अंतरविरोध के बारे में

माओ त्से–तुङ, जुलाई 1937

यह दार्शनिक निबंध कामरेड माओ त्से–तुङ ने “व्यवहार के बारे में” शीर्षक अपने निबंध के बाद लिखा था, और उक्त निबंध के ही समान इस निबंध का उद्देश्य भी उन गंभीर कठमुल्लावादी विचारों को दूर करना था जो उस समय पार्टी में मौजूद थे। यह सबसे पहले येनान में जापान–विरोधी सैनिक व राजनीतिक कालेज में भाषण के रूप में प्रस्तुत किया गया था। संकलित रचनाओं में शामिल करते समय लेखक ने इसमें कुछ जोड़ा, घटाया और संशोधन किया है।

इस लेख की पीडीएफ फाइल इस लिंक से डाउनलोड करें

To read English version of this article click here

वस्तुओं में अंतरविरोध का नियम, यानी विपरीत तत्वों की एकता का नियम, भौतिकवादी द्वन्द्ववाद का सबसे बुनियादी नियम है। लेनिन ने कहा था : “वास्तविक अर्थ में, पदार्थों की मूलवस्तु में निहित अंतरविरोध का अध्ययन  ही द्वन्द्ववाद है।”[1] लेनिन प्राय: इस नियम को द्वन्द्ववाद की मूलवस्तु बतलाते थे; उन्होंने  इसे द्वन्द्ववाद का केंद्र–भाग भी कहा है।[2] इसलिए इस नियम का अध्ययन करते समय, यह लाजमी है कि हम अनेक विषयों की, दर्शन की बहुत सी समस्याओं की चर्चा करें। यदि हम इन सारी समस्याओं को स्पष्ट रूप से समझ सकेंगे, तो भौतिकवादी द्वन्द्ववाद के बारे में हम एक बुनियादी समझ प्राप्त कर लेंगे। ये समस्याएं हैं : दो विश्व–दृष्टिकोण; अंतरविरोध की सार्वभौमिकता; अंतरविरोध की विशिष्टता; प्रधान अंतरविरोध और अंतरविरोध का प्रधान पहलू; अंतरविरोध के पहलुओं की एकरूपता और उनका संघर्ष; तथा अंतरविरोध में शत्रुता का स्थान ।

हाल के वर्षों में सोवियत संघ के दार्शनिक क्षेत्रों में देबोरिनपंथी आदर्शवाद की जो आलोचना हुई है, उसने हम लोगों में गहरी दिलचस्पी  पैदा कर दी है। देबोरिन के आदर्शवाद ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी पर बहुत बुरा प्रभाव डाला है, और यह नहीं कहा जा सकता कि हमारी पार्टी  में कठमुल्लावादी विचार का इस पंथ  की विचार पद्धति के साथ संबंध न रहा हो। इसलिए हमारे वर्तमान दार्शनिक अध्ययन का मुख्य उद्देश्य कठमुल्लावादी विचार को दूर करना ही होना  चाहिए।

  1. दो विश्व–दृष्टिकोण

मानव–ज्ञान के इतिहास में विश्व के विकास के नियमों के बारे में हमेशा दो धारणाएं रही हैं, अध्यात्मवादी धारणा और द्वन्द्ववादी धारणा, जिनसे दो परस्पर–विरोधी विश्व–दृष्टिकोण बन जाते हैं। लेनिन ने कहा था :

विकास (क्रमिक विकास) की दो मूल (अथवा दो संभव ? या दो इतिहास में प्रदर्शित ?) धारणाएं हैं : घटती या बढ़ती के रूप में, पुनरावृत्ति के रूप में विकास को देखना, और विपरीत तत्वों की एकता के रूप में विकास को देखना (किसी इकाई का एक दूसरे को बहिष्कृत करने वाले विपरीत तत्वों में विभाजन और उनका पारस्परिक संबंध)।[3]

लेनिन यहां पर इन्हीं दो भिन्न विश्व–दृष्टिकोणों का उल्लेख कर रहे थे।

चीन में अध्यात्मवाद का एक अन्य नाम है “श्वेन–श्वे”। चाहे चीन में हो अथवा यूरोप में, इतिहास के एक काफी लंबे काल तक, यह विचारधारा आदर्शवादी विश्व–दृष्टिकोण का ही एक अंग थी और मानव–चिंतन में एक प्रभुत्वशाली स्थान पर आसीन रही। यूरोप में, पूंजीपति वर्ग के शैशव काल का भौतिकवाद भी अध्यात्मिक ही था। जब अनेक यूरोपीय देशों में सामाजिक अर्थव्यवस्था अत्यंत विकसित पूंजीवाद की मंजिल पर पहुंच गई, जब उत्पादक शक्तियां, वर्ग–संघर्ष और विज्ञान इतिहास में एक अभूतपूर्व स्तर तक विकसित हो गए, और जब औद्योगिक सर्वहारा वर्ग ऐतिहासिक विकास में सबसे महान प्रेरक शक्ति बन गया, तब मार्क्सवाद के भौतिकवादी द्वन्द्ववाद के विश्व–दृष्टिकोण का उदय हुआ। तब भौतिकवादी द्वन्द्ववाद का विरोध करने के लिए, पूंजीपति वर्ग के बीच एक खुले रूप में प्रतिपादित, अत्यंत नग्न प्रतिक्रियावादी आदर्शवाद के अलावा भोंड़े विकासवाद का भी उदय हुआ।

अध्यात्मवादी विश्व–दृष्टिकोण या भोंड़े विकासवाद का विश्व–दृष्टिकोण वस्तुओं को एक अलग–थलग, स्थिर और एकांगी दृष्टि से देखता है। यह दृष्टिकोण विश्व की तमाम वस्तुओं, उनके रूपों तथा उनकी किस्मों को हमेशा के लिए एक दूसरे से अलग तथा अपरिवर्तनीय मानता है। यदि कोई परिवर्तन हो, तो उसका अर्थ केवल परिमाण में घटती या बढ़ती, अथवा स्थानांतरण है। इसके अलावा, ऐसी घटती या बढ़ती, अथवा स्थानांतरण का कारण वस्तुओं के अंदर नहीं, वरन उनके बाहर रहता है, अर्थात बाह्य शक्तियां ही उन्हें प्रेरित करती हैं। अध्यात्मवादियों का मत है कि विश्व में विभिन्न प्रकार की सभी वस्तुओं तथा उनकी विशिष्टताओं में, उनके अस्तित्व में आने के समय से कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। बाद में यदि कोई परिवर्तन हुआ है, तो वह केवल परिमाण में बढ़ती या घटती ही है। उनका यह दावा है कि कोई वस्तु हमेशा केवल खुद उसी वस्तु के रूप में बार–बार प्रजनित हो सकती है और किसी भिन्न वस्तु में नहीं बदल सकती। उनकी दृष्टि में पूँजीवादी शोषण, पूंजीवादी होड़, पूंजीवादी समाज की व्यक्तिवादी विचारधारा, आदि तमाम बातें प्राचीन काल के दास समाज में, यहां तक कि आदिम समाज में भी पाई जा सकती हैं, और बिना किसी परिवर्तन के हमेशा ही बनी रहेंगी। सामाजिक विकास के कारणों को वे समाज के बाहर की परिस्थितियों में, जैसे भूगोल और जलवायु में, ढूंढ़ते हैं। वे अत्यंत सरल ढंग से वस्तुओं के विकास के कारणों को वस्तुओं के बाहर ढूंढ़ते हैं और भौतिकवादी द्वन्द्ववाद द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत को ठुकरा देते हैं कि वस्तुओं के भीतर विद्यमान अंतरविरोध ही उनके विकास का कारण है। परिणामस्वरूप वे न तो वस्तुओं की गुणात्मक विविधता की व्याख्या कर पाते हैं और न ही एक गुण के दूसरे गुण में परिवर्तन की घटना की। यूरोप में, चिंतन की यह प्रणाली यांत्रिक भौतिकवाद के रूप में सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में और भोंड़े विकासवाद के रूप में उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तथा बीसवीं शताब्दी के शुरू में मौजूद थी। चीन में, अध्यात्मवादी चिंतनधारा की मिसाल इस उक्ति में देखने को मिलती है : “व्योम नहीं बदलता, इसी तरह ताओ भी नहीं बदलता”[4]। यह चिंतनधारा लंबे अरसे तक पतनोन्मुख सामंती शासक वर्ग का प्रश्रय पाती रही। गत सौ वर्षों में यूरोप से चीन में लाए गए इस यांत्रिक भौतिकवाद तथा भोंड़े विकासवाद को चीनी पूँजीपति वर्ग का समर्थन प्राप्त हुआ है।

अध्यात्मवादी विश्व–दृष्टिकोण के विपरीत, भौतिकवादी द्वन्द्ववाद के विश्व–दृष्टिकोण का कहना है कि किसी वस्तु के विकास को समझने के लिए उसका अध्ययन भीतर से, अन्य वस्तुओं के साथ उस वस्तु के संबंध से किया जाना चाहिए; दूसरे शब्दों में वस्तुओं के विकास को उनकी आंतरिक और आवश्यक आत्म–गति के रूप में देखना चाहिए, और यह कि प्रत्येक गतिमान वस्तु को और उसके इर्द–गिर्द की वस्तुओं को परस्पर संबंधित तथा एक–दूसरे को प्रभावित करती हुई वस्तुओं के रूप में देखना चाहिए। किसी वस्तु के विकास का मूल कारण उसके बाहर नहीं बल्कि उसके भीतर होता है; उसके अंदरूनी अंतरविरोध में निहित होता है। यह अंदरूनी अंतरविरोध हर वस्तु में निहित होता है तथा इसीलिए हर वस्तु गतिमान और विकासशील होती है। किसी वस्तु के भीतर मौजूद अंतरविरोध ही उसके विकास का मूल कारण होता है, जबकि उसके और अन्य वस्तुओं के बीच के अंतर–संबंध  और अंतर–प्रभाव उसके विकास के गौण कारण होते हैं। इस प्रकार भौतिकवादी द्वन्द्ववाद, अध्यात्मवादी यांत्रिक भौतिकवाद और भोंडे़ विकासवाद द्वारा प्रतिपादित बाह्य कारणों, या बाह्य प्रेरणा के सिद्धांत का जोरदार विरोध करता है। जाहिर है कि मात्र बाह्य कारणों से वस्तुओं में केवल यांत्रिक गति ही पैदा हो सकती है, अर्थात उनके पैमाने अथवा मात्रा में ही परिवर्तन हो सकता है, लेकिन उनसे इस बात का खुलासा नहीं हो सकता कि वस्तुओं में हजारों किस्म के गुणात्मक भेद क्यों होते हैं और क्यों एक वस्तु दूसरी वस्तु में बदल जाती है। वास्तव में किसी बाह्य शक्ति से प्रेरित वस्तुओं की यांत्रिक गति भी उनके आंतरिक अंतरविरोध के कारण ही उत्पन्न होती है। वनस्पतियों और जंतुओं की सहज वृद्धि और उनका परिमाणात्मक विकास भी मुख्यत: उनके आंतरिक अंतरविरोधों के कारण ही होता है। इसी प्रकार, सामाजिक विकास मुख्यतया बाह्य कारणों से नहीं बल्कि आंतरिक कारणों से होता है। बहुत से देशों की भौगोलिक और वायुमंडलीय परिस्थितियां लगभग एक समान होते हुए भी उनका विकास अत्यंत भिन्न और असमान रूप से होता है। यही नहीं, किसी देश की भौगोलिक और वायुमंडलीय परिस्थितियों में कोई परिवर्तन न होने पर भी उसके अंदर जबरदस्त सामाजिक परिवर्तन हो सकते हैं। साम्राज्यवादी रूस समाजवादी सोवियत संघ में बदल गया और सामंती जापान, जो द्वार बंद करके संसार से अलग–थलग था, साम्राज्यवादी जापान में बदल गया, जबकि इन दोनों देशों की भौगोलिक और वायुमंडलीय परिस्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। चीन में, जो कि एक लंबे अरसे से सामंती व्यवस्था के चंगुल में रहा है, गत सौ वर्षों के दौरान बहुत भारी परिवर्तन हुए हैं और अब वह एक नए, मुक्त और स्वतंत्र चीन की दिशा में परिवर्तित हो रहा है; लेकिन चीन की भौगोलिक और वायुमंडलीय परिस्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। समूची पृथ्वी तथा उसके प्रत्येक भाग की भौगोलिक और वायुमंडलीय परिस्थितियों में परिवर्तन अवश्य होते रहते हैं, किंतु समाज में होने वाले परिवर्तनों की तुलना में वे बहुत ही नगण्य हैं; भौगोलिक और वायुमंडलीय परिस्थितियों में होने वाले परिवर्तन जहां दसियों हजार सालों में व्यक्त होते हैं, वहां समाज में होने वाले परिवर्तन केवल हजारों, सैकड़ों, दसियों सालों में और यहां तक कि क्रांति के काल में कुछ ही सालों या महीनों में व्यक्त हो जाते हैं। भौतिकवादी द्वन्द्ववाद के दृष्टिकोण के अनुसार प्रकृति में परिवर्तनों का मुख्य कारण प्रकृति में मौजूद आंतरिक अंतरविरोधों का विकास होता है। समाज में परिवर्तनों का मुख्य कारण होता है समाज में मौजूद आंतरिक अंतरविरोधों का, अर्थात उत्पादक शक्तियों और उत्पादन–संबंधों के बीच के अंतरविरोध, वर्गों के बीच के अंतरविरोध तथा नए और पुराने के बीच के अंतरविरोध का विकास होना; इन अंतरविरोधों का विकास ही समाज को आगे बढ़ाता है, तथा पुराने समाज की जगह नए समाज की स्थापना की प्रक्रिया को गति प्रदान करता है। क्या भौतिकवादी द्वन्द्ववाद बाह्य कारणों की भूमिका को नहीं मानता ? नहीं, ऐसा कदापि नहीं है। भौतिकवादी द्वन्द्ववाद का मत है बाह्य कारण परिवर्तन के लिए महज परिस्थिति होते हैं,  जबकि आंतरिक कारण परिवर्तन का आधार होते हैं, तथा बाह्य कारण आंतरिक कारणों के जरिए ही क्रियाशील होते हैं। अनुकूल तापमान में अंडा चूजे में बदल जाता है, लेकिन ऐसा कोई तापमान नहीं होता जो एक पत्थर को चूजे में बदल दे, कारण अंडे और पत्थर का आधार अलग–अलग होता है। विभिन्न देशों की जनता के बीच निरंतर पारस्परिक प्रभाव पड़ता रहता है। पूंजीवाद के युग में, विशेषकर साम्राज्यवाद और सर्वहारा क्रांति के युग में, विभिन्न देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में पारस्परिक प्रभाव तथा अंतरक्रिया अत्यंत भारी होती है। अक्टूबर समाजवादी क्रांति ने न केवल रूस के इतिहास में बल्कि विश्व के इतिहास में भी एक नए युग का सूत्रपात किया। उसने विश्व के तमाम देशों के आंतरिक परिवर्तनों पर प्रभाव डाला; इसी तरह उसने चीन के आंतरिक परिवर्तनों को और भी गहरे रूप में प्रभावित किया। लेकिन ये परिवर्तन उन देशों के तथा चीन के विकास के आंतरिक नियमों से ही उत्पन्न हुए थे। युद्ध में एक सेना विजयी होती है और दूसरी पराजित; विजय और पराजय दोनों ही आंतरिक कारणों से निश्चित होती हैं। एक सेना विजयी इसलिए होती है कि या तो वह शक्तिशाली है या उसकी कमान सही है; दूसरी सेना पराजित इसलिए होती है कि या तो वह कमजोर है या उसकी कमान अयोग्य है; बाह्य कारण आंतरिक कारणों के जरिए ही क्रियाशील होते हैं। 1927 में चीन के बड़े पूंजीपतियों के वर्ग ने, स्वयं चीनी सर्वहारा वर्ग के भीतर (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में) मौजूद अवसरवाद का फायदा उठाकर सर्वहारा वर्ग को पराजित किया। जब हमने इस अवसरवाद को खत्म कर दिया, तो चीनी क्रांति फिर आगे बढ़ने लगी। बाद में हमारी पार्टी में दुस्साहसवाद के उदय के कारण, चीनी क्रांति को दोबारा दुश्मन के कठोर प्रहारों का शिकार होना पड़ा। जब हमने इस दुस्साहसवाद को खत्म किया, तब हमारा कार्य फिर से एक बार आगे बढ़ चला। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि क्रांति को विजय की मंजिल तक पहुंचाने के लिए, किसी राजनीतिक पार्टी  को खुद अपनी राजनीतिक कार्यदिशा के सही होने पर और अपने संगठन की मजबूती पर निर्भर होना चाहिए।

द्वन्द्ववादी विश्व–दृष्टिकोण का उदय चीन और यूरोप दोनों ही जगहों पर प्राचीन काल में ही हो चुका था। किंतु प्राचीन द्वन्द्ववाद का स्वरूप बहुत कुछ स्वयंस्फूर्त और सरल था; उस समय की सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों में वह एक सैद्धांतिक व्यवस्था का रूप नहीं ले सका और इसलिए विश्व की पूरी तरह व्याख्या नहीं कर सका और बाद में उसका स्थान अध्यात्मवाद ने ले लिया। प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक हेगेल ने, जिसका जीवन काल अठारहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक था, द्वन्द्ववाद के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान किया; पर उसका द्वन्द्ववाद आदर्शवादी द्वन्द्ववाद था। सर्वहारा आंदोलन के महान कर्मवीर मार्क्स और एंगेल्स ने जब मानव–ज्ञान के इतिहास की सकारात्मक उपलब्धियों का संश्लेषण कर लिया, विशेषकर हेगेल के द्वन्द्ववाद के युक्तिसंगत तत्वों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाकर उन्हें ग्रहण कर लिया और द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद व ऐतिहासिक भौतिकवाद के महान सिद्धांत की रचना की, तभी मानव–ज्ञान के इतिहास में एक अभूतपूर्व महान क्रांति हुई। लेनिन और स्तालिन ने इस महान सिद्धांत को और अधिक विकसित किया। जब यह सिद्धांत चीन में पहुंचा, तो उसने चीनी विचार–जगत में जबरदस्त परिवर्तन ला दिया।

यह द्वन्द्वात्मक विश्व–दृष्टिकोण हमें मुख्य रूप में यह सिखाता है कि विभिन्न वस्तुओं में मौजूद अंतरविरोधों की गति का निरीक्षण और विश्लेषण कुशलता से किया जाना चाहिए, और ऐसे विश्लेषण के आधार पर अंतरविरोधों को हल करने के तरीकों का पता लगाया जाना चाहिए। इसलिए, यह हमारे लिए अत्यधिक महत्व की बात है कि हम वस्तुओं में अंतरविरोध के नियम को ठोस रूप से समझ लें।

