मौजूदा दौर के किसान आन्दोलनों की प्रमुख माँगें बनाम छोटे किसानों, मज़दूरों और सर्वहारा वर्ग के साझा हित

इन्द्रजीत

तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जि़ले के कलेक्ट्रेट के सामने एक ग़रीब मज़दूर परिवार ने आत्मदाह कर लिया। 23 अक्टूबर को घटी इस ह्रदय-विदारक घटना के बाद मज़दूर की हालात नाज़ुक बतायी जा रही है, जबकि उसकी पत्नी और दो छोटी-छोटी बेटियों ने आग में झुलसने के कारण दम तोड़ दिया। मज़दूर परिवार सूदखोरी से तंग आकर जनसुनवाई के लिए कलेक्टर दफ़्तर गया था। 1 लाख 40 हज़ार रुपये क़र्ज़ के बदले 2 लाख रुपये चुका देने के बावजूद भी इन्हें मौत को गले लगाना पड़ा! भारत की मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था के मानवद्रोही चरित्र को दर्शाने के लिए चन्द आँकड़े ही पर्याप्त होंगे। अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (‘आईएलओ’) की एक पुरानी रिपोर्ट बताती है कि पूरी दुनिया में होने वाली लगभग 22 लाख श्रमिकों की मौतों में से अकेले भारत में ही क़रीब 44,000 हर साल औद्योगिक दुर्घटनाओं के कारण असमय मृत्यु का शिकार होते हैं, और अब श्रम क़ानूनों को जिस तरह से बर्बाद किया जा रहा है तो हालात की भयंकरता को समझा ही जा सकता है। 30 दिसम्बर 2016 को जारी की गयी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (‘एनसीआरबी’) के आँकड़ों के अनुसार ही क़र्ज़ के बोझ, सूखे आदि के रूप में आर्थिक तबाही और सबसे बढ़कर सरकारों की जनविरोधी नीतियों के चलते साल 2015 में 12,602 किसानों और खेत मज़दूरों ने आत्महत्या की थी, जो कि साल 2014 में हुई आत्महत्याओं में 2 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी थी। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि उद्योग, खेती-किसानी और छोटे-मोटे काम-धन्धों से जुड़ी देश की बहुत बड़ी आबादी का जीना मुहाल है। इतिहास और आज के हालात दोनों ही बताते हैं कि अन्याय-दमन-शोषण के विरुद्ध जनता का संघर्ष भी साथ-साथ चलता है, यानी कि चाहे सचेतन तौर पर या फिर अचेतन, चाहे योजनाबद्ध ढंग से या फिर स्वतःस्फूर्त किन्तु हक़-अधिकार के लिए लोग लड़ते ज़रूर हैं। कई हज़ार साल का वर्ग संघर्ष का अनुभव और ख़ासतौर पर बीसवीं सदी की क्रान्तियों और सामाजिक प्रयोगों के अनुभव निश्चय ही हमारे आज के संघर्षों के लिए मददगार साबित होते हैं। इतिहास चूँकि निरन्तरता और परिवर्तन के द्वन्द्व से आगे बढ़ता है, इसीलिए आज की हमारी लड़ाई के लिए पुराने सिद्धान्त और अनुभव नये का सन्धान करने में सहायक भी होते हैं।

