दिल्ली आँगनवाड़ी की महिलाओं की हड़ताल जारी है!

बिगुल संवाददाता

पिछले महीने की 27 तारीख़ से दिल्ली की आँगनवाड़ी की महिलाएँ अपनी यूनियन ‘दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन’ के नेतृत्व में हड़ताल पर हैं। समाचार लिखे जाने तक उनका धरना और क्रमिक भूख हड़ताल मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल के आवास पर जारी है, लेकिन अपने को ‘आम आदमी’ कहने वाली केजरीवाल सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही है। हड़ताल में हज़ारों की संख्या में वर्कर्स और हेल्पर्स शामिल हो रहे हैं।

हड़ताल की पूर्वपीठिका

जैसा कि पहले भी 2015 में बिगुल के पन्नों पर ख़बर आ चुकी है कि हड़ताल जीतने के बाद मुख्यमन्त्री केजरीवाल ने स्वयं एक लिखित समझौता किया था, जिसमें उन्होंने हमारी सारी माँगों को क़बूल किया था। लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी अभी तक सरकार ने हमारी मुख्य माँगों को लागू नहीं किया। पिछले दो सालों से महिलाओं ने यूनियन के साथ कभी दिल्ली सचिवालय में तो कभी केजरीवाल के आवास पर प्रदर्शन किया। लेकिन जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने फै़सला लिया कि आने वाले नगर निगम के चुनाव में आँगनवाड़ी की महिलाएँ ‘आम आदमी पार्टी ‘ का पूर्ण बहिष्कार करेंगी।

आम आदमी पार्टी का नगर निगम चुनाव में बुरी तरह से हारने का एक बड़ा कारण आँगनवाड़ी की वर्कर्स और हेल्पर्स के द्वारा किया गया बहिष्कार भी था। चुनाव के बाद हार से बौखलायी केजरीवाल सरकार ने आँगनवाड़ी की ग़रीब महिलाओं से बदला निकालना शुरू कर दिया।

दिल्ली के उपमुख्यमन्त्री मनीष सिसोदिया जिसके पास शिक्षा और महिला बाल विकास विभाग भी है, ने दिल्ली के खस्ताहाल पड़े सरकारी स्कूलों का कभी निरीक्षण नहीं किया लेकिन अलग-अलग आँगनवाड़ी में जाकर निरीक्षण करना शुरू कर दिया। आँगनवाड़ी के खस्ता हालत जैसेकि खाना ख़राब आना, बच्चों का न आना, रजिस्टर में फ़र्ज़ी एण्ट्री होना, इत्यादि के लिए ग़रीब कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को जि़म्मेदार पाया और तीन कार्यकर्ताओं को ‘टर्मिनेट’ करने का फ़रमान सुना दिया। जबकि आँगनवाड़ी में खाने में गड़बड़ी के लिए वे एनजीओ जि़म्मेदार हैं, जिन्हें वहाँ के खाने का टेण्डर मिलता है। पिछले दिनों एक अंग्रेज़ी दैनिक ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ में एक ख़बर छपी थी कि जिन एनजीओ को दिल्ली के सरकारी स्कूलों में मध्यान्तर भोजन के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था, वे एनजीओ अब भी आँगनवाड़ी में खाना देने का काम कर रहे हैं। और इन एनजीओ का रिश्ता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर ‘आम आदमी पार्टी’ से जुड़े एनजीओ ‘कबीर’ और ‘परिवर्तन’ से है! ज़ाहिर है कि अपने ही लोगों द्वारा किये गये घपले-घोटालों के लिए मनीष सिसोदिया आँगनवाड़ी की ग़रीब महिलाओं को जि़म्मेदार ठहरा रहा है और उन्हें दिल्ली की जनता के सामने बदनाम भी कर रहा है। दूसरी ओर सुपरवाइज़र और सीडीपीओ इन महिलाओं पर दबाव डालकर रजिस्टर में फ़र्ज़ी नाम डलवाती हैं, लेकिन किसी सुपरवाइज़र या सीडीपीओ पर आज तक किसी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं हुई है। सरकार एक तरफ़ आँगनवाड़ी को जानबूझकर ख़राब कर रही है और दूसरी तरफ़ प्लेस्कूलों (यहाँ भी अपने ही लोगों को) को लाइसेंस दे रही है और मनीष सिसोदिया इन सबका जि़म्मेदार आँगनवाड़ी की ग़रीब वर्कर्स और हेल्पर्स को ठहरा रहा है। ये इनका असली चरित्र है।

सरकार की इस बदले की कार्रवाई की वजह से आँगनवाड़ी की महिलाओं में ज़बरदस्त गुस्सा भरा हुआ था। और वे आन्दोलन की राह पर चलने का मन बना रही थी।