  1. अंतरविरोध की सार्वभौमिकता

अपनी व्याख्या को सहज बनाने के लिए, मैं यहां पहले अंतरविरोध की सार्वभौमिकता की चर्चा करूंगा, और उसके बाद अंतरविरोध की विशिष्टता पर विचार करूंगा। इसकी वजह यह है कि अंतरविरोध की सार्वभौमिकता की व्याख्या संक्षेप में की जा सकती है, क्योंकि मार्क्सवाद के महान निर्माताओं और उसको आगे बढ़ाने वालों-मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन-ने जब से भौतिकवादी द्वन्द्ववाद के विश्व–दृष्टिकोण की खोज की और मानव–इतिहास तथा प्राकृतिक इतिहस के विश्लेषण के अनेक पहलुओं पर तथा समाज और प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों के अनेक पहलुओं पर भौतिकवादी द्वन्द्ववाद को बड़ी सफलता के साथ लागू किया (जैसे सोवियत संघ में), तभी से अनेक लोगों ने अंतरविरोध की सार्वभौमिकता को स्वीकार किया है; किंतु अंतरविरोध की विशिष्टता के बारे में बहुत से साथियों के विचार, विशेषकर कठमुल्लावादियों के विचार अब भी साफ नहीं हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि अंतरविरोध की विशिष्टता में ही अंतरविरोध की सार्वभौमिकता निहित है। वे यह भी नहीं समझ पाते कि हमारे सामने उपस्थित ठोस वस्तुओं में निहित अंतरविरोध की विशिष्टता का अध्ययन क्रांतिकारी व्यवहार को आगे बढ़ाने में मार्गदर्शन करने के लिए कितना अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए, अंतरविरोध की विशिष्टता के अध्ययन पर जोर देना तथा उसकी काफी विस्तार के साथ व्याख्या करना बहुत जरूरी है। इस कारण, वस्तुओं में निहित अंतरविरोध के नियम का विश्लेषण करते समय हम पहले अंतरविरोध की सार्वभौमिकता का विश्लेषण करेंगे, फिर अंतरविरोध की विशिष्टता के विश्लेषण पर विशेष जोर देंगे और अंत में अंतरविरोध की सार्वभौमिकता पर फिर लौट आएंगे।

अंतरविरोध की सार्वभौमिकता या निरपेक्षता के दो अर्थ हैं। एक तो यह कि अंतरविरोध सभी वस्तुओं के विकास की प्रक्रिया में मौजूद रहता है और दूसरा यह कि प्रत्येक वस्तु के विकास की प्रक्रिया में अंतरविरोधों की गति आरंभ से अंत तक कायम रहती है।

एंगेल्स ने कहा था : “गति स्वयं एक अंतरविरोध है।”[5] लेनिन ने विपरीत तत्वों की एकता के नियम की परिभाषा इस प्रकार की थी कि वह “प्रकृति (जिसमें मस्तिष्क और समाज भी शामिल हैं) की सभी घटनाओं और प्रक्रियाओं में अंतरविरोधपूर्ण, एक दूसरे को बहिष्कृत करने वाली, विपरीत प्रवृतियों को मानना (खोज निकालना)”[6] है। क्या ये विचार सही हैं ? हां, सही हैं। तमाम वस्तुओं में निहित अंतरविरोधपूर्ण पहलुओं की अंतर–निर्भरता तथा उनके बीच का संघर्ष ही उन वस्तुओं के जीवन को निर्धारित करते हैं तथा उनके विकास को आगे बढ़ाते हैं। ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसमें अंतरविरोध निहित न हो; अंतरविरोध के बिना विश्व ही न रहेगा।

अंतरविरोध गति के साधारण रूपों (मिसाल के लिए यांत्रिक गति) का आधार है और गति के संश्लिष्ट रूपों का आधार तो वह और भी अधिक है।

एंगेल्स ने अंतरविरोध की सार्वभौमिकता की इन शब्दों में व्याख्या की है :

यदि साधारण यांत्रिक स्थानांतरण में अंतरविरोध निहित है, तो यह बात पदार्थ की गति के उच्चतर रूपों के लिए, विशेषकर प्राणी–जीवन और उसके विकास के लिए और भी अधिक सच है। …जीवन प्रथमत: ठीक इसी बात में निहित है कि एक सजीव वस्तु प्रत्येक क्षण स्वयं वही वस्तु रहते हुए भी कुछ और वस्तु होती है। इसलिए जीवन भी एक अंतरविरोध है जो खुद वस्तुओं और प्रक्रियाओं में मौजूद होता है, और जो लगातार अपने आप उत्पन्न और हल होता रहता है; और ज्यों ही यह अंतरविरोध खत्म हो जाता है, त्यों ही जीवन का भी अंत हो जाता है और मृत्यु का आगमन होता है। इसी तरह हमने यह भी देखा कि विचार के क्षेत्र में भी हम अंतरविरोधों से बच नहीं सकते, और उदाहरण के लिए यह कि मानव जाति की ज्ञानप्राप्ति की स्वभावजन्य असीम क्षमता और मनुष्य द्वारा, जो अपनी बाह्य परिस्थितियों से सीमित होता है और जिसकी बौद्धिक क्षमता भी सीमित होती है, उसकी वास्तविक प्राप्ति के बीच के अंतरविरोध का समाधान-कम से कम व्यावहारिक रूप में, हमारे लिए-एक के बाद दूसरी पीढ़ी के अंतहीन आवर्तन के रूप में, अंतहीन प्रगति के रूप में होता है।

…उच्च गणित–शास्त्र का एक बुनियादी नियम…अंतरविरोध ही है।…पर निम्न गणित–शास्त्र में अंतरविरोधों की भरमार है।[7]

लेनिन ने अंतरविरोध की सार्वभौमिकता की निम्नलिखित मिसालें दी थी:

गणित–शास्त्र में : + और  –– ; अवकलन (डिफरेंशियल) और समाकलन (इन्टिगरल)।

यंत्र–विज्ञान में : क्रिया और प्रतिक्रिया।

भौतिक विज्ञान में : धनात्मक विद्युत और ऋणात्मक विद्युत।

रसायन विज्ञान में : परमाणुओं का संघटन और विघटन ।

सामाजिक विज्ञान में : वर्ग–संघर्ष।[8]

युद्ध में, हमला और बचाव, आगे बढ़ना और पीछे हटना, जीत और हार सभी अंतरविरोधपूर्ण घटनाएं हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं हो सकता। ये दोनों पहलू आपस में संघर्ष भी करते हैं तथा एक दूसरे पर निर्भर भी रहते हैं, यही युद्ध को सम्पूर्ण बनाते हैं, युद्ध के विकास को आगे बढ़ाते हैं तथा युद्ध की समस्याओं को हल करते हैं।

मानव की धारणाओं में पाए जाने वाले प्रत्येक भेद को वस्तुगत अंततरविरोध के प्रतिबिंब के रूप में देखना चाहिए। वस्तुगत अंतरविरोध मनोगत चिंतन में प्रतिबिंबित होते हैं, यही प्रक्रिया धारणाओं के अंतरविरोधों की गति की रचना करती है, और अंतरविरोधों की यह गति चिंतन के विकास को आगे बढ़ाती है तथा मानव के चिंतन में उठने वाली समस्याओं को निरंतर हल करती जाती है।

पार्टी के भीतर, विभिन्न विचारों के बीच विरोध और संघर्ष लगातार चलता रहता है; यह पार्टी के भीतर समाज के विभिन्न वर्गों के बीच के अंतरविरोधों तथा नए और पुराने के बीच के अंतरविरोधों को प्रतिबिंबित करता है। अगर पार्टी के भीतर अंतरविरोध न हों और उन्हें हल करने के लिए विचारधारात्मक संघर्ष न चलाए जाएं, तो पार्टी की जिंदगी खत्म हो जाएगी।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि चाहे गति का रूप साधारण हो या संश्लिष्ट, चाहे वस्तुगत घटना हो या विचारगत, अंतरविरोध सार्वभौमिक रूप से तथा सभी प्रक्रियाओं में मौजूद रहता है। किंतु क्या अंतरविरोध हर प्रक्रिया की प्रारंभिक अवस्था में भी मौजूद रहता है ? क्या प्रत्येक वस्तु के विकास की प्रक्रिया में आरंभ से अंत तक अंतरविरोधों की गति बनी रहती है ?

सोवियत दार्शनिकों द्वारा देबोरिन–पंथ की आलोचना में लिखे गए लेखों से ज्ञात होता है कि देबोरिन–पंथ का दृष्टिकोण यह था कि अंतविरोध किसी प्रक्रिया के एकदम आरंभ में उत्पन्न नहीं होता, बल्कि उसके विकास की एक निश्चित अवस्था में ही प्रकट होता है। अगर बात ऐसी होती तो उस निश्चित अवस्था पर पहुंचने के पहले उस प्रक्रिया का विकास आंतरिक कारणों से नहीं बल्कि बाह्य कारणों से होता। इस प्रकार देबोरिन बाह्य कारणों और यांत्रिकता के अध्यात्मवादी सिद्धांत पर लौट जाते हैं। ठोस समस्याओं के विश्लेषण में इस दृष्टिकोण को लागू करके, देबोरिनपंथी इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि सोवियत संघ में वर्तमान परिस्थितियों में कुलकों और आम किसानों के बीच केवल भेद ही है, अंतरविरोध नहीं, और इस प्रकार वे बुखारिन के मत से पूर्णतया सहमत हो जाते हैं। फ्रांसीसी क्रांति का विश्लेषण करते हुए वे यह कहते हैं कि क्रांति के पहले थर्ड एस्टेट में, जिसमें मजदूर, किसान और पूंजीपति वर्ग शामिल थे, केवल भेद मौजूद थे, अंतरविरोध नहीं। देबोरिनपंथियों के ये विचार मार्क्सवाद–विरोधी विचार हैं। वे यह नहीं समझते कि दुनिया में मौजूद प्रत्येक भेद में पहले से ही एक अंतरविरोध मौजूद होता है, और यह कि भेद खुद ही अंतरविरोध है। मजदूरों और पूंजीपतियों के बीच इन दोनों वर्गों के अस्तित्व में आने के समय से ही अंतरविरोध रहा है, यद्यपि आरंभ में इस अंतरविरोध ने उग्र रूप धारण नहीं किया था। यहां तक कि सोवियत संघ की मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों के अंतर्गत भी मजदूरों और किसानों के बीच भेद मौजूद है और यह भेद अंतरविरोध ही है, यद्यपि यह अंतरविरोध मजदूरों और पूंजीपतियों के बीच मौजूद अंतरविरोध से भिन्न है और यह उग्र रूप धारण कर शत्रुता या वर्ग–संघर्ष के रूप में परिवर्तित नहीं होगा; समाजवादी निर्माण के दौरान मजदूरों और किसानों ने सुदृढ़ संश्रय कायम कर लिया है और वे समाजवाद से कम्युनिज्म की दिशा में आगे बढ़ने की प्रक्रिया में इस अंतरविरोध को कदम–ब–कदम हल कर रहे हैं। सवाल अलग–अलग किस्म के अंतरविरोधों का है, न कि उनके होने या न होने का। अंतरविरोध सार्वभौमिक और निरपेक्ष होता है, वह सभी वस्तुओं के विकास की प्रक्रिया में मौजूद रहता है और सभी प्रक्रियाओं में शुरू से अंत तक बना रहता है।

किसी नई प्रक्रिया के उदय होने का क्या तात्पर्य है ? इसका तात्पर्य है कि जब कोई नई एकता तथा उसके संघटक विपरीत तत्व किसी पुरानी एकता और उसके संघटक विपरीत तत्वों का स्थान लेते हैं, तो पुरानी प्रक्रिया के स्थान पर एक नई प्रक्रिया का उदय होता है। पुरानी प्रक्रिया का अंत हो जाता है और नई प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। इस नई प्रक्रिया में नए अंतरविरोध होते हैं, और उसके अपने अंतरविरोधों के विकास का इतिहास शुरू हो जाता है।

जैसा कि लेनिन ने बताया था, मार्क्स ने अपनी पुस्तक “पूंजी” में अंतरविरोधों की उस गति का आदर्श विश्लेषण किया है जो वस्तुओं के विकास की प्रक्रिया में शुरू से अंत तक बनी रहती है। यह एक ऐसा तरीका है जिसे सभी वस्तुओं के विकास की प्रक्रिया के अध्ययन में लागू करना चाहिए। लेनिन ने खुद भी इस तरीके को सही ढंग से लागू किया था और अपनी सभी रचनाओं में इसे अपनाया था।

‘‘पूंजी” नामक अपनी रचना में मार्क्स पहले पूंजीवादी (तिजारती माल वाले) समाज के सबसे सरल, सबसे साधारण और बुनियादी, सबसे अधिक प्रचलित और रोजमर्रा के संबंध का विश्लेषण करते हैं, एक ऐसे संबंध का जो करोड़ों बार देखने में आता है, यानी माल का विनिमय। इस अति–साधारण घटना (पूंजीवादी समाज की इस “कोशिका”) में यह विश्लेषण आधुनिक समाज के सभी अंतरविरोधों को (या सभी अंतरविरोधों के बीजों को) व्यक्त कर देता है। बाद की व्याख्या हमें इन अंतरविरोधों के और इस समाज के, जो अपने अलग–अलग अंशों की (समष्टि) है, शुरू से अंत तक के विकास (वृद्धि तथा गति दोनों ही) से अवगत कराती है।

लेनिन ने आगे कहा : “द्वन्द्ववाद की व्याख्या (या अध्ययन) का भी सामान्यतया यही तरीका होना चाहिए।”[9]

चीनी कम्युनिस्टों को यह तरीका सीख लेना चाहिए; केवल तभी वे चीनी क्रांति के इतिहास और उसकी वर्तमान स्थिति का सही विश्लेषण कर सकेंगे तथा उसके भविष्य के बारे में अनुमान लगा सकेंगे।

  1. अंतरविरोध की विशिष्टता

अंतरविरोध सभी वस्तुओं के विकास की प्रक्रिया में मौजूद है; यह प्रत्येक वस्तु के विकास की प्रक्रिया में शुरू से अंत तक बना रहता है। यही अंतरविरोध की सार्वभौमिकता और निरपेक्षता है, जिसकी हमने ऊपर चर्चा की है। अब हम अंतरविरोध की विशिष्टता और सापेक्षता की चर्चा करेंगे।

इस समस्या को कई पहलुओं से देखना–परखना होगा।

पहली बात तो यह है कि पदार्थ की गति के प्रत्येक रूप में मौजूद अंतरविरोध की अपनी विशिष्टता होती है। पदार्थ के बारे में मानव का ज्ञान पदार्थ की गति के रूपों का ज्ञान है, कारण यह कि विश्व में गतिमान पदार्थ के अलावा और कुछ नहीं है और पदार्थ की गति निश्चित रूप से कोई न कोई रूप धारण कर लेती है। पदार्थ की गति के प्रत्येक रूप पर विचार करते समय हमें उसके उन तत्वों को ध्यान में रखना होगा जो उसमें तथा गति के अन्य रूपों में समान रूप से मौजूद रहते हैं। लेकिन जो बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है तथा जो वस्तुओं के बारे में हमारे ज्ञान के आधार को नियोजित करती है, वह यह है कि हमें पदार्थ की गति की विशिष्टता को ध्यान में रखना होगा, अर्थात गति के एक रूप और अन्य रूपों के बीच के गुणात्मक भेद को ध्यान में रखना होगा। इस बात को ध्यान में रखकर ही हम वस्तुओं में भेद कर सकते हैं। गति के किसी भी रूप के भीतर उसका अपना विशिष्ट अंतरविरोध निहित होता है। यह विशिष्ट अंतरविरोध ही किसी वस्तु की विशिष्ट मूलवस्तु को निर्धारित करता है जिससे वह वस्तु अन्य सभी वस्तुओं से भिन्न होती है। यही दुनिया की अनगिनत किस्म की वस्तुओं के एक दूसरे से भिन्न होने का आंतरिक कारण या यों कहा जाए उसका आधार है। प्रकृति में गति के अनेक रूप विद्यमान है : यांत्रिक गति, ध्वनि, प्रकाश, ताप, विद्युत, विघटन, संघटन आदि। ये सभी रूप एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। लेकिन मूलवस्तु की दृष्टि से ये एक दूसरे से भिन्न होते हैं। गति के प्रत्येक रूप में मौजूद विशिष्ट मूलवस्तु उसके अपने विशिष्ट अंतरविरोध द्वारा निर्धारित होती है। यह बात केवल प्रकृति पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक और विचारगत घटनाओं पर भी लागू होती है। समाज के प्रत्येक रूप और चिंतन के प्रत्येक रूप का अपना विशिष्ट अंतरविरोध होता है और उसकी अपनी विशिष्ट मूलवस्तु होती है।

विज्ञान की भिन्न–भिन्न शाखाओं का वर्गीकरण ठीक उनके अध्ययन की वस्तुओं में निहित विशिष्ट अंतरविरोधों पर ही आधारित होता है। इस प्रकार एक खास किस्म के अंतरविरोध का, जो किसी खास घटना–क्रम के क्षेत्र में निहित होता है, अध्ययन करना विज्ञान की किसी विशेष शाखा की विषय–वस्तु बन जाता है। उदाहरणार्थ, गणित में धनात्मक और ऋणात्मक अंक; यंत्र विज्ञान में क्रिया और प्रतिक्रिया; भौतिक विज्ञान में धनात्मक और ऋणात्मक विद्युत; रसायन विज्ञान में विघटन और संघटन; सामाजिक विज्ञान में उत्पादक शक्तियां और उत्पादन संबंध, वर्ग और वर्ग के बीच का आपसी संघर्ष; सैन्य–विज्ञान में हमला और बचाव; दर्शन–शास्त्र में आदर्शवाद और भौतिकवाद, अध्यात्मवादी दृष्टिकोण और द्वन्द्ववादी दृष्टिकोण; वगैरह–वगैरह-इन सबका विज्ञान की भिन्न–भिन्न शाखाओं के रूप में अध्ययन ठीक इसलिए किया जाता है कि इनमें से प्रत्येक शाखा में एक विशेष अंतरविरोध मौजूद होता है तथा प्रत्येक शाखा में एक विशेष मूलवस्तु मौजूद रहती है। इसमें संदेह नहीं कि अंतरविरोध की सार्वभौमिकता को समझे बिना हम वस्तुओं की गति, वस्तुओं के विकास के सार्वभौमिक कारण या सार्वभौमिक आधार का किसी तरह पता नहीं लगा सकते; लेकिन अंतरविरोध की विशिष्टता का अध्ययन किए बिना हम किसी वस्तु की उस विशिष्ट मूलवस्तु का किसी तरह पता नहीं लगा सकते जो उस वस्तु को अन्य वस्तुओं से भिन्न बना देती है, वस्तु की गति, वस्तु के विकास के विशिष्ट कारण या विशिष्ट आधार का पता नहीं लगा सकते, एक वस्तु और दूसरी वस्तु के बीच के अंतर को नहीं पहचान सकते, और न ही विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के बीच भेद कर सकते हैं।

