आइसिन ऑटोमोटिव हरियाणा प्रा. लि. (आई.एम.टी., रोहतक, हरियाणा) के मज़दूर कम्पनी प्रबन्धन के शोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष की राह पर

बिगुल संवाददाता
रोहतक (हरियाणा)

विगत 3 मई से ‘आइसिन ऑटोमोटिव हरियाणा प्रा. लि.’ के मज़दूर ‘आइसिन ऑटोमोटिव हरियाणा मज़दूर यूनियन’ के बैनर तले कम्पनी प्रबन्धन की मनमानी के ख़िलाफ़ सड़क पर हैं। ज्ञात हो कि आइसिन ऑटोमोटिव हरियाणा प्रा. लि. एक जापानी कम्पनी है, जिसके एमडी मकत्तो साइतो हैं तथा प्रदीप, रमणीक विकास और विक्रम इसके एचआर मैनेजर व स्थानीय प्रबन्धक हैं। यह कम्पनी मारुती, हौण्डा और टोयोटा कम्पनियों की वेण्डर कम्पनी है जोकि ‘डोर लॉक’, ‘इनसाइड-आउटसाइड हैण्डल’ निर्मित करती है। कम्पनी 2011 में शुरू हुई थी। इसमें क़रीब 800 मज़दूर काम करते हैं जिनमें 60-70 स्त्री मज़दूर भी शामिल हैं। यहाँ पर मज़दूरों को बेहद कम वेतन पर खटाया जाता है। ‘कैजुअल’ मज़दूरों को कुल 6,800 रुपये मिलते हैं, और ट्रेनी को 8,620 तथा कहने के लिए क़रीब 270 मज़दूर पक्के हैं किन्तु उन्हें भी वेतन 8,000 से 10,000 के क़रीब ही मिलता है, जबकि हरियाणा सरकार द्वारा तय उच्च कुशल मज़दूर का न्यूनतम वेतन 10,568 है। कम्पनी में हरियाणा समेत देश के अलग-अलग राज्यों से आये हुए मज़दूर काम करते हैं। अब सोचा जा सकता है कि महँगाई के इस ज़माने में थोड़े से वेतन से क्या तो अपना गुज़ारा होता होगा और क्या अपने ऊपर निर्भर घर वालों की मदद की जाती होगी।
कम्पनी में लम्बे समय से काम कर रहे और संघर्ष की अगुवाई कर रहे जसबीर हुड्डा, अनिल शर्मा, उमेश, सोनू प्रजापति तथा अन्य मज़दूरों ने बताया कि कम्पनी में मज़दूरों के साथ लगातार बुरा व्यवहार किया जाता है। भाड़े के गुण्डों जिन्हें सभ्य भाषा में बाउंसर कह दिया जाता है और प्रबन्धन के लोगों द्वारा गाली-गलौज करना और गधे तक जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना आम बात है। काम कर रही स्त्री मज़दूरों के साथ भी ज़्यादतियाँ और छेड़छाड़ तक के मामले सामने आये, किन्तु संज्ञान में लाये जाने पर प्रबन्धन के उच्च अधिकारियों द्वारा इन्हें आम घटना बताकर भूल जाने की बात कही गयी। मज़दूरों ने अपनी मेहनत के बूते कम्पनी को आगे तो बढ़ाया किन्तु इसका ख़ामियाज़ा मज़दूरों को ही भुगतना पड़ा। शुरुआत में जहाँ एक ‘प्रोडक्शन लाइन’ पर 25 मज़दूर काम करते थे, वहीं अब उनकी संख्या घटकर 18 रह गयी। पहले जहाँ एक घण्टे में 120 पीस तैयार होते थे, वहीं अब उनकी संख्या 300 तक पहुँच गयी, किन्तु मज़दूरों के वेतन में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। कई मज़दूर साथियों के वेतन में तो सालाना 1 रुपये तक की भी बढ़ोत्तरी हुई है। ‘बोनस’ के नाम पर मज़दूरों को एक माह के वेतन के बराबर राशि देने की बजाय छाता और चद्दरें थमा दी जाती हैं। कम्पनी के कुछ बड़े अधिकारी तो सीधे जापानी हैं