भारतीय और अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन पर दो विचारोत्तेजक व्याख्यान

बिगुल संवाददाता

‘अक्टूबर क्रान्ति शतवार्षिकी समिति’ और ‘अरविन्द स्मृति न्यास’ की ओर से पिछली 22 व 23 जुलाई को मार्क्सवादी चिन्तक और ऐक्टिविस्ट शशि प्रकाश के दो व्याख्यान आयोजित किये। पहले व्याख्यान का विषय था ‘भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन: इतिहास, समस्याएँ और सम्भावनाएँ’ और दूसरे का विषय था ‘समाजवाद की समस्याएँ: बीसवीं शताब्दी की क्रान्तियों के अनुभव’।
अपने पहले व्याख्यान में उन्होंने कहा कि भारत में वैचारिक और सांगठनिक ग़लतियों के कारण टूट और बिखराव के शिकार कम्युनिस्ट आन्दोलन को आज नये सिरे से खड़ा करने की ज़रूरत है। आज देश की सत्ता पर काबिज फासीवाद एक धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलन है जिसे कैडर-आधारित सांगठनिक तंत्र के जरिए ज़मीनी स्तर से खड़ा किया गया है। मेहनतकशों और प्रगतिशील मध्यवर्ग के बीच व्यापक आधार वाला सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलन खड़ा करके ही इसे परास्त किया जा सकता है।
करीब चार दशक से कम्युनिस्ट आन्दोलन में सक्रिय रहे तथा इस समय मार्क्सवादी विमर्श की पत्रिका ‘द ऐन्विल’ के सम्पादक शशि प्रकाश ने कहा कि भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन ने लगभग एक शताब्दी की यात्रा के दौरान गौरवशाली संघर्षों और शौर्यपूर्ण बलिदानों के अनेक कीर्तिस्तम्भ स्थापित किये लेकिन एक अहम सवाल यह है कि भारतीय पूँजीपति वर्ग और उसकी प्रतिनिधि कांग्रेस के हाथों से राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व अपने हाथों में क्यों नहीं ले सका। पिछले ढाई दशकों के दौरान नयी आर्थिक नीतियों के कारण जनता में भारी असन्तोष पैदा हुआ है और फासिस्ट शक्तियाँ निरन्तर मज़बूत होते हुए सत्ता में पहुँच गयी हैं। फिर भी कम्युनिस्ट धारा कोई प्रभावी प्रतिरोध खड़ा करने में अक्षम है। एक समय व्यापक जनाधार वाला कम्युनिस्ट आन्दोलन आज बुरी तरह टूट-बिखराव का शिकार क्यों है? इसके कारण हम किसी ऐतिहासिक संयोग या कुछ व्यक्तियों की भूमिका में नहीं ढूँढ़ सकते। ऐसा करना अनैतिहासिक होगा। इसके कारणों पर गहराई में जाकर विचार करने की ज़रूरत है।
उन्होंने कहा कि पिछले तीन-चार दशकों में दुनिया व्यापक परिवर्तनों से गुज़री है। विश्व पूँजीवाद की संरचना, कार्यप्रणाली और उत्पादन-प्रक्रिया में तथा भारत जैसे उत्तर-औपनिवेशिक देशों की सामाजिक-आर्थिक संरचना में व्यापक बदलाव आये हैं। उद्योग और कृषि, शहरों और गाँवों सभी जगह उत्पादन व शोषण, वर्गों की संरचना और सामाजिक समीकरण पहले जैसे नहीं रहे हैं। इन बदलावों को समझने और मज़दूर आन्दोलन तथा सामाजिक क्रान्ति की नई रणनीति और रणकौशल विकसित करने में कम्युनिस्ट आन्दोलन अब तक विफल रहा है।
भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास की विस्तार से चर्चा करते हुए शशि प्रकाश ने कहा कि इसकी सबसे बड़ी कमी विचारधारात्मक कमज़ोरी रही है । इसी मुख्य कारण के चलते यहाँ के कम्युनिस्ट मार्क्सवादी सिद्धान्त को भारत की ठोस परिस्थितियों में रचनात्माक ढंग से लागू करने में चूकते रहे, और अक्सर अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व और बड़ी एवं अनुभवी बिरादर पार्टियों पर वैचारिक रूप से निर्भर रहे। कम्युनिस्ट नेतृत्व