इतनी बात के बाद अब हम आते हैं मुद्दे की बात पर। यानी अपनी बात को फ़सलों का लाभकारी मूल्य बढ़ाने, लागत मूल्य घटाने, स्वामीनाथन कमेटी की सिफ़ारिशों को लागू कराने आदि माँगों व ग़रीब किसानों, खेत मज़दूरों, औद्योगिक मज़दूरों और सर्वहारा वर्गहितों के सन्दर्भ में इन माँगों की प्रासंगिकता पर केन्द्रित करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज के समय में देश की बहुत बड़ी ग़रीब किसान आबादी तबाही और बर्बादी झेल रही है। वैसे तो आमतौर पर पूँजीवादी समाज में वर्ग ध्रुवीकरण होता ही रहता है – यानी कि समाज में एक तरफ़ बदहाली, ग़रीबी और कंगाली बढ़ती है तो दूसरी ओर मुट्ठीभर आबादी के पास संसाधनों का अम्बार लगता जाता है – किन्तु 1991 में कांग्रेस-नीत ‘यूपीए’ गठबन्धन के समय में लागू की गयी व भाजपा-नीत ‘एनडीए’ गठबन्धन की सरकार के द्वारा अनुमोदित की गयी उदारीकरण-निजीकरण की धन्नासेठों की हितैषी और जनविरोधी नीतियों ने ‘कोढ़ में खाज’ का काम किया है। यह अनायास ही नहीं है कि भारत में ग़रीबों और अमीरों के बीच आय असमानता 1922 के मुक़ाबले 2014 में और भी ज़्यादा बढ़ गयी है। खेती के बाज़ारीकरण व कॉरपोरेटीकरण ने ग़रीब किसानों को उजाड़ने की दर में बेतहाशा बढ़ोत्तरी की है। नेतृत्व की मंशाएँ चाहे जो हों किन्तु देश-भर में ग़रीब किसानों का अच्छा ख़ासा हिस्सा आन्दोलनरत है, किसान यात्राएँ निकाली जा रही हैं, कहीं-कहीं पर सत्ता की लाठी-गोली का भी सामना लोग कर रहे हैं। दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर तमिलनाडु के किसान काफ़ी दिन तक अपनी माँगों को लेकर डेरा डाले रहे, मध्यप्रदेश के मन्दसौर में किसान आन्दोलन उग्र हो गया तथा पुलिस की गोलियों से 6 किसानों को अपनी जान गँवानी पड़ी, राजस्थान में 13 दिन तक किसानों का बड़ा आन्दोलन चला। जोत का आकार लगातार घटता जा रहा है, खेती के बाज़ारीकरण, कॉरपोरेटीकारण के कारण बड़ी पूँजी वाले धनी किसान और ‘एग्रो बिज़नेस’ कम्पनियाँ तो मुनाफ़ा कमा जाती हैं किन्तु छोटा और ग़रीब किसान अपनी लागत भी नहीं निकाल पाता। आर्थिक मन्दी से कराह रही पूँजीवादी व्यवस्था में सरकारों ने “कल्याणकारी राज्य” का चोला अब पूरी तरह से उतार फेंका है और खुले तौर पर देशी-विदेशी पूँजी की चाकरी हो रही है। पूँजीवादी राज्य की नीतियों को फिर से कल्याणकारी राज्य की तरफ़ मोड़ना आकाश कुसुम को निहारने के समान है। निश्चय ही पिछले कुछ ही सालों के दौरान गुज्जर, जाट, पटेल, मराठा, कापू आदि पेशेवर किसान जातियों के नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की माँग को लेकर उठे आन्दोलन भी किसानी के बीच पसरी घोर निराशा, असहायता, मायूसी और असुरक्षा-बोध को ही दर्शाते हैं।

ऐसे दौर में उजड़ते हुए किसान यानी सीमान्त, छोटे और ग़रीब किसान को बचाने के लिए जो माँगें उठायी जा रही हैं, जो नारे दिये जा रहे हैं, जो योजनाएँ सुझायी जा रही हैं – उनकी पड़ताल अत्यावश्यक है। क्या उक्त माँगें, नारे और योजनाएँ ग़रीब किसानों की सही सच्ची माँगें हो सकती हैं? उजड़ते छोटे किसानों की असल माँगें क्या हों यह सिर्फ़ भावना का सवाल नहीं है बल्कि तर्क का भी सवाल है। समाज परिवर्तन के क्रान्तिकारी आन्दोलन में चूँकि ग़रीब किसान मज़दूर वर्ग का सबसे विश्वस्त साथी है, इसलिए भी सर्वहारा के नज़रिये और वर्ग दृष्टिकोण से कुछ नुक्तों पर साफ़ नज़र होना ज़रूरी है।