तथा अन्य यहीं के देसी लोग हैं, किन्तु मज़दूरों को लूटने में कोई किसी से पीछे नहीं है। यहाँ पर भयंकर वित्तीय अनियमितताएँ दिखाई देती हैं। मज़दूरों से निचोड़े गये पैसे को मालिक से लेकर नीचे मैनेजरों तक की जमात हड़प जाती है। कम्पनी लगातार विस्तारित होती गयी, मैनेजमेण्ट के लोगों की तोंदें लगातार बढ़ती चली गयीं, जो पहले साइकिल पर आता था, उसके पास अब चमचमाती गाड़ी है, किन्तु मज़दूर वहीं के वहीं हैं।
आइसिन के मज़दूरों ने अपने अनुभव से जाना कि तमाम तरह के शोषण से निज़ात पाने का रास्ता अपनी एकजुटता और संघर्ष से होकर जाता है। इसी के मद्देनज़र ‘ट्रेड यूनियन एक्ट 1926’ के तहत यूनियन के पंजीकरण के लिए फ़ाइल श्रम विभाग में लगायी गयी। यहीं से मज़दूरों के लिए दिक़्क़त होनी शुरू हो गयी। मज़दूरों को सबक़ सिखाने के मक़सद से उन पर ज़बरन तालाबन्दी थोप दी गयी। अपनी क़ानूनी और संविधान सम्मत माँग के उठाये जाने पर विगत 3 मई को कम्पनी प्रबन्धन के द्वारा 20 ‘ट्रेनिंग’ पर काम कर रहे साथियों को बिना किसी अग्रिम ‘नोटिस’ और पूर्व-सूचना के निकाल बाहर किया गया, जब अन्य मज़दूरों ने अपने 20 साथियों के समर्थन में आवाज़ उठायी तो कम्पनी के प्रबन्धकों द्वारा उन्हें ‘अण्डर-टेकिंग’ के नाम पर एक ‘फॉर्म’ थमा दिया जिसमें साफ़ तौर पर कहा गया था कि कम्पनी में काम करते समय कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष माँग नहीं रखनी होगी और कुल मिलाकर इसका लुब्बेलुबाब यह था कि यदि कम्पनी में काम करना है तो ‘बिना कान तक हिलाये’ गुलामों की तरह से खटना होगा तथा शोषण के ख़िलाफ़ किसी भी रूप में आवाज़ नहीं उठानी होगी, क़ानूनी अधिकारों के लिए भी अपना मुँह बन्द रखना होगा। कम्पनी प्रबन्धन का यह रवैया आइसिन के मज़दूरों को नागवार गुज़रा और मज़दूरों ने संघर्ष का रास्ता चुनने का संकल्प लिया। सभी पक्के, ‘ट्रेनिंग’, ‘कैजुअल’ और ठेके पर काम कर रहे मज़दूरों ने शानदार एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए कम्पनी की तानाशाही के सामने सिर झुकाना नामंजूर कर दिया। कम्पनी की मनमानी और अण्डर-टेकिंग को ठोकर मारते हुए मज़दूरों ने कम्पनी गेट पर ही जमे रहने का फ़ैसला लिया। मज़दूर कम्पनी प्रबन्धन की मनमानी के ख़िलाफ़ 3 मई से कम्पनी के गेट पर दिन-रात डटे हुए हैं। 3 तारीख़ से लेकर 14 तारीख़ तक यानी यह रिपोर्ट लिखे जाने तक न तो प्रबन्धन ने कुछ सुध ली है और न ही स्थानीय प्रशासन व सरकार ने। एसडीएम, श्रम विभाग से लेकर डीसी तक कम्पनी प्रबन्धन के सामने नतमस्तक दिखाई दे रहे हैं। यही नहीं रोहतक के भाजपाई विधायक मनीश ग्रोवर से लेकर कांग्रेसी सांसद दीपेन्द्र हुड्डा तक मज़दूरों के मसले पर अपने मुँह में दही जमा कर बैठे हैं, मज़दूरों के जायज़ और क़ानूनसम्मत हक़-हुकुक के समर्थन में अपनी ज़बान तक नहीं हिला रहे हैं। यही नहीं तमाम नेता जोकि आरक्षण के समय पर अपने बिलों