जहां तक मानव के ज्ञान की गति के क्रम का संबंध है, वह हमेशा अलग–अलग और विशिष्ट वस्तुओं के ज्ञान से आम वस्तुओं के ज्ञान की दिशा में कदम–ब–कदम विकसित होता है। मनुष्य सामान्यीकरण की ओर केवल तभी बढ़ सकता है और वस्तुओं में सामान्य रूप से मौजूद मूल वस्तु को सिर्फ तभी जान सकता है जब वह पहले अनेक भिन्न–भिन्न वस्तुओं में से प्रत्येक की विशिष्ट मूल–वस्तु को जान ले। जब मनुष्य इस सामान्य मूलवस्तु को जान लेता है, तब वह इस ज्ञान को एक मार्गदर्शक के रूप में प्रयोग करते हुए उन विभिन्न ठोस वस्तुओं का अध्ययन करने की तरफ, जिनका अभी तक अध्ययन नहीं हुआ है या गहन रूप से नहीं हुआ है, आगे बढ़ता है और उनमें से प्रत्येक की विशिष्ट मूलवस्तु का पता लगाता है; केवल इसी तरह वह उनकी सामान्य मूलवस्तु के बारे में अपने ज्ञान की पूर्ति कर सकता है, उसे समृद्ध और विकसित कर सकता है, और ऐसे ज्ञान को मुरझाने और पथराने से बचा सकता है। ज्ञानप्राप्ति की ये दो प्रक्रियाएं हैं : एक है विशिष्ट से सामान्य की ओर बढ़ना, और दूसरी है सामान्य से विशिष्ट की ओर बढ़ना। इस प्रकार, मानव का ज्ञान हमेशा, बार–बार चक्के की भांति घूमता हुआ आगे बढ़ता है, और प्रत्येक घुमाव के साथ (यदि वह वैज्ञानिक रीति से पूर्णतया मेल खाता हो) मनुष्य का ज्ञान एक कदम आगे बढ़ता जाता है और इस तरह अधिकाधिक गहन होता जाता है। हमारे कठमुल्लावादी लोग जहां गलती करते हैं वह यह है कि एक तरफ तो वे यह नहीं समझ पाते कि अंतरविरोध की सार्वभौमिकता और विभिन्न वस्तुओं की सामान्य मूलवस्तु को पर्याप्त रूप से जानने के पहले हमें अंतरविरोध की विशिष्टता का अध्ययन करना होगा और अलग–अलग वस्तुओं की विशिष्ट मूलवस्तु को जानना होगा; दूसरी तरफ वे यह नहीं समझ पाते कि वस्तुओं की सामान्य मूलवस्तु को जानने के बाद हमें उन ठोस वस्तुओं के अध्ययन की तरफ कदम बढ़ाना चाहिए जिनका अभी तक गहन अध्ययन नहीं हुआ है, या जो अभी नई–नई पैदा हुई हैं। हमारे कठमुल्लावादी लोग कामचोर हैं। वे ठोस वस्तुओं का मेहनत के साथ अध्ययन करने से इन्कार करते हैं, और सामान्य सत्यों को इस तरह देखते हैं मानो वे शून्य से टपक पड़े हों, और उनको ऐसे विशुद्ध अमूर्त फार्मूलों में बदल लेते हैं जो लोगों की समझ में नहीं आते, और इस प्रकार वे उस सामान्य क्रम को, जिसके जरिए मानव सत्य तक पहुंचता है, न केवल पूर्णयता ठुकरा देते हैं, बल्कि एकदम उलट भी देते हैं। न ही वे मानव की ज्ञानप्राप्ति की दो प्रक्रियाओं-विशिष्ट से सामान्य और सामान्य से विशिष्ट की ओर अग्रसर होने की प्रक्रियाओं-के अंतर–संबंधों को समझते हैं। वे मार्क्सवाद के ज्ञान–सिद्धांत को बिलकुल नहीं समझ पाते।

पदार्थ की गति के रूपों की प्रत्येक वृहत् प्रणाली में निहित विशिष्ट अंतरविरोधों और उन अंतरविरोधों से निर्धारित मूलवस्तु का अध्ययन करना ही आवश्यक नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि पदार्थ की गति के प्रत्येक रूप के विकास के लंबे दौर में उस की प्रत्येक प्रक्रिया के विशिष्ट अंतरविरोध और मूलवस्तु का भी अध्ययन किया जाए। गति के प्रत्येक रूप में विकास की वह प्रत्येक प्रक्रिया जो वास्तविक होती है (और काल्पनिक नहीं), गुणात्मक रूप से भिन्न होती है। अपने अध्ययन में हमें इसी बात पर जोर देना और इसी से आरंभ करना चाहिए।

गुणात्मक रूप से भिन्न अंतरविरोधों को केवल गुणात्मक रूप से भिन्न तरीकों से ही हल किया जा सकता है। मिसाल के तौर पर, सर्वहारा वर्ग और पूंजीपति वर्ग के बीच के अंतरविरोध को समाजवादी क्रांति के तरीके से हल किया जाता है; विशाल जन–समुदाय और सामंती व्यवस्था के बीच के अंतरविरोध को जनवादी क्रांति के तरीके से हल किया जाता है; उपनिवेशों और साम्राज्यवाद के बीच के अंतरविरोध को राष्ट्रीय क्रांतिकारी युद्ध के तरीके से हल किया जाता है; समाजवादी समाज में मजदूर वर्ग और किसान वर्ग के बीच के अंतरविरोध को कृषि के सामूहिकीकरण और मशीनीकरण के तरीके से हल किया जाता है; कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर के अंतरविरोध को आलोचना और आत्म–आलोचना के तरीके से हल किया जाता है; समाज और प्रकृति के बीच के अंतरविरोध को उत्पादक शक्तियों का विकास करने के तरीके से हल किया जाता है। प्रक्रियाएं बदलती हैं, पुरानी प्रक्रियाएं और पुराने अंतरविरोध समाप्त हो जाते हैं, नई प्रक्रियाएं और नए अंतरविरोध उत्पन्न होते हैं, और उन्हीं के अनुरूप अंतरविरोधों को हल करने के तरीके भी भिन्न–भिन्न होते हैं। रूस में फरवरी क्रांति और अक्टूबर क्रांति ने जिन अंतरविरोधों को हल किया, वे एक दूसरे से मूल रूप से भिन्न थे और उनको हल करने के तरीके भी मूल रूप से भिन्न थे। भिन्न–भिन्न अंतरविरोधों को हल करने के लिए भिन्न–भिन्न तरीकों को इस्तेमाल करने का उसूल एक ऐसा उसूल है जिसका पालन मार्क्सवादी–लेनिनवादियों को सख्ती से करना चाहिए। कठमुल्लावादी इस उसूल का पालन नहीं करते; वे यह नहीं समझते कि विभिन्न क्रांतियों की परिस्थितियां भी भिन्न होती हैं। परिणामस्वरूप वे यह नहीं समझ पाते कि भिन्न–भिन्न अंतरविरोधों को हल करने के लिए भिन्न–भिन्न तरीकों को इस्तेमाल में लाना चाहिए; इसके विपरीत वे हमेशा एक ऐसे नुस्खे को अपनाते हैं जिसे वे अपरिवर्तनीय समझते हैं और उसे बिना सोचे–समझे हर जगह लागू करते हैं, जिससे क्रांति को नुकसान पहुंचता है या जिस काम को पहले अच्छी तरह किया जा सकता था वह गड़बड़घोटाले में पड़ जाता है।

किसी वस्तु के विकास की प्रक्रिया में अंतरविरोधों की विशिष्टता को उनकी समग्रता, उनके अंतर–संबंधों की रोशनी में प्रदर्शित करने के लिए, अर्थात उस वस्तु के विकास की प्रक्रिया की मूलवस्तु को प्रदर्शित करने के लिए हमें उस प्रक्रिया के प्रत्येक अंतरविरोध के दोनों पहलुओं की विशिष्टता को प्रदर्शित करना होगा; अन्यथा प्रक्रिया की मूलवस्तु को प्रदर्शित करना असंभव है। यह भी एक ऐसी बात है जिस पर हमें अपने अध्ययन में अधिकाधिक ध्यान देना चाहिए।

किसी भी बड़ी वस्तु के विकास की प्रक्रिया में अनेकों अंतरविरोध होतेहैं। उदाहरण के लिए,चीन की पूँजीवादी–जनवादी क्रांति की प्रक्रिया में, जहां की परिस्थिति अत्यंत जटिल है, चीनी समाज के तमाम उत्पीड़ित वर्गों और सम्राज्यवाद के बीच अंतरविरोध है, विशाल जन–समुदाय और सामंती व्यवस्था के बीच अंतरविरोध है, सर्वहारा वर्ग और पूंजीपति वर्ग के बीच अंतरविरोध है, एक तरफ किसान तथा शहरी निम्न–पूंजीपति वर्ग और दूसरी तरफ पूंजीपति वर्ग के बीच अंतरविरोध है, विभिन्न प्रतिक्रियावादी शासक गुटों के बीच अंतरविरोध है, वगैरह–वगैरह। इन तमाम अंतरविरोधों की अपनी–अपनी विशिष्टताएं हैं और इसलिए उन्हें एक ही तराजू से नहीं तोला जा सकता; यही नहीं, प्रत्येक अंतरविरोध के दोनों पहलुओं की भी अपनी–अपनी विशिष्टताएं होती हैं और इसलिए उन्हें भी एक जैसा नहीं समझा जा सकता। हम लोगों को, जो चीनी  क्रांति के लिए काम करते हैं, न केवल अंतरविरोधों की विशिष्टताओं को उनकी समग्रता, अर्थात उनके  अंतर–संबंधों की रोशनी में समझना चाहिए, बल्कि हम अंतरविराधों की समग्रता को सिर्फ तभी समझ सकते हैं जबकि हम प्रत्येक अंतरविरोध के दोनों पहलुओं का अध्ययन करें। किसी अंतरविरोध के प्रत्येक पहलू को समझने का अर्थ है यह समझना कि प्रत्येक पहलू की विशिष्ट स्थिति क्या है, प्रत्येक पहलू कौन से ठोस रूप में अपने विपरीत पहलू के साथ अंतर–निर्भरता व अंतरविरोध का संबंध रखता है, और अंतर–निर्भरता व अंतरविरोध का संबंध रखने में तथा अंतर–निर्भरता के खंडित हो जाने पर प्रत्येक पहलू अपने विपरीत पहलू के खिलाफ किन ठोस तरीकों द्वारा संघर्ष चलाता है। इन समस्याओं का अध्ययन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेनिन ने जब यह कहा था कि ठोस परिस्थितियों का ठोस रूप में विश्लेषण करना ही मार्क्सवाद की सबसे मूलभूत वस्तु है, मार्क्सवाद जीती–जागती आत्मा है,[10] तो वे ठीक इसी विचार को व्यक्त कर रहे थे। हमारे कठमुल्लावादी  लोग लेनिन की शिक्षाओं के विरुद्ध चलते हैं; वे किसी भी वस्तु का ठोस विश्लेषण करने में अपने दिमाग से काम नहीं लेते, अपने लेखों तथा भाषणों में वे हमेशा घिसीपिटी शैली का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें विषय–वस्तु का बिलकुल अभाव होता है, और इस तरह वे हमारी पार्टी में एक अत्यंत बुरी कार्यशैली को जन्म देते हैं।

किसी समस्या का अध्ययन करते समय हमें मनोगतवाद, एकांगीपन और उथलेपन से बचना चाहिए। मनोगतवाद का मतलब है समस्याओं को वस्तुगत ढंग से न देखना, अर्थात उन्हें देखते समय भौतिकवादी दृष्टिकोण का इस्तेमाल न करना। इस समस्या पर मैंने “व्यवहार के बारे में” शीर्षक अपने निबंध में विचार किया है। एकांगीपन का मतलब है समस्याओं को सर्वांगीण रूप से न देखना। उदाहरण के लिए, केवल चीन को समझना, किंतु जापान को नहीं; केवल कम्युनिस्ट पार्टी को समझना, किंतु क्वोमिंताङ को नहीं; केवल सर्वहारा वर्ग को समझना, किंतु पूंजीपति वर्ग को नहीं; केवल किसानों को समझना, किंतु जमींदारों को नहीं; केवल अनुकूल परिस्थितियों को समझना, किंतु प्रतिकूल परिस्थितियों को नहीं; केवल अतीत को समझना, किंतु भविष्य को नहीं; केवल अलग–अलग अंशों को समझना, किंतु सम्पूर्ण को नहीं; केवल कमियों को समझना, किंतु उपलब्धियों को नहीं; केवल अभियोक्ता को समझना, किंतु अभियुक्त को नहीं; केवल भूमिगत क्रांतिकारी कार्य को समझना, किंतु खुले क्रांतिकारी कार्य को नहीं; वगैरह–वगैरह। एक शब्द में, इसका मतलब है किसी अंतरविरोध के दोनों पहलुओं  की विशिष्टताओं को न समझना। इसी को कहते हैं समस्याओं को एकांगी ढंग से देखना। या यों कहिए कि सम्पूर्ण वस्तु को न देखकर केवल उसके किसी एक अंग को ही देखना, जंगल को न देखकर केवल पेड़ों को ही देखना। यही वजह है कि अंतरविरोधों को हल करने के तरीके का पता लगाना असंभव हो जाता है, क्रांति के कामों को पूरा करना, जिम्मेदारियों को अच्छी तरह निभाना, अथवा पार्टी के भीतर विचारधारात्मक संघर्ष सही ढंग से चलाना असंभव हो जाता है। युद्ध–विज्ञान की चर्चा करते हुए सुन ऊ चि ने कहा था : “दुश्मन को पहचानो और खुद अपने को पहचानो, तभी तुम हार का खतरा उठाए बिना सैकड़ों लड़ाइयां लड़ सकते हो”।[11] वे युद्ध करने वाले दोनों पक्षों की चर्चा कर रहे थे। थाङ वंश के वेइ चङ[12] भी एकांगीपन की गलती को समझते थे। उन्होंने कहा था : “दोनों पक्षों की बात सुनने से तुम्हारी समझ बढ़ती है, जबकि केवल एक ही पक्ष की बात पर विश्वास करने से तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।” फिर भी हमारे साथी अक्सर समस्याओं को एकांगी ढंग से ही देखते हैं और इसलिए वे अक्सर ठोकर खाते हैं। “श्वेइ हू च्वान” नामक उपन्यास में सुङ च्याङ तीन बार चू गांव पर हमला करता है[13] और दो बार पराजित हो जाता है, क्योंकि उसे स्थानीय परिस्थितियों की कोई जानकारी नहीं थी तथा उसने गलत तरीकों को लागू किया था। बाद में उसने अपने तरीके को बदल डाला; पहले उसने परिस्थितियों की जांच की, और भूल–भुलैया के रास्तों का पता लगाया, तत्पश्चात उसने ली, हू और चू गांवों के गठजोड़ को छिन्न–भिन्न कर दिया और एक विदेशी कथा में वर्णित ट्रोजन हार्स जैसी चाल के जरिए अपने सैनिकों को भेष बदलकर गुप्त  रूप से शत्रु के शिविर में प्रवेश करा दिया। इसके बाद तीसरी मुठभेड़ में उसने विजय प्राप्त कर ली। “श्वेइ हू च्वान” में भौतिकवादी द्वन्द्ववाद के अनेक उदाहरण हैं, जिनमें चू गांव पर तीन हमलों वाली घटना को एक बेहतरीन मिसाल माना जा सकता है। लेनिन ने कहा है :

…किसी पदार्थ को सही मायनों में जानने के लिए हमें उसके सभी पहलुओं, सभी संबंधों और सभी “माध्यमों” को अंगीकार करना होगा, उनका अध्ययन करना होगा। हालांकि ऐसा हम पूर्ण रूप से कभी नहीं कर पाएंगे, फिर भी सर्वांगीणता की मांग हमें गलतियों और गैरलचीलेपन से बचाएगी।[14]

हमें लेनिन के शब्दों को याद रखना चाहिए। उथलेपन का मतलब है न तो अंतरविरोधों की समग्रता की विशिष्टताओं पर विचार करना और न प्रत्येक अंतरविरोध के दोनों पहलुओं की विशिष्टताओं पर विचार करना; इसका मतलब है किसी वस्तु की बड़ी गहराई से छानबीन करने और उसके अंतरविरोधों की विशिष्टताओं का बड़ी बारीकी से अध्ययन करने की आवश्यकता से इनकार करना, तथा उन पर दूर से महज एक सरसरी नजर डालकर और महज उनकी रूपरेखा पर नजर मारते ही उन्हें हल करने (किसी प्रश्न का उत्तर देने, किसी विवाद को निपटाने, किसी काम को पूरा करने, अथवा किसी फौजी कार्रवाई का निर्देशन करने) की कोशिश करने लग जाना। काम करने का यह तरीका हमें अनिवार्य रूप से झंझट में डाल देगा। चीनी कठमुल्लावादी और अनुभववादी साथियों ने ये गलतियां ठीक इसीलिए की हैं कि वे वस्तुओं को मनोगत, एकांगी और उथले ढंग से ही देखते हैं। एकांगीपन और उथलापन दोनों मनोगतवाद ही हैं। हालांकि सभी वस्तुगत पदार्थ वास्तव में एक दूसरे से संबंधित और आंतरिक नियमों से नियंत्रित होते हैं, फिर भी कुछ लोग वस्तुओं को सही रूप में प्रतिंबिबित करने के बदले उन्हें केवल एकांगी या उथले ढंग से ही देखते हैं तथा न तो उनके अंतर–संबंधों को समझते हैं और न उनके आंतरिक नियमों को, और इस प्रकार उनका तरीका मनोगतवादी हो जाता है।

हमें न केवल किसी वस्तु के विकास की सम्पूर्ण प्रक्रिया के दौरान अंतरविरोधों की गति में उनके अंतर–संबंधों और उनके प्रत्येक पहलू की विशिष्टताओं पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि विकास की प्रक्रिया में प्रत्येक मंजिल की भी अपनी विशिष्टताएं होती हैं, जिन पर हमें ध्यान देना चाहिए।

