सनातन संस्था की असली जन्म कुंडली
बम धमाकों से महाराष्ट्र को कौन दहलाना चाहता था?

 नितेश शुक्ला

पिछले कुछ वर्षों के दौरान अनेक बम धमाकों और दाभोलकर, पान्‍सारे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्‍या में शामिल होने के सबूतों सहित इसके कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी के बावजूद सनातन संस्‍थाको कौन बचा रहा है और क्‍यों?                        
       पुणे पुलिस ने वाम विचारधारा से सम्बन्ध रखने वाले पाँच जाने-माने बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भीमा कोरेगांव मामले में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया है। मीडिया के ज़रिए ऐसी अफ़वाहें फैलायी जा रही  हैं कि ये पाँचों लोग नरेन्‍द्र मोदी की हत्‍या की साज़ि‍श से जुड़े हुए हैं हालाँकि पुलिस ने अदालत में इस बारे में कुछ भी नहीं कहा! असलियत ये है कि ये सभी लोग सरकार की नीतियों के आलोचक हैं और मज़दूरों, किसानों और आदिवासियों पर होने वाले ज़ुल्‍मों के विरुद्ध आवाज़ उठाते रहे हैं। देशव्यापी विरोध और अनेक जनपक्षधर बुद्धिजीवियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इनको जेल न भेजकर अगली सुनवाई 6 सितंबर 2018 तक घर पर नज़रबंद रखने का निर्देश दिया है। दूसरी ओर भीमा-कोरेगांव की घटना में हिंसा भड़काने के आरोप में हिन्‍दुत्‍ववादी संगठनों से जुड़े मिलिन्‍द एकबोटे और सम्‍भाजी भिड़े पर एफ़आईआर में नाम होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की गयी है। एकबोटे को गिरफ़्तार करने के बाद ज़मानत पर छोड़ दिया गया और भिड़े को अभी तक गिरफ़्तार ही नहीं किया गया है।

देश ही नहीं, दुनिया भर में जाने-माने बुद्धिजीवियों की गिरफ़्तारी का यह पूरा मामला जिस नाटकीय ढंग से रचा गया है उसके पीछे एक ऐसी सच्चाई है जिसको दबाने की कोशिश की जा रही है। 

दरअसल 9 अगस्त को मुम्बई एटीएस (आतंकवाद निरोधक दस्‍ता) ने सनातन संस्था से सम्बंध रखने वाले वैभव राउत, जो हिन्दू गोवंश रक्षा समिति का कार्यकर्ता है, के घर और दुकान पर छापेमारी की। इस छापेमारी में एटीएस को 8 देशी बम, 10 पिस्तौल, एक एयरगन, एक कट्टा, 6 मैगज़ीन और काफी मात्रा में बारूद और डेटोनेटर बरामद हुआ। छापे की यह कार्रवाई वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के संदर्भ में एसआईटी द्वारा चल रही जाँच के सिलसिले में की गयी। एसआईटी ने अमोल काले नाम के एक व्यक्ति को जून 2018 में गौरी लंकेश की हत्या के मास्टरमाइंड के तौर पर गिरफ्तार किया था। उसने पूछताछ के दौरान अपने संगठन से जुड़े 10 अन्य लोगों के नाम बताए जिनमें वैभव राउत का नाम भी शामिल था। 

इसके बाद तीन अन्य लोग भी गिरफ्तार हुए। ‘शिवप्रतिष्ठान हिंदुस्तान’ नामक संस्‍था का सदस्य सुधन्वा गोन्धेलकर गिरफ्तार हुआ। यह वही शिवप्रतिष्ठान हिंदुस्तान है जिसपर भीमा कोरेगाँव में दलितों के ऊपर हमला कराने के आरोप लगे थे। गिरफ्तार किए गए दूसरे व्यक्ति का नाम शरद कालस्कर है। शरद कालस्कर ने पूछताछ में बताया कि महाराष्ट्र के तर्कवादी लेखक नरेंद्र दाभोलकर की हत्या में वह भी शामिल था, उसने सचिन अंदुरे नाम के  एक शख्स के साथ मिलकर नरेंद्र दाभोलकर पर गोली चलाई थी। सचिन अंदुरे को एटीएस ने गिरफ्तार करके नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की जाँच कर रही सीबीआई को सौंप दिया है। सीबीआई का कहना है कि नरेंद्र दाभोलकर की हत्या का मास्टरमाइंड डॉक्टर वीरेंद्र तावड़े था जिसके साथ सचिन अंदुरे भी नरेंद्र दाभोलकर की हत्या में शामिल था। सचिन अंदुरे को महाराष्ट्र व कर्नाटक में हथियार चलाने की ट्रेनिंग मिली थी। वीरेंद्र तावड़े को सीबीआई पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है और 2016 में उसपर चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है। वीरेंद्र तावड़े भी सनातन संस्था का ही सदस्य बताया जाता है। कर्नाटक एसआईटी ने जिस शख्स को गौरी लंकेश की हत्या के संदर्भ में गिरफ्तार किया है उसका भी संबंध नरेंद्र दाभोलकर की हत्या में सामने आ रहा है। दाभोलकर को मारने की साजिश 2009 से चल रही थी जो कि 20 अगस्त 2013 को अंजाम दी गयी।