पूँजीवादी व्यवस्था की आम गतिकी और किसान

आज की मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था भी समाज विकास के दौरान अस्तित्व में आयी ऐतिहासिक सीमाओं में बँधी एक व्यवस्था ही है। मुख्य तौर पर शोषित और शोषक में बँटे हमारे इस समाज में मज़दूर वर्ग और पूँजीपति वर्ग के अलावा अन्य वर्ग भी अस्तित्वमान हैं जिनकी स्थिति ऊपर-नीचे होती रहती है जैसे छोटे व्यापारी, दुकानदार, छोटे कारख़ानेदार, किसान, कारीगर इत्यादि। पूँजीवादी व्यवस्था चूँकि निजी स्वामित्व पर आधारित व्यवस्था है इसलिए उत्पादन मानवीय ज़रूरत की बजाय मुनाफ़े को केन्द्र में रखकर किया जाता है।  मोटे तौर पर कहें तो पूँजीपति यानी की पूँजी का स्वामी वर्ग और सर्वहारा यानी कि ऐसा वर्ग जिसके पास उत्पादन के कोई साधन नहीं हैं, यह वर्ग अपनी मानसिक और शारीरिक श्रमशक्ति बेचने के लिए वैसे तो आज़ाद है किन्तु उसे कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी रूप में पूँजीवादी गुलामी में फँसकर अपनी श्रमशक्ति बेचनी ही पड़ती है। पूँजी असल में कुछ और नहीं बल्कि ‘संचित श्रम’ ही है जिसे पूँजीपति वर्ग श्रमिक वर्ग से निचोड़ता है और उसे मात्र इतना ही मिलता है जिससे उसका बस गुज़ारा-भर हो सके और मज़दूरों की अगली नस्ल तैयार हो सके। पूँजी संकेद्रण भी पूँजीवादी समाज की आम प्रवृत्ति है। बड़ी पूँजी छोटी पूँजी को लगातार हड़पकर और लीलकर ही आगे बढ़ती है। कृषि की स्थिति भी पूँजीवाद के आम नियमों से स्वतन्त्र नहीं होती, जिस पर हम आगे बात करेंगे। प्राक् पूँजीवादी समाज में उत्पादन आमतौर पर जहाँ उपभोग के लिए और छोटे पैमाने पर होता था इसलिए उत्पादक किसान, दस्तकार या कारीगर कह सकता था कि उत्पाद पर उसका या कुछ ही लोगों का श्रम लगा है, वहीं पूँजीवादी समाज में उत्पादन बहुत बड़े पैमाने पर होता है जिसमें सामूहिक श्रम का इस्तेमाल होता है। अब उत्पाद एक तरह से सामूहिक श्रम की पैदावार होता है, कई बार तो तैयार माल के पीछे प्रत्यक्ष तौर पर ही हज़ारों-हज़ार लोगों की मेहनत लगी होती है, तथा अप्रत्यक्ष तौर पर अन्य लोग उक्त उत्पाद में लगे लोगों की अन्य ज़रूरतें पूरी करते हैं। कहने का मतलब पैदा तो पूरा समाज मिलकर करता है किन्तु क्या पैदा किया जाये और कितना पैदा किया जाये, यह निर्णय लेने का काम पूँजीपति वर्ग करता है और नियन्त्रण उसके हाथ में होता है। एक पूँजीपति भले ही उत्पादन अनुशासन के साथ करवाता हो किन्तु समूची व्यवस्था में उत्पादन पूरी तरह से अराजक तरीक़े से होता है। यही कारण है कि अतिउत्पादन और बेरोज़गारी पूँजीवादी व्यवस्था के आम नियम हैं यानी एक तरफ़ मालों से भरे गोदाम तो दूसरी तरफ़ ज़रूरतमन्दों का हुजूम, ध्यान रहे पूँजीवाद में आपकी माँग को माँग तभी माना जायेगा जब उसे पूरा करने के लिए आपकी जेब में पैसा हो! उत्पादन का सामाजिक स्वरूप और मालिकाने का निजी स्वरूप ही पूँजीवादी व्यवस्था का सबसे प्रमुख अन्तर्विरोध होता है। पूँजीवाद में उत्पादन शक्तियों और उत्पादन सम्बन्धों का अन्तर्विरोध इसी रूप में अभिव्यक्त होता है जो इस व्यवस्था को अन्त की तरफ़ ले जाता है। यानी कि सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में समाज की क्रान्तिकारी ताक़तें पूँजीवादी राज्यसत्ता और व्यवस्था को चकनाचूर करके समाजवादी व्यवस्था का निर्माण करती हैं। जब मालिकाने का स्वरूप भी उत्पादक शक्तियों के ही अनुरूप सामाजिक कर दिया जाता है, तभी अराजकतापूर्ण पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की बजाय नियोजित समाजवादी अर्थव्यवस्था की स्थापना की जाती है।

