ग़ैर-सरकारी संगठनों का सरकारी तन्त्र

अपूर्व मालवीय

अगर आप किसी भी सरकारी विभाग में जायें और सरकारी योजनाओं की जानकारी लें तो निम्न जवाब सामान्य तौर पर मिलेगा – ”हमारे विभाग की बहुत सी कल्याणकारी योजनाएँ हैं और इन योजनाओं को विभिन्न एनजीओ के सहयोग के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है।” 

ज़्यादातर सरकारी विभागों की यही स्थिति है। सरकारी योजनाओं में ग़ैर-सरकारी संगठनों की घुसपैठ को समझा जा सकता है। नब्बे के दशक में जब भारत में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियाँ लागू की गयीं, उस समय हमारे देश में एनजीओ की संख्या क़रीब एक लाख थी। आज इन नीतियों ने जब देश की मेहनतकश जनता को तबाह-बर्बाद करने में कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं रख छोड़ी है, इनकी संख्या 32 लाख 97 हज़ार तक पहुँच चुकी है (सीबीआई की तरफ़ से सुप्रीम कोर्ट में दाखि़ल रिपोर्ट)। यानी देश के 15 लाख स्कूलों से दुगने और भारत के अस्पतालों से 250 गुने ज़्यादा!

अकेले उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में ही 5 लाख 48 हज़ार एनजीओ हैं। दिल्ली जैसे छोटे राज्य में 76000 एनजीओ हैं। उत्तराखण्ड में 16674 गाँव हैं, लेकिन एनजीओ हैं 51675! यानी तीन एनजीओ प्रति गाँव। उत्तराखण्ड में साठ फ़ीसदी से अधिक एनजीओ का काम ग्रामीण विकास पर केन्द्रि‍त है। लेकिन उत्तराखण्ड के गाँवों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। जो कम्पनियाँ यहाँ पर्यावरण, जंगलों, पहाड़ों, नदियों के विनाश के लिए जि़म्मेदार हैं, वही कम्पनियाँ इन मुद्दों को लेकर गोष्ठी, सेमिनार और कैम्प आदि लगाया करती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य आदि क्षेत्र को भी बड़े-बड़े एनजीओ ट्रस्ट, धर्मार्थ सेवा संगठनों ने अपने शिकंजे में जकड़ लिया है। अभी उत्तराखण्ड सरकार ने 300 सरकारी विद्यालयों को “10 से कम बच्चे आ रहे थे, का तर्क देकर” बन्द कर दिया। सिर्फ़ यहीं तक यह मामला नहीं रुका। इसके साथ ही इन सरकारी विद्यालयों की इमारतों को विद्या भारती (फ़ासिस्ट संगठन आरएसएस की संस्था) को दे दिया। अब जहाँ बच्चे ही नहीं आ रहे थे, उन स्कूलों का विद्या भारती क्या करेगी, यह सोचा जा सकता है। सरकार चार जि़लों के उन जवाहर नवोदय विद्यालयों को भी बन्द करने जा रही है, जिनमें अच्छी-ख़ासी संख्या में ग़रीब घरों के बच्चे आते हैं। उत्तराखण्ड में शिक्षा को लेकर ‘अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन’ सबसे अधिक काम करता है। पहाड़ों के कई स्कूलों को इसने गोद लिया है। उत्तराखण्ड में ज़्यादातर विश्वविद्यालय, कॉलेज बाबाओं-महन्तों के ट्रस्ट द्वारा संचालित हो रहे हैं। यही हाल स्वास्थ्य का है। स्वास्थ्य में मैक्स, फ़ोर्टिस जैसी कम्पनियों की दख़ल तो है ही, साथ ही बाबाओं-महन्तों के ट्रस्ट द्वारा संचालित कई मेडिकल कॉलेज सरकारी अस्पतालों को गोद लेकर ख़ूब मुनाफ़ा कमा रहे हैं। उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून के डोईवाला तहसील में एक सरकारी अस्पताल है, जो अब स्वामी राम हिमालयन हॉस्पिटल ट्रस्ट की देख-रेख में संचालित होता है। सरकारी अस्पताल में आये थोड़े से भी गम्भीर मरीजों को हिमालयन में रेफ़र कर दिया जाता है। सरकारी अस्पताल में ज़्यादातर ग़रीब-मेहनतकश ही आते हैं जो बमुश्किल ही पैसा देकर अपना इलाज करवा सकते हैं। लेकिन हिमालयन अस्पताल में भेजकर उनसे ठीक-ठाक फ़ीस वसूल ली जाती है। सुधीर नाम के व्यक्ति बताते हैं कि उनका रोड एक्सीडेण्ट हो गया था। ‘परिवार के लोग सरकारी अस्पताल लाये तो यहाँ के डॉक्टर ने हिमालयन रेफ़र कर दिया। मैं ठीक तो हो गया लेकिन क़र्ज़ के बोझ से दब गया।’

