महान अक्टूबर क्रान्ति की शतवार्षिकी पर
उन्मुक्त स्त्री

रामवृक्ष बेनीपुरी (‘लाल रूस’ पुस्तक से)

सोवियत संघ में स्त्री-पुरुषों के सम्बन्ध में भारी और मौलिक परिवर्तन हुआ है। लेकिन पूँजीवादी लेखक और पत्र उसे बढ़ा-चढ़ाकर इस प्रकार दिखलाना चाहते हैं कि जिसमें बाहर के अधकचरे सहानुभूति रखने वाले लोग भड़क उठें। इस सम्बन्ध में जो परिवर्तन हुआ है, वह दो बातों के कारण हुआ है। सोवियत राष्ट्र ने सिर्फ़ सिद्धान्त के रूप में ही स्त्री-पुरुष को बराबर नहीं माना है; बल्कि क्रियात्मक रूप से उसने इसे दिखला दिया है। दरअसल स्त्रियों की काग़ज़ी स्वतन्त्रता तब तक वास्तविक रूप धारण नहीं कर सकती, जब तक कि उन्हें आर्थिक स्वतन्त्रता न हो। पूँजीवादी देश चाहे यूरोप के हों या एशिया के, अमेरिका के हों या अफ़्रीका के, विवाह सम्बन्ध को स्त्रियों के लिए जीविकोपार्जन का एक पेशा मानते हैं। सामाजिक नियम राजनीतिक क़ानून से भी बलवान होते हैं; और वह कभी इस बात के लिए उत्साह नहीं देते कि स्त्री अपनी रोज़ी कमाने में पुरुषापेक्षी न हो। रोज़ी कमाने वाली स्त्री को नीची निगाह से देखा जाता है। डाॅक्टरी, वक़ालत, प्रोफे़सरी – जैसे कुछ काम ऐसे ज़रूर हैं, जिनमें जाने वाली स्त्रियों को उतनी नीची निगाह से नहीं देखा जाता। लेकिन इनमें जाने वाली औरतें कितनी हैं ही? जिनमें प्रतिभा और शिक्षा है, उनके लिए भी वहाँ पुरुषों से ज़बरदस्त प्रतियोगिता है। कैसे पुरुषों से? जो शताब्दियों से इन स्थानों पर अपना पक्का अधिकार जमा चुके हैं। स्त्री जो कुछ स्वतन्त्र जीविका कर भी सकती थी, उसमें भी आये दिन बाधा उपस्थित की जा रही है। हिटलर-शासित जर्मनी ने विवाहित स्त्रियों को नौकरी करने से वंचित कर दिया है। उसके अन्दर यही विचार काम कर रहा है; कि विवाह ऐसी स्त्री के लिए एक पेशा मिल ही चुका है; उसे दूसरे पेशे की ज़रूरत ही क्या?