से बाहर निकलकर लोगों को जाति के आधार पर लड़ाने में एक-दूसरे को पीछे छोड़ने में होड़ लगाते हैं अब कानों में रुई तेल डालकर ‘एसी’ में सो रहे हैं। भाजपा-नीत एनडीए की सरकार में उद्योग एवं इस्पात मन्त्री बिरेन्द्र सिंह डूमरखाँ जिन्होंने अपने जीवन का लम्बा समय कांग्रेस की सेवा में भी लगाया और जिनके नाना सर छोटूराम आज़ादी के समय इस इलाक़े के ग़रीब किसानों के क़र्जे़ माफ़ करवाते घूमा करते थे तथा जिनके नाम पर उक्त मन्त्री महोदय आज तक अपनी चुनावी गोट लाल करते आये हैं, ने तो बड़ी ही बेशर्मी के साथ कहा कि ‘हम तो बड़ी मुश्किल से बाहर की कम्पनियों को यहाँ लाते हैं और तुम लोग हड़ताल करके बैठ जाते हो’। रोहतक में जब किसानों से ज़मीनें छीनकर आइएमटी खुली थी, तो युवाओं को इज़्ज़त के साथ रोज़गार देने का वायदा किया गया था किन्तु अब यहाँ मज़दूरों की श्रम शक्ति का ज़बरदस्त शोषण हो रहा है तथा दूसरी ओर कम्पनी प्रबन्धन से लेकर मालिकों का पूरा वर्ग मालामाल हो रहा है। साफ़ तौर पर प्रशासन और सरकार के लग्गू-भग्गू कम्पनी प्रबन्धन और मालिकान के सामने पूँछ हिला रहे हैं और ऐसा वे जिस कारण से कर रहे हैं, यह बताने की भी ज़रूरत नहीं है। चिलचिलाती धूप में सभी मज़दूरों को खुले आसमान के नीचे ही बैठना पड़ता है, टेण्ट तक की अनुमति मज़दूरों को नहीं दी गयी जबकि कुछ ही दूरी पर पुलिस और कम्पनी के बाउन्सर टेण्ट के नीचे कूलर की ठण्डी हवा खा रहे हैं। भयंकर गर्मी और लू के चलते 20-25 मज़दूरों की हालत ख़राब हो गयी जिन्हें रोहतक पीजीआई दाखि़ल कराना पड़ा। परेशान करने के मक़सद से रात को सड़क की ‘लाइट’ तक को बन्द कर दिया जाता है। कम्पनी संघर्ष शुरू होने के अगले दिन ही ‘कोर्ट’ से ‘स्टे ऑर्डर’ ले आयी जिसके कारण अगुआ मज़दूरों को कम्पनी से 400 मीटर की दूरी पर बैठना पड़ रहा है। महिला मज़दूरों तक के लिए स्थानीय प्रशासन के द्वारा ‘मोबाइल शौचालय’ तक की भी व्यवस्था नहीं की गयी। संघर्ष में शामिल मज़दूरों के घर पर फ़ोन किया जा रहा है, चिि‍ट्ठयाँ भेजी जा रही हैं, जिनका मक़सद लालच देना और डराना-धमकाना है। अलग-अलग पीछा करके भी डराया-धमकाया जा रहा है। यह ख़बर लिखे जाने तक और संघर्ष के 12 दिन तक श्रम विभाग, कम्पनी प्रबन्धन और स्थानीय प्रशासन के साथ 14-15 वार्ताएँ हो चुकी हैं किन्तु कम्पनी प्रबन्धन अपने तानाशाही रुख़ पर क़ायम है। 14 तारीख़ को यूनियन का पंजीकरण रद्द कराने की बात कहकर प्रबन्धन के द्वारा एक नया शिगुफ़ा छोड़ा गया ताकि मज़दूर संघर्ष में टूट जायें। किन्तु प्रबन्धन का यह पैंतरा भी नहीं चल पाया। यूनियन का रजिस्ट्रेशन नम्बर जो कि आने ही वाला था, प्रबन्धन उसे रद्द कराने के लिए तमाम हथकण्डे अपना रहा है।