ने औपनिवेशिक भारत के उत्पादन-सम्बन्धों और जाति व्यवस्था, स्त्री प्रश्न और राष्ट्रीयताओं का प्रश्न सहित ऊपरी संरचना के सभी पहलुओं का ठोस अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल के निर्धारण की स्वतन्त्र कोशिश नहीं की। वह संयुक्त मोर्चा, मज़दूर आन्दोलन और अन्य प्रश्नों पर बार-बार कभी दक्षिणपंथ की ओर तो कभी अतिवाम के भटकाव का शिकार होता रहा। अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में होने वाले भटकाव और भारत-विषयक ग़लत या असन्तुलित मूल्यांकन भी यहाँ के आन्दोलन को प्रभावित करते रहे।
नक्सलबाड़ी का जन-उभार भारत में क्रान्तिकारी वामपन्थ की नयी शुरुआत और संशोधनवादी राजनीति से निर्णायक विच्छेद की एक प्रतीक घटना सिद्ध हुआ। इसने मज़दूर-किसान जनता के सामने राज्यसत्ता के प्रश्न को एक बार फिर केन्द्रीय प्रश्न बना दिया। तेलंगाना-तेभागा-पुनप्रा वायलार और नौसेना विद्रोह के दिनों के बाद, एक बार फिर देशव्यापी स्तर पर जनसमुदाय की क्रान्तिकारी ऊर्जा और पहलक़दमी निर्बन्ध हुई, लेकिन ”वामपन्थी” दुस्साहसवाद के विचारधारात्मक विचलन और विरासत के तौर पर प्राप्त विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण भारतीय सामाजिक-आर्थिक संरचना एवं राज्यसत्ता की प्रकृति की ग़लत समझ और उस आधार पर निर्धारित क्रान्ति की ग़लत रणनीति एवं आम रणकौशल के परिणामस्वरूप यह धारा आगे बढ़ने के बजाय गतिरोध और विघटन का शिकार हो गयी। 1969 में जिस भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मा-ले) की घोषणा हुई, वह पिछले अड़तालीस वर्षों में कई ग्रुपों और संगठनों में बँटी हुई, एकता और फूट के अनवरत सिलसिले से गुज़रती रही है। नक्सलबाड़ी की मूल प्रेरणा से गठित जो कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन भाकपा (मा-ले) में शामिल नहीं हुए थे, उनकी भी यही स्थिति रही है। इन सभी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठनों के जिस समूह को कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी शिविर कहा जाता रहा है, उनमें से कुछ आज भी ”वामपन्थी” दुस्साहसवादी निम्न-पूँजीवादी लाइन के संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण को अमल में ला रहे हैं, कुछ दक्षिणपन्थी सिरे की ओर विपथगमन की प्रक्रिया में हैं तो कुछ सीधे संसदमार्गी वामपन्थियों की पंगत में जा बैठे है, कुछ का अस्तित्व बस नाम को ही बचा हुआ है तो कुछ बाक़ायदा विसर्जित हो चुके हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो नववामपन्थी ”मुक्त चिन्तन” की राह पकड़ चिन्तन कक्षों में मुक्ति के नये सूत्र ईजाद कर रहे हैं।
बाद में सवाल-जवाब के दौर में मार्क्सवादी विचारधारा पर हो रहे हमलों की चर्चा करते हुए शशि प्रकाश ने कहा कि इसके बुनियादी सिद्धान्तों को कोई भी ग़लत नहीं ठहरा सका है। लेकिन इन्हें समझने और देशकाल के अनुसार लागू करने में ग़लतियाँ हुई हैं। भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन के पुनरुत्थान के लिए ज़रूरी है कि विभिन्न माध्यमों से बड़े पैमाने पर प्रगतिशील विचारों और संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया जाये, अतीत की ग़लतियों के सार-संकलन और नई परिस्थितियों के विश्लेषण से आगे का रास्ता विकसित किया जाये। युवाओं को कम्युनिस्ट आन्दोलन से जोड़ने पर विशेष ज़ोर देना होगा जो नये