पर्दा सापेक्षिक साफ़-सुथरी छवि वाले बुर्जुआ नेता के माध्यम से अपने ऊपर जो ढँकने का प्रयास करती है, ट्रम्प जैसा लम्पट उसे खींचकर उतार फेंकता है। चुनाव प्रचार के दौरान निहायत बेहूदा नारी-विरोधी बातों, प्रवासी-विरोधी, इस्लाम-विरोधी नारों के बावजूद उसका सत्ता में आना पूरी दुनिया के लिए चौंका देने वाला था। लेकिन ढाँचागत संकट के दौर में पूँजीवाद की राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में फासीवादी प्रवृत्तियों का विभिन्न रूपों में उभार कत्तई चौंकाने वाली बात नहीं है। अमेरिकी चुनावों के ट्रम्पीय परिणाम को इससे जोड़कर ही समझा जा सकता है।

यह तो सही है कि ट्रम्प का सत्ता में आने को अमेरिका में फासीवाद का सत्ता में आना नहीं कहा जा सकता क्योंकि ट्रम्प के पीछे कोई फासीवादी पार्टी या फासीवादी सिद्धान्त आधारित कोई आन्दोलन नहीं है। लेकिन ट्रम्प की जीत से वहाँ फासीवादी प्रवृत्तियों और तत्वों को बल मिला है। उसे सत्ता में लाने वाली रिपब्लिकन पार्टी अमेरिका में रूढ़ि‍वादी विचारों की मुख्य प्रति‍निधि‍ मानी जाती है। ट्रम्प ने अपने चुनाव प्रचार में जो तौर-तरीक़़े अपनाये वे एक फासीवादी नेता के समान ही थे। उसने एक सशक्त और निर्णायक नेता की छवि प्रस्तुत की जो अमेरिका को ”एक बार फिर महान” बनायेगा। जिस तरह फासीवाद किसी काल्पनिक महान इतिहास की रचना कर जनता की निराशा को अपने पक्ष में कर लेता है उसी तरह ट्रम्प ने अमेरिका को एक बार फिर महान राष्ट्र बनाने का वायदा कर बेरोज़गारी, बदहाली, और ग़रीबी की मार झेल रही अमेरिकी जनता को सुनहरे भविष्य के सपने दिखाये। किसी महान इतिहास और उसके खो जाने के कथानक में एक दुश्मन की आवश्यकता होती है और फिर उस काल्पनिक स्वर्णिम युग का दुश्मन वर्तमान समय की समस्याओं का जि़म्मेदार बन जाता है। जैसे भारत में संघी फासिस्ट मुसलमानों को दुश्‍मन की तरह पेश करते हैं, वैसे ही अमेरिका में ट्रम्प ने प्रवासियों पर निशाना साधा। इस दुश्मन के ख़िलाफ़ घोर नफ़रत पैदा कर उसे समाज के संकट का ज़िम्मेदार बताना ज़रूरी हो जाता है ताकि असली समस्याओं पर परदा डाला जा सके। ट्रम्प के अनुसार प्रवासी लोग अमेरिकी जनता की नौकरियाँ और संसाधन छीन लेते हैं और इसीलिए आम अमेरिकी जनता बेरोज़गारी और सुविधाओं में कटौती से परेशान है।

इस परिप्रेक्ष्य से ट्रम्प और उसकी नीतियों को समझा जा सकता है। इसके अलावा पूँजीवाद के पास जनता का ध्यान मूल मुद्दों से भटकाने के लिए एक और आज़माया नुस्ख़ा भी है, आतंकवाद। अमेरिका जो पूरे विश्व में आतंकवाद का सबसे बड़ा जन्मदाता और संरक्षक है, वह बेहद कुशलता से अपने संचार तन्त्र, मीडिया और सिनेमा के माध्यम से जनता के बीच आतंकवाद के प्रति एक सतत भय बनाये रखता है। इसी कड़ी में ट्रम्प ने सात मुसलमान देशों को अमेरिका की सुरक्षा के लिए ख़तरनाक घोषित किया।