सोवियत ने स्त्रियों को स्वतन्त्र पेशा अख्तियार करने के लिए सारे दरवाज़े खोल दिये हैं। आज वहाँ ऐसी स्त्री का मिलना मुश्किल है; जो पति की कमाई पर गुज़ारा करती हो। स्थलीय, समुद्री और वायवीय – तीनों सेनाओं में साधारण सिपाही से लेकर बड़े-बड़े अफ़सर बनने तक का अधिकार स्त्रियों को प्राप्त है। वायुसेना में तो उनकी काफ़ी तादाद है। राजनीति में वह खुलकर हिस्सा लेती हैं; और राष्ट्रीय प्रजातन्त्रों तथा सोवियत संघ प्रजातन्त्र के मन्त्री जैसे दायित्वपूर्ण पदों पर वह पहुँच रही हैं। पार्लियामेण्ट के मेम्बरों में उनकी ख़ासी संख्या है। इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, डॉक्टर ही नहीं, बड़ी-बड़ी फ़ैक्टरियों में कितनी ही डायरेक्टर तथा डिप्टी डायरेक्टर तक स्त्रियाँ हैं। वर्तमान सोवियत पार्लियामेण्ट के सबसे कम उम्र के सदस्य क्लाउदिया सखारोवा को ही ले लीजिए। सखारोवा की उम्र अभी 19 साल है। वह रोदिन्की स्थान में पैदा हुई थी। उसके माँ-बाप उसी जगह कपड़े की मिल में मज़दूर थे। आजकल की बोल्शेविक बुनाई मिल, जिसकी सखारोवा डिप्टी डायरेक्टर है, क्रान्ति के पहले एक व्यापारी की सम्पत्ति थी। उस वक़्त घण्टों का नियम नहीं था; और सखारोवा के माँ-बाप काम के मारे पिसे जाते थे। सखारोवा के जन्म के समय लाल क्रान्ति हो चुकी थी, लेकिन अभी गृह युद्ध भयंकर रूप धारण किये हुए था। धीरे-धीरे सभी जगह सोवियत शासन स्थापित हुआ, और हर जगह श्रमजीवियों और किसानों के लिए स्कूल और दूसरी शिक्षण संस्थाएँ क़ायम हुईं। सखारोवा ने स्कूल में प्रवेश किया। सोलह वर्ष की उम्र तक उसने प्रारम्भिक शिक्षा और अपने भविष्य के व्यवसाय की शिक्षा प्राप्त की। 1935 में बुनकर के तौर पर उसने काम शुरू किया। साम्यवादी सरकार ने अच्छा काम करने में उत्साह पैदा करने के लिए वेतन और पुरस्कार भी अधिक नियत कर रखा है। जिस साल सखारोवा ने काम करना शुरू किया, उसी साल अलेखेई स्तखानोफ़ ने सोवियत के श्रमिकों के सामने बुद्धिपूर्वक तत्परता से काम करने का एक नया उदाहरण पेश किया। उसने काम करने के विभाग और यन्त्र के उपयोग द्वारा साधारण उपज से कई गुना अधिक कोयला उतने ही समय में निकाला। स्तालिन ने जब यह ख़बर पायी तो स्तखानोफ़ को सुदूर दक्षिण दोन की खानों से बुलाकर क्रेमलिन में उसका सम्मान किया; और चन्द ही दिनों में स्तखानोफ़ की कीर्ति बाल्टिक समुद्र से प्रशान्त महासागर तक फैल गयी। सखारोवा ने भी स्तखानोफ़ का नाम सुना। पहले वह दो करघों पर काम करती थी। फिर उसने सोचा, किस तरह वह अकेले 4 करघों का संचालन कर सकेगी। उसमें वह सफल हुई। फिर कुछ दिनों बाद वह 6 करघों को चलाने लगी। इस सफलता पर उसका मानसिक हर्ष और उल्लास ही नहीं बढ़ा, बल्कि उसे नगद इनाम मिले। मास्को और काकेशस की सैर के लिए टिकट और पैसे मिले; और सबसे बड़ी बात यह हुई कि वह कारख़ाने के प्रधान बुनकरों में गिनी जाने लगी।

निश्चय ही अगर सखारोवा किसी पूँजीपति के कारख़ाने में काम करती होती, तो उसे यह सुभीता न होता। पहले तो उसे इतना अच्छा काम करने का जितना चाहिए उतना पुरस्कार न मिलता; और यदि दो से 4 करघों को पकड़ती तो एक मज़दूर बेकार हो जाता। 6 करघे तक पहुँचने तक तो 2 मज़दूर बेकार हो जाते। इस प्रकार वह अपने सहयोगी मज़दूरों के कोप का भाजन बनती। सोवियत में किसी के बेकार होने का डर नहीं। अव्वल तो उनके पास काम बहुत है, और जब काम कम हो, तो आदमी को बेकार करने की अपेक्षा काम के घण्टों को कम कर वह अधिक आदमियों को काम दे सकते हैं।

सखारोवा सिर्फ़ अपने ही कामों से सन्तुष्ट न थी; दूसरे साम्यवादी श्रमजीवियों की तरह अपने अनुभव से अपने दूसरे साथियों को फ़ायदा पहुँचाना भी वह अपना कर्तव्य समझती थी। उसने ख़ुद कहा है – ‘‘मैंने अपने कारख़ाने के युवक-युवती श्रमिकों को सुधरे हुए ढंग सिखलाने में मदद दी। मैंने कुछ बुनकरों को लेकर उन्हें सिखलाया; कि जिन चीज़ों पर काम करना है, उनकी सावधानी से देखभाल करनी चाहिए। मशीन और पुरजों को साफ़ और बाक़ायदा रखना चाहिए।’’ बोल्शेविक मिल में आज दर्जनों ऐसे चतुर उत्साही कार्यकर्ता हैं; जिनको सखारोवा ने इतनी थोड़ी उम्र में सिखाकर आगे बढ़ाया। उसी फ़ैक्टरी में एक तरुण बुनकर वान्या स्मिरनोफ़ भी काम करता था। उसका काम बहुत खराब था। जब वह पहले पहल कारख़ाने में आया, तो उसने इतना कपड़ा और सूत खराब किया कि उसे काम से हटा दिया गया। सखारोवा ने यह बात सुनी। उसने प्रबन्ध समिति से उसे फिर लेने के लिए प्रार्थना की; और फिर सिखलाना शुरू किया। पहले ही महीने में उसने अपने हिस्से से एक सौ सात सैकड़ा अधिक काम किया; और कुछ ही महीनों में स्मिरनोफ़ ने अपने काम के ढंग को इतना सुधारा कि वह अपनी फ़ैक्टरी के अच्छे कार्यकर्ताओं में हो गया।