विचारों को लेकर व्यापक मेहनकश अवाम के बीच में जायेंगे। साम्प्रदायिक फासीवाद फ़ौरी चुनौती के मुकाबले के लिए भी ज़रूरी है कि मेहनतकशों और मध्यवर्ग के प्रगतिशील तबकों के बीच निरन्तर वैचारिक तथा सांस्कृतिक काम किया जाये और उन्हें बुनियादी मुद्दों पर संगठित किया जाये। इसके साथ ही पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध लम्बी लड़ाई के लिए उन्हें शिक्षित और संगठित करने के उद्देश्य से हज़ारों नौजवानों को मज़दूरों और ग़रीबों की बस्तियों में जीवन बिताने के लिए तैयार करना होगा।
अपने दूसरे व्याख्यान में शशि प्रकाश ने कहा कि 1917 में हुई अक्टूबर क्रान्ति ने बीसवीं सदी को एक नयी शक्ल दी। पूरी दुनिया में शोषण और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष को इसने प्रेरणा और दिशा दी। भारत में 1917 से 1930 के बीच हिन्दी और अन्य भाषाओं की पत्रिकाओं में लेनिन और सोवियत क्रान्ति, सोवियत संघ में स्त्रियों की स्थिति, कृषि के सामूहिकीकरण, पंचवर्षीय योजनाओं आदि के बारे में सैकड़ों लेख, कविताएँ आदि छपे। भगत सिंह और उनके साथियों ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन नाम रखते हुए मार्क्सवादी सिद्धान्तों पर सर्वहारा वर्ग की पार्टी बनाने की घोषणा की।
उन्होंने कहा कि अक्टूबर क्रान्ति के बाद पहली बार ऐसी राजसत्ता कायम हुई जिसमें निजी स्वामित्व की व्यवस्था पर चोट की। उत्पादन के साधनों का सामूहिकीकरण किया गया और कुछ ही वर्षों में करोड़ों लोगों के जीवनस्तर को कई गुना पर उठाया गया। 1918 की विवाह और परिवार संहिता में पहली बार स्त्रियों को बराबर के अधिकार दिये गये। जीवन के हर क्षेत्र में उन्हें न केवल काम करने का अधिकार दिया गया बल्कि चूल्हे चौखट से उन्हें मुक्त करने के लिए सामूहिक भोजनालयों से लेकर बड़े स्तर पर शिशु शालाओं का निर्माण भी किया गया। वेश्यावृति, नशाखोरी, बेरोज़गारी, भीख आदि क्रान्ति के कुछ वर्षों बाद समाज से समाप्त हो गये। अक्टूबर क्रान्ति केवल 500 वर्ष के पूँजीवाद के विरुद्ध क्रान्ति नहीं थी, वह 5000 वर्षों के पूरे वर्ग समाज के विरुद्ध एक सतत क्रान्ति की शुरआत का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी।
समाजवाद की समस्याओं की चर्चा करते हुए शशि प्रकाश ने कहा कि हर मौलिक क्रान्ति की तरह इस पहली समाजवादी क्रान्ति की भी कुछ समस्याएँ थीं। क्रान्ति के बाद निजी मालिकाने का काफी हद ख़ात्मा तो हो गया लेकिन समाज में मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के बीच, कृषि और उद्योग के बीच, शहर और गाँव के बीच के अन्तर जैसी असमानताएँ बनी हुई थीं। छोटे पैमाने का निजी उत्पादन, मूल्य का नियम और मज़दूरी की व्यवस्था बने हुए थे। लोगों की सोच, संस्कार और आदतों में पूँजीवादी मूल्य-मान्यताएँ भी रातों-रात नहीं खत्म होते। निश्चय ही कुछ सैद्धान्तिक ग़लतियाँ और मार्क्सवाद के सिद्धान्तों पर अमल में व्यावहारिक ग़लतियाँ भी हुईं। पूँजीवाद की पुनर्स्थापना का प्रयास करने वाले तत्वों को इस ज़मीन पर अपनी ताक़त बढ़ाने का अवसर मिला और 1956 में सोवियत संघ में समाजवाद के लेबल के तहत पूँजीवाद की बहाली हो गयी तथा 1989 में लेबल भी हटाकर खुला पूँजीवाद आ गया।

