“अपना काम” की ग़लत सोच में पिसते मज़दूर
राहुल, करावल नगर, दिल्ली
मैं दिल्ली, गाँधी नगर में सिलाई का काम करता हूँ। एशिया की सबसे बड़ी इस कपड़ा मार्किट का नाम जिन मज़दूरों के दम पर है; उनके हालात बहुत ही बदतर है। लेकिन फिर भी यहाँ काम करने वाले मज़दूर एक गलत मानसिकता के शिकार है। यहाँ अधिकतर सिलाई मज़दूर पीस रेट पर काम करते है। उन्हें लगता कि हम किसी से बँधे हुए नहीं है। ये हमारा अपना काम है; जब मन होगा तब काम पर आयेंगे और जब तक मन होगा छोड़कर जा सकते है। इन मज़दूरों को लगता है कि वे अन्य मज़दूरों के मुक़ाबले ज़्यादा आज़ाद है। इन मज़दूरों में अपने काम के मालिक होने की मानसिकता काम करती है। लेकिन असलियत यही है कि ये पीस रेट पर काम करने वाले सिलाई मज़दूर भी पूरी तरह मालिक के ही ग़ुलाम होते है। सुबह काम पर देर से पहुँचे तो डाँट तो पड़ती ही है और अगर दो-तीन ऐसा ही हुआ तो काम से भी निकाले जा सकते है। काम ज़्यादा होने पर मालिक देर तक काम करने को कहता; जो करना ही पड़ता है। मालिक अक्सर बात-बात पर गालियाँ देकर डाँटता रहता है। मैं 15 साल से सिलाई लाईन में हूँ; मुझे तो यही महसूस हुआ कि पीस रेट पर काम करने वाला मज़दूर भी आज़ाद नहीं है। हाँ हम एक जगह से काम छोड़ सकते है; काम की तलाश में भटकेंगे तो हो सकता है कहीं न कहीं काम मिल ही जाय लेकिन हम मज़दूरों के ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आता है। क्योंकि किसी भी मालिक के पास जायेंगे तो वह काम तो ऐसे ही लेगा। पीस रेट पर मिलने वाला पैसा बेहद कम होता है और ये वे रेट है कई सालों से बढ़े ही नहीं है। ऐसे में इस महँगाई में अपना घर-परिवार चलाने के लिए हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद भी हर महीने किसी का उधार करना पड़ता है। आधा से ज्यादा वेतन तो खाने में खर्च होता है। बाकी में से कमरे का किराया देना पड़ता है और बच्चों पर खर्च हो जाता है। जो थोड़ा बहुत बचता है वह परिवार में हर बार किसी न किसी के बीमार होने के कारण डॉक्टर और दवाई पर खर्च हो जाता है।
दोस्तो! मुझे तो यही समझ आता है कि चाहे वेतन पर काम करने वाले मज़दूर हो या पीस रेट पर सब मालिकों के ग़ुलाम ही हैं। इस गुलामी के बन्धन को तोड़ने के लिए हम मज़दूरों के पास एकजुट होकर लड़ने के सिवा कोई रास्ता भी नहीं है। मैं नियमित मज़दूर बिगुल अख़बार पड़ता हूँ। मुझे लगता है कि मज़दूर वर्ग की सच्ची आज़ादी का रास्ता क्या होगा; यहीं इस अखबार के माध्यम से बताया जाता है।
मज़दूर बिगुल, जुलाई 2013














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