किसी वस्तु के विकास की प्रक्रिया में निहित मूल अंतरविरोध और इस मूल अंतरविरोध द्वारा निर्धारित उस प्रक्रिया की मूलवस्तु तब तक समाप्त नहीं होगी, जब तक कि वह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती; किंतु किसी वस्तु के विकास की लंबी प्रक्रिया में प्रत्येक मंजिल की परिस्थितियां अक्सर दूसरी मंजिल से भिन्न होती हैं। ऐसा इसलिए होता है कि किसी वस्तु के विकास की प्रक्रिया में निहित मूल अंतरविरोध का स्वरूप और उस प्रक्रिया की मूलवस्तु यद्यपि नहीं बदलती, फिर भी विकास की लंबी प्रक्रिया की विभिन्न मंजिलों में मूल अंतरविरोध उत्तरोत्तर उग्र रूप धारण करता जाता है। इसके अलावा, मूल अंतरविरोध द्वारा निर्धारित या प्रभावित अनेक बड़े और छोटे अंतरविरोधों में से कुछ अंतरविरोध उग्र रूप धारण करते हैं, कुछ तो अस्थाई अथवा आंशिक रूप से हल हो जाते हैं या मंदे पड़ जाते हैं, और कुछ नए अंतरविरोध सामने आ जाते हैं; इसलिए यह प्रक्रिया भिन्न–भिन्न मंजिलों से गुजरती हुई प्रकट होती है। यदि लोग किसी वस्तु के विकास की प्रक्रिया में उसकी विभिन्न मंजिलों की तरफ ध्यान नहीं देते, तो वे उसके अंतरविरोधों को उचित ढंग से हल नहीं कर सकते।

उदाहरण के लिए, जब स्वच्छंद होड़ के युग के पूंजीवाद ने विकसित होकर साम्राज्यवाद का रूप धारण किया, तो मूल अंतरविरोध वाले दो वर्गों, अर्थात सर्वहारा वर्ग और पूंजीपति वर्ग के वर्ग–स्वरूप में, या ऐसे समाज की पूंजीवादी मूलवस्तु में कोई परिवर्तन नहीं आया; फिर भी, इन दोनों वर्गों के बीच के अंतरविरोध ने उग्र रूप धारण कर लिया, इजारेदार पूंजी और गैर–इजारेदार पूंजी के बीच के अंतरविरोध का उदय हुआ, उपनिवेशवादी देशों और उपनिवेशों के बीच के अंतरविरोध अर्थात उनके असमान विकास के कारण पैदा हुए अंतरविरोध, और अधिक उग्र हो गए तथा पूंजीवादी देशों के बीच के अंतरविरोध, खास तौर से उग्र रूप में प्रकट हुए, और इस प्रकार पूंजीवाद की विशेष मंजिल, साम्राज्यवाद की मंजिल का प्रादुर्भाव हुआ। लेनिनवाद साम्राज्यवाद और सर्वहारा क्रांति के युग का मार्क्सवाद इसीलिए है, क्योंकि लेनिन और स्तालिन ने इन अंतरविरोधों की सही व्याख्या की है और उन्हें हल करने के लिए सर्वहारा क्रांति के सिद्धांत और कार्यनीति का सही निरूपण किया है।

चीन की पूंजीवादी–जनवादी क्रांति, जिसका सूत्रपात 1911 की क्रांति से हुआ था, की प्रक्रिया को ही लीजिए; इसकी भी कई खास मंजिलें हैं। खास तौर से पूंजीपति वर्ग के नेतृत्व–काल में क्रांति की मंजिल और सर्वहारा नेतृत्व–काल में क्रांति की मंजिल क्रांति की दो अत्यंत भिन्न ऐतिहासिक मंजिलों का प्रतिनिधित्व करती हैं। दूसरे शब्दों में, सर्वहारा नेतृत्व ने क्रांति के रूप को मूल रूप से बदल दिया है, वर्ग–संबंधों की एक नई पांतबंदी की है, किसान क्रांति में जबरदस्त उभार पैदा कर दिया है, साम्राज्यवाद और सामंतवाद के विरुद्ध मुकम्मिल क्रांति का सूत्रपात किया है, जनवादी क्रांति से समाजवादी क्रांति में संक्रमण की संभावना को जन्म दिया है, वगैरह–वगैरह। यह सब कुछ उस काल में संभव नहीं था जब क्रांति का नेतृत्व पूंजीपति वर्ग के हाथों में था। यद्यपि सम्पूर्ण प्रक्रिया के मूल अंतरविरोध के स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, अर्थात प्रक्रिया के साम्राज्यवाद–विराधी, सामंतवाद–विरोधी, जनवादी–क्रांतिकारी स्वरूप में (जिसका विपरीत तत्व अर्द्ध–औपनिवेशिक, अर्द्ध–सामंती स्वरूप है) कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, फिर भी बीस वर्ष से ज्यादा समय में यह प्रक्रिया विकास की कई मंजिलों से गुजरी है; इस काल के दौरान अनेक बड़ी घटनाएं घटी हैं-जैसे 1911 की क्रांति की असफलता और उत्तरी युद्ध–सरदारों के शासन की स्थापना, प्रथम राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चे की स्थापना और 1924-27 की क्रांति, संयुक्त मोर्चे का विघटन और पूंजीपति वर्ग का प्रतिक्रांतिकारी शिविर में पलायन, नए युद्ध–सरदारों के बीच की लड़ाइयां, भूमि–क्रांति युद्ध, द्वितीय राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चे की स्थापना और जापानी–आक्रमण–विरोधी युद्ध। इन मंजिलों की ये विशेषताएं हैं : कुछ अंतरविरोधों का अधिक उग्र रूप धारण करना (मिसाल के लिए, भूमि–क्रांति युद्ध और चार उत्तर–पूर्वी प्रांतों पर जापानी अतिक्रमण), कुछ अंतरविरोधों का आंशिक या अस्थाई रूप से हल हो जाना (मिसाल के लिए, उत्तरी युद्ध–सरदारों का खात्मा और हमारे द्वारा जमींदारों की जमीन का जब्त किया जाना), और कुछ अन्य अंतरविरोधों का फिर प्रकट हो जाना (मिसाल के लिए, नए युद्ध–सरदारों के बीच संघर्ष, हमारे हाथों से दक्षिण के क्रांतिकारी आधार–क्षेत्रों के निकल जाने पर जमींदारों द्वारा जमीन पर फिर से कब्जा किया जाना)।

किसी वस्तु के विकास की प्रक्रिया में प्रत्येक मंजिल पर अंतरविरोधों की विशिष्टताओं का अध्ययन करते समय, हमें न केवल उन्हें इन अंतरविरोधों के अंतर–संबंधों अथवा इनकी समग्रता में देखना चाहिए, बल्कि प्रत्येक मंजिल में निहित प्रत्येक अंतरविरोध के दोनों पहलुओं को भी देखना चाहिए।

मिसाल के लिए, क्वोमिंताङ और कम्युनिस्ट पार्टी पर ही गौर कीजिए। उसके एक पहलू क्वोमिंताङ को लीजिए। प्रथम संयुक्त मोर्चे के काल में क्वोमिंताङ ने रूस से संश्रय, कम्युनिस्ट पार्टी से सहयोग और मजदूर–किसानों की सहायता, सुन यात–सेन की इन तीन महान नीतियों पर अमल किया; इसलिए वह  क्रांतिकारी और शक्ति से ओतप्रोत हो गई थी, वह जनवादी क्रांति के लिए विभिन्न वर्गों का संश्रय बन गई थी। किंतु 1927 से क्वोमिंताङ अपने विपरीत तत्व में बदलकर जमींदार वर्ग तथा बड़े पूंजीपतियों के वर्ग का प्रतिक्रियावादी गुट बन गई। दिसंबर 1936 में शीआन घटना के बाद, उसके अंदर गृहयुद्ध को बंद करने तथा जापानी साम्राज्यवाद का संयुक्त रूप से विरोध करने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी से सहयोग करने की दिशा में परिवर्तन शुरू हुआ। यही हैं इन तीन मंजिलों में क्वोमिंताङ की विशिष्टताएं। इसमें शक नहीं कि ये विशिष्टताएं विभिन्न कारणों से पैदा हुईं। अब हम दूसरे पहलू, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को लेते हैं। प्रथम संयुक्त मोर्चे के काल में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अपनी शैशवावस्था में थी; 1924-27 की क्रांति का उसने साहस के साथ नेतृत्व किया, किंतु जहां तक क्रांति के स्वरूप, उसके कार्य और तरीकों के बारे में उसकी समझ का सवाल है, उसने अपनी अपरिपक्वता का परिचय दिया, और फलस्वरूप छन तू–श्यूवाद, जो इस क्रांति के उत्तरार्ध में प्रकट हुआ था, अपना असर डालने और इस क्रांति को असफल करने में कामयाब हुआ। 1927 से, कम्युनिस्ट पार्टी ने फिर भूमि–क्रांति युद्ध का साहस के साथ नेतृत्व किया और क्रांतिकारी फौज तथा क्रांतिकारी आधार–क्षेत्रों की स्थापना की; किंतु उसने दुस्साहसवाद की गलतियां भी कीं, जिनसे फौज और आधार–क्षेत्रों दोनों को ही भारी नुकसान उठाना पड़ा। 1935 से पार्टी ने अपनी इन गलतियों को दुरुस्त कर लिया है और वह जापान–विरोधी नए संयुक्त मोर्चे का नेतृत्व कर रही है; इस महान संघर्ष का अब विकास हो रहा है। वर्तमान मंजिल में, कम्युनिस्ट पार्टी एक ऐसी पार्टी है जो दो क्रांतियों की परीक्षा से गुजर चुकी है और जिसने समृद्ध अनुभव प्राप्त कर लिए हैं। यही हैं इन तीन मंजिलों में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की विशिष्टताएं। ये विशिष्टताएं भी विभिन्न कारणों से पैदा हुई हैं। इन दोनों तरह की विशिष्टताओं का अध्ययन किए बिना हम विकास की विभिन्न मंजिलों में दोनों पार्टियों के विशिष्ट संबंधों को-अर्थात संयुक्त मोर्चे की स्थापना, संयुक्त मोर्चे का विघटन, और एक अन्य संयुक्त मोर्चे की स्थापना को-नहीं समझ सकते। यही नहीं, दोनों पार्टियों की विशिष्टताओं का अध्ययन करने के लिए और भी ज्यादा बुनियादी बात यह है कि हमें दोनों पार्टियों के वर्ग–आधार का तथा इसके फलस्वरूप उन दोनों में से प्रत्येक पार्टी तथा अन्य शक्तियों के बीच विभिन्न कालों में पैदा हुए अंतरविरोधों का अध्ययन करना चाहिए। उदाहरण के लिए, कम्युनिस्ट पार्टी के साथ अपने पहले सहयोग के काल में क्वोमिंताङ का एक ओर तो विदेशी साम्राज्यवाद के साथ अंतरविरोध था और इसलिए वह साम्राज्यवाद–विरोधी थी; दूसरी ओर उसका खुद अपने देश में विशाल जन–समुदाय के साथ अंतरविरोध था, और हालांकि मेहनतकश जनता को वह अनेक सुविधाएं देने के हवाई वायदे करती रहती थी, किंतु वास्तव में या तो बहुत कम सुविधाएं देती थी, या बिलकुल भी नहीं देती थी। उस काल में जबकि क्वोमिंताङ कम्युनिस्ट–विरोधी युद्ध चला रही थी, उसने विशाल जन–समुदाय के विरुद्ध साम्राज्यवाद और सामंतवाद के साथ गठजोड़ कायम किया और क्रांति में विशाल जन–समुदाय ने जो उपलब्धियां हासिल की थीं, उन सबको खत्म कर दिया और इस प्रकार उसने विशाल जन–समुदाय के साथ अपने अंतरविरोध को उग्र बना दिया। जापानी–आक्रमण–विरोधी युद्ध के वर्तमान काल में क्वोमिंताङ, जिसका जापानी साम्राज्यवाद के साथ अंतरविरोध है, एक ओर तो कम्युनिस्ट पार्टी के साथ सहयोग करना चाहती है, लेकिन दूसरी ओर कम्युनिस्ट पार्टी और चीनी जनता के विरुद्ध अपने संघर्ष में तथा उनके दमन में कोई भी कमी नहीं आने देती। जहां तक कम्युनिस्ट पार्टी का ताल्लुक है, उसने हमेशा, हर दौर में, साम्राज्यवाद और सामंतवाद के विरुद्ध विशाल जन–समुदाय का ही साथ दिया है, लेकिन जापानी–आक्रमण–विरोधी युद्ध के वर्तमान काल में चूंकि क्वोमिंताङ ने यह जाहिर किया है कि वह जापान का प्रतिरोध करने के हक में है, इसलिए कम्युनिस्ट पार्टी ने उसकी ओर तथा घरेलू सामंती शक्तियों की ओर एक नरम नीति अपनाई है। इन परिस्थितियों ने दोनों पार्टियों के बीच कभी संश्रय तो कभी संघर्ष को जन्म दिया, और संश्रय कायम होने के दौरान भी परिस्थिति बड़ी जटिल रही जिसमें संश्रय तथा संघर्ष एक साथ चलते रहे। यदि हम अंतरविरोध के दोनों पहलुओं की विशिष्टताओं का अध्ययन नहीं करते, तो हम न केवल दोनों पार्टियों में से प्रत्येक पक्ष और अन्य शक्तियों के बीच के संबंधों को नहीं समझ सकेंगे, बल्कि दोनों पार्टियों के बीच के संबंधों को भी समझने में असमर्थ रहेंगे।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी तरह के अंतरविरोध-पदार्थ की गति के प्रत्येक रूप में निहित अंतरविरोध, गति के प्रत्येक रूप के विकास की हरेक प्रक्रिया में निहित अंतरविरोध, विकास की प्रत्येक प्रक्रिया में निहित हरेक अंतरविरोध के दोनों पहलुओं, विकास की प्रत्येक प्रक्रिया की हरेक मंजिल में निहित अंतरविरोध, और विकास की प्रत्येक मंजिल में निहित हरेक अंतरविरोध के दोनों पहलुओं-की विशिष्टता का अध्ययन करते समय, यानी इन तमाम अंतरविरोधों की विशिष्टताओं का अध्ययन करते समय, हमें मनोगतवादी स्वेच्छाचारिता से सर्वथा मुक्त रहना चाहिए और उनका ठोस विश्लेषण करना चाहिए। ठोस विष्लेषण किए बिना किसी भी अंतरविरोध की विशिष्टता के बारे में कोई जानकारी हासिल नहीं की जा सकती। हमें लेनिन के इन शब्दों को हमेशा याद रखना चाहिए : ठोस वस्तुओं का ठोस विश्लेषण।

सबसे पहले मार्क्स और एंगेल्स ने ही हमें ऐसे ठोस विश्लेषण के उत्कृष्ट नमूने प्रदान किए।

जब मार्क्स और एंगेल्स ने वस्तुओं में निहित अंतरविरोध के नियम को सामाजिक–ऐतिहासिक प्रक्रिया के अध्ययन पर लागू किया, तो उन्होंने उत्पादक शक्तियों और उत्पादन–संबंधों के बीच के अंतरविरोध का पता लगा लिया, उन्होंने शोषक वर्ग और शोषित वर्ग के बीच के अंतरविरोध का पता लगा लिया, तथा इन अंतरविरोधों से पैदा हुए आर्थिक आधार और ऊपरी ढांचे (राजनीति, विचारधारा इत्यादि) के बीच के अंतरविरोध का पता लगा लिया, और उन्होंने यह पता लगा लिया कि ये अंतरविरोध भिन्न–भिन्न वर्ग–समाजों में किस तरह अनिवार्य रूप से भिन्न–भिन्न सामाजिक क्रांतियों को जन्म देते हैं।

  जब मार्क्स ने इस नियम को पूंजीवादी समाज के आर्थिक रचना–विधान के अध्ययन पर लागू किया, तो उन्होंने देखा कि इस समाज का मूल अंतरविरोध उत्पादन के सामाजिक स्वरूप और मिलकियत के निजी स्वरूप के बीच का अंतरविरोध है। इस अंतरविरोध की अभिव्यक्ति अलग–अलग कारोबारों में उत्पादन के संगठित स्वरूप और समूचे समाज में उत्पादन के असंगठित स्वरूप के बीच के अंतरविरोध में होती है। वर्ग–संबंधों की दृष्टि से, इसकी अभिव्यक्ति पूंजीपति वर्ग और सर्वहारा वर्ग के बीच के अंतरविरोध में होती है।

चूंकि वस्तुओं का दायरा अत्यंत विस्तृत होता है और उनके विकास की कोई सीमा नहीं होती, इसलिए एकविशेष स्थिति में जो बात सार्वभौमिकता की द्योतक होती है, वही दूसरी विशेष स्थिति में विशिष्टता में बदल जाती है। इसके विपरीत, एक विशेष स्थिति में जो बात विशिष्टता की द्योतक होती है, वहीं दूसरी विशेष स्थिति में सार्वभौमिक बन जाती है। पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन के सामाजिक स्वरूप और उत्पादन के साधनों पर निजी मिलकियत के बीच जो अंतरविरोध निहित है, वह उन सभी देशों में समान रूप से मौजूद है जहां पूंजीवाद का अस्तित्व है तथा उसका विकास हो रहा है; पूंजीवाद के लिए अंतरविरोध की सार्वभौमिकता इसी में निहित है। किंतु, पूंजीवाद का यह अंतरविरोध वर्ग–समाज के आम विकास की एक विशेष ऐतिहासिक मंजिल की चीज है; जहां तक समूचे वर्ग–समाज में उत्पादक शक्तियों और उत्पादन–संबंधों के बीच के अंतरविरोध का सवाल है, वह अंतरविरोध की विशिष्टता है। किंतु पूंजीवादी समाज में इन तमाम अंतरविरोधों का विश्लेषण करके उनकी विशिष्टता को स्पष्ट करते हुए, मार्क्स ने और भी गहराई से, और भी विशद रूप से तथा और भी पूर्णता के साथ आम वर्ग–समाज में मौजूद उत्पादक शक्तियों और  उत्पादन–संबंधों के बीच के अंतरविरोध की सार्वभौमिकता पर रोशनी डाली है।

