”रामराज्य” में गाय के लिए बढ़ि‍या एम्बुलेंस और जनता के लिए
बुनियादी सुविधाओं तक का अकाल!

 मुनीश मैन्दोला

एक ओर लखनऊ में उपमुख्यमन्त्री केशव प्रसाद मौर्य ने गाय ”माता” के लिए सचल एम्बुलेंस का उद्घाटन किया तो दूसरी ओर राजस्थान सरकार ने अदालत में स्वीकार किया है कि साल 2017 में अक्टूबर तक 15 हज़ार से अधिक नवजात शिशुओं की मौत हो चुकी है। नवम्बर और दिसम्बर के आँकड़े इसमें शामिल नहीं हैं। उनको मिलाकर ये संख्या और बढ़ जायेगी। डेढ़ हज़ार से अधिक नवजात शिशु तो केवल अक्टूबर में मारे गये। सामाजिक कार्यकर्ता चेतन कोठारी को सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार भारत में नवजात बच्चों के मरने का आँकड़ा बड़ा ही भयावह है और इसमें मध्य प्रदेश और यूपी सबसे टॉप पर हैं। आँकड़ों पर ग़ौर करें तो केवल अप्रैल 2017 से जुलाई 2017 तक के केवल चार महीनों में देशभर में कम से कम 75,493 नवजात बच्चों की मौत हो चुकी है। इनमें भी 64,093 बच्चों की मौत एक साल से कम उम्र में हुई है। इसके अलावा एक से पाँच साल के बच्चों में भी मौत का आँकड़ा कम नहीं है। मध्य प्रदेश में 9,269, महाराष्ट्र में 5,547, यूपी में 8,440, गुजरात में 6,755 बच्चे मारे गये। इसके अलावा 2014-15 में एक से पाँच साल की उम्र के 16,042 बच्चे मरे, 2015-16 में 17,744, 2016-17 में 18,739 बच्चे मरे और अप्रैल से जुलाई 2017 तक 11,400 बच्चे  मर चुके हैं।

देश की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं की इस हालत की पुष्टि हाल ही में हुए एक अध्ययन से भी होती है। मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट’ में प्रकाशित ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ़ डिजीज़ स्टडी’ के अनुसार भारत स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी स्वास्थ्य सुविधाओं और सेवाओं के मामले में अपने कई पड़ोसी देशों से काफ़ी पीछे है। इस रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य सेवाएँ देने के क्षेत्र में भारत पिछली रैंकिंग से 11 स्थान से गिरकर 154वें स्थान पर पहुँच गया है। सूची में कुल 195 देश हैं। भारत सरकार स्वास्थ्य सुविधाएँ देने के मामले में श्रीलंका, बांग्लादेश, चीन, भूटान से भी पीछे है! रपट के अनुसार टीबी से निपटने में भारत को 100 में से 26 का स्कोर मिला, जो पाकिस्तान (29/100) और कांगो (30/100) से कम है। इन रोगों के अलावा डायबिटीज़, गुर्दे और दिल से जुड़े रोगों के इलाज में भी भारत का स्कोर बेहद कम रहा है।

पूँजीवादी सरकारों की प्राथमिकता जनता को शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य सुविधाएँ, घर, बिजली-पानी आदि देना नहीं होता है। ये सरकारें पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटियाँ होती हैं जो मालिकों के वर्ग के हितों के लिए काम करती हैं। ये सरकारें इन असल मसलों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए गाय, मन्दिर, लव जिहाद जैसे नक़ली मुद्दों (जो कि मुद्दे हैं ही नहीं, महज़ कुत्साप्रचार की राजनीति है) का इस्तेतमाल करती हैं। कई राज्यों में लगातार प्रसूताओं की मृत्यु, गोरखपुर से लेकर महाराष्ट्र तक के अस्पतालों में मरते बच्चे, और एम्बुलेंस की कमी के चलते अपने कन्धे पर शव ले जाते लोगों की तस्वीरें – आज़ादी के बाद के 70 साल के पूँजीवादी ‘विकास’ की यही सच्चाई है कि भारतीय पूँजीवाद ने जनता को कुछ नहीं दिया है। सरकार चाहे किसी भी पूँजीवादी दल की हो, जनता को इनसे ना तो कुछ मिला है और ना ही मिलेगा और पूँजीवादी लूटतन्त्र में इस समस्या का कोई समाधान है भी नहीं। हमें इस सड़ी हुई व्यवस्था के विकल्प के बारे में सोचना ही होगा।

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2018

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