तीसरा गिरफ्तार शख्स श्रीकांत पांगरकर है जो कि शिवसेना का पूर्व पार्षद है। गिरफ्तार लोगों ने पूछताछ के दौरान यह बताया कि श्रीकांत ने विस्फोटक जमा करने और जोड़ने में उनकी मदद की। शिवसेना का कहना है कि पांगरकर ने बहुत पहले ही पार्टी छोड़ दी थी। शिवसेना के कोटे से महाराष्ट्र सरकार में मंत्री बने अंजुन खोटकर ने माना कि कई नेता श्रीकांत के संपर्क में थे और उसने उन नेताओं के सनातन संस्था से सम्बंध और विस्फोट के प्लान के बारे में कुछ बताया था। 

इन चारों से पूछताछ में यह सामने आया कि ये लोग महाराष्ट्र के छह शहरों मुंबई, पुणे के सनबर्न फेस्टिवल, सतारा, सांगली, सोलापुर आदि जगहों पर बम विस्फोट करने वाले थे। इसका उद्देश्य यही था कि इसमें मुस्लिमों का नाम आये और उनके प्रति नफरत पैदा की जा सके। इन्होंने कुछ पत्रकारों और लेखकों पर हमले की भी योजना बनाई थी। साथ ही इन्होंने कहा कि पद्मावत फ़िल्म की रिलीज के समय इन्होंने मुम्बई के कुछ सिनेमाघरों के सामने पेट्रोल बम फेंका था। 

हमेशा की तरह सनातन संस्था ने इन लोगों से अपना कोई सम्बन्ध होने से इंकार किया है। सनातन संस्था ने एक प्रेस नोट जारी करके कहा है कि वैभव राउत सनातन संस्था का साधक नहीं था, वह हिन्दू जनजागृति समिति का कार्यकर्ता था और कई महीने से कार्यरत नहीं था। फिर भी संस्था के वकील ने कहा कि वे उनको पूरी कानूनी मदद प्रदान करेंगे। 

यह पहली बार नहीं है जब सनातन संस्था से जुड़े लोगों को आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाया गया है। हम संस्था के इतिहास पर नजर डालेंगे तो यह बात साफ हो जायेगी कि यह एक हिन्दू उग्र कट्टरपंथी संगठन है और यह भी साफ हो जाएगा कि आखिर क्यों ये लोग ऐसे आतंकवादी कृत्यों को अंजाम देते हैं। 

सनातन संस्था सबसे पहले 1991 में एक धार्मिक ट्रस्ट के रूप में हिप्नोथेरेपिस्ट जयंत आठवले द्वारा स्थापित हुई। 23 मार्च 1999 को इसका नाम सनातन संस्था रखा गया। अपने को अध्यात्म और धर्म जागरण की संस्था बताने वाली यह संस्था अपनी धार्मिक कट्टरता, धमाकों और हत्या के षङयंत्रों के लिए कुख्यात है। आइये कुछ नजर इनके कारनामों पर डालते हैं। 

 

  1. 2007 के मुम्बई के वाशी, पनवेल, ठाणे बम धमाके:-

4 जून 2008 को ठाणे के गडकरी रंगायतन थिएटर की पार्किंग में एक बम धमाका हुआ जिसमें 7 लोग घायल हुए। उस दिन रंगायतन में मराठी नाटक ‘आम्ही पचपुते’ का मंचन हो रहा था। सनातन संस्था का कहना था कि ये नाटक हिन्दू धर्म के खिलाफ है।  