समाज में मौजूद सभी वर्ग अपने ऐतिहासिक योगदान के तौर पर ही प्रगतिशील और प्रतिगामी होते हैं, क्रान्तिकारी और प्रतिक्रान्तिकारी होते हैं। मज़दूर वर्ग के अग्रणी शिक्षकों – कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स द्वारा लिखित कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र की निम्न पंक्तियों से इस बात को हम और आसानी से समझ सकते हैं, “निम्न मध्यम वर्ग के लोग – छोटे कारख़ानेदार, दुकानदार, दस्तकार और किसान – ये सब मध्यम वर्ग के अंश के रूप में अपने अस्तित्व को नष्ट होने से बचाने के लिए पूँजीपति वर्ग से लोहा लेते हैं। इसलिए वे क्रान्तिकारी नहीं, रूढ़िवादी हैं। इतना ही नहीं, चूँकि वे इतिहास के चक्र को पीछे की ओर घुमाने की कोशिश करते हैं, इसलिए वे प्रतिगामी हैं। अगर कहीं वे क्रान्तिकारी हैं तो सिर्फ़ इसलिए कि उन्हें बहुत जल्द सर्वहारा वर्ग में मिल जाना है; चुनाँचे वे अपने वर्तमान नहीं, बल्कि भविष्य के हितों की रक्षा करते हैं; अपने दृष्टिकोण को त्यागकर वे सर्वहारा का दृष्टिकोण अपना लेते हैं।”

लाभकारी मूल्य बढ़ाने और लागत मूल्य घटाने की माँग, किसके हित में है?