सखारोवा सिर्फ़ काम करने में ही अपने साथियों को मदद नहीं देती, बल्कि वह शिक्षा-सम्बन्धी और सामाजिक क्षेत्र में भी आगे बढ़ी हुई है। वह स्वयं पढ़ने की बड़ी शौक़ीन है। रूसी और विदेशी साहित्य, राजनीतिक और उद्योग सम्बन्धी पुस्तकों को पढ़ने का उसे बहुत शौक़ है। वह ख़ुद पढ़ती है, और अपने साथियों की प्रवृृत्ति भी पढ़ने की ओर करती है। दो वर्ष के छोटे से समय में जबकि सखारोवा 18वें साल से ज़रा ही आगे बढ़ी थी, उसने अपने कार्य द्वारा सब पर अपना सिक्का जमा लिया; और प्रबन्ध समिति ने उसे कारख़ाने का असिस्टेण्ट डायरेक्टर (सहायक प्रबन्ध) निर्वाचित किया। बोल्शेविक मिल हमारे यहाँ जैसी कोई छोटी-मोटी मिल नहीं है, इसमें 11000 मज़दूर काम करते हैं; और इसी के सहारे रोदिन्की की 30000 जनसंख्या गुज़र-बसर करती है। सत्रह वर्ष की लड़की के लिए किसी पूँजीवादी देश में क्या ऐसा स्वप्न भी देखने को मिलता!

जिस वक़्त क्लाउदिया सखारोवा को यह पद मिला तो वह भी इसके भारी उत्तरदायित्व को समझकर सहम सी गयी थी। उसने कहा – ‘‘मुझे डर मालूम होता था कि मैं इस उत्तरदायित्व को निभा न सकूँगी। लेकिन मज़दूर संघ, इंजीनियर और पार्टी के सदस्यों ने मेरे इस नये काम में मेरी मदद की। पहले हमारा कारख़ाना अपनी योजना को पूरा नहीं करता था, लेकिन अब हमने अपनी उपज को योजना से भी ऊपर बढ़ा दिया है।’’

सखारोवा के माँ-बाप अभी जि़न्दा हैं। उसके दो छोटे भाई और एक बहन है। लड़के अभी स्कूल में पढ़ रहे हैं। सखारोवा के माँ-बाप के आनन्द के बारे में क्या पूछना है? कहाँ वह पुराने सौदागर के कारख़ाने में 12-12 घण्टे खटना और उस पर भी पेट को अन्न तथा तन को कपड़ा दुर्लभ! और कहाँ अब उन्हें सात घण्टे रोज़ का काम और अच्छा वेतन! और उनकी बेटी इस छोटी उम्र में फ़ैक्टरी में सहायक प्रबन्धक और इसके बाद देश की सर्वोपरि पार्लियामेण्ट की सदस्य! सखारोवा के माँ-बाप के घर में, जहाँ चूहे कलाबाजि़याँ खेला करते थे, अब रेडियो, फ़ोनोग्राफ़ और सिलाई की मशीन है। खाना, पीना, रहना सभी काफ़ी ऊँचा है। पार्लियामेण्ट की सदस्य चुने जाने पर सखारोवा ने कहा – ‘‘कहाँ मैं एक 19 वर्ष की कपड़े के कारख़ाने की मज़दूरिन थी और वहीं मैं अब राजनीतिज्ञ बन गयी? मैं जानती हूँ कि मेरे ऊपर कितनी भारी जवाबदेही है। दुनिया के किसी भी देश में मेरी जैसी कमसिन लड़की शासन-संचालन में हाथ डालने का अधिकार नहीं पा सकती।’’ सखारोवा अब भी अपने कारख़ाने की सहायक प्रबन्धक है; और साथ ही उसे पार्लियामेण्ट की सदस्य का कर्तव्य भी करना पड़ता है। अभी हाल में वह अध्ययनार्थ औद्योगिक एकेडमी में इंजीनियर का डिप्लोमा पाने के लिए दाखि़ल हुई है।

 

मज़दूर बिगुल,अक्‍टूबर-दिसम्‍बर 2017

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