उड़ती हुई अफ़वाहें, सोती हुई जनता!

विजय राही (अलवर से चिट्ठी)

इधर कुछ दिनों से राजस्थान के अलवर-जयपुर जि़लों के गाँवों-शहरों में हवा की तेज़ी से फैलती इस अफ़वाह के चलते दहशत फैली हुई है कि पहले तो सोते समय रहस्यमय तरीक़े से महिलाओं के बालों की चोटी कट जाती है, फिर उस महिला की छाती पर त्रिशूल का निशान बन जाता है और उसके बाद या तो वह महिला बेहोश हो जाती है या उसकी मृत्यु हो जाती है। वैसे तो गाँवों में अधिकतर लोग अन्धविश्वासी ही होते हैं, परन्तु महिलाएँ जोकि अधिकतर अनपढ़ होती हैं; इस अफ़वाह के चलते अधिक दहशत में हैं। धार्मिक आस्था के चलते महिलाएँ कहीं मन्दिरों में प्रसाद चढ़ा रही हैं, तो कहीं घरों के दरवाज़ों पर मेहन्दी और हल्दी से पंजों की छाप बना रही हैं। वैसे तो इस तरह की यह कोई नयी घटना नहीं है; साल भर पहले यह अफ़वाह उड़ी थी कि रात में कोई गेंहू पीसने की चक्की पर हथौड़े से पीटता है और फिर उसके बाद उस घर में कुछ अनहोनी घटित हो जाती है। इस तरह की घटनाओं से कोई भी समझदार और तार्किक व्यक्ति यह सोचने पर ज़रूर मज़बूर होगा कि अनपढ़ महिलाओं की बात छोड़ भी दें तो बाक़ी पढ़ी-लिखी जनता भी आखि़र इन अफ़वाहों को सच क्यों मानने लगती है? वैसे तो सरकार भी अफ़वाहों को अनैतिक व ग़ैरक़ानूनी मानती हैं, परन्तु कभी भी उन लोगों की शिनाख़्त नहीं की जाती जो अफ़वाह फैलाने के दोषी होते हैं। कुछ न्यूज़ चैनल भी इस तरह की अफ़वाहों को सनसनीखेज ख़बर के रूप में चलाकर टीआरपी बटोरने का काम करते हैं। आरएसएस, बजरंग दल जैसे हिन्दू कट्टरपन्थी संगठन व्हाट्सएप के ज़रिये इस अफ़वाह का इस्तेमाल मुसलमानों के खि़लाफ़ नफ़रत भड़काने में कर रहे हैं। उनका कहना है कि एक मुस्लिम तान्त्रिक गिरोह हिन्दू महिलाओं की जनसंख्या घटाने के लिए यह सब कर रहा है। हिन्दू कट्टरपन्थियों के इन धूर्ततापूर्ण कृत्यों से यह आशंका होती है, जैसे यह अफ़वाह ख़ुद इन लोगों द्वारा ही फैलायी गयी हो। खै़र सच्चाई जो भी हो, सोचने लायक बात यह है कि समाज में इस तरह की अफ़वाहें तेज़ी से क्यों फैल जाती हैं, जबकि सही तथ्यपरक बातें नहीं फैल पातीं। इसका कारण हमारे सामाजिक ताने-बाने में मौजूद है। हम जिस समाज में रहते हैं वहाँ सवाल करना, तर्क करना, बहस करना, चीज़ों को वैज्ञानिक तरीक़े से समझ लेना हम नहीं सीख पाते। परिवार से लेकर स्कूल-कॉलेजों में भयंकर रूप से मध्ययुगीन पिछड़ापन मौजूद है। हमारा रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा, बोलचाल इत्यादि बेशक आधुनिक हो गये हों, लेकिन हमारी सोच हमारे विचार अभी बेहद पिछड़े हुए हैं। और इस पिछड़ेपन के लिए सरकारें, प्रिण्ट मीडिया सहित इलैक्ट्रोनिक मीडिया, शिक्षण-संस्थान, टेलीविज़न एवं फि़ल्म संस्थान समान रूप से दोषी हैं।

अगर सरकार चाहे तो इन सबके माध्यम से लोगों को बेहतर तार्किक एवं वैज्ञानिक शिक्षा दी जा सकती है। परन्तु किसी भी पार्टी की सरकारें ऐसा नहीं करती हैं। सवाल उठता है क्यों? क्योंकि ऊपर वर्णित इन तमाम संस्थानों पर कॉरपोरेट घरानों का क़ब्ज़ा है। उनका काम लोगों को शिक्षित करना नहीं, बल्कि केवल और केवल जैसे भी हो मुनाफ़ा बटोरना होता है। नेता-मन्त्रियों को उनके हिस्से का मुनाफ़ा महीने-की-महीने पहुँचा दिया जाता है। इस तरह मुनाफ़ा कूटने का यह गोरखधन्धा चलता रहता है। सरकार को जागरुक जनता की नहीं, बल्कि भेड़चाल चलने वाली जनता की ज़रूरत होती है। उसे यह बख़ूबी पता होता है कि अगर लोगों को बेहतर तार्किक एवं वैज्ञानिक शिक्षा दी जायेगी तो वे सोचने-समझने लगेंगे। उनको किसी भी तरीक़े से मूर्ख नहीं बनाया जा सकेगा। जाति-धर्म के नाम पर आपस में बाँटा नहीं जा सकेगा। ऐसे में उनकी चुनावी फ़सल कैसे तैयार हो सकेगी?

सरकार और उसके तमाम प्रकार के पिट्ठू जनता को अन्धविश्वासी और कूपमण्डूक बनाये रखना चाहते हैं। लोगों की चेतना हर सम्भव तरीक़े से कुन्द कर देना चाहते हैं। ताकि वे भयंकर रूप से फैलती ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई, बदहाली जैसी ज्वलन्त समस्याओं को भूलकर तमाम प्रकार की बेसिर-पैर की ऊल-जलूल बातों में उलझे रहें।

 

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2017

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