पिछले दो-तीन दशकों से किसान आन्दोलनों में उठायी जाने वाली सबसे प्रमुखतम दो माँगें हैं; पहली है फ़सल का लाभकारी मूल्य बढ़ाने की माँग और दूसरी है कृषि में होने वाली लागत को कम करने की माँग। स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों में भी उक्त दोनों ही माँगों को स्थान दिया गया है। सन 2004 में तत्कालीन कांग्रेस-नीत ‘यूपीए’ सरकार के कार्यकाल में मोनकोम्पू साम्बासिवन स्वामीनाथन की अध्यक्षता में अनाज की आपूर्ति को सुनिश्चित करने लिए तथा किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर करने के मक़सद से बनी ‘नेशनल कमीशन ऑन फ़ार्मर्स’ ने अपनी पाँच रिपोर्टें सरकार के सामने पेश की थीं। आयोग के द्वारा अन्तिम व पाँचवीं रिपोर्ट 4 अक्टूबर 2006 को सौंपी गयी थी। सरकारों द्वारा ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (‘एमएसपी’) औसत लागत से 50 प्रतिशत अधिक करने और क़र्ज़ माफ़ी समेत लागत मूल्य कम करने के अलावा आयोग द्वारा की गयी सिफ़ारिशों में भूमि सुधार, सिंचाई, खाद्य सुरक्षा, किसान आत्महत्याओं के समाधान, राज्य स्तरीय किसान आयोग बनाने, सेहत सुविधाओं से लेकर वित्त-बीमा की स्थिति सुनिश्चित करने पर बल दिया गया था। किन्तु कोई भी समस्या हो उसके समाधान के लिए न केवल इतिहासबोध की ज़रूरत होती है, बल्कि समाधान हेतु कौरी भावनाओं से काम नहीं चलता बल्कि हमारी भावनाएँ तर्क और विज्ञान की ठोस ज़मीन पर टिकी होनी चाहिए। जैसाकि मज़दूर वर्ग के महान शिक्षक माओ-त्से तुड· ने कहा है कि ‘तथ्यों से सत्य का निवारण करना चाहिए’ तो उक्त माँगों को तथ्यों-आँकड़ों की रोशनी में थोड़ा परखते हैं। निश्चय ही देश की काफ़ी बड़ी आबादी कृषि से जुड़ी है किन्तु औसत जोत का आकार छोटा होने के कारण प्रति व्यक्ति उत्पादकता बेहद कम है, बहुत बड़ी आबादी तो मज़बूरी में खेती-किसानी में उलझी हुई है, जिसके पास कोई वैकल्पिक रोज़गार नहीं है। 2005-06 की कृषि गणना के अनुसार हरित क्रान्ति के अग्रणी राज्यों में से एक हरियाणा में 67 प्रतिशत भूमि मालिकों के पास 2 हेक्टेयर से कम और 48 प्रतिशत के पास 1 हेक्टेयर से भी कम कृषि भूमि थी। देश के स्तर पर देखा जाये तो 2011 के सामाजिक-आर्थिक सर्वे व 2011-12 की कृषि जनगणना के अनुसार गाँवों के क़रीब 18 करोड़ परिवारों में से 54 प्रतिशत श्रमिक हैं, 30 प्रतिशत खेती, 14 प्रतिशत सरकारी/ग़ैर-सरकारी नौकरी, 1.6 प्रतिशत ग़ैर-कृषि कारोबार से जुड़े हैं। सिर्फ़ खेती पर निर्भर 30 प्रतिशत आबादी में 85 प्रतिशत सीमान्त और छोटे किसान हैं जिनके पास क्रमशः 1 से 2 हेक्टेयर और 1 हेक्टेयर से कम ज़मीन है। ऊपर के मध्यम और बड़े 15 प्रतिशत किसानों के पास कुल कृषि योग्य ज़मीन का क़रीब 56 प्रतिशत है। हम सिर्फ़ किसानों की ही बात करें तो स्थिति साफ़-साफ़ दिखायी देती है कि उनका बहुत बड़ा हिस्सा रसातल में है तथा छोटी जोत होने के कारण न केवल इस हिस्से की उत्पादन लागत औसत से अधिक आती है बल्कि पूँजी के अभाव में यही हिस्सा क़र्ज़ के बोझ तले भी दबा रहता है। औसत उत्पादन लागत में आने वाले ख़र्च के कारण 2013 के सैम्पल सर्वे के अनुसार केवल 13 प्रतिशत किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य, लाभकारी दामों का फ़ायदा उठा पाते हैं। और भाजपा के आने के बाद तो यह आँकड़ा 6 प्रतिशत तक भी पहुँचा है। और यदि सही पड़ताल के साथ देखा जाये तो यह बात भी स्पष्ट है कि सीमान्त व छोटे किसान के लिए सिर्फ़ कृषि पर निर्भर रहकर अपनी आजीविका तक कमा पाना ख़ासा मुश्किल काम है, इसीलिए परिवार के किसी-न-किसी सदस्य को ग़ैर-कृषि व्यवसाय या नौकरी-चाकरी में ख़ुद को लगाना पड़ता है। गाँव-देहात में खेती के बारे में पहले कहा जाता था कि ‘कुँए की माटी कुँए पै ए लाग ज्याया करै’ पर अब कहा जाता है कि ‘एकली खेती तै तो भूखा ए मरणा सै’। एक हालिया सर्वे के अनुसार, पक्का रोज़गार मिलने की ऐवज़ में ग़रीब किसानों का 61 प्रतिशत हिस्सा ख़ुशी-ख़ुशी खेती छोड़ने के लिए तैयार बैठा है! दूसरे पहलू से यदि देखा जाये तो आमतौर पर सीमान्त और छोटा किसान जितनी कृषि पैदावार मण्डी में बेचता है उससे कहीं ज़्यादा साल-भर में ख़रीद लेता है। जैसे एक छोटा और सीमान्त किसान गेहूँ, सरसों, बाज़रा, धान जैसी फ़सलों का गुज़ारे लायक रखने के बाद एक हिस्सा मण्डी में बेच भले ही ले, किन्तु उसे साल-भर अन्य कृषि उत्पाद जैसे दालें, चीनी, चावल, पत्ती, तेल, गुड़, तम्बाकू, फल-सब्ज़ी, पशुओं के लिए खल-बिनोला इत्यादि से लेकर वे उत्पाद जिनमें कच्चे माल के तौर पर कृषि उत्पादों का इस्तेमाल होता है ख़रीदने ही पड़ेंगे। कहना नहीं होगा कि यदि फ़सलों के दाम लागत से 50 प्रतिशत अधिक तय होते हैं तो केवल वे उन्हीं फ़सलों के तो होने से रहे जिन्हें छोटी किसानी का 85 प्रतिशत हिस्सा मण्डी तक पहुँचाता है, बल्कि ये बढ़े हुए “लाभकारी” दाम तो सभी फ़सलों पर ही लागू होंगे। अब यह सवाल उठना लाज़िमी है कि फ़सलों के लाभकारी दाम बढ़ाने की माँग किसके हितों में जाती है। निश्चय ही महँगाई में सहायक भूमिका निभाने वाली यह माँग खेत मज़दूरों, औद्योगिक मज़दूरों और सर्वहारा वर्ग के ख़िलाफ़ है ही, किन्तु असल में यह ख़ुद ग़रीब किसानों के हितों के भी ख़िलाफ़ जाती है। यह अनायास ही नहीं है कि कांग्रेस-नीत ‘यूपीए’ सरकार के शासन काल में जब समर्थन मूल्यों में तुलनात्मक रूप से वृद्धि की गयी थी तब बदले में बेहिसाब बढ़ी महँगाई ने ग़रीब आबादी की कमर तोड़ने का ही काम किया था। और वहीं दूसरी तरफ़ 2003 से 2013 के 10 वर्षों में कृषि उत्पाद में 13 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई, किन्तु इसी दौरान किसानों पर क़र्ज़ 24 प्रतिशत बढ़ गया।