ट्रम्प के भारतीय हिन्दुत्ववादी भक्त

अब जबकि यह तय कर दिया गया कि अमेरिका के भविष्य को सुधारने और महान राष्ट्र बनाने के रास्ते के प्रमुख रोड़े आप्रवासन और अातंकवाद हैं तो इनसे निपटना बेहद ज़रूरी था। इसलिए राष्ट्रपति पद का कार्यभार सम्भालते ही ट्रम्प ने इनके ख़िलाफ़ आक्रामक नीतियाँ बनानी शुरू कर दीं। वैसे तो अमेरिका की 45 प्रतिशत जनता ने दोनों में से किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं दिया है, लेकिन जनता का भ्रम बनाये रखने के लिए ट्रम्प की ओर से ऐसी नीतियों का आक्रामक अमल ज़रूरी था, और बिना किसी को निराश किये उम्मीदों पर खरा उतरते उसने अपने कार्यकाल के पहले सप्ताह में ही सात मुसलमान बहुल देशों, ईरान, इराक, सीरिया, यमन, लीबिया, सूडान और सोमालिया पर 90 दिनों तक के लिए आप्रवासन प्रतिबन्ध लगा‍ दिया और शरणार्थियों पर 120 दिनों का पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया। अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर दीवार निर्माण की घोषणा कर दी। ट्रम्प ने अमेरिका के एक करोड़ 10 लाख ग़ैरक़ानूनी प्रवासियों को निर्वासित करने की धमकी दे दी और साथ ही यह भी कहा है कि ऐसे शहर जो ग़ैरक़ानूनी प्रवासियों को कुछ संरक्षण देते हैं उनके फे़डरल फ़ण्ड में भारी कटौती की जायेगी जैसे न्यूयॉर्क, लॉस एंजे‍ल्स, शिकागो, फि़लाडेल्फि़या, बोस्टन, डेनवर, वाशिंगटन, सैन फ्रांसिस्को और सिएटल।

सात देशों पर प्रतिबन्ध की वजह उसने राष्ट्रीय सुरक्षा और अमेरिकी-मेक्सिको सीमा पर दीवार निर्माण की वजह अमेरिकी रोज़गार और संसाधनों को अमेरिकी जनता के लिए सुरक्षित करना बताया। अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर दीवार निर्माण के सन्दर्भ में सबसे मजे़दार बात यह रही कि ट्रम्प ने बार-बार यह कहा कि इस दीवार के निर्माण का ख़र्च मेक्सिको देगा। दीवार निर्माण के निर्णय और घोषणा में ट्रम्प ने एक बार भी मेक्सिको के राष्ट्रपति पेन्या नेयतो से सलाह-मशविरा नहीं किया और फिर सीधे उन्हें भुगतान के लिये कहा जाने लगा। पेन्या नेयतो ने इससे साफ़ इनकार कर दिया। यदि ज़रूरत अमेरिका की है तो इसका भुगतान मेक्सिको भला क्यों करे? देर से ही सही लेकिन अब ट्रम्प को शायद यह सीधी सी बात समझ आ गयी है, इसलिए उसने कहा है कि अब 3,200 किमीटर लम्बी दीवार का निर्माण फे़डरल फ़ण्ड से होगा जो कि बेहद ख़र्चीला होने वाला है।

आप्रवासन पर प्रतिबन्ध निश्चित ही इन सात देशों की विश्व स्तर पर एक खराब छवि प्रस्तुत कर रहा है। विश्व में पहले से फैली मुसलमान विरोधी लहर को यह और भड़कायेगा। युद्ध प्रभावित क्षेत्र, मुख्यत: सीरिया से आने वाले आप्रवासियों के लिए इसने बेहद कठिन स्थिति पैदा कर दी है। कई लोग जिन्हें शरणार्थी का दर्जा मिल गया था और वे अपने देशों में नौकरी छोड़ चुके थे और सम्पत्ति बेचकर अमेरिका आने की तैयारी में थे अब उनकी जि़न्दगी शरणार्थियों पर लगे पूर्ण प्रतिबन्ध की वजह से अधर में लटक गयी है।

इसके अलावा एच-1बी वीज़ा पर प्रतिबन्ध और उसके वेतन में दुगनी वृद्धि अमेरिका के आईटी सेक्टर को ख़ासा प्रभावित करने जा रहा है। यह वहाँ की कम्पनियों के लिए एक बड़ी चिन्ता का विषय है क्योंकि उच्च प्रशिक्षण प्राप्त मज़दूरों को नौकरी पर रखना उनके लिए कठिन और महँगा होने जा रहा है। यह निर्णय उनकी गुणवत्ता के साथ-साथ उनके मुनाफ़़ेे को भी प्रभावित करेगा। इसीलिए ट्रम्प के इस निर्णय का विरोध पूँजीपति वर्ग के एक हिस्से की ओर से भी हो रहा है।

आप्रवासन से जुड़ा एक तथ्य यह भी है कि प्रवासी, विशेष तौर से लातिन अमेरिका से आने वाले क़ानूनी और ग़ैरक़ानूनी प्रवासी अमेरिका में बेहद सस्ते श्रम के स्रोत हैं। ये प्रवासी मज़दूर बेहद कठिन कामों में लगाये जाते हैं और इन्हें नाममात्र की मज़दूरी दी जाती है। ट्रम्प की आप्रवासन नीतियों का प्रतिरोध दोनों, राजनीतिक और आर्थिक ज़मीन से होने जा रहा है। वहाँ का पूँजीपति वर्ग इतने सस्ते श्रम के स्रोत को इतनी आसानी से नहीं छोड़ेगा।