तमाम जन संगठन, रोहतक व आस-पास की यूनियनें और ऑटोमोबाइल सेक्टर की ट्रेड यूनियनें मज़दूरों के समर्थन में आ रही हैं। धरना एवं संघर्ष स्थल पर बिगुल मज़दूर दस्ता के साथी भी लगातार आइसिन कम्पनी के मज़दूरों के संघर्ष में शामिल हैं तथा हर सम्भव मदद कर रहे हैं। ऑटोमोबाइल सेक्टर आज पूरी तरह से सुलग रहा है। बिगुल मज़दूर दस्ता के साथी मज़दूरों के साथ यह बात लगातार साझा कर रहे हैं कि हमें फै़क्टरी आधार पर ट्रेड यूनियनें संगठित करने के साथ-साथ सेक्टर गत ट्रेड यूनियन बनाने के प्रयास भी छेड़ देने चाहिए। ऑटोमोबाइल सेक्टर के मज़दूरों की सेक्टर के आधार पर इलाक़ाई ट्रेड यूनियन आज वक़्त की ज़रूरत है। ‘फॉरडिस्ट असेम्बली लाइन’ के टूटने और ‘ग्लोबल असेम्बली लाइन’ के बनने के साथ ही अब मज़दूर अपनी इलाक़ाई और सेक्टरगत यूनियनें बनाकर ही अपने संघर्षों को बेहतर ढंग से न केवल लड़ सकते हैं बल्कि इनमें जीतने की सम्भावनाएँ भी अधिक हैं। मालिक वर्ग ने आज उत्पादन को एक फै़क्टरी में करने कि बजाय बिखरा दिया है। पहले जहाँ एक ही छत के नीचे पूरा उत्पाद बनता था तथा ‘असेम्बलिंग’ भी वहीं होती थी, वहीं आज पूरा उत्पाद एक जगह बनने की बजाय टुकड़ों-टुकड़ों में बनता है तथा ‘असेम्बलिंग’ भी कहीं और होती है। इसीलिए आज सेक्टरगत यूनियनें हमारे संघर्ष को ज़्यादा कारगर ढंग से लड़ पायेंगी तथा इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम फै़क्टरी के आधार पर यूनियन न बनायें बल्कि ज़रूर बनायें बल्कि आगे चलकर सेक्टरगत यूनियन हमारे स्थानीय संघर्षों में मददगार ही साबित होंगी। फै़क्टरीगत यूनियनों के साथ-साथ गुड़गाँव, मानेसर, धारूहेड़ा, बावल, ख़ुशखेड़ा, भिवाड़ी, टपुकड़ा, अलवर से लेकर बहादुरगढ़, रोहतक आदि तक की ऑटोमोबाइल की पूरी पट्टी की एक सेक्टरगत यूनियन आज समय की माँग है। ज़्यादातर मज़दूर युवा और पढ़े-लिखे हैं तथा बात को न केवल समझ रहे हैं, बल्कि शिद्दत से सेक्टरगत इलाक़ाई यूनियन की बात पर सहमत भी हो रहे हैं।
संघर्ष अभी चल ही रहा है। मालिक और मैनेजमेण्ट फ़िलहाल तक मज़दूरों को थकाने के मूड में नज़र आ रहे हैं। किन्तु आन्दोलन की गर्मी मई माह की भयंकर गर्मी और लू पर भारी पड़ रही है। आइएमटी परिसर से लेकर शहर भर में विरोध जुलूस निकाले जा रहे हैं। रोहतक की फ़िज़ाएँ मज़दूरों के नारों से गूँज रही हैं। मज़दूर अपनी सामूहिक रसोई चला रहे हैं जिसमें कम्पनी के साथी अपने हाथों से भोजन बनाने और परोसने का काम कर रहे हैं। मज़दूरों के महान नेता लेनिन ने कहा था कि हड़ताल मज़दूरों की प्राथमिक पाठशाला है। मज़दूरों ने बताया कि वे अपनी इस प्राथमिक पाठशाला से बहुत कुछ सीख रहे हैं, अपनी एकजुटता और ताक़त का अहसास कर रहे हैं। आन्दोलन में ग़लत प्रवृत्तियों पर लगातार बात भी हो रही है। आसपास के लोग, जनसंगठन और यूनियनें संघर्ष की आर्थिक मदद कर रहे हैं। आन्दोलन आगे क्या मोड़ लेगा, यह बात अभी तक समय के गर्भ में है।

 

मज़दूर बिगुल, मई 2017

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन

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