खेती किसानी में लागत मूल्य कम करने की माँग को देखा जाये तो पहली बात तो यही स्पष्ट है कि धनी और ग़रीब किसान दोनों का ही औसत ख़र्च यानी कि लागत अलग-अलग आती है। दूसरा लागत मूल्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ‘मज़दूरी’ भी होती है। धनी किसान और एग्रो बिज़नेस कम्पनियाँ मज़दूरों की श्रम शक्ति का सीधे इस्तेमाल करती हैं और कृषि मशीनरी निर्माण में लगी श्रमिक आबादी भी श्रमशक्ति बेचकर ही ज़िन्दा रहती है। राजनीतिक अर्थशास्त्र का क-ख-ग जानने वाले के लिए भी इस चीज़ को समझना कोई मुश्किल नहीं है कि कृषि की लागत क़ीमतों को कम तभी किया जा सकता है जब कृषि की आगत लागतों (‘इनपुट कॉस्ट’) को कम किया जाये। और आमतौर पर कम यह तभी हो सकती हैं जब कृषि व सम्बन्धित उद्यमों में लगे श्रमिकों की या तो मज़दूरी घटायी जाये, या काम के घण्टे बढ़ाये जायें या फिर श्रम की सघनता बढ़ायी जाये। सरकारों से साँठ-गाँठ करके कृषि क्षेत्र में लगी खाद-बीज की व एग्रो बिज़नेस और बैंक-बीमा कम्पनियाँ ख़ुद ही धनी किसानों के पूँजी निवेश का एक माध्यम हैं। निश्चय ही सरकारें इनकी लूट और अन्धेरगर्दी पर कोई आँच नहीं आने देंगी। यह बात भी स्पष्ट ही है कि कृषि मशीनों का ज़्यादा इस्तेमाल तो धनी किसान यानी कुलक फ़ार्मर ही करते हैं, सीमान्त और छोटे किसान तो कृषि उपकरणों और मशीनरी को भाड़े-किराये पर ही लेते हैं। इसलिए लागत मूल्यों में कमी की माँग भी समाज के किस तबक़े के पक्ष में जायेगी और किसके विरुद्ध यह स्पष्ट है। आज के समय में ख़ासतौर पर लाभकारी मूल्य बढ़ाने और लागत मूल्य घटाने की माँगों के समर्थन में विपक्षी पार्टियाँ (केवल तभी जब वे विपक्ष में हों), चुनावी तथा संशोधनवादी पार्टियों से जुड़े किसान संगठन, एनजीओ की राजनीति करने वाले, किसान जातियों में वोट बैंक तलाशने वाले (और फिर चुनाव के समय मोटी थैली की तरफ़ लुढ़क जाने वाले) क्षेत्रीय गुट, भारत में क्रान्ति की जनवादी और नवजनवादी मंजि़ल मानने वाले वामपन्थी संगठन और ‘अहो ग्राम्य जीवन’ बोलकर रुदालियों की भूमिका में आ जाने वाले (और शहरों में रहकर मोटी तनख़्वाहें प्राप्त करके ऐश्वर्य के तमाम साधनों का आनन्द लेने वाले) बुद्धिजीवी लगभग एकजुट हैं! किसान आन्दोलन की मौजूदा स्थिति और इसकी माँगों का वर्ग-चरित्र निश्चय ही समाज के प्रबुद्ध, चिन्तनशील और प्रगतिशील तत्त्वों को सोचने के लिए विवश करते हैं।

