“संस्कारी देशभक्तों” के कुसंस्कारी शोहदे – सत्ता की शह पर बेख़ौफ़ गुण्डे!

सुनील, हरि‍याणा

भारत के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शहरों में से एक चण्डीगढ़, जिसमें हर 200 मीटर पर सीसीटीवी कैमरे लगे होने तथा नागरिक सुरक्षा हेतु पुलिस चौकसी के दावे किये जाते हैं, में 5 अगस्त की रात हरियाणा के भाजपा अध्यक्ष सुभाष बराला के शोहदे विकास बराला ने अपने दोस्त के साथ नशे में धुत होकर आईएएस वीरेन्द्र कुण्डू की बेटी वर्णिका कुण्डू का देर तक पीछा किया। पीछा करते वक़्त कई दफ़ा अपनी कार को वर्णिका की कार के आगे लगाकर रोकने की कोशिश की, कई बार नीचे उतरकर वर्णिका की कार के शीशे पर हमले कर अपहरण की नाकाम कोशिश की। वर्णिका के ही शब्दों में इस ख़ौफ़नाक घटना को बयान करें तो वह इस बात के लिए ख़ुद को ख़ुशकि़स्मत मानती हैं कि आज उनकी लाश किसी नाले से बरामद नहीं हुई। मौक़े पर पहुँची पुलिस ने दोनों को गिरफ़्तार तो किया परन्तु जल्द ही सारी ग़ैर-जमानती धाराएँ हटाकर थाने से ही जमानत पर रिहा कर दिया। थाने में मौजूदगी के दौरान पुलिस ने विकास बराला की ख़ूब ख़ातिरदारी भी की और वारदात की सड़क पर लगे 9 सीसीटीवी कैमरों में से 6 की फ़ुटेज ग़ायब करवा दी गयी।
”बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” वाली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने बेटे को बेटियों के बारे में कैसे संस्कार दिये हैं, इस घटना से सहज ही समझा जा सकता है व साथ ही पानी की तरह साफ़ केस में सत्ता पक्ष के लोग तरह-तरह की दलीलें देकर आरोपी को बचाने की हरसम्भव कोशिश कर रहे हैं और पूरे घटनाक्रम को देखते हुए सरकारी दबाव के चलते पुलिस की मिलीभगत भी अब किसी से छिपी नहीं है। हालाँकि बाद में देश-भर में चण्डीगढ़ पुलिस के इस ग़ैर-जि़म्मेदाराना व सत्तापरस्त रवैये के खि़लाफ़ उठी विरोध की आवाज़ों ने पुलिस को फिर से धाराएँ लगाकर दोनों को गिरफ़्तार करने पर मज़बूर कर दिया। मामले की लीपापोती करने के लिए भाजपा ने हमेशा की तरह दोहरी नीति (जिसे दोगली कहना ज़्यादा उचित होगा) अपनायी है। एक तरफ़ तो अपनी धूमिल होती छवि को बचाने की पेशोपेश में हरियाणा भाजपा अध्यक्ष सुभाष बराला वर्णिका को “अपनी बेटी” कहकर बेटे के खि़लाफ़ जाने की नौटंकी कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा के तमाम नेता वर्णिका को ही हिदायतें देने और उसके चरित्रहरण की नापाक कोशिशें कर रहे हैं। हरियाणा भाजपा उपाध्यक्ष रामवीर भट्टी ने तो वर्णिका को ही रात में बाहर ना निकलने की नसीहत दे डाली। भाजपा प्रवक्ता शाइना एनसी ने ट्विटर पर वर्णिका का पुराना फ़ोटो डालकर ये जताने की कोशिश की कि विकास बराला वर्णिका का पुराना परिचित है, जिसका वर्णिका ने तुरन्त ही खण्डन कर दिया कि फ़ोटो में उनके साथ उनका बहुत अच्छा दोस्त है ना कि विकास बराला। ये तो मात्र एक-दो प्रातिनिधिक उदाहरण हैं, बल्कि इन्होंने तो सोशल मीडिया पर अफ़वाहों का ताँता लगा दिया है। ग़ौरतलब है कि हरियाणा के मुख्यमन्त्री मनोहरलाल खट्टर ने महिला आज़ादी के सवाल पर एक बार बयान दिया था कि उन्हें आज़ादी चाहिए तो वे नंगी घूमें, यह बयान संघी मुख्यमन्त्री की महि‍लाओं की आज़ादी के प्रति‍ ”प्रतिबद्धता” को भी दर्शाता है। अगर याद हो तो भाजपा के ही मन्त्री कर्नाटक विधानसभा में पोर्न वीडियो देखते पकड़े गये थे, जिन पर पार्टी की तरफ़ से कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। इनके कितने ही मन्त्री हत्या और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में अभियुक्त हैं, ऐसे में इनसे कोई भी उम्मीद रखना स्वयं को धोखा देने से ज़्यादा कुछ नहीं है।
आठ अगस्त 2017 को केन्द्रीय गृह राज्य मन्त्री हंसराज गंगाराम अहीर द्वारा लोक सभा में दी गयी जानकारी के अनुसार साल 2016 में पूरे देश में महिलाओं द्वारा स्टॉकिंग (पीछा और छेड़खानी करने) के 7132 मामले दर्ज कराये गये थे। डाटा वेबसाइट इण्डिया स्पेण्ड ने अहीर के दिये आँकड़ों के आधार पर रिपोर्ट की है कि साल 2014 की तुलना में साल 2016 में पूरे देश में छेड़खानी की घटनाएँ 54 प्रतिशत ज़्यादा हुईं। हालाँकि जहाँ ऐसी घटनाओं की संख्या तीन साल में बढ़ी है, वहीं दूसरी तरफ़ इनके लिए सज़ा पाने की दर पहले से कम हुई है। भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही महि‍ला वि‍रोधी अपराधों तथा दलि‍त व अल्पसंख्यकों पर हमलों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी साफ़ दर्शा रही है कि‍ साम्प्रदायि‍क गुण्डा गि‍रोहों को संघी सरकार की शह है। सत्ता की शह पाये हुए गुण्डा-गिरोह व नवधनाढ्य शोहदे बेलगाम छुट्टे घूम रहे हैं। जिस देश का प्रधानमन्त्री ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर दो शब्द बोलने की जहमत न उठाये या ज़ुबानी जमाख़र्च करके छुट्टी पा ले तो इसका साफ़-सीधा मतलब यही है कि अपने गुर्गों को उसका मौन समर्थन हासिल है। वर्णिका के ही शब्दों में जब ये लोग आर्थिक व सामाजिक रूप से समृद्ध वर्ग की महिलाओं से ऐसा सलूक करने की हिमाक़त कर सकते हैं तो आम मेहनतकश पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं की तो बिसात ही क्या! उन्हें तो ये अपनी जागीर से अधिक नहीं समझते। लोगों का आज़ादी और इज़्ज़त से जीने का अधिकार महज़ काग़ज़ी मालूम होता है। इनका अगला निशाना आप भी हो सकते हैं और ज़रूरी नहीं कि आप भी वर्णिका की तरह ख़ुशकि़स्मत हों।

मज़दूर बिगुल,अगस्त 2017

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