चूंकि विशिष्ट सामान्य के साथ संबद्ध होता है, और चूंकि अंतरविरोध की विशिष्टता के साथ–साथ उसकी सार्वभौमिकता भी प्रत्येक वस्तु में निहित होती है, तथा सार्वभौमिकता विशिष्टता में निहित होती है, इसलिए किसी वस्तु का अध्ययन करते समय हमें उस वस्तु के अंदर ही विशिष्ट और सामान्य का तथा उनके अंतरसंबंधों का पता लगाने का प्रयत्न करना चाहिए, विशिष्टता और सार्वभौमिकता का तथा उनके अंतरसंबंधों का पता लगाने का प्रयत्न करना चाहिए, तथा उस वस्तु के और उसके बाहर की अनेक वस्तुओं के अंतरसंबंधों का पता लगाने का भी प्रयत्न करना चाहिए। जब स्तालिन ने अपनी प्रसिद्ध रचना “लेनिनवाद के आधारभूत सिद्धांत” में लेनिनवाद के ऐतिहासिक उद्गम की व्याख्या की, तो उन्होंने उस अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति का विश्लेषण किया जिसमें लेनिनवाद का जन्म हुआ था, साथ ही उन्होंने पूंजीवाद के उन विभिन्न अंतरविरोधों का भी विश्लेषण किया जो साम्राज्यवाद की परिस्थितियों में अपनी चरम अवस्था पर पहुंच चुके थे, और यह स्पष्ट किया कि किस प्रकार इन अंतरविरोधों ने सर्वहारा क्रांति के सवाल को एक फौरी कार्रवाई का सवाल बना दिया है, और पूंजीवाद पर सीधा हमला बोल देने के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर दी हैं। यही नहीं, उन्होंने अपने विश्लेषण द्वारा उन कारणों को भी स्पष्ट किया है जिनसे रूस लेनिनवाद का हिंडोला बन गया, जारशाही रूस साम्राज्यवाद के तमाम अंतरविरोधों का केंद्र बिंदु बन गया, तथा रूसी सर्वहारा वर्ग अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी सर्वहारा वर्ग का हिरावल दस्ता बन गया। इस तरह, स्तालिन ने साम्राज्यवाद में निहित अंतरविरोध की सार्वभौमिकता का विश्लेषण करते हुए यह दिखाया कि किस तरह लेनिनवाद साम्राज्यवाद और सर्वहारा क्रांति के युग का मार्क्सवाद है, और इसके साथ–साथ उन्होंने साम्राज्यवाद के इस आम अंतरविरोध में जारशाही रूसी साम्राज्यवाद की विशिष्टता का विश्लेषण करते हुए यह दिखाया कि किस तरह रूस सर्वहारा क्रांति के सिद्धांत और कार्यनीति की जन्मभूमि बना और किस तरह ऐसी विशिष्टता में अंतरविरोध की सार्वभौमिकता निहित है। स्तालिन द्वारा किया गया यह विश्लेषण अंतरविरोध की विशिष्टता और सार्वभौमिकता तथा उनके अंतरसंबंधों को समझने में हमारे लिए एक आदर्श उपस्थित करता है।

वस्तुगत घटनाओं के अध्ययन में द्वन्द्ववाद को लागू करने के सवाल पर मार्क्स और एंगेल्स ने, और उसी तरह लेनिन और स्तालिन ने भी, लोगों को हमेशा यह सिखाया कि उन्हें किसी भी तरह की मनोगतवादी स्वेच्छाचारिता को काम में नहीं लाना चाहिए, बल्कि वास्तविक वस्तुगत गति की ठोस परिस्थितियों के बीच से इन घटनाओं में निहित ठोस अंतरविरोधों को, प्रत्येक अंतरविरोध के हरेक पहलू की ठोस भूमिका को, तथा अंतरविरोधों के ठोस अंतरसंबंधों को ढूंढ़ निकालना चाहिए। हमारे कठमुल्लावादी लोग अपने अध्ययन में यह रवैया नहीं अपनाते और इसलिए उनकी कोई बात कभी ठीक नहीं हो सकती। हमें उनकी असफलता से सबक लेना चाहिए और उपरोक्त रवैया अपनाना सीख लेना चाहिए, जो अध्ययन का एकमात्र सही तरीका है।

अंतरविरोध की सार्वभौमिकता और अंतरविरोध की विशिष्टता के बीच का संबंध अंतरविरोध के सामान्य स्वरूप और व्यक्तिगत स्वरूप के बीच का संबंध है। अंतरविरोध के सामान्य स्वरूप से हमारा तात्पर्य यह है कि अंतरविरोध सभी प्रक्रियाओं में मौजूद है और सभी प्रक्रियाओं में शुरू से अंत तक बना रहता है; गति, वस्तुएं, प्रक्रियाएं, विचार-ये सभी अंतरविरोध हैं। अंतरविरोध से इनकार करना हर बात से इनकार करना है। यह एक ऐसा सार्वभौमिक सत्य है जो सभी कालों और सभी देशों के लिए मान्य है, जिसका कोई अपवाद नहीं है। यही वजह है कि अंतरविरोध का सामान्य स्वरूप होता है, उसमें निरपेक्षता होती है। किंतु यह सामान्य स्वरूप प्रत्येक व्यक्तिगत स्वरूप में पाया जाता है; बिना व्यक्तिगत स्वरूप के सामान्य स्वरूप का अस्तित्व संभव नहीं। यदि तमाम व्यक्तिगत स्वरूपों को हटा दिया जाए, तो भला कैसा सामान्य स्वरूप बचा रह जाएगा ? व्यक्तिगत स्वरूपों की रचना इसीलिए होती है कि प्रत्येक अंतरविरोध विशिष्ट होता है। सभी व्यक्तिगत स्वरूपों का अस्तित्व परिस्थितिबद्ध और अस्थाई होता है, इसलिए वे सापेक्ष होते हैं।

सामान्य स्वरूप और व्यक्तिगत स्वरूप, निरपेक्षता और सापेक्षता, के बारे में यह सच्चाई वस्तुओं में मौजूद अंतरविरोध की समस्या का सार है; इसे न समझने का अर्थ है द्वन्द्ववाद को तिलांजलि दे देना।

  1. प्रधान अंतरविरोध और अंतरविरोध का प्रधान पहलू

अंतरविरोध की विशिष्टता की समस्या में और दो बातें ऐसी हैं जिनका एक–एक करके विशेष रूप से विश्लेषण किया जाना चाहिए। ये दोनों हैं : प्रधान अंतरविरोध और अंतरविरोध का प्रधान पहलू।

किसी वस्तु के विकास की जटिल प्रक्रिया में अनेक अंतरविरोध होते हैं; इनमें अनिवार्य रूप से एक प्रधान अंतरविरोध होता है जिसका अस्तित्व और विकास अन्य अंतरविरोधों के अस्तित्व और विकास को निर्धारित या प्रभावित करता है।

उदाहरण के लिए, पूंजीवादी समाज में दो अंतरविरोधपूर्ण शक्तियों, सर्वहारा वर्ग और पूंजीपति वर्ग, के बीच का अंतरविरोध प्रधान अंतरविरोध होता है; अन्य अंतरविरोध-उदाहरण के लिए, बचे–खुचे सामंती वर्ग और पूंजीपति वर्ग के बीच का अंतरविरोध, निम्न–पूंजीपति वर्ग के किसानों और पूंजीपति वर्ग के बीच का अंतरविरोध, सर्वहारा वर्ग और निम्न–पूंजीपति वर्ग के किसानों के बीच का अंतरविरोध, गैर–इजारेदार पूंजीपति वर्ग और इजारेदार पूंजीपति वर्ग के बीच का अंतरविरोध, पूंजीवादी जनवाद और पूंजीवादी फासिस्टवाद के बीच का अंतरविरोध, खुद पूंजीवादी देशों के बीच का अंतरविरोध, साम्राज्यवाद और उपनिवेशों के बीच का अंतरविरोध, आदि इसी प्रधान अंतरविरोध से निर्धारित या प्रभावित होते हैं।

चीन जैसे अर्द्ध–औपनिवेशिक देशों में प्रधान अंतरविरोध और अप्रधान अंतरविरोधों के बीच के संबंध एक जटिल परिस्थिति उपस्थित करते हैं।

साम्राज्यवाद जब ऐसे देश के खिलाफ हमलावर युद्ध छेड़ देता है, तो उस देश के विभिन्न वर्ग, कुछ देशद्रोहियों को छोड़कर, साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय युद्ध चलाने के लिए अस्थाई रूप से  एकताबद्ध हो सकते हैं। ऐसे समय में साम्राज्यवाद और उस देश के बीच का अंतरविरोध प्रधान अंतरविरोध बन जाता है, जबकि देश के अंदर के विभिन्न वर्गों के बीच के सभी अंतरविरोधों (जिनमें यह प्रधान अंतरविरोध-सामंती व्यवस्था और विशाल जन–समुदाय के बीच का अंतरविरोध-भी शामिल है) की स्थिति अस्थाई रूप से गौण अथवा अधीनता की हो जाती है। 1840 के अफीम युद्ध में, 1894 के चीन–जापान युद्ध में और 1900 के ई हो थ्वान युद्ध में चीन में यही हुआ था, और वर्तमान चीन–जापान युद्ध में भी यही हो रहा है।

किंतु एक भिन्न अवस्था में अंतरविरोधों की स्थिति में परिवर्तन हो जाता है। जब साम्राज्यवाद अपने उत्पीड़न को जारी रखने के लिए युद्ध को नहीं, बल्कि अपेक्षाकृत नरम तरीकों-राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तरीकों-को इस्तेमाल में  लाता है, तब अर्द्ध–औपनिवेशिक देशों के शासक वर्ग साम्राज्यवाद के सामने घुटने टेक देते हैं; वे दोनों ही विशाल जन–समुदाय का संयुक्त रूप से उत्पीड़न करने के लिए गठजोड़ कायम कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में साम्राज्यवाद और सामंती वर्ग के इस गठजोड़ का विरोध करने के लिए विशाल जन–समुदाय अक्सर गृहयुद्ध का रास्ता अपनाता है, और साम्राज्यवाद अक्सर अर्द्ध–औपनिवेशिक देशों में प्रत्यक्ष कार्रवाई करने के बजाय जनता का उत्पीड़न करने के लिए प्रतिक्रियावादियों को परोक्ष रूप में सहायता देता है; और इस प्रकार आंतरिक अंतरविरोध विशेष रूप से तीव्र हो जाते हैं। 1911 के क्रांतिकारी युद्ध में, 1924-27 के क्रांतिकारी युद्ध में, और 1927 से चल रहे दस वर्षों के भूमि–क्रांति युद्ध में चीन में ऐसा ही हुआ। अर्द्ध–औपनिवेशिक देशों में विभिन्न प्रतिक्रियावादी शासक गुटों के बीच होने वाले गृहयुद्ध भी, जैसे चीन में युद्ध–सरदारों के आपसी युद्ध, इसी श्रेणी में आते हैं।

जब कोई क्रांतिकारी गृहयुद्ध उस समय तक विकसित हो जाता है जिस समय साम्राज्यवाद और उसके पालतू कुत्तों-घरेलू प्रतिक्रियावादियों-का अस्तित्व बुनियादी तौर पर खतरे में पड़ गया हो, तब साम्राज्यवाद अपनी हुकूमत को कायम रखने की कोशिश में, अक्सर ऊपर बताए गए तरीकों से भिन्न तरीके अपनाता है; वह या तो क्रांतिकारी मोर्चे में भीतर से फूट डालने की कोशिश करता है, या घरेलू प्रतिक्रियावादियों को प्रत्यक्ष रूप से मदद पहुंचाने के लिए फौजें भेजता है। ऐसे समय में विदेशी साम्राज्यवादी और घरेलू प्रतिक्रियावादी खुलेआम एक छोर पर खड़े हो जाते हैं, और विशाल जन–समुदाय दूसरे छोर पर; इस तरह यह एक प्रधान अंतरविरोध बन जाता है, जो अन्य अंतरविरोधों के विकास को निर्धारित या प्रभावित करता है। अक्टूबर क्रांति के बाद विभिन्न पूंजीवादी देशों ने रूसी प्रतिक्रियावादियों को जो मदद दी, वह फौजी हस्तक्षेप की एक मिसाल है। 1927 में च्याङ काई–शेक की गद्दारी क्रांतिकारी मोर्चे में फूट डालने की एक मिसाल है।

कुछ भी हो, इस बात में तनिक भी संदेह नहीं कि किसी प्रक्रिया के विकास की हर मंजिल में केवल एक ही अंतरविरोध प्रधान अंतरविरोध होता है, जो प्रमुख भूमिका अदा करता है।

इस प्रकार यदि किसी प्रक्रिया में अनेक अंतरविरोध मौजूद हों, तो उनमें अवश्य ही एक प्रधान अंतरविरोध होता है, जो एक प्रमुख और निर्णयात्मक भूमिका अदा करता है, जबकि बाकी तमाम अंतरविरोध गौण और अधीनस्थ होते हैं। इसलिए किसी ऐसी जटिल प्रक्रिया का अध्ययन करते समय जिसमें दो या दो से ज्यादा अंतरविरोध मौजूद हों, हमें उसके प्रधान अंतरविरोध को खोज निकालने की भरसक कोशिश करनी चाहिए। जहां एक बार हमने उसके प्रधान अंतरविरोध को पकड़ लिया, तो तमाम समस्याओं को आसानी से हल किया जा सकेगा। पूंजीवादी समाज के अपने अध्ययन में मार्क्स ने हमें यही तरीका सिखाया था। जब लेनिन और स्तालिन ने साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के आम संकट का अध्ययन किया, और जब उन्होंने सोवियत अर्थव्यवस्था का अध्ययन किया, तब उन्होंने भी हमें यही सीख दी। हजारों विद्वान और व्यावहारिक कार्यकर्ता इस तरीके को नहीं समझते, और इसका नतीजा यह होता है कि वे घने कुहरे में रास्ते से भटक जाते हैं, समस्या के मर्म को नहीं पकड़ पाते और इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि वे अंतरविरोधों को हल करने का तरीका नहीं निकाल पाते।

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, हमें किसी प्रक्रिया के सभी अंतरविरोधों को एक जैसा नहीं मानना चाहिए, बल्कि प्रधान और गौण अंतरविरोधों के बीच भेद करना चाहिए, और प्रधान अंतरविरोध को पकड़ने की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। लेकिन किसी अंतरविरोध में, चाहे वह प्रधान हो या गौण, क्या हम अंतरविरोध के दोनों परस्पर विरोधी पहलुओं को एक समान समझ सकते हैं ? नहीं, हम ऐसा भी नहीं कर सकते। किसी भी अंतरविरोध में परस्पर विरोधी पहलुओं का विकास असमान होता है। कभी–कभी ऐसा अवश्य लगता है कि वे संतुलित होते हैं, लेकिन यह केवल एक अस्थाई और सापेक्ष स्थिति होती है; मूल स्थिति असमानता की स्थिति ही है। दो परस्पर विरोधी पहलुओं में से एक अवश्य प्रधान होता है और दूसरा गौण। प्रधान पहलू वह होता है जो किसी अंतरविरोध में प्रमुख भूमिका अदा करता है। किसी वस्तु के स्वरूप का निर्णय मुख्यतया अंतरविरोध का प्रधान पहलू ही करता है, वह पहलू जो अपना प्रभुत्व कायम कर चुका है।

लेकिन यह स्थिति स्थिर नहीं होती; अंतरविरोध के प्रधान और अप्रधान पहलू एक दूसरे में बदल जाते हैं तथा उसी के अनुसार वस्तु का स्वरूप भी बदल जाता है। अंतरविरोध के विकास की किसी एक प्रक्रिया में अथवा किसी एक मंजिल में, प्रधान पहलू “क” है और अप्रधान पहलू “ख” है; विकास की दूसरी मंजिल में अथवा अन्य प्रक्रिया में “क” और “ख” की भूमिकाएं आपस में बदल जाती हैं-यह परिवर्तन इस बात से निर्धारित होता है कि किसी वस्तु के विकास में एक दूसरे से संघर्ष करने वाले दोनों पहलुओं की शक्ति में कितनी बढ़ती या घटती हुई है।

हम अक्सर “नूतन द्वारा पुरातन का स्थान लेने” की चर्चा करते हैं। नूतन द्वारा पुरातन का स्थान लेना विश्व का सार्वभौमिक और सदा के लिए अनुल्लंघनीय नियम है। कोई वस्तु अपने स्वरूप तथा अपनी परिस्थितियों के अनुसार अनेक प्रकार की छलांगों के जरिए एक दूसरी वस्तु में बदल जाती है; नूतन द्वारा पुरातन का स्थान लेने की प्रक्रिया यही है। प्रत्येक वस्तु में उसके नए पहलू और पुराने पहलू के बीच अंतरविरोध निहित होता है, और यह अंतरविरोध सिलसिलेवार अनेक पेचीदा संघर्षों को जन्म देता है। इन संघर्षों के परिणामस्वरूप, नया पहलू छोटे से बड़ा बन जाता है और आगे बढ़कर अपना प्रभुत्व कायम कर लेता है, जबकि पुराना पहलू बड़े से छोटे में बदल जाता है और कदम–ब–कदम विनाश की ओर अग्रसर होता है। पुराने पहलू पर नए पहलू का प्रभुत्व कायम होते ही पुरानी वस्तु गुणात्मक रूप से एक नई वस्तु में बदल जाती है। इस प्रकार किसी वस्तु का स्वरूप मुख्यत: अंतरविरोध के प्रधान पहलू द्वारा ही निर्धारित होता है, उस पहलू द्वारा जो अपना प्रभुत्व कायम कर चुका है। जब अंतरविरोध के प्रधान पहलू में, जिसने अपना प्रभुत्व कायम कर लिया है, परिवर्तन होता है, तो उसी के अनुकूल वस्तु का स्वरूप भी बदल जाता है।

पूंजीवादी समाज में, पूंजीवाद ने पुराने सामंती युग की अपनी अधीनस्थ स्थिति को प्रभुत्व की स्थिति में बदल लिया है और तदनुसार समाज का स्वरूप भी सामंती से पूंजीवादी हो गया है। नए पूंजीवादी युग में, सामंती शक्तियां, जो पहले प्रभुत्व की स्थिति में थीं, अब अधीनस्थ बन गई हैं, और कदम–ब–कदम विनाश की ओर अग्रसर हो रही हैं। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन और फ्रांस में ऐसा ही हुआ। उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ–साथ पूंजीपति वर्ग, प्रगतिशील भूमिका अदा करने वाले एक नए वर्ग की स्थिति से हटकर प्रतिक्रियावादी भूमिका अदा करने वाले एक पुराने वर्ग में बदल जाता है और अंत में सर्वहारा वर्ग द्वारा उसका तख्ता उलट दिया जाता है, और वह एक ऐसा वर्ग बन जाता है जो उत्पादन के साधनों पर निजी मिलकियत और सत्ता से वंचित हो जाता है और तब वह भी कदम–ब–कदम विनाश की ओर अग्रसर होता है। सर्वहारा वर्ग, जो पूंजीपति वर्ग से संख्या में कहीं अधिक ज्यादा है और जिसका विकास पूंजीपति वर्ग के साथ–साथ, लेकिन पूंजीपति वर्ग के ही शासन में होता है, एक नई शक्ति है; पूंजीपति वर्ग की अधीनता की अपनी आरंभिक स्थिति से वह कदम–ब–कदम शक्तिशाली बनकर एक ऐसा वर्ग बन जाता है जो स्वतंत्र है और इतिहास में एक प्रमुख भूमिका अदा करता है, और अंत में राजनीतिक सत्ता छीनकर शासक वर्ग बन जाता है। इसके परिणामस्वरूप समाज का स्वरूप बदल जाता है और पुराना पूंजीवादी समाज नए समाजवादी समाज में बदल जाता है। यही वह रास्ता है जिसे सोवियत संघ ने अपनाया है और बाकी तमाम देशों को अनिवार्य रूप से अपनाना है।