 इसके बाद वाशी और पनवेल के थिएटर में ‘जोधा अकबर’ फिल्‍म की रिलीज के समय दो छोटे धमाके किये गए थे।  इन धमाकों के आरोप में सनातन संस्था के 6 साधक गिरफ्तार हुए थे। सनातन संस्था इस समय भी दावा करती रही कि उनके कार्यकर्ताओं को झूठे केस में फंसाया गया है। इनमें से दो साधकों विक्रम भावे और रमेश गडकरी पर आरोप सिद्ध हुए और उनको 2011 में 10-10 साल की सजा सुनाई गई। 

  1. 2009 का गोवा मर्गांव धमाका:-

2009 में गोवा के मर्गाँव में दीवाली के उत्सव में बम धमाके करने जा रहे सनातन संस्था के दो कार्यकर्ताओं मलगौन्दा पाटिल और योगेश नाइक की उस वक्त मौत हो गयी जब उनके स्कूटर में रखा बम समय से पहले फट गया। इसके कुछ देर बाद पुलिस ने एक अन्य प्लांटेड बम वेस्को के पोर्ट टाउन के पास से ज़ब्त किया।  इस समय सनातन संस्था ने माना था कि पाटिल उनका साधक था। 

अक्टूबर 2009 में सनातन संस्था के ही चार साधकों, जिनमें विक्रम भावे भी शामिल था, के घर छापेमारी में दो रिवाल्वर, भारी मात्रा में विस्फोटक पाउडर, 20 डेटोनेटर, 19 जिलेटिन स्टिक, टाइमर, रिमोट कंट्रोल आदि ज़ब्त किये गये थे। इस मामले में सनातन संस्था के तीन अन्य साधक सारंग अकोलकर, जयप्रकाश और रुद्र पाटिल अभी तक फरार हैं जिनके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी किया जा चुका है। 

  1. 2013 में नरेंद्र दाभोलकर की हत्या:-

20 अगस्त 2013 को महाराष्ट्र के प्रसिद्ध तर्कवादी और अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष नरेंद्र दाभोलकर सुबह की सैर पर निकले थे जब उनको मोटरसाइकिल सवार लोगों ने गोली मार दी। इस घटना ने महाराष्ट्र को हिलाकर रख दिया। लोगों के काफी विरोध के बाद सीबीआई को इसकी जाँच सौंपी गई। सीबीआई ने जून 2016 में हिन्दू जनजागृति समिति के कार्यकर्ता वीरेंद्र तावड़े को इस हत्या के संदर्भ में गिरफ्तार किया। सीबीआई को तावड़े और गोवा ब्लास्ट के भगोड़े आरोपी सारंग अकोलकर के बीच ईमेल से बातचीत के प्रमाण भी मिले थे जिसमें हथियार जुटाने और हथियार बनाने का कारखाना स्थापित करने पर बातचीत हुई थी। इस मामले में अब दूसरा आरोपी सचिन अंदुरे भी पकड़ा जा चुका है। इन सभी के सम्बन्ध सनातन संस्था से रहे हैं। 

  1. 2015 में गोविंद पानसरे की हत्या :-

16 फरवरी 2015 को सुबह अपनी पत्नी के साथ टहलने जाते हुए बुज़ुर्ग वामपंथी नेता और लेखक गोविंद पानसरे पर दो मोटरसाइकिल सवारों ने गोलियां चलाईं। 20 फरवरी को गोविंद पानसरे की मृत्यु हो गयी। इस हत्या ने एक बार फिर पूरे देश के लोगों में आक्रोश पैदा कर दिया। धार्मिक कट्टरता के खिलाफ लिखने और बोलने वालों पर हमले बढ़ रहे थे और सरकार ज़ुबानी जमाखर्च के अलावा कुछ नहीं कर रही थी। पानसरे की हत्या की जाँच के लिए बाद में एसआईटी का गठन किया गया। एसआईटी की चार्जशीट के अनुसार पानसरे सनातन संस्था की नज़र में थे क्योंकि वह धार्मिक कट्टरता के विरोधी थे। हिन्दू जनजागृति समिति उनको एक ”दुर्जन” मानती थी जो उनके हिन्दू राष्ट्र की स्थापना में बाधक बन रहे थे। 30 दिसंबर 2014 को पानसरे ने यह घोषणा की थी कि वह सनातन संस्था की धार्मिक कट्टरता के विरोध में महाराष्ट्र भर में 150 सभाएँ करेंगे। इस घोषणा के  डेढ़ महीने बाद उनकी हत्या कर दी गयी। 