आज के दौर में भूमि सुधारों की प्रासंगिकता और भूमिहीनों व ग़रीब किसानों के लिए सही राजनीतिक नारे का सवाल

क्रान्तिकारी तरीक़े से भूमि सुधार की माँग बेशक एक दौर की प्रगतिशील माँग हो सकती थी। किन्तु बदली हुई परिस्थितियों में अन्तर्विरोध पलट जाया करते हैं। जैसा कि लेनिन ने भूमि सम्बन्धों में पूँजीवादी रुपान्तरण के दो रास्ते बताये थे; एक था “अमेरिकी रास्ता” जिसमें प्रगतिशील बुर्जुआजी या पूँजीपति वर्ग नेतृत्वकारी भूमिका में रहकर अन्य वर्गों को साथ लेकर नीचे से क्रान्तिकारी बदलाव के द्वारा सामन्ती सम्बन्धों को एक झटके में उखाड़कर पूँजीवादी भूमि सम्बन्धों को लागू कर देता है। दूसरा है “प्रशियाई रास्ता” जिसमें पूँजीपति वर्ग पहले सत्ता पर क़ाबिज़ होता है और फिर धीरे-धीरे कृषि में पूँजीवादी सम्बन्धों को क़ायम करता है। निश्चय ही दूसरे वाला रास्ता अधिक लम्बा, पीड़ादायी और विभिन्न सामन्ती मूल्यों-मान्यताओं को साथ घसीटता हुआ आगे बढ़ता है। आज़ादी से पहले औपनिवेशिक शासक वर्ग ने देशी सामन्त वर्ग की मदद से कृषि में मौटे तौर पर ज़मींदारी, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी भूमि सम्बन्धों को लागू किया था, जिनकी अपनी-अपनी विशिष्टताएँ थीं। भारत के पूँजीपति वर्ग ने समझोते-दबाव-समझोते की नीतियों पर चलते हुए सत्ता हथियाई। फिर धीरे-धीरे भूमि सम्बन्धों के पूँजीवादी रूपान्तरण का रास्ता साफ़ किया। सामन्ती तत्वों को वर्ग रूपान्तरण करने और ख़ुद को पूँजीवादी कुलक फ़ार्मरों में तब्दील करने का पूरा मौक़ा दिया गया और उन्हें सत्ता का भागीदार बनाया गया। कृषि में “प्रशियन रास्ते” से होने वाला पूँजीवादी रूपान्तरण ऐसे ही होता है। उत्पादन सम्बन्धों और उत्पादन शक्तियों के बदले हुए अन्तर्विरोधों के कारण क्रान्ति की मंजि़ल भी बदल जाती है। सूत्रीकरण और सिद्धान्त पुराने पड़ जाते हैं और सामाजिक यथार्थ आगे बढ़ जाता है। इसीलिए बदली हुई परिस्थितियों को समझकर व्यवहार के अनुरूप ही सिद्धान्त विकसित किये जाते हैं। जनवादी और नवजनवादी क्रान्ति के रास्ते पर 1960 के दशक में ही सवाल खड़े करने के पर्याप्त तर्क मौजूद थे, किन्तु उसके बाद 1980 का दशक आते-आते तो भारतीय अर्थव्यवस्था में पूँजीवादी विकास को बड़ी ही आसानी से रेखांकित किया जा सकता था। उदारीकरण-निजीकरण के पिछले 27 सालों के दौरान जिस द्रुत गति से भारतीय समाज की नस-नस और पौर-पौर में पूँजी की घुसपैठ हुई है, इसे कोई राजनीतिक रूप से मोतिबिन्द का शिकार ही नकार सकता है। पहली बात तो अब ज़मीन है भी कितनी जिसके वितरण की बात की जाती है, दूसरा जो 85 प्रतिशत सीमान्त और छोटी किसानी तबाही और बर्बादी झेल रही है, उसके हालात क्या सच्चाई से रूबरू कराने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। यह वास्तविकता है कि पूँजी के अभाव में तथा बड़ी पूँजी के सामने लाचार ग़रीब किसान आबादी को अपनी जगह-ज़मीन से उजड़कर फिर से भूमिहीन की श्रेणी में आने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा! ज़मीन के छोटे-से टुकड़े की भूख पैदा करना निश्चय ही आज एक प्रतिगामी क़दम होगा। आज के हालात में समाजवादी क्रान्ति के द्वारा ही मेहनतकश वर्ग को पूँजीवादी गुलामी से आज़ादी मिल सकती है। उसके बाद ज़मीन का राष्ट्रीयकरण करके बड़े पैमाने की सहकारी, सामूहिक और राज्य नियन्त्रित कृषि के द्वारा ही खेती से जुड़े मेहनतकश वर्ग के दिन फिर सकते हैं।