उदाहरण के लिए, चीन को ही लीजिए। जिस अंतरविरोध में चीन एक अर्द्ध–उपनिवेश बना हुआ है, उसमें साम्राज्यवाद का प्रधान स्थान है, वह चीनी जनता का उत्पीड़न करता है, और चीन एक स्वतंत्र देश से बदलकर एक अर्द्ध–उपनिवेश बन गया है। किंतु इस स्थिति का बदलना अनिवार्य है; दोनों पक्षों के बीच संघर्ष में चीनी जनता की शक्ति, जो सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में बढ़ती ही जा रही है, अनिवार्य रूप से चीन को एक अर्द्ध–उपनिवेश से एक स्वतंत्र देश में बदल देगी, जबकि साम्राज्यवाद का तख्ता उलट दिया जाएगा और पुराना चीन अनिवार्य रूप से नए चीन में बदल जाएगा।

पुराने चीन के नए चीन में बदलने में वह परिवर्तन भी शामिल है जो चीन की पुरानी सामंती शक्तियों और नई जन–शक्तियों के बीच के संबंधों में होता है। पुराने सामंती जमींदार वर्ग का तख्ता उलट दिया जाएगा और वह शासक की स्थिति से हटकर शासित बन जाएगा; और यह वर्ग भी कदम–ब–कदम विनाश की ओर अग्रसर होगा। सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में जनता शासितों की अवस्था से शासकों की अवस्था में पहुंच जाएगी। तब चीनी समाज के स्वरूप में भी परिवर्तन होगा और पुराना, अर्द्ध–औपनिवेशिक तथा अर्द्ध–सामंती समाज एक नए जनवादी समाज में बदल जाएगा।

इस तरह के पारस्परिक रूपांतरण के उदाहरण हमारे अतीतकालीन अनुभव में भी मिलते हैं। छिङ वंश, जो लगभग तीन सौ साल तक चीन पर शासन करता रहा, 1911 की क्रांति में उखाड़ फेंका गया, और सुन यात–सेन के नेतृत्व में क्रांतिकारी थुङ मङ ह्वेइ ने कुछ समय के लिए विजय प्राप्त की। 1924-27 के क्रांतिकारी युद्ध में कम्युनिस्ट–क्वोमिंताङ संश्रय की क्रांतिकारी शक्तियां दक्षिण में कमजोर से शक्तिशाली बनती गर्इं और उत्तरी अभियान में विजयी हुर्इं, जबकि उत्तरी युद्ध–सरदारों का, जिनका किसी समय बड़ा रोब था, तख्ता उलट दिया गया। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चलने वाली जन–शक्तियां 1927 में क्वोमिंताङ की प्रतिक्रियावादी शक्तियों के प्रहारों के कारण बहुत कमजोर हो गर्इं, किंतु अपनी पांतों से अवसरवाद को नेस्तनाबूद कर लेने पर वे एक बार फिर कदम–ब–कदम विकास करने लगीं। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में क्रांतिकारी आधार–क्षेत्रों के किसान, जो पहले शासित थे, अब शासक बन गए हैं, जबकि जमींदारों का इससे उल्टी दिशा में रूपांतर हो गया है। दुनिया में इसी तरह नूतन हमेशा पुरातन की जगह स्थापित होता जाता है, और पुरातन का स्थान लेता जाता है, पुरातन का अंत और नूतन का उदय होता जाता है या पुरातन के अंदर से नूतन का उदय होता जाता है।

क्रांतिकारी संघर्ष के दौरान कभी–कभी कठिनाइयों का पलड़ा अनुकूल स्थितियों के मुकाबले ज्यादा भारी हो जाता है और इसलिए वे अंतरविरोध का प्रधान पहलू बन जाती हैं और अनुकूल स्थितियां अंतरविरोध का गौण पहलू बन जाती हैं। लेकिन क्रांतिकारी लोग अपनी कोशिशों के जरिए कठिनाइयों पर कदम–ब–कदम काबू पा सकते हैं और एक नई अनुकूल स्थिति पैदा कर सकते हैं; इस प्रकार कठिन स्थिति की जगह अनुकूल स्थिति पैदा हो जाती है। 1927 में चीन में क्रांति की असफलता के बाद और चीनी लाल सेना के लंबे अभियान के दौरान ऐसा ही हुआ था। वर्तमान चीन–जापान युद्ध में चीन फिर एक कठिन स्थिति में आ पड़ा है; लेकिन हम इस स्थिति को बदल सकते हैं तथा चीन और जापान दोनों के बीच की स्थिति में आमूल परिवर्तन ला सकते हैं। इसके विपरीत यदि क्रांतिकारी लोग गलतियां करेंगे, तो अनुकूल स्थितियां भी कठिनाइयों में बदल सकती हैं। 1924-27 की क्रांति की जीत हार में बदल गई थी। 1927 के बाद दक्षिणी प्रांतों में जिन क्रांतिकारी आधार–क्षेत्रों का विकास हुआ था, वे सबके सब 1934 में पराजित हो गए।

जब हम अध्ययन करते हैं, तो अज्ञान की अवस्था से ज्ञान की अवस्था में पदार्पण करने का अंतरविरोध भी ऐसा ही होता है। मार्क्सवाद का अध्ययन करते समय एकदम आरंभ में मार्क्सवाद के  बारे में हमारी अनभिज्ञता या उसके बारे में हमारा अल्प ज्ञान मार्क्सवाद संबंधी ज्ञान के साथ अंतरविरोध की स्थिति में होता है। किंतु लगन के साथ अध्ययन करने के परिणामस्वरूप अनभिज्ञता को ज्ञान में, अल्प ज्ञान को यथेष्ट ज्ञान में और मार्क्सवाद को आंखें मूंद कर लागू करने की स्थिति को उसे दक्षता के साथ लागू करने की स्थिति में बदला जा सकता है।

कुछ लोगों का विचार है कि कुछ खास अंतरविरोध इस तरह के नहीं होते। मिसाल के लिए, उत्पादक शक्तियों और उत्पादन–संबंधों के बीच के अंतरविरोध में उत्पादक शक्तियां प्रधान पहलू हैं; सिद्धांत और व्यवहार के बीच के अंतरविरोध में व्यवहार प्रधान पहलू है; आर्थिक आधार और ऊपरी ढांचे के बीच के अंतरविरोध में आर्थिक आधार प्रधान पहलू है; और इनकी अपनी स्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं होता। यह धारणा एक यांत्रिक भौतिकवादी धारणा है, द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी नहीं। यह सच है कि उत्पादक शक्तियां, व्यवहार और आर्थिक आधार आम तौर पर प्रधान और निर्णयात्मक भूमिका अदा करते हैं; जो कोई इस बात से इनकार करता है वह भौतिकवादी नहीं है। लेकिन इस बात को भी स्वीकार करना होगा कि एक विशेष परिस्थिति में उत्पादन–संबंध, सिद्धांत और ऊपरी ढांचे जैसे पहलू भी प्रधान और निर्णयात्मक भूमिका अदा करते हैं। जब उत्पादन–संबंधों को बदले बिना उत्पादक शक्तियों का विकास नहीं हो सकता, तब उत्पादन–संबंधों में परिवर्तन ही प्रधान और निर्णयात्मक भूमिका अदा करता है। जैसा कि लेनिन ने कहा था, “बिना क्रांतिकारी सिद्धांत के कोई क्रांतिकारी आंदोलन नहीं हो सकता”[15]; ऐसी स्थिति में क्रांतिकारी सिद्धांत की रचना और उसके प्रतिपादन की ही प्रधान और निर्णयात्मक भूमिका होती है। जब किसी काम को (चाहे कैसा ही काम क्यों न हो) करना हो, पर उसे कैसे किया जाए इस बारे में अभी तक कोई दिशा–निर्देश, विधि, योजना या नीति निर्धारित न हुई हो, तो ऐसी स्थिति में दिशा–निर्देश, विधि, योजना या नीति को निर्धारित करना ही प्रधान और निर्णायक तत्व बन जाता है। जब ऊपरी ढांचा (राजनीति, संस्कृति, आदि) आर्थिक आधार के विकास को अवरूद्ध करता है, तब राजनीतिक और सांस्कृतिक सुधार प्रधान और निर्णयात्मक तत्व बन जाते हैं। जब हम ऐसा कहते हैं, तो क्या हम भौतिकवाद से दूर भाग रहे हैं ? नहीं। कारण कि जहां हम यह मानते हैं कि इतिहास के आम विकास के दौरान भौतिक स्थिति ही मानसिक स्थिति का निर्णय करती है तथा सामाजिक अस्तित्व ही सामाजिक चेतना का निर्णय करता है, वहां हम यह भी मानते हैं और हमें ऐसा अवश्य मान लेना चाहिए कि मानसिक स्थिति की भौतिक स्थिति पर, सामाजिक चेतना की सामाजिक अस्तित्व पर तथा ऊपरी ढांचे की आर्थिक आधार पर भी प्रतिक्रिया होती है। यह मान्यता भौतिकवाद के खिलाफ नहीं है; इसके विपरीत यह यांत्रिक भौतिकवाद से बच  जाती है और द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर दृढ़ता से कायम रहती है।

यदि अंतरविरोध की विशिष्टता का अध्ययन करते समय हम इन दो स्थितियों का-किसी प्रक्रिया में निहित प्रधान अंतरविरोध और अप्रधान अंतरविरोध का, तथा अंतरविरोध के प्रधान पहलू और अप्रधान पहलू का-अध्ययन नहीं करते, अर्थात यदि हम अंतरविरोध की इन दो स्थितियों की भिन्नता का अध्ययन नहीं करते, तो हम अमूर्त अध्ययन के दलदल में फंस जाएंगे और अंतरविरोध को ठोस रूप में समझ नहीं पाएंगे, और फलस्वरूप उसे हल करने के लिए सही उपाय नहीं खोज पाएंगे। अंतरविरोध की इन दो स्थितियों की भिन्नता या उनकी विशिष्टता, अंतरविरोध में शक्तियों की असमानता ही है। विश्व में निरपेक्ष समानता के साथ किसी वस्तु का विकास नहीं होता; और हमें समान विकास के सिद्धांत या संतुलित विकास के सिद्धांत का विरोध करना चाहिए। साथ ही यह ठोस अंतरविरोधपूर्ण स्थिति तथा अंतरविरोध के विकास की प्रक्रिया में उसके प्रधान और अप्रधान पहलुओं में होने वाला परिवर्तन ही नूतन के पुरातन का स्थान लेने की शक्ति को दर्शाते हैं। अंतरविरोधों में असमानता की विभिन्न अवस्थाओं का, प्रधान अंतरविरोध तथा अप्रधान अंतरविरोधों का, अंतरविरोध के प्रधान पहलू और अप्रधान पहलू का अध्ययन ही वह महत्वपूर्ण तरीका है जिसके द्वारा कोई क्रांतिकारी राजनीतिक पार्टी राजनीतिक और फौजी क्षेत्रों में अपनी रणनीतिक और कार्यनीतिक नीतियों को सही ढंग से निर्धारित करती है। सभी कम्युनिस्टों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए।

  1. अंतरविरोध के पहलुओं की एकरूपता और उनका संघर्ष

अंतरविरोध की सार्वभौमिकता और विशिष्टता की समस्या को समझ लेने के बाद हमें आगे बढ़कर अंतरविरोध के पहलुओं की एकरूपता और उनके संघर्ष की समस्या का अध्ययन करना चाहिए।

एकरूपता, एकता, संयोग, अंतर–व्याप्ति, अंतर–प्रवेश, अंतर–निर्भरता (या अस्तित्व के लिए अंतर–निर्भरता), अंतर–संबंध या आपसी सहयोग-इन सभी भिन्न शब्दों का एक ही अर्थ है और ये इन दो बातों के सूचक हैं : पहले, किसी वस्तु के विकास की प्रक्रिया में प्रत्येक अंतरविरोध के दोनों पहलुओं में से हर पहलू के अस्तित्व के लिए दूसरे पहलू का अस्तित्व अनिवार्य होता है, और दोनों पहलुओं का एक ही इकाई में सह–अस्तित्व होता है; दूसरे, ये दोनों परस्पर विरोधी पहलू किसी विशेष परिस्थिति में एक दूसरे में बदल जाते हैं। एकरूपता का यही मतलब है।

लेनिन ने कहा था :

द्वन्द्ववाद एक ऐसा सिद्धांत है जो इस बात को बताता है कि किस प्रकार विपरीत तत्व एकरूप हो सकते हैं और किस प्रकार वे एकरूप बनते हैं (किस प्रकार वे परिवर्तित होकर एकरूप बनते हैं)-किन परिस्थितियों में वे एक दूसरे में बदलते हुए एकरूप बन जाते हैं,-क्यों मानव–मस्तिष्क को इन विपरीत तत्वों को मृत और जड़ वस्तुओं के रूप में नहीं, बल्कि सजीव, परिस्थितिबद्ध, परिवर्तनशील, एक दूसरे में बदल जाने वाली वस्तुओं के रूप में देखना चाहिए।[16]

लेनिन के इस कथन का क्या अर्थ है ?

प्रत्येक प्रक्रिया में परस्पर विरोधी पहलू एक दूसरे को बहिष्कृत करते हैं, आपस में संघर्ष करते हैं, और एक दूसरे के विरोधी होते हैं। ऐसे परस्पर विरोधी पहलू बिना किसी अपवाद के सभी वस्तुओं की प्रक्रियाओं में तथा समस्त मानव–चिंतन में निहित होते हैं। किसी साधारण प्रक्रिया में विपरीत तत्वों की केवल एक ही जोड़ी होती है, किंतु किसी संश्लिष्ट प्रक्रिया में उनकी एक से अधिक जोड़ियां होती है। इसके अलावा, विपरीत तत्वों की विभिन्न जोड़ियां आपस में अंतरविरोधपूर्ण बन जाती हैं। इस तरह वस्तुगत जगत में सभी वस्तुओं और समस्त मानव–चिंतन की रचना होती है और उन्हें गति प्राप्त होती है।

 यदि यह सच है, तो इसमें एकरूपता का, अथवा एकता का सर्वथा अभाव है। तब भला हम एकरूपता और एकता की बात कैसे कर सकते हैं ?

कारण यह है कि कोई भी परस्पर विरोधी पहलू अलगाव की स्थिति में नहीं रह सकता। बिना उस दूसरे पहलू के, जो उसका विरोधी है, हर पहलू अपने अस्तित्व की परिस्थितियां खो देता है। जरा कल्पना कीजिए, क्या वस्तुओं या मानव–मस्तिष्क की धारणाओं का कोई भी परस्पर विरोधी पहलू स्वतंत्र अस्तित्व कायम रख सकता है ? जीवन के बिना मृत्यु नहीं हो सकती; मृत्यु के बिना जीवन भी नहीं हो सकता। बिना “ऊपर” के कोई “नीचे” नहीं हो सकता; बिना “नीचे” के “ऊपर” भी नहीं हो सकता। बिना दुर्भाग्य के सौभाग्य नहीं हो सकता; बिना सौभाग्य के दुर्भाग्य भी नहीं हो सकता। बिना सुविधा के कठिनाई नहीं हो सकती; बिना कठिनाई के सुविधा भी नहीं हो सकती। बिना जमींदारों के असामी किसान नहीं हो सकते; बिना असामी किसानों के जमींदार भी नहीं हो सकते। बिना पूंजीपति वर्ग के सर्वहारा वर्ग नहीं हो सकता; बिना सर्वहारा वर्ग के पूंजीपति वर्ग भी नहीं हो सकता। साम्राज्यवाद द्वारा राष्ट्रों के उत्पीड़न के बिना उपनिवेश अथवा अर्द्ध–उपनिवेश नहीं हो सकते; बिना उपनिवेशों और अर्द्ध–उपनिवेशों के राष्ट्रों का साम्राज्यवादी उत्पीड़न भी नहीं हो सकता। सभी विपरीत तत्व ऐसे ही होते हैं : विशेष परिस्थिति में, वे एक तरफ तो एक दूसरे के विरोधी होते हैं और दूसरी तरफ अंतर–संबंधित, अंतर–प्रविष्ट, अंतर–व्याप्त और अंतर–निर्भर होते हैं; उनके इसी स्वरूप को एकरूपता कहा जाता है। विशेष परिस्थिति में, सभी परस्पर विरोधी पहलुओं का स्वरूप विषमता लिए होता है, इसलिए उन्हें अंतरविरोध कहा जाता है। लेकिन उनका स्वरूप एकरूपता भी लिए होता है, इसलिए वे अंतर–संबंधित होते हैं। जब लेनिन कहते है कि द्वन्द्ववाद इस बात का अध्ययन करता है कि “किस प्रकार विपरीत तत्व एकरूप हो सकते हैं”, तो उनका आशय वही होता है जो ऊपर बताया गया है। वे आखिर एकरूप कैसे हो सकते है ? क्योंकि इनमें से हर पहलू दूसरे पहलू के अस्तित्व के लिए एक शर्त है। एकरूपता का पहला अर्थ यही है।

पर क्या केवल इतना ही कहना काफी है कि परस्पर विरोधी पहलुओं में से हर पहलू दूसरे पहलू के अस्तित्व के लिए एक शर्त है, उनमें एकरूपता है और परिणामत: वे एक ही इकाई में सह–अस्तित्व की स्थिति में रह सकते हैं ? नहीं, इतना ही कहना काफी नहीं है। अपने अस्तित्व के लिए परस्पर विरोधी पहलुओं की अंतर–निर्भरता तक ही बात समाप्त नहीं हो जाती; इससे अधिक महत्वपूर्ण बात है परस्पर विरोधी पहलुओं का एक दूसरे में बदलना। तात्पर्य यह कि विशेष परिस्थिति में किसी वस्तु में निहित दोनों परस्पर विरोधी पहलू अपने विपरीत पहलू में बदल जाते हैं, अपने विपरीत पहलू की स्थिति में पहुँच जाते हैं। अंतरविरोध की एकरूपता का यह दूसरा अर्थ है।

 आखिर यहां भी एकरूपता क्यों होती है ? बात यह है कि क्रांति के द्वारा सर्वहारा वर्ग, जो किसी समय एक शासित वर्ग था, अब शासक वर्ग बन जाता हे, जबकि पूंजीपति वर्ग, जो पहले शासक वर्ग था, अब शासित वर्ग बन जाता है और उस स्थिति में पहुँच जाता है जो पहले उसके विरोधी की थी। सोवियत संघ में तो ऐसा हो ही चुका है, बाकी तमाम दुनिया में भी ऐसा ही होगा। यदि विशेष परिस्थिति में विपरीत तत्वों के बीच अंतर–संबंध तथा एकरूपता न होती, तो ऐसा परिवर्तन कैसे हो सकता था ?