इस मामले में एसआईटी ने समीर गायकवाड़ और वीरेंद्र तावड़े को गिरफ्तार किया था। सीबीआई के अनुसार वीरेंद्र तावड़े वही व्यक्ति है जिसने नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड में मास्टरमाइंड की भूमिका निभाई थी और सारंग अकोलकर और सचिन अंदुरे के साथ मिलकर दाभोलकर की हत्या की थी। 

  1. 2015 में एम. एम. कलबुर्गी की हत्या:-

प्रसिद्ध कन्‍नड़ तर्कवादी और लेखक प्रोफेसर एम. एम. कलबुर्गी की 30 अगस्त 2015 को दो मोटरसाइकिल सवारों ने घर पर गोली मारकर हत्या कर दी। प्रोफेसर कलबुर्गी साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक और तर्कवादी थे जिनको लंबे समय से धार्मिक कट्टरपंथियों द्वारा धमकियाँ मिल रही थीं। इस हत्या के विरोध में पूरे देश में लेखकों ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार व अन्य पुरस्कार लौटाना शुरू कर दिया। इस हत्या की जाँच सीआईडी को दी गयी। इस हत्या में भी सनातन संस्था पर ही सवाल उठा था। फिर भी अभी तक सीआईडी इस मामले में किसी ठोस सूत्र का पता नहीं लगा पाई है। 

  1. 2017 में गौरी लंकेश की हत्या:-

बेंगलोर में वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या भी बिल्कुल उसी तरीके से की गई जैसे बाकी 3 तर्कवादी लेखकों की हुई थी। इस मामले में हाल ही में सीबीआई ने कोर्ट से कहा है कि उसने नरेंद्र दाभोलकर और गौरी लंकेश की हत्या के बीच कड़ी का पता लगा लिया है। सचिन अंदुरे ने पूछताछ में बताया कि गौरी लंकेश की हत्या के एक गिरफ्तार आरोपी ने उसे 7.65 एमएम की देशी रिवाल्वर और तीन गोलियाँ दी थीं। अगर सही जाँच हुई तो जल्दी ही इसमें भी सच्चाई सामने आ जायेगी। 

 

इतनी आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने वाली इस संस्था को प्रतिबंधित करने की मांग लगातार उठती रही है पर सत्ता में बैठे लोगों ने लगातार किसी न किसी बहाने से सनातन संस्था को बचाने का प्रयास ही किया है। कई जानकार लोगों का कहना है कि सनातन संस्‍था अपने दम पर लगातार ऐसी कार्रवाइयों को अंजाम नहीं देती रह सकती है। उसके पीछे राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ का हाथ है और केन्‍द्र तथा राज्‍यों में भाजपा की सरकारें उसे बचाती रही हैं। हालाँकि यह भी सच है कि कांग्रेस की सरकार भी ऐसे मामलों में कार्रवाई नहीं करने की दोषी है।

2011 में महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट सौंपकर सनातन संस्था पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इसको यह कहकर ठुकरा दिया कि अभी इसके लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।

2015 में फिर महाराष्ट्र सरकार ने इस संस्था को प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव भेजा पर भाजपा सरकार ने कांग्रेस की वही पुरानी कहानी दोहरा दी। 

इस बात में कोई संदेह नहीं कि सनातन संस्था एक कट्टरपंथी संगठन है। बीबीसी हिंदी ने भी इस पर जारी अपनी रिपोर्ट में इसके काले कारनामों को उजागर किया है। कुछ तथ्य इस बात की ओर स्‍पष्‍ट इशारा करते हैं कि संस्था का इन तमाम हत्याओं और धमाकों और उनमें शामिल आतंकवादियों से गहरा संबंध है-

  1. सनातन संस्था अपने आपको एक आध्यात्मिक संगठन बताती है पर इसका मुख्य लक्ष्य शुद्ध राजनीतिक है यानी हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना। संस्थापक जयंत आठवले के अनुसार सनातन संस्था का हिन्दू राष्ट्र कैसा होगा इसकी झलक देखिये –”जनप्रतिनिधि या राजनेता नहीं बल्कि केवल संत ही हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करने में सक्षम हैं। हिन्दू राष्ट्र में कोई चुनाव या जनप्रतिनिधि नहीं होगा।” 