ग़रीब किसानों के दूरगामी हित किसमें हैं?

ग़रीब किसानों के असल हित आज पूरी तरह से मज़दूर और सर्वहारा वर्ग के हितों के साथ जुड़े हुए हैं। एक ऐसी समाज व्यवस्था ही उन्हें आज के दुखों से छुटकारा दिला सकती है, जिसमें उत्पादन के साधनों पर मेहनतकशों का नियन्त्रण हो तथा उत्पादन समाज की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर हो, न की निजी मुनाफ़े को केन्द्र में रखकर। छोटा लगने वाला कोई भी रास्ता मंजि़ल तक पहुँचने की दूरी को और भी बढ़ा सकता है। इसलिए तर्क के आधार पर सोचा जाना चाहिए और अपने सही वर्ग हितों की पहचान की जानी चाहिए। बेरोज़गारी, बढ़ती महँगाई, सबके लिए शिक्षा, चिकित्सा सुविधा, लूट, दमन शोषण आदि वे मुद्दे होंगे, जिनके आधार पर व्यापक जनता को एकजुट किया जा सकता है। जायज़ माँगों के लिए एकजुट संघर्ष की प्रक्रिया में ही आपसी भाईचारा और एकता और भी मज़बूत होंगे। 1917 से 1956 के सोवियत संघ और 1949 से 1976 के चीनी समाजों में मेहनतकाश जनता ने शानदार प्रयोग किये हैं। इन प्रयोगों के दौरान मेहनत करने वाले मज़दूरों और किसानों के जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन आये थे। हमें वहाँ के प्रयोगों के बारे में ज़रूर जानना चाहिए। आज भले ही समाजवादी समाजों पर कीचड़ उछाला जाता हो, उन महान प्रयोगों की “असफलता” का कितना ही ढिंढोरा पीता जाता हो, किन्तु मृत्युशैया पर पड़ा कराह रहा पूँजीवाद आम जनता को युद्ध, तबाही, ग़रीबी, भुखमरी देकर ख़ुद कितना सफल हुआ है, यह सबके सामने है। इतिहास-बोध बताता है कि नयी समाज-व्यवस्था की वाहक क्रान्तियाँ पहली बार में ही सफल नहीं हो गयीं, ख़ुद पूँजीवादी क्रान्तियों पर भी यह बात लागू होती है। इसलिए कहा जा सकता है कि ग़रीब किसान आबादी को अपने रोज़-रोज़ के संघर्षों को लड़ते हुए भी दूरगामी तौर पर समाजवाद को अपना लक्ष्य मानना चाहिए।

 

मज़दूर बिगुल,अक्‍टूबर-दिसम्‍बर 2017

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