उत्तराखण्ड के पहाड़, जंगल अपनी बहुमूल्य जड़ी-बूटियों, वानस्पतिक विविधताओं आदि के लिए जाने जाते हैं। लेकिन यहाँ की “सरकार इन जड़ी-बूटियों, वनस्पतियों के दोहन-संवर्द्धन के साथ ही इनके वास्तविक मूल्य लगा पाने में नाकाम है।” इसलिए इसकी जि़म्मेदारी बाबा रामदेव एण्ड कम्पनी को दे दी है। ये वही बाबा हैं जो काला धन और भ्रष्टाचार पर ज़ोर-शोर से प्रचार करते आज से चार-पाँच साल पहले दिखा करते थे। इन महोदय के पास क़रीब 100 ट्रस्ट, सोसायटी और कम्पनियाँ हैं, जो जन-कल्याण का काम करती हैं। अभी फि़क्की के एक सम्मेलन में इन्होंने बताया कि अभी तक उनकी कम्पनी 11 हज़ार करोड़ का जन-कल्याण कर चुकी है और अभी वे कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण में एक लाख करोड़ का जन-कल्याण करना चाहते हैं। बाबा जी का जन-कल्याण जानने के लिए जब इनका खाता-बही देखा गया तो पता चला कि पतंजलि की बिल्डिंग की सफ़ेदी-सफ़ाई भी “जन-कल्याण” है! वहाँ 12 घण्टे काम करने वाले ‘मज़दूर-कर्मचारी’ नहीं बल्कि “सेवक” हैं जिनके परिवार के गुज़ारे एवं सेवा के लिए बाबा कुछ सेवा फल मासिक तौर पर “जन-कल्याण” के नाम पर प्रदान करते हैं! बाक़ी आप जानते ही हैं कि समय-समय पर जो “जन-कल्याणकारी” योग-शिविर लगता है और अलग-अलग स्तर के जो करोड़ों रुपये के शुल्क बाबा योग सिखाने का लेते हैं, वो तो “जन-कल्याण” है ही!

सेवा के नाम पर अपने ही कर्मचारियों का शोषण

ये “जन-कल्याणकारी” संस्थाएँ अपने कर्मचारियों का शोषण करने में भी गुरेज़ नहीं करतीं। बहुत से एनजीओ, सोसायटी स्व-रोज़गार के उद्यम चलाते हैं। पहाड़ों में या दूरदराज के गाँवों में स्थानीय जड़ी-बूटियाँ, सब्जि़याँ, अचार या किसी क्राफ़्ट की वस्तुएँ आदि लेकर शहरों में हाई-क्लास सोसायटी के बीच में उसकी मार्केटिंग करते हैं और ख़ूब मुनाफ़ा कमाते हैं। लेकिन इन्हें बनाने वाले, जड़ी-बूटियों को जंगलों से लाने, उसकी प्रोसेसिंग, पैकिंग करने या इसकी मार्केटिंग में लगे कर्मचारियों तक को उनके श्रम की वाजिब क़ीमत तक नहीं मिलती।