जाहिर है कि सनातन संस्था किसी जनवादी व्यवस्था या संविधान में विश्वास नहीं रखती। 

सनातन संस्था पर कई विशेष रिपोर्ट तैयार करने वाली पत्रकार अलका धुपकर बीबीसी से बातचीत में कहती हैं – “सनातन संस्था की विचारधारा कट्टर दक्षिणपंथी है। वो हिंसा की वकालत करते हैं, उनका मकसद हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना है। इस लक्ष्य के रास्ते में आनेवाले का सफाया करना मंजिल तक पहुँचने की उनकी नीति का हिस्सा है।”

  1. डॉक्टर आठवले की पत्रिका ‘क्षत्रधर्म साधना’ में लिखा है कि पाँच फीसद अनुयायियों को हथियार की ट्रेनिंग देने की आवश्यकता होगी। भगवान सही समय पर हथियार उपलब्ध करायेंगे। सनातन संस्था की नज़र में तर्कवादी यानी वैज्ञानिक सोच का व्यक्ति, मुसलमान, ईसाई और हर इंसान जो हिन्दू विरोधी है वह ”दुर्जन” है। साथ ही एक लेख में ये भी जिक्र आता है कि “शैतानी ताक़तों के ख़िलाफ़ कदम उठाने होंगे।”

‘क्षत्रधर्म साधना’ में ये भी लिखा है कि – “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसीको गोली चलानी आती है या नहीं, जब वो भगवान का नाम लेकर गोली चलाता है तो ईश्वर की शक्ति से गोली निश्चित रूप से सही निशाने पर लगेगी।” 

इन कुछ ही पंक्तियों से समझा जा सकता है कि नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे या अन्य लोग मौत के घाट क्‍यों उतार दिये गये।

  1. तमाम दोगले फासिस्‍टों की तरह सनातन संस्था पकड़े जाने वाले अपने लोगों से लगातार अपना संबंध नकारती रहती है पर दूसरी तरफ इन अपराधियों को पूरी क़ानूनी मदद मुहैया कराती है, दर्जनों वकील और पूरी आर्थिक मदद दी जाती है। ये पैसे शहरों में रहने वाले हजारों नौकरीशुदा लोगों और व्‍यापारियों से धर्म रक्षा के नाम पर जुटाये जाते हैं। इसकी वेबसाइट पर लिखा है- “धर्मदान करो! धर्मपुण्य पाओ!” इसका अप्रत्यक्ष मतलब यही हुआ कि बम विस्फोटों और हत्याओं के लिए दान देने से पुण्य बढ़ता है। ये बार-बार इस बात को नकारते हैं कि गिरफ्तार पांचों लोग उनसे संबंधित नहीं हैं और हिन्दू जनजागृति समिति और सनातन संस्था में कोई संबंध नहीं है लेकिन दूसरी तरफ ठाणे में इन कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद विरोध रैली निकाली जाती है और उसमें सनातन संस्था और हिन्दू जनजागृति समिति दोनों के बैनर लिए हुए लोग दिखते हैं। वैभव राउत की गिरफ्तारी के विरोध में मुम्बई के नालासोपारा में निकाली गई जनाक्रोश रैली में सनातन संस्था और हिन्दू जनजागृति समिति दोनों हिस्सालेते हैं। हिन्दू जनजागृति समिति ने ही इसको आयोजित किया था और हिन्दू जनजागृति समिति और गोवंश रक्षा समिति के कार्यकर्ता दिप्तेश पाटिल ने इसकी अगुआई की थी। सनातन संस्था इस जनाक्रोश रैली की ख़बर अपनी वेबसाइट पर डालते हुए लिखती है – “अगर निर्दोष वैभव राउत को छोड़ा नहीं जाता तो हमारा आक्रोश और बढ़ेगा – आयोजकों की पुलिस और सरकार को चेतावनी।” जिस वैभव राउत से कोई भी सम्बन्ध होने से सनातन संस्था नकार रही है उसके निर्दोष होने का पता संस्था को कैसे चल गया? उसको क़ानूनी मदद क्यों दे रही है? कोई भी समझ सकता है कि सनातन संस्था यूँही इतना ज़ोर नहीं लगा रही। 