10 जून को ‘दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन’ ने आगे की योजना के लिए एक बैठक बुलाई और फै़सला लिया कि आगामी 24 जून को दिल्ली सचिवालय पर 1 दिन का चेतावनी प्रदर्शन किया जायेगा। 24 जून को क़रीब हज़ार की संख्या में महिलाएँ दिल्ली सचिवालय पहुँचीं। भारी संख्या में महिलाओं को देखकर सरकार घबरा गयी और मनीष सिसोदिया के ओएसडी ने प्रतिनिधिमण्डल को बातचीत के लिए बुलाया। ओएसडी ने यूनियन को 27 जून को मनीष सिसोदिया से बातचीत का निमन्त्रण दिया।

हड़ताल की शुरुआत

27 जून को जब भारी संख्या में महिलाएँ मनीष सिसोदिया के बँगले (हालाँकि ये आम आदमी है और चुनाव से पहले इन्हें बँगले, गाड़ी, सुरक्षा आदि नहीं चाहिए थी) पर पहुँचीं तो पहले पुलिस ने बैरीकेड लगा दिया और अन्दर आने से ही मना कर दिया। लेकिन जब महिलाओं का दबाव बढ़ता गया तो पाँच महिलाओं को यूनियन की संचालक शिवानी के साथ बात करने के लिए अन्दर जाने दिया गया। लेकिन सिसोदिया बात करने से ज़्यादा महिलाओं को डराने के मूड में था। जब उसे मालूम चला कि महिलाओं के साथ यूनियन की साथी शिवानी भी आयी हैं तो उसने बात करने से ही मना कर दिया। साफ़ है कि यह सिसोदिया का गै़रजनवादी और असंवैधानिक रवैया था।

मनीष सिसोदिया की इस दग़ाबाज़ी से महिलाओं का रोष और बढ़ गया और अब ये केजरीवाल और सिसोदिया से आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार थीं। और तब यूनियन ने 30 जून को दिल्ली सचिवालय पर विराट जुटान का आह्वान किया।

30 जून को होने वाले प्रदर्शन को लेकर केजरीवाल सरकार में ज़बरदस्त खलबली मची हुई थी। तरह-तरह की दलाल यूनियन, धार्मिक कट्टरवादी संगठन व आम आदमी पार्टी के पिछलग्गुओं ने प्रदर्शन को समर्थन देने के बहाने आन्दोलन को ख़त्म करने की कोशिश की। लेकिन यूनियन ने इस तरह के किसी भी संगठन का समर्थन लेने से साफ़ इनकार कर दिया। 30 जून को लगभग दस हज़ार की भारी संख्या में महिलाओं ने प्रदर्शन में हिस्सेदारी की। ऐसा लग रहा था, जैसे कोई जनसैलाब उमड़ गया हो। प्रदर्शन में यूनियन ने यह फै़सला किया कि मुख्यमन्त्री स्वयं आकर हमसे मिलकर हमारी सारी माँगों को पूरा करें, वरना हम यहीं डटे रहेंगे और रिंग रोड जाम करेंगे। लेकिन जब मुख्यमन्त्री या सरकार का कोई प्रतिनिधि मिलने को तैयार नहीं हुआ तो महिलाओं ने रिंग रोड को चार घण्टे तक जाम रखा। उसके बाद यूनियन ने आम सहमति से यह फै़सला लिया कि आगामी तीन जुलाई से मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल के बँगले पर अनिश्चितकालीन हड़ताल की जायेगी। तब से उनकी हड़ताल जारी है और 6 जुलाई से वे क्रमिक भूख हड़ताल पर हैं।

हड़ताल तोड़ने के लिए दलाल यूनियन केजरीवाल के साथ!

जब आँगनवाडी की महिलाओं की यह जुझारू हड़ताल पूरी दिल्ली में फैल गयी और लगभग सभी आँगनवाडि़यों में काम पूरी तरह ठप्प हो गया तब से तरह-तरह के बिचौलिये, दलाल और मज़दूरों के साथ ग़द्दारी करने का रिकॉर्ड बना चुकी दलाल यूनियनें अपने काम में लग गयीं और केजरीवाल का साथ देने लगी।