अमेरिका के कई फे़डरल जजों ने ट्रम्प के आप्रवासन और शरणार्थी सम्बन्धी निर्णयों पर पूर्ण रोक लगा दी है लेकिन अभी यह तय नहीं है कि इस निर्णय को टाला जा सकता है या नहीं क्योंकि ट्रम्प के न्याय विभाग ने फे़डरल जजों के निर्णय को चुनौती दी है । जजों का कहना है कि अभी तक किसी भी तथ्य में यह उजागर नहीं हुआ है कि अमेरिका में अब तक के आतंकवादी हमलों के आतंकवादी इन देशों से आते थे। यदि ऐसी कोई वजह नहीं है तो महज़ मुसलमान बहुल देश होने के नाते इन पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता क्योंकि वीज़ा जारी करने में अमेरिकी क़ानून के अनुसार धर्म या नस्ल के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर सरकार के हाथों में फे़डरल न्यायालय से ज़्यादा शक्ति होती है। इससे यह क़तई नहीं समझा जाना चाहिए कि फे़डरल जज या वहाँ की न्यायपालिका निष्पक्ष या न्यायपूर्ण है। बल्कि यह एक निश्चित बुर्जुआ जनवाद के दायरे में ही काम करती है। अगर ऐसा नहीं होता तो अमेरिका के जेलों की आबादी का 70 प्रतिशत अश्वेत नहीं होता।

ट्रम्प और जन प्रतिरोध

इन नीतियों की घोषणा दर्शाती है कि अमेरिकी जनता के लिए आने वाले दिन आसान नहीं होने जा रहे हैं। यह बात ट्रम्प पर भी लागू होती है। 45 प्रतिशत अमेरिकी जनता जिसका मोहभंग इस व्यवस्था से है और बाक़ी बची जनता इन नीतियों का समर्थन पूर्ण रूप से करेगी, ऐसा लगता नहीं है। इतनी घोर ग़ैरजनवादी, मुसलमान विरोधी, नस्लविरोधी और आप्रवासन विरोधी नीतियों को समर्थन मिलने की जो उम्मीद ट्रम्प को है, वैसा होने नहीं जा रहा है और यह अमेरिका की सड़कों पर दिख भी रहा है। ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने की घोषणा होने के बाद और उसके वाइट हाउस में क़दम रखने पर अमेरिका में प्रतिरोधों की जैसे लहर चल गयी है। ट्रम्प के सात देशों के आप्रवासन प्रतिबन्ध और शरणार्थियों पर पूर्ण प्रतिबन्ध के बाद अमेरिकी जनता विभिन्न शहरों के हवाईअड्डों पर उमड़ पड़ी। शिकागा, डेनवर, सैन फ्रांसिस्को हवाईअड्डे, जॉन एफ़ केनेडी ऐयरपोर्ट, न्यूयॉर्क आदि जगहों पर लोगों ने इन ग़ैरजनवादी, तानाशाही नीतियों के विरोध में प्रदर्शन किये। स्वयं रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ट्रम्प को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। रिपब्लिकन नेता, एरिज़ोना के सैनेटर जॉन मैकेन और दक्षिण कैरोलिना के सेनेटर लिन्डसे ग्राहम ने ट्रम्प की नीतियों का विरोध किया है। यदि अमेरिका की जनता के लिए आने वाला समय कठिन होने जा रहा है तो ट्रम्प के लिए भी चीज़ें आसान नहीं होंगी। ट्रम्प का चरित्र फासीवादी है लेकिन वह किसी फासीवादी पार्टी से नहीं आता। अपनी नीतियों के समर्थन और उन्हें अमल में लाने के लिए उसके पास हताश नौजवानों की कोई फ़ौज नहीं है। इसके अलावा उसकी पार्टी किसी फासीवादी सिद्धान्त के बीज बोने के लिए जनता के बीच कैडर आधारित संगठन के माध्यम से काम नहीं कर रही है। अमेरिकी जनता के बीच उसकी नीतियों की मान्यता आसानी से नहीं होने जा रही। लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि ट्रम्प कू-क्लक्स क्लैन सरीके घोर प्रतिक्रियावादी संगठनों को अपने हित में इस्तेमाल करे। मरणासन्न पूँजीवाद अपने आप को बचाने के लिए हर प्रयास करेगा।

विश्व पूँजीवाद का चौधरी होने के नाते अमेरिका की नीतियाँ दुनिया भर को प्रभावित करेंगी जिसकी झलक हमें देखने को मिल रही है। ट्रम्प की नीतियों का इंग्लैण्ड और फ़्रांस में भी प्रतिरोध हो रहा है। कई हज़ार की संख्या में लोगों ने इन देशों में प्रतिरोध प्रदर्शन में भाग लिया है। लोग मज़ाक़ में कहते हैं कि हमने कई सालों मोदी झेला है अब पूरी दुनिया को मोदी मिल गया है। वैसे ट्रम्प और मोदी के सत्ता में आने की भौतिक ज़मीन एक है भले ही संगठनात्मक राजनीतिक ज़मीन पर भिन्नता है। लेकिन दोनों में एक स्तर पर ग़ज़ब की समानता है, दोनों जितने जनविरोधी हैं, उतने ही बड़बोले, मूर्ख और लबार भी  हैं। हमारा ट्रम्प पुराना है उनका मोदी नया है!

 

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2017

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