     सनातन संस्था धार्मिक कट्टर होने के साथ साथ घोर आधुनिकता विरोधी और विज्ञान विरोधी भी है। धर्म को वैज्ञानिक तरीके से समझाने के अपने दावे के बावजूद संस्था घोर अतार्किकता और अवैज्ञानिकता का गढ़ है। सनातन संस्था की वेबसाइट पर कई साधकों के हवाले से कई वाहियात दावे किये गये हैं। कुछ साधकों का दावा है कि – 

– उन्होंने डॉ आठवले के इर्दगिर्द एक आभामंडल देखा है। 

– जब वो आसपास होते हैं तो एक अलग तरह की खुशबू आती है।

– उनका चेहरा भगवान श्रीकृष्ण के समान दिखता है। 

  कई लोग ऐसे आरोप भी लगाते हैं कि डॉ आठवले सम्मोहन के जरिये अपने अनुयायियों के दिमाग नियंत्रित करते हैं। 2016 में संस्था के पनवेल आश्रम से ऐसी नशीली दवाएँ मिली थी जो तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती हैं। 

सनातन संस्था की वेबसाइट पर कुछ बहुमूल्य मशविरे भी दिये गये हैं। उनमें से कुछ नीचे दिये जा रहे हैं। 

– बिना कपड़े उतारे स्नान करना चाहिए वरना शैतानी ताकतें आपका नुकसान कर सकती हैं। 

– टॉयलेट जाने के बाद साबुन की बजाय मिट्टी से हाथ धोएँ। 

– रात में आईना देखने से बचना चाहिए वरना माहौल में मौजूद शैतानी आत्माएं आईने में दिखने वाले चेहरे पर हमला बोल सकती हैं। 

– श्राद्ध के दिनों में दाँतों को साफ नहीं करना चाहिए और न ही खाने के बाद पानी से मुँह साफ करना चाहिए क्योंकि इससे पुरखों की चमत्कारिक किरणों का प्रभाव कम हो जाता है। 

– हेयर ड्रायर से अपने बालों को नहीं सुखाना चाहिए क्योंकि ड्रायर की आवाज़ से शैतानी ताकतें खिंची चली आती हैं। इन शैतानी तरंगों का बुरा असर बालों की जड़ों पर पड़ता है और शरीर में विध्वंसक जज़्बात पैदा हो जाते हैं।

– वाशिंग मशीन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 

– गहरे रंग के कपड़े तामसी होते हैं, शैतानी शक्तियों के आसानी से शिकार बनते हैं। 

– महिलाओं को बाल संवारते समय ऐसे भाव में में लाना चाहिए कि “हे भगवान, मेरे बालों को ऋणात्मक ऊर्जा से बचाओ!”

 

ये सब देख कर आसानी से समझा जा सकता है कि तार्किकता और वैज्ञानिकता की बात करने वाले नरेन्द्र दाभोलकर व अन्य लोग सनातन संस्था की नज़र में दुश्मन क्‍यों बन गये होंगे और “धर्मरक्षकों” का खून खौल उठा होगा , और वह तभी शांत हुआ होगा जब “संहारकों” ने “पापियों” के खून से अपना हाथ धो लिया होगा। 

ऐसे कट्टरपंथी हत्‍यारे संगठनों का उभार सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है और ना ही किसी एक धर्म की बात है। बंगलादेश के इस्लामिक कट्टरपंथी भी इस मामले में भारत के हिन्दू कट्टरपंथियों को तगड़ी प्रतिस्पर्धा दे रहे हैं। बंगलादेश में 2016 तक इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा करीब 50 तर्कवादी लेखकों, सेक्युलर बुद्धिजीवियों, ब्लॉगरों या पत्रकारों की हत्या की जा चुकी थी जिनमें 20 विदेशी नागरिक थे। हर जगह सबसे पहले तर्कवादी, सेक्युलर और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को ही ख़त्‍म किया जाता है ताकि बाद में जब आम लोगों के प्रतिरोध को ख़ून की नदियों में डुबोया जाये तो आवाज़ उठाने वाला भी कोई न हो। 