क्वोमिंताङ, जिसने चीन के आधुनिक इतिहास की एक निश्चित मंजिल में किसी हद तक सकारात्मक भूमिका अदा की थी, अपने स्वाभाविक वर्ग–चरित्र तथा साम्राज्यवाद के लोभ के कारण (ये परिस्थितियां ही थीं) 1927 से एक प्रतिक्रांतिकारी पार्टी बन गई है; लेकिन चीन और जापान के बीच के अंतरविरोध के तेज हो जाने और कम्युनिस्ट पार्टी की संयुक्त मोर्चे की नीति के कारण (ये परिस्थितयां ही थीं) उसे जापानी आक्रमण का प्रतिरोध स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा। परस्पर विरोधी वस्तुएं एक दूसरे में बदल जाती हैं, और उनमें एक प्रकार की एकरूपता विद्यमान रहती है।

हमने जिस भूमि–क्रांति को सम्पन्न किया है, वह एक ऐसी प्रक्रिया बन चुकी है और फिर से बन जाएगी, जिसमें जमीन का मालिक जमींदार वर्ग एक ऐसा वर्ग बन जाता है जिसके हाथों से जमीन छिन चुकी है, जबकि किसान, जो कभी अपनी जमीन से वंचित थे, थोड़ी जमीन के मालिक बन जाते है। एक विशेष परिस्थिति में साधन–सम्पन्नता और साधन–हीनता, नफा और नुकसान, अंतर–संबंधित होते है; दोनों पक्षों में एकरूपता होती है। समाजवाद की परिस्थिति में किसानों की निजी मिलकियत की व्यवस्था समाजवादी कृषि की सार्वजनिक मिलकियत में बदल जाती है; सोवियत संघ में ऐसा हो चुका है और बाकी सारी दुनिया में भी ऐसा ही होगा। निजी सम्पत्ति और सार्वजनिक सम्पत्ति के बीच की खाई के दो किनारों को मिलाने वाला एक सेतु होता है, जिसे दर्शन–शास्त्र में एकरूपता, या एक दूसरे में रूपांतर, अथवा अंतर–व्याप्ति कहते हैं।

सर्वहारा अधिनायकत्व को अथवा जनता के अधिनायकत्व को मजबूत बनाना वास्तव में ऐसे अधिनायकत्व को खत्म करने और सभी राज्य–व्यवस्थाओं का अंत करने की उच्चतर मंजिल की ओर बढ़ने के लिए परिस्थितियां तैयार करना है। कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना करना और उसका विकास करना वास्तव में कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों को खत्म करने के लिए परिस्थितियां तैयार करना है। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में क्रांतिकारी सेना बनाना और क्रांतिकारी युद्ध चलाना वास्तव में युद्ध को सदा के लिए मिटा देने की परिस्थितियां तैयार करना है। ये सभी विपरीत तत्व साथ ही साथ एक दूसरे के पूरक भी हैं।

जैसा कि हर कोई जानता है, युद्ध और शांति अपने को एक दूसरे में रूपांतरित कर लेते हैं। युद्ध शांति में बदल जाता है; उदाहरण के लिए, प्रथम विश्वयुद्ध युद्धोत्तरकालीन शांति में बदल गया था; चीन का गृहयुद्ध भी अब बंद हो गया है और उसकी जगह आंतरिक शांति कायम हो गई है। शांति युद्ध में रूपांतरित हो जाती है; उदाहरण के लिए, 1927 का क्वोमिंताङ–कम्युनिस्ट सहयोग युद्ध में बदल गया था, और आज की शांतिपूर्ण विश्व–परिस्थिति भी द्वितीय विश्वयुद्ध में बदल सकती है। ऐसा क्यों होता है ? इसलिए कि वर्ग–समाज में युद्ध और शांति जैसी परस्पर विरोधी वस्तुएं एक विशेष परिस्थिति में एकरूपता लिए हुए होती हैं।

सभी परस्पर विरोधी वस्तुएं अंतर–संबंधित होती हैं, और वे न केवल एक विशेष परिस्थिति में एक ही इकाई में सह–अस्तित्व की स्थिति में रहती हैं, बल्कि एक अन्य विशेष परिस्थिति में एक दूसरे में बदल भी जाती हैं-विपरीत तत्वों की एकरूपता का पूर्ण अर्थ यही होता है। लेनिन का ठीक यही मतलब था जब उन्होंने लिखा था, “किस प्रकार वे एकरूप बनते हैं (किस प्रकार वे परिवर्तित होकर एकरूप बनते हैं)-किन परिस्थितियों में वे एक दूसरे में बदलते हुए एकरूप बन जाते हैं।”

क्या कारण है कि “मानव–मस्तिष्क को इन विपरीत तत्वों को मृत और जड़ वस्तुओं के रूप में नहीं, बल्कि सजीव, परिस्थितिबद्ध, परिवर्तनशील, एक दूसरे में बदल जाने वाली वस्तुओं के रूप में देखना चाहिए” ? कारण यह है कि वस्तुगत पदार्थों में ठीक ऐसे ही होते हैं। सच बात यह है कि वस्तुगत पदार्थ असल में परस्पर विरोधी पहलुओं की एकता या एकरूपता कभी भी मृत और जड़ चीज नहीं होती, बल्कि सजीव, परिस्थितिबद्ध, परिवर्तनशील, अस्थाई और सापेक्ष चीज होती है; सभी परस्पर विरोधी पहलू, एक विशेष परिस्थिति में, अपने विपरीत पहलुओं में बदल जाते हैं। यही बात जब मानव–मस्तिष्क में प्रतिबिंबित होती है, तो वह मार्क्सवाद के भौतिकवादी द्वन्द्ववाद का विश्व–दृष्टिकोण बन जाती है। केवल प्रतिक्रियावादी शासक वर्ग, चाहे वे वर्तमान के हों या अतीत के, और उनकी चाकरी करने वाले अध्यात्मवादी ही, विपरीत तत्वों को सजीव, परिस्थितिबद्ध, परिवर्तनशील और एक दूसरे में बदल जाने वाली वस्तुओं के रूप में नहीं देखते, बल्कि मृत और जड़ मानते हैं, तथा आम जनता को धोखा देने के लिए इस गलत दृष्टिकोण का प्रचार करते हैं, और इस तरह अपने शासन को कायम रखने की कोशिश करते हैं। कम्युनिस्टों का कर्तव्य है कि वे प्रतिक्रियावादियों और अध्यात्मवादियों के गलत विचारों का भण्डाफोड़ कर दें, वस्तुओं में निहित द्वन्द्वात्मकता का प्रचार करें, और इस प्रकार वस्तुओं के रूपांतर की रफ्तार बढ़ाएं तथा क्रांति के उद्देश्य को प्राप्त करें।

जब हम एक विशेष परिस्थिति में विपरीत तत्वों की एकरूपता की बात करते हैं, तो हम वास्तविक और ठोस विपरीत तत्वों की तथा विपरीत तत्वों के एक दूसरे में वास्तविक और ठोस रूप से परिवर्तित होने की ही बात करते हैं। पौराणिक कथाओं में अनगिनत रूपांतर देखने को मिलते हैं; उदाहरण के लिए, “शान हाए चिङ” में ख्वा फू द्वारा सूर्य का पीछा करना,[17] “ह्वाए नान चि” में ई का नौ सूरजों को मार गिराना,[18] “शी यओ ची” में वानरराज का बहत्तर बार रूप बदलना,[19] “ल्याओ चाए की विचित्र कहानियां”[20] में भूतों और लोमड़ियों के इन्सानों के रूप में बदल जाने के अनेक किस्से, आदि। लेकिन इन कथाओं में वर्णित विपरीत तत्वों के परस्पर रूपांतर ठोस अंतरविरोधों को प्रतिबिंबित करने वाले ठोस रूपांतर नहीं हैं। ये रूपांतर एक प्रकार के बचकाने, काल्पनिक, मनोगत रूप से सोचे हुए ऐसे रूपांतर हैं जो मानव–मस्तिष्क में वास्तविक विपरीत तत्वों के एक दूसरे में अनगिनत जटिल रूपांतरों के कारण होते हैं। मार्क्स ने कहा था : “तमाम पौराणिक कथाएं कल्पना में तथा कल्पना के सहारे प्रकृति की शक्तियों पर काबू पाती हैं, उन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करती हैं और उन्हें साकार बनाती हैं; इसलिए मानव जैसे ही प्रकृति की शक्तियों पर काबू पाता है, वैसे ही पौराणिक कथाओं का लोप हो जाता है।”[21] ऐसी पौराणिक कथाओं के (और बाल–कथाओं के भी) अनंत रूपांतर लोगों का मनोरंजन इसीलिए करते हैं, क्योंकि उनमें प्रकृति की शक्तियों पर मानव की विजय का कल्पनापूर्ण वर्णन होता है, तथा उत्तम पौराणिक कथाओं में, जैसा कि मार्क्स ने कहा है, “चिरंतर रोचकता” होती है; लेकिन पौराणिक कथाएं एक विशेष परिस्थिति में मौजूद ठोस अंतरविरोधों पर आधारित नहीं होतीं और इसलिए वे यथार्थ को वैज्ञानिक ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करतीं। तात्पर्य यह है कि पौराणिक कथाओं या बाल–कथाओं में अंतरविरोध के पहलुओं में केवल काल्पनिक एकरूपता होती है, न कि वास्तविक एकरूपता। जो चीज वास्तविक परिवर्तनों में निहित एकरूपता को वैज्ञानिक ढंग से प्रतिबिंबित करती है, वही मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद है।

क्या कारण है कि अंडे को चूजे में रूपांतरित किया जा सकता है लेकिन पत्थर को नहीं ? क्या कारण है कि केवल युद्ध और शांति में ही एकरूपता है, तथा युद्ध और पत्थर में नहीं ? क्या कारण है कि इन्सान केवल इन्सान को ही जन्म दे सकता है, अन्य किसी चीज को नहीं ? इसका एकमात्र कारण यह है कि विपरीत तत्वों की एकरूपता केवल एक आवश्यक विशेष परिस्थिति में ही होती है। बिना इस आवश्यक विशेष परिस्थिति के किसी भी प्रकार की एकरूपता नहीं हो सकती।

क्या कारण है कि रूस में 1917 की पूंजीवादी–जनवादी फरवरी क्रांति उसी वर्ष की सर्वहारा समाजवादी अक्टूबर क्रांति के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी थी, जबकि फ्रांस में पूंजीवादी क्रांति प्रत्यक्ष रूप में किसी समाजवादी क्रांति से जुड़ी नहीं थी, और 1871 का पेरिस कम्यून अंत में असफल हो गया ? दूसरी ओर, इसका क्या कारण है कि मंगोलिया और मध्य एशिया में खानाबदोश जीवन–प्रणाली प्रत्यक्ष रूप से समाजवाद के साथ जुड़ गई है ? क्या कारण है कि चीनी क्रांति पश्चिमी देशों के पुराने ऐतिहासिक पथ पर चले बिना ही, पूंजीपति वर्ग के अधिनायकत्व के काल से गुजरे बिना ही, प्रत्यक्ष रूप से समाजवाद से जुड़ सकती है और पूंजीवादी भविष्य से अपने को बचा सकती है ? इसका एकमात्र कारण है समय–समय की ठोस परिस्थितियां। जब कुछ आवश्यक विशेष परिस्थितियां मौजूद होती हैं, तभी वस्तुओं के विकास की प्रक्रिया में कुछ निश्चित विपरीत तत्व उत्पन्न होते हैं; इतना ही नहीं, ये विपरीत तत्व (दो या दो से अधिक) एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं और एक दूसरे में बदल जाते हैं; अन्यथा इनमें से एक भी बात संभव नहीं।

यही एकरूपता की समस्या है। तब फिर संघर्ष क्या है ? और एकरूपता तथा संघर्ष के बीच क्या संबंध है ?

लेनिन ने कहा था :

विपरीत तत्वों की एकता (संयोग, एकरूपता, समान कार्रवाई) परिस्थितिबद्ध, क्षणिक, अस्थाई और सापेक्ष होती है। एक दूसरे को बहिष्कृत करने वाले विपरीत तत्वों का संघर्ष, विकास और गति के समान ही, निरपेक्ष होता है।[22]

इस कथन का क्या अर्थ है ?

सभी प्रक्रियाओं का आदि और अंत होता है; सभी प्रक्रियाएं अपने विपरीत तत्वों में रूपांतरित होती हैं। सभी प्रक्रियाओं की स्थिरता सापेक्ष होती है, किंतु एक प्रक्रिया के दूसरी प्रक्रिया में रूपांतरित होने में दिखाई देने वाली परिवर्तनशीलता निरपेक्ष होती है।

सभी वस्तुओं की गति की दो अवस्थाएं होती हैं : सापेक्ष स्थिरता की अवस्था और प्रत्यक्ष परिवर्तन की अवस्था। ये दोनों अवस्थाएं किसी वस्तु में निहित दो परस्पर विरोधी तत्वों के संघर्ष से उत्पन्न होती हैं। जब किसी वस्तु की गति पहली अवस्था में होती है, तब उसमें केवल परिमाणात्मक परिवर्तन होता है, न कि गुणात्मक परिवर्तन, और इसलिए वह ऊपर से स्थिरता की अवस्था में प्रतीत होती है। जब वस्तु की गति दूसरी अवस्था में होती है, तो उस समय तक पहली अवस्था का परिमाणात्मक परिवर्तन एक चरमबिंदु पर पहुंच चुका होता है, और वह एक इकाई वाली उस वस्तु का विघटन कर देता है, तथा उसमें गुणात्मक परिवर्तन हो जाता है, जिसके फलस्वरूप उसमें प्रत्यक्ष परिवर्तन प्रकट हो जाता है। ऐसी एकता, एकजुटता, सम्मिलन, सामंजस्य, साम्य, ठहराव, गतिरोध, स्थिरता, स्थायित्व, संतुलन, सघनता, आकर्षण, आदि, जिन्हें हम दैनिक जीवन में देखते हैं, सभी परिमाणात्मक परिवर्तन की अवस्था से गुजरती हुई वस्तुओं के रूप हैं। दूसरी ओर, एकता का विघटन, अर्थात इस एकजुटता, सम्मिलन, सामंजस्य, साम्य, ठहराव, गतिरोध, स्थिरता, स्थायित्व, संतुलन, सघनता व आकर्षण का विनाश, और उनका अपनी विपरीत अवस्थाओं में परिवर्तन, ये सभी गुणात्मक परिवर्तन की अवस्था से गुजरती हुई वस्तुओं के, एक प्रक्रिया के दूसरी प्रक्रिया में रूपांतर के रूप हैं। गति की पहली अवस्था से दूसरी अवस्था में वस्तुओं का लगातार रूपांतर होता रहता है; विपरीत तत्वों का संघर्ष दोनों ही अवस्थाओं में चलता रहता है, लेकिन अंतरविरोध का हल दूसरी अवस्था में ही होता है। इसलिए हम कहते हैं कि विपरीत तत्वों की एकता परिस्थितिबद्ध, अस्थाई और सापेक्ष है, जबकि एक दूसरे को बहिष्कृत करने वाले विपरीत तत्वों का संघर्ष निरपेक्ष है।

जब हमने ऊपर यह कहा कि दो विपरीत वस्तुएं एक ही इकाई में सह–अस्तित्व की स्थिति में रह सकती हैं और एक दूसरे में रूपांतरित भी हो सकती हैं, क्योंकि उनमें एकरूपता होती है, तब हम परिस्थितिबद्धता का उल्लेख कर रहे थे, अर्थात यह कि एक विशेष परिस्थिति में दो अंतरविरोधपूर्ण वस्तुएं एकताबद्ध हो सकती हैं और एक दूसरे में रूपांतरित भी हो सकती हैं, किंतु ऐसी परिस्थिति के न होने पर वे एक अंतरविरोध का रूप धारण नहीं कर सकतीं, एक ही इकाई में सह–अस्तित्व की स्थिति में नहीं रह सकतीं और एक दूसरे में रूपांतरित नहीं हो सकतीं। चूंकि अंतरविरोध की एकरूपता केवल एक विशेष परिस्थिति में ही उत्पन्न होती है, इसलिए हम एकरूपता को परिस्थितिबद्ध और सापेक्ष कहते हैं। यहां हम इतनी बात और कहना चाहते हैं कि विपरीत तत्वों के बीच संघर्ष किसी प्रक्रिया के आरंभ से अंत तक चलता है और एक प्रक्रिया के दूसरी में बदल जाने का कारण होता है, और यह संघर्ष हर जगह मौजूद रहता है, तथा इसलिए संघर्ष परिस्थितियों से परे और निरपेक्ष होता है।

परिस्थितिबद्ध, सापेक्ष एकरूपता और परिस्थितियों से परे, निरपेक्ष संघर्ष का सम्मिलन सभी वस्तुओं में अंतरविरोधों की गति को जन्म देते हैं।

हम चीनी अक्सर कहा करते हैं : “वस्तुएं जहां एक दूसरे के विपरीत होती हैं, वहां एक दूसरे की पूरक भी होती हैं।”[23] अर्थात, विपरीत वस्तुओं में एकरूपता होती है। यह कथन द्वन्द्वात्मक है, और अध्यात्मवाद के विपरीत है। “एक दूसरे के विपरीत होने” का अर्थ है दोनों परस्पर विरोधी पहलुओं का एक दूसरे को बहिष्कृत करना या एक दूसरे से संघर्ष करना। “एक दूसरे के पूरक होने” का अर्थ है एक विशेष परिस्थिति में दोनों परस्पर विरोधी पहलुओं का एकताबद्ध होना और एकरूपता प्राप्त करना। फिर भी संघर्ष एकरूपता में निहित होता है; और बिना संघर्ष के कोई एकरूपता संभव नहीं।

एकरूपता में संघर्ष मौजूद रहता है, विशिष्टता में सार्वभौमिकता मौजूद रहती है, व्यक्तिगत स्वरूप में सामान्य स्वरूप मौजूद रहता है। लेनिन के शब्दों में, “…सापेक्ष में निरपेक्ष मौजूद रहता है।”[24]

  1. अंतरविरोध में शत्रुता का स्थान

शत्रुता क्या है ?-यह एक ऐसा प्रश्न है जो विपरीत तत्वों के बीच के संघर्ष के प्रश्न में शामिल है। हमारा उत्तर है : शत्रुता विपरीत तत्वों के बीच के संघर्ष का एक रूप तो है, लेकिन उसका एकमात्र रूप नहीं है।