इन दलाल यूनियन में सबसे अग्रणी नाम सीटू की कमला वाली यूनियन का है। सीटू, जिनका इतिहास मज़दूरों के साथ ग़द्दारी का है, बंगाल से लेकर केरल तक जिनकी माता चुनावी पार्टी माकपा मज़दूरों पर गोलियाँ बरसा चुकी है, जो गुण्डों से पिटवाने और मालिकों का खुल्ला साथ देने के लिए बदनाम है, वह भला दिल्ली में आँगनवाड़ी की महिलाओं से ग़द्दारी करने और उनकी हड़ताल तुड़वाने में पीछे कैसे रह सकती थी! कमला जो पहले भी 2015 में हड़ताल तुड़वाने के लिए आयी थी, लेकिन महिलाओं ने उसे भगा दिया था, अब वह तरह-तरह की चालों के ज़रिये यह काम करने लगी। पहले वह यूनियन को समर्थन देने के बहाने हड़ताल में घुसने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी यह चाल जब क़ामयाब नहीं हुई तो वह यूनियन के साथियों के खि़लाफ़ कुत्सा-प्रचार करने में जुट गयी। इससे भी जब काम नहीं बना तो कमला और सीटू ने अपना नाम बदल कर ‘स्वतन्त्र आँगनवाड़ी कर्मचारी और सहायिका संघ’ के नाम से पर्चा निकाला और महिलाओं में भ्रम फैलाने का काम किया और 10 जुलाई को मनीष सिसोदिया के आवास को घेरने का आह्वान किया। जबकि यूनियन पहले ही मनीष सिसोदिया से उसके घर पर मुलाक़ात करने गयी थी, पर वहाँ बात न बन पाने के कारण ही हड़ताल का निर्णय लिया गया था। ज़ाहिर है कि कमला की यह चाल हड़ताल तोड़ने की ही थी।

लेकिन कमला और सीटू की ग़द्दारी का पर्दाफ़ाश आँगनवाड़ी की महिलाओं ने दमदार तरीक़े से किया। सिसोदिया के घर पर कमला अपनी 3 चमचियों के साथ ही पहुँची और उसका प्रदर्शन पूरी तरह से ‘फ़्लॉप शो’ साबित हुआ।

दूसरा एक दलाल रामकरण है, जिसने 2015 में ही आँगनवाड़ी के साथ शुरू हुए आशा वर्कर्स के आन्दोलन को डुबाने का काम किया था। इस हड़ताल की शुरुआत में रामकरण खुलकर केजरीवाल सरकार और आम आदमी पार्टी की पैरवी कर रहा था और महिलाओं के सामने बड़ी-बड़ी डींगें हाँक रहा था कि अगर वे ‘दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन’ को छोड़कर उसके साथ आ जायें तो वह उनका केजरीवाल के साथ समझौता करवा देगा और सारी माँगें मनवा देगा। अब वह यह झूठ फैला रहा है कि शिवानी की वजह से ही माँगें पूरी नहीं हो रही हैं। रामकरण जिसने आशा वर्कर्स के साथ ग़द्दारी की और अब वही काम वह आँगनवाड़ी की महिलाओं के साथ करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन महिलाओं ने उसे माक़ूल जबाब दिया।

सोचने वाली बात तो यह है कि एक तरफ़ केजरीवाल और सिसोदिया हमारी यूनियन से बात करने को तैयार नहीं होते हैं, जिनके साथ आँगनवाड़ी की महिलाएँ हैं, लेकिन उन सारी दलाल यूनियनों से बात करने को राज़ी है जिनके साथ कोई नहीं है। ऊपर से यह “केजरीवाल और सिसोदिया गैंग” झूठी अफ़वाहें फैलाने में माहिर है। हद तो तब हो गयी जब सिसोदिया ने एक फ़र्ज़ी यूनियन ‘दिल्ली आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स एसोसिएशन’, जिसमें सुपरवाइज़र और सीडीपीओ शामिल थे, के साथ मिलकर ‘मानदेय बढाने की’ और हड़ताल ख़त्म होने की घोषणा भी कर दी। इसी से इस दोमुँही केजरीवाल सरकार और आम आदमी पार्टी के चरित्र का पता चलता है।

केन्द्र में भाजपा की फासीवादी मोदी सरकार तो खुल्ले तौर पर मज़दूरों की विरोधी है ही लेकिन दिल्ली का ये नटवरलाल जो कि छोटे बनिये-व्यापारी का प्रतिनिधित्व करता है किसी भी मायने में मोदी से कम नहीं है! जिन तथाकथित ‘लिबरल जन’ का भरोसा इस नटवरलाल पर है और जो इसे मोदी का विकल्प समझ रहे हैं, उन्हें भी अब अपनी आँखे खोल लेनी चाहिए।

सरकार और दलाल यूनियनों की सारी कोशिशों के बावजूद आँगनवाड़ी की महिलाएँ अपनी यूनियन ‘दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन’ के नेतृत्व में शानदार तरीक़े से अपनी हड़ताल को चला रही हैं और अपनी एकता के दम पर ज़रूर दिल्ली सरकार को झुकायेंगी!

 

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2017

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