आज जब जनता अपनी ज़िन्‍दगी से जुड़े बुनियादी सवालों के जवाब माँग रही है तो उसे बहकाने, भरमाने और आपस में बाँटने के लिए फासिस्‍ट सत्‍ता और संघ गिरोह के संगठन जाति और धर्म के झूठे नारे उछाल रहे हैं और हिन्‍दू राष्‍ट्र के हवाई सपने के नाम पर हिन्दू कट्टरपंथ को खुलेआम बढ़ावा दे रहे हैं। सनातन संस्था और हिन्दू जनजागृति समिति जैसे संगठनों का वे कुशलता से इस्‍तेमाल कर रहे हैं। इन हत्‍यारे संगठनों पर कठोर प्रतिबन्‍ध लगाने और इसके हत्‍यारे सदस्‍यों को सज़ा दिलवाने के लिए व्‍यापक जनदबाव बनाने की ज़रूरत है। लेकिन हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि इस व्‍यवस्‍था में प्रतिबन्‍ध मात्र लग जाने से इनकी कार्रवाइयाँ बन्‍द नहीं हो जायेंगी। धार्मिक कट्टरपंथ की राजनीति के विरुद्ध एक जुझारू जन आन्‍दोलन खड़ा करने की ज़रूरत है।

इसके लिए सबससे पहले आम लोगों को यह समझाना होगा कि धार्मिक कट्टरपंथ, चाहे वो किसी भी धर्म का हो, हमारे लिए बेहद ख़तरनाक है। शासक वर्ग और लुटेरों के हाथ का यह सबसे ख़तरनाक हथियार है। अंग्रेज़ों की बाँटो और राज करो की नीति आज भी इसलिए कारगर है क्योंकि लोगों का बड़ा हिस्‍सा धर्म के नशे में सोया हुआ है। तर्क और विज्ञान की रोशनी ही हमारी मदद कर सकती है। इसीलिए ये लोग तर्कवादियों और वैज्ञानिक विचारधारा रखने वाले बुद्धिजीवियों को अपना निशाना बनाते हैं ताकि जनता तक तर्क और विज्ञान की शक्ति पहुँच ही न पाये और वह अज्ञानी, मूढ़ बनी हुई इनके हाथें लुटती-पिटती रहे। आज भगतसिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी, राहुल सांकृत्यायन, राधामोहन गोकुल आदि के विचारों को बड़े पैमाने पर लोगों के बीच ले जाने की ज़रूरत है।

साथ ही, आज धार्मिक कट्टरता (चाहे हिन्दू कट्टरता हो या मुस्लिम कट्टरता) के इलाज के लिए एक जुझारू क्रान्तिकारी धर्मनिरपेक्ष आन्‍दोलन और नौजवानों के जुझारू दस्‍तों का निर्माण सबसे अहम कार्यभार है। ऐसे दस्ते जिनमें सभी धर्मों और जातियों के न्यायप्रिय और धर्मनिरपेक्ष लोग हों और जो हर धर्म की कट्टरता का कड़ाई से विरोध करने में सक्षम हों। दंगा करने वाले कट्टरपंथियों (चाहे हिन्दू कट्टरपंथी हों या मुस्लिम) को खदेड़ सकें। यही आज के समय में साम्प्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता का एकमात्र इलाज हो सकता है। एक धर्म की कट्टरता के ख़ि‍लाफ़ दूसरे धर्म की कट्टरता के साथ जा खड़े होना इस बीमारी को और बढ़ायेगा। अगर मुस्लिम कट्टरता के ख़ि‍लाफ़ हिन्दू कट्टरता को बढ़ावा दिया जाये या हिन्दू कट्टरता के विरोध में मुस्लिम कट्टरता को बढ़ावा दिया जाये तो इससे अनन्त काल तक चलने वाली एक विनाशकारी लड़ाई का जन्म होगा जिसमें पूरा नुकसान आम जनता को ही उठाना पड़ेगा और फ़ायदा सिर्फ़ दोनों धर्मों के कट्टरपंथी नेताओं और सत्‍ता पर काबिज़ लुटेरों को मिलेगा। हर तरह की धार्मिक कट्टरता का विरोध करने के साथ ही जनता को शोषण-उत्‍पीड़न, बेरोज़गारी, महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर संगठित करने के प्रयासों को तेज़ करने की भी ज़रूरत है।

मज़दूर बिगुल, सितम्‍बर-अक्‍टूबर-नवम्‍बर 2018


 

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