मानव–इतिहास में वर्गों के बीच की शत्रुता विपरीत तत्वों के बीच के संघर्ष की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति के रूप में मौजूद रहती है। जरा शोषक वर्ग और शोषित वर्ग के बीच के अंतरविरोध पर तो गौर कीजिए। ऐसे परस्पर विरोधी वर्ग लंबे अरसे तक एक ही समाज में, चाहे वह दास समाज हो अथवा सामंती या पूंजीवादी समाज, सह–अस्तित्व की स्थिति में रहते हैं, और आपस में संघर्ष करते रहते हैं; लेकिन जब तक इन दोनों वर्गों के बीच का अंतरविरोध विकसित होकर एक खास मंजिल पर नहीं पहुंच जाता, तब तक यह अंतरविरोध एक खुली शत्रुता का रूप धारण नहीं करता और क्रांति में विकसित नहीं होता। वर्ग–समाज के अंदर शांति का युद्ध में रूपांतर भी ऐसे ही होता है।

विस्फोट के पहले बम एक ऐसी इकाई होता है जिसमें विपरीत तत्व एक विशेष परिस्थिति में सह–अस्तित्व की स्थिति में रहते हैं। विस्फोट तभी होता है जब एक नई परिस्थिति, प्रज्वलन, पैदा हो जाती है। ऐसी ही स्थिति उन तमाम प्राकृतिक घटनाओं में पैदा होती है जो पुराने अंतरविरोधों को हल करने और नई वस्तुओं को उत्पन्न करने के लिए अंत में खुले विरोध का रूप धारण करती हैं।

इस बात को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे हम यह समझ जाते हैं कि वर्ग–समाज में क्रांतियों और क्रांतिकारी युद्धों का होना अनिवार्य है, और उनकी अनुपस्थिति में सामाजिक विकास के क्षेत्र में छलांग लगाना असंभव है, प्रतिक्रियावादी शासक वर्गों को उखाड़ फेंकना असंभव है और इसलिए जनता द्वारा राजनीतिक सत्ता पर अधिकार करना असंभव है। कम्युनिस्टों को चाहिए कि वे प्रतिक्रियावादियों के इस तमाम झूठे प्रचार का भण्डाफोड़ कर दें कि सामाजिक क्रांति अनावश्यक और असंभव है। उन्हें चाहिए कि वे सामाजिक क्रांति के मार्क्सवादी–लेनिनवादी सिद्धांत को मजबूती के साथ बुलंद रखें, और लोगों को यह समझाएं कि सामाजिक क्रांति न केवल पूर्णत: आवश्यक है, बल्कि पूर्णत: व्यावहारिक भी है, और यह कि मानव जाति का सम्पूर्ण इतिहास और सोवियत संघ की विजय इस वैज्ञानिक सच्चाई की पुष्टि करती है।

बहरहाल, हमें विपरीत तत्वों के बीच चलने वाले विभिन्न संघर्षों की परिस्थितियों का ठोस रूप से अध्ययन करना चाहिए और ऊपर बताए गए फार्मूले को हर वस्तु पर अनुचित ढंग से लागू नहीं करना चाहिए। अंतरविरोध और संघर्ष सार्वभौमिक और निरपेक्ष होते हैं, लेकिन अंतरविरोधों को हल करने के तरीके, अर्थात संघर्ष के रूप अंतरविरोधों के भिन्न–भिन्न स्वरूपों के अनुसार अलग–अलग होते हैं। कुछ अंतरविरोधों में खुली शत्रुता मौजूद रहती है और कुछ में नहीं। वस्तुओं के ठोस विकास के अनुसार, कुछ अंतरविरोध जो शुरू में अशत्रुतापूर्ण होते हैं, विकसित होकर शत्रुतापूर्ण बन जाते हैं, जबकि अन्य अंतरविरोध जो शुरू में शत्रुतापूर्ण होते हैं, विकसित होकर अशत्रुतापूर्ण बन जाते हैं।

जैसा कि हमने ऊपर बताया है, जब तक समाज में वर्ग मौजूद हैं, तब तक कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर सही विचारों और गलत विचारों के बीच के अंतरविरोध, पार्टी के अंदर वर्ग–अंतरविरोध को ही प्रतिबिंबित करते रहेंगे। आरंभ में, कुछ मामलों में, यह जरूरी नहीं कि ऐसे अंतरविरोध तत्काल ही शत्रुतापूर्ण बन जाएं। लेकिन वर्ग–संघर्ष के विकास के साथ–साथ विकसित होकर वे शत्रुतापूर्ण बन सकते हैं। सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास यह बताता है कि लेनिन और स्तालिन के सही विचारों तथा त्रात्सकी, बुखारिन व अन्य लोगों के गलत विचारों के बीच के अंतरविरोध शुरू में शत्रुतापूर्ण रूप में प्रकट नहीं हुए थे, लेकिन बाद में वे विकसित होकर शत्रुतापूर्ण बन गए। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास में भी ऐसी मिसालें मौजूद हैं। पार्टी में हमारे अनेक साथियों के सही विचारों और छन तू–श्यू, चाङ क्वो–थाओ तथा अन्य लोगों के गलत विचारों के बीच के अंतरविरोध भी पहले शत्रुतापूर्ण रूप में प्रकट नहीं हुए थे, किंतु बाद में वे विकसित होकर शत्रुतापूर्ण बन गए। इस समय हमारी पार्टी में सही विचारों और गलत विचारों के बीच के अंतरविरोध का रूप शत्रुतापूर्ण नहीं है, और यदि वे साथी, जिन्होंने गलतियां की हैं, अपनी गलतियों को सुधार लें, तो वह विकसित होकर शत्रुतापूर्ण रूप नहीं धारण करेगा। इसलिए, पार्टी को एक तरफ गलत विचारों के विरुद्ध गंभीर संघर्ष चलाना चाहिए, और दूसरी तरफ, उन साथियों को जिन्होंने गलतियां की हैं, चेतने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए। जाहिर है कि ऐसी परिस्थितियों में, सीमा से बाहर संघर्ष चलाना उचित नहीं है। किंतु गलतियां करने वाले लोग यदि अपनी गलतियों पर अड़े रहते हैं तथा और गंभीर गलतियां करते हैं, तो हो सकता है कि यह अंतरविरोध विकसित होकर शत्रुतापूर्ण अंतरविरोध बन जाए।

आर्थिक दृष्टि से, पूंजीवादी समाज में, जहां पूंजीपति वर्ग के शासन के अंतर्गत शहर द्वारा देहात की निर्मम लूट–खसोट होती है और चीन के क्वोमिंताङ शासित इलाकों में, जहां विदेशी साम्राज्यवाद और चीन के बड़े दलाल–पूंजीपतियों के वर्ग के शासन के अंतर्गत शहर द्वारा देहात की अत्यंत अमानुषिक लूट–खसोट होती है, शहर और देहात के बीच का अंतरविरोध अत्यंत शत्रुतापूर्ण अंतरविरोध बन जाता है। किंतु किसी समाजवादी देश में और हमारे क्रांतिकारी आधार–क्षेत्रों में, यह शत्रुतापूर्ण अंतरविरोध एक अशत्रुतापूर्ण अंतरविरोध में बदल चुका है; और कम्युनिस्ट समाज बन जाने पर यह समाप्त हो जाएगा।

लेनिन ने कहा था : “शत्रुता और अंतरविरोध एक ही और समान वस्तुएं कदापि नहीं हैं। समाजवाद में पहले का लोप हो जाएगा, किंतु दूसरे का अस्तित्व बना रहेगा।”[25] तात्पर्य यह कि शत्रुता विपरीत तत्वों के बीच के संघर्ष का महज एक रूप है, उसका एकमात्र रूप नहींय शत्रुता के फार्मूले को हम हर जगह बिना सोचे–समझे लागू नहीं कर सकते।

  1. निष्कर्ष

अब हम निष्कर्ष के तौर पर कुछ बातें कहेंगे। वस्तुओं में अंतरविरोध का नियम, अर्थात विपरीत तत्वों की एकता का नियम, प्रकृति और समाज का मूल नियम है और इसलिए चिंतन का भी मूल नियम है। वह अध्यात्मवादी विश्व–दृष्टिकोण के विपरीत है। वह मानव–ज्ञान के इतिहास में एक महान क्रांति का प्रतिनिधित्व करता है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के दृष्टिकोण के अनुसार, अंतरविरोध वस्तुगत पदार्थों की और मनोगत चिंतन की सभी प्रक्रियाओं में मौजूद होता है और इन सभी प्रक्रियाओं में शुरू से अंत तक बना रहता है; यही अंतरविरोध की सार्वभौमिकता और निरपेक्षता है। प्रत्येक अंतरविरोध और उसके प्रत्येक पहलू की अपनी–अपनी विशिष्टताएं होती हैं; यही अंतरविरोध की विशिष्टता और सापेक्षता है। एक विशेष परिस्थिति में, विपरीत तत्वों में एकरूपता होती है और इसलिए वे एक ही इकाई में सह–अस्तित्व की स्थिति में रह सकते हैं तथा एक दूसरे में बदल सकते हैं; यह भी अंतरविरोध की विशिष्टता और सापेक्षता है। किंतु विपरीत तत्वों के बीच संघर्ष लगातार चलता रहता है; यह संघर्ष तब भी चलता रहता है जबकि विपरीत तत्व सह–अस्तित्व की स्थिति में रहते हैं, और तब भी जबकि वे एक दूसरे में रूपांतरित होते हैं, और खासकर जब उनका एक दूसरे में रूपांतर हो रहा है, उस समय यह संघर्ष और ज्यादा स्पष्ट रूप से व्यक्त होता है; यह भी अंतरविरोध की सार्वभौमिकता और निरपेक्षता ही है। अंतरविरोध की विशिष्टता और सापेक्षता का अध्ययन करते समय, हमें प्रधान अंतरविरोध तथा अप्रधान अंतरविरोधों के फर्क को, तथा अंतरविरोध के प्रधान पहलू और अप्रधान पहलू के फर्क को ध्यान में रखना चाहिए; अंतरविरोध की सार्वभौमिकता और अंतरविरोध में निहित विपरीत तत्वों के संघर्ष का अध्ययन करते समय, हमें संघर्ष के विभिन्न रूपों के भेद को ध्यान में रखना चाहिए। अन्यथा हम गलतियां कर बैठेंगे। यदि अध्ययन के जरिए हमने ऊपर बताई गई आवश्यक बातों को सही तौर पर समझ लिया, तो हम उन कठमुल्लावादी विचारों को चकनाचूर कर सकेंगे, जो मार्क्सवाद–लेनिनवादी के बुनियादी उसूलों के विरुद्ध हैं तथा हमारे क्रांतिकारी कार्य के लिए हानिकारक हैं; और साथ ही व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हमारे साथी अपने अनुभव को उसूलों के रूप में व्यवस्थिति कर सकेंगे तथा अनुभववादी गलतियों को दोहराने से बच सकेंगे। अंतरविरोध के नियम के अपने अध्ययन में हम इन्हीं चंद साधारण निष्कर्षों पर पहुंचे हैं।

नोट

[1] वी.आई.लेनिन, “दार्शनिक नोटबुक”: “हेगेल की रचना ‘दर्शन–शास्त्र का इतिहास’ के पहले ग्रंथ में ‘एलियावादी विचार–शाखा’” के बारे में।

[2] वी.आई.लेनिन ने “द्वन्द्ववाद के सवाल के बारे में” नामक अपने निबंध में कहा है: “एक इकाई का दो में विभाजन और उसके परस्पर विरोधी अंशों का बोध ही द्वन्द्ववाद का सारतत्व है।” “हेगेल की रचना ‘तर्क विज्ञान’ की रूपरेखा” नामक अपनी रचना में उन्होंने कहा है : “संक्षेप में, द्वन्द्ववाद को विपरीत तत्वों की एकता का सिद्धांत कहा जा सकता है। ऐसा कहने से उसका निचोड़ तो पकड़ में आ जाता है, लेकिन स्पष्टीकरण करने और उसे भरा–पूरा बनाने की आवश्यकता बनी रहती है।”

[3] वी.आई.लेनिन, “द्वन्द्ववाद के सवाल के बारे में”।

[4] हान वंश में कनफ्यूशियसवाद के एक प्रसिद्ध व्याख्याकार तुङ चुङ–शू (179-104 ई–पू–) ने सम्राट हान ऊ ती से कहा था : “ताओ व्योम से उत्पन्न होता है; व्योम नहीं बदलता, इसी तरह ताओ भी नहीं बदलता”। “ताओ” प्राचीन चीन में दर्शन–शास्त्र के विद्वानों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक पारिभाषिक शब्द है। इसका अर्थ है “सिद्धांत” या “नियम”।

[5] फ्रेडरिक एंगेल्स, “द्वन्द्ववाद। परिमाण और गुण”-“ड्यूरिंग का मत–खण्डन”, प्रथम भाग का 12वां अध्याय।

[6] वी.आई.लेनिन, “द्वन्द्ववाद के सवाल के बारे में”।

[7] फ्रेडरिक एंगेल्स, “द्वन्द्ववाद। परिणाम और गुण”-“ड्यूहरिंग का मत–खण्डन”, प्रथम भाग का 12वां अध्याय।

[8] वी.आई.लेनिन, “द्वन्द्ववाद के सवाल के बारे में”।

[9] वी.आई.लेनिन, “द्वन्द्ववाद के सवाल के बारे में”।

[10] देखिए : वी.आई.लेनिन, “कम्युनिज्म” (12 जून 1920)। और देखिए : “चीन के क्रांतिकारी युद्ध की रणनीति विषयक समस्याएं”, नोट 10।

[11] देखिए : “सून चि” नामक पुस्तक का तीसरा अध्याय, “आक्रमण की रणनीति”।

[12] वेइ चङ (580-643 ई–) थाङ वंश का एक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ और इतिहासकार था। इस लेख में यह वाक्य “चि च थुङ च्येन” नामक किताब के 192वें खण्ड से उद्धृत किया गया है।

[13] “श्वेइ हू च्वान” (कछार के वीर) एक प्रसिद्ध चीनी उपन्यास है जिसमें उत्तरी सुङ वंश के अंतिम काल के एक किसान युद्ध का वर्णन किया गया है। ल्याङशानपो में किसान विद्रोह के नेता और उपन्यास के नायक सुङ च्याङ ने अपना अड्डा बनाया था और चू गांव लयाङशानपो के निकट था। इस गांव का मुखिया चू छाओ–फङ एक निरंकुश जमींदार था।

[14] वी.आई.लेनिन, “ट्रेड यूनियनों, वर्तमान परिस्थिति और त्रात्सकी व बुखारिन की गलतियों पर फिर एक बार विचार”।

[15] वी.आई.लेनिन, “क्या करें ?”, अध्याय 1, परिच्छेद 4।

[16] वी.आई.लेनिन, “हेगेल की रचना ‘तर्क–विज्ञान’ की रूपरेखा”।

[17] “शान हाए चिङ” (पर्वतों और सागरों की पुस्तक) युद्धरत राज्यों (403-221 ई–पू–) के काल में लिखी गई थी। ख्वा फू “शान हाए चिङ” में वर्णित एक ऋषि का नाम था। “शान हाए चिङ” के “हाए वाए पेइ चिङ” खण्ड में लिखा है : “ख्वा फू सूरज का पीछा कर रहा था। जब सूर्यास्त हुआ, तो उसे बहुत प्यास लग गई, और वह पीली नदी व वेइश्वेइ नदी में पानी पीने लगा। पीली नदी व वेइश्वेइ नदी का पानी उसकी प्यास बुझाने के लिए काफी नहीं था, तो वह ‘महासरोवर’ में पानी पाने के लिए उत्तर की ओर चल दिया। लेकिन ‘महासरोवर’ के पास पहुंचने से पहले ही वह रास्ते में मर गया। उसने अपनी लाठी नीचे फेंक दी, जिससे ‘तङ’ नामक एक जंगल बन गया।”

[18] ई प्राचीन चीन की पौराणिक कथा में वर्णित एक विख्यात वीर था। “सूरजों को मार गिराना” उसकी धनुर्विद्या के बारे में एक मशहूर कहानी है। “ह्वाए नान चि” नामक किताब में, जिसका सम्पादक हान वंश का ल्यू आन (ईसापूर्व दूसरी शताब्दी का एक अभिजात वर्गीय व्यक्ति) था, यह लिखा गया है : “सम्राट याओ के शासन–काल में आकाश में दस सूरज उगा करते थे। उनके कारण फसलों और पेड़–पौधों को बहुत क्षति पहुंचती थी और जनता को खाना नहीं मिलता था। इसके अलावा, तरह–तरह के हिंस्र पशु भी जनता को नुकसान पहुंचाते थे। इसलिए सम्राट याओ ने ई को आदेश दिया…और ई ने आकाश से सूरजों को मार गिराया और जमीन पर तरह–तरह के हिंस्र पशुओं को मार डाला। …इससे जनता को बड़ी राहत मिली है और खुशी हुई।” पूर्वी हान वंश के वाङ यी (ईसा की दूसरी शताब्दी के एक लेखक) द्वारा छ्वी य्वान रचित “आकाश से पूछना” नामक काव्य के लिए लिखी गई टिप्पणियों में बताया गया है : “‘ह्वाए नान चि’ के अनुसार सम्राट याओ के शासन–काल में आकाश में दस सूरज एक साथ उगा करते थे। उनके कारण फसलों और पेड़–पौधों को बहुत क्षति पहुंचती थी। सम्राट याओ ने ई को आदेश दिया कि वह उन्हें मार गिराए। ई ने दस सूरजों में से नौ को मार गिराया…सिर्फ एक को छोड़ दिया।”

[19] “शी यओ ची” (पच्छिम की तीर्थयात्रा) सोलहवीं शताब्दी में लिखा गया एक पौराणिक उपन्यास है, जिसका नायक सुन ऊ–खुङ नामक एक वानरराज है। उसके अंदर बहत्तर रूप, जैसे चिड़िया, पेड़–पौधे और पत्थर इत्यादि, धारण करने की अद्भुत शक्ति है।

[20] “ल्याओ चाए की विचित्र कहानियां” सत्रहवीं शताब्दी में छिङ वंश के फू सुङ–लिङ द्वारा लोक–कथाओं के आधार पर लिखी गई कहानियों का संग्रह है। इसमें छोटी–छोटी 431 कहानियां हैं, जो ज्यादातर भूत–प्रेतों और लोमड़ियों के बारे में है।

[21] कार्ल मार्क्स, “राजनीतिक अर्थशास्त्र की समालोचना की भूमिका”।

[22] वी.आई.लेनिन, “द्वन्द्ववाद के सवाल के बारे में”।

[23] इस वाक्य का प्रयोग पहली बार ईसा की पहली शताब्दी के प्रसिद्ध इतिहासकार पान कू द्वारा लिखित “हान वंश के पूर्वार्ध का इतिहास” में हुआ था। उसके बाद से यह चीन की एक लोकप्रिय उक्ति बन गई है।

[24] वी.आई.लेनिन, “द्वन्द्ववाद के सवाल के बारे में”।

[25] वी.आई.लेनिन, “एन.आई.बुखारिन की रचना ‘संक्रमणकालीन अर्थशास्त्र’ पर टिप्पणी”।