उन्होंने कहा कि चीन में 1949 में होने वाली नवजनवादी क्रान्ति के बाद वहाँ इन समस्याओं पर लम्बा वाद-विवाद चला और 1966-67 में शुरू हुई सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के द्वारा पूँजीवाद की वापसी रोकने का एक रास्ता प्रस्तुत किया गया। इसमें कहा गया कि समाजवादी व्यवस्था कायम होने के बाद ऊपरी संरचना में सतत क्रान्ति जारी रखनी होगी और एक नया मानव बनाने का काम सर्वोपरि हो जायेगा। हालाँकि उस समय तक चीन में भी वर्ग शक्ति संतुलन पूँजीवादी पथगामियों के पक्ष में झुक गया था और 1976 के बाद से वहाँ भी बाजार समाजवाद के नाम पर पूँजीवाद की पुनर्स्थापना की शुरुआत हो चुकी थी।
शशि प्रकाश ने कहा कहा कि आज के मार्क्सवादी ”पुराने” को समझे बिना ”नये” का सन्धान नहीं कर सकते हैं; उन्हें अतीत को ख़ारिज करने या अनालोचनात्मक तौर पर अपनाने के बजाय उसके साथ एक आलोचनात्मक सम्बन्ध स्थापित करना ही होगा। आज के कम्युनिस्टों के लिए अक्टूबर क्रान्ति की युगान्तरकारी घटना, पहले समाजवादी प्रयोग और पहले व्यवस्थित मज़दूर राज्य के रूप में आज भी एक ऐतिहासिक सन्दर्भ बिन्दु का काम करती है। दुनिया को हिला देने वाली इस घटना की समकालीनता को समझे बग़ैर न तो आज के पूँजीवाद की विशिष्टताओं को समझा जा सकता है और न ही हम इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रान्तियों की समझदारी विकसित कर सकते हैं। इसीसे हमारे सामने यह बेहद प्रासंगिक प्रश्न भी खड़ा हो हो जाता है कि इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रान्तियों में ‘नया’ क्या है? विशेष तौर पर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूँजीवाद की कार्यप्रणाली में आये बदलावों को हम कैसे समझें? आज के कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए इन बदलावों के क्या निहितार्थ हैं?
आज दुनिया की परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं। आज के युग की क्रान्तियाँ चीन की नवजनवादी क्रान्ति जैसी या हूबहू अक्टूबर क्रान्ति जैसी नहीं हो सकतीं। आज केवल देशी पूँजीवाद के विरुद्ध नहीं बल्कि साम्राज्यवाद और पूँजीवाद विरोधी क्रान्तियाँ होंगी। पूँजीवाद आर्थिक रूप से संकटग्रस्त है लेकिन इसकी राज्यसत्ता तथा इसके सामाजिक अवलम्ब आज पहले से कहीं ज्यादा मज़बूत और गहरे जड़ जमाये हुए हैं। इक्कीसवीं सदी की नयी समाजवादी क्रान्तियों को अंजाम देने के लिए आज मुक्त चिंतन और कठमुल्लावाद से बचते हुए मार्क्सवाद को रचनात्माक ढंग से अपने देश की परिस्थितियों में लागू करना होगा। आज पूँजीवाद और साम्राज्यवाद पूरी दुनिया में आक्रामक हैं लेकिन जगह-जगह इनके प्रतिरोध के आन्दोलन भी ज़ोर पकड़ रहे हैं जिन्हें सही दिशा की तलाश है। आने वाला समय पूँजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी नयी समाजवादी क्रान्तियों का होगा।
जयशंकर प्रसाद सभागार में आयोजित दोनों व्याख्यानों में अच्छी संख्या में बुद्धिजीवी, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और छात्र उपस्थित थे। पहले व्याख्यान में अध्यक्षता वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने की। दूसरे व्याख्यान की अध्यक्षता गिरि विकास अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रो. सुरिन्दर कुमार को करनी थी लेकिन अस्वस्थ के कारण वे नहीं आ सके, हालाँकि पहले दिन वे मौजूद रहे। व्याख्यान में प्रस्तुत बातों पर सवाल-जवाब का भी लम्बा दौर चला।

मज़दूर बिगुल,अगस्त 2017

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