पिछले साल देहरादून में एक बड़े ट्रस्ट राफ़ेल राइडर शशाया इण्टरनेशनल सेण्टर (जहाँ विकलांग बच्चों का इलाज, देखरेख और पढ़ाई आदि होती है) के कर्मचारियों ने अपने वेतन बढ़ाने के लिए आन्दोलन किया। 15-20 साल तक काम करने वाले इन कर्मचारियों को केवल 6000-7000 हज़ार रुपये ही मासिक वेतन दिये जा रहे थे। वहाँ के कर्मचारियों ने बताया कि पहले तो हम कम तनख़्वाह के बावजूद कुछ भी नहीं बोलते थे, क्योंकि हम यह मानकर चलते थे कि ये सेवा का काम है। लेकिन हमने देखा कि इसके प्रबन्धक, मैनेजिंग कमेटी के लोग विलासिता से रह रहे हैं। जब-तब वे अपनी तनख़्वाहें बढ़ा लेते हैं। जब हमारी बात आती है तो संसाधनों और पैसे की कमी का रोना रोते हैं। जबकि यहाँ सालों-साल कुछ-न-कुछ निर्माण का काम भी चलता रहता है। इससे भी यहाँ का मैनेजमेण्ट अपनी जेब गर्म करता है। जब इस ट्रस्ट के 2015-16 के वार्षिक वित्तीय हिसाब को देखा गया तो पता चला कि उस वर्ष इसे विदेशों से 3 करोड़ 62 लाख 3 हज़ार, 1 करोड़ 87 लाख 84 हज़ार का भारतीय अनुदान और ख़ुद राफ़ेल की आय 8 लाख 49 हज़ार थी। इसकी फ़ण्डिंग रतन टाटा समूह, ओएनजीसी, मैक्स इण्डिया, आरईजीई फ़ाउण्डेशन से होती है। करोड़ों की सलाना आय के बावजूद ये अपने कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन तक नहीं देता है।

ये सिर्फ़ राफ़ेल का ही मामला नहीं है। रामदेव एण्ड कम्पनी के मज़दूर भी न्यूनतम वेतन और श्रम क़ानूनों के तहत मिलने वाली तमाम सुविधाओं के लिए हड़ताल कर चुके हैं। आपने गोरखपुर के गीता प्रेस के मज़दूरों के आन्दोलन के बारे में सुना ही होगा, जो सम्मानजनक वेतन की माँग कर रहे थे। गीता प्रेस ने इसका ख़ूब प्रचार किया कि धर्मार्थ कार्यों के लिए चलने वाली संस्था इतनी तनख़्वाह कैसे दे सकती है! लेकिन इसकी मैनेजमेण्ट ने यह नहीं बताया कि कैसे इसकी वितरण शाखाएँ पूरे देश में बढ़ती जा रही हैं? मैनेजमेण्ट ने यह भी नहीं बताया कि उसकी किताबों की वार्षिक बिक्री क़रीब 54 करोड़ रुपये है।

असल में किसी बड़े एनजीओ का वार्षिक बजट सैकड़ों-हज़ारों मिलियन्स या कई बिलियन डॉलर्स हो सकता है। 1999 में ही ‘अमेरिकन एसोसियेशन ऑफ़ रिटायर्ड पर्सन्स’ का बजट 540 मिलियन डॉलर्स से अधिक था! अधिकतर एनजीओ अपने वित्त के लिए सरकारों पर बहुत अधिक निर्भर होते हैं। सरकारें जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में राजस्व की कमी का रोना रोती हैं, जबकि इससे ज़्यादा की राशि को तमाम एनजीओ की गतिविधियों के लिए दे देती हैं। इन एनजीओ के मालिक व मैनेजमेण्ट देशी-विदेशी फ़ण्डिंग से विलासिता की ज़िन्दगी जीते हैं, जबकि इसमें काम करने वाले कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन तक नहीं मिलता है। बहुत से नौजवान एनजीओ आदि में काम करके बमुश्किल अपना जेब-ख़र्च निकाल पाते हैं, लेकिन वे यह सोचकर अपने दिल को ख़ुश किये रहते हैं कि वे समाज-सेवा का काम कर रहे हैं।

रँगे सियारों की समाज-सेवा

क्या आप आड़ू के पेड़ में आम फलने की कल्पना कर सकते हैं? या गेहूँ की फ़सल बोकर गन्ना काटने की उम्मीद कर सकते हैं? नहीं न! उसी तरह क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, कॉर्पोरेट्स या पूँजीपति जो पूरी दुनिया के मेहनतकशों को लूट रहे हैं, इनके द्वारा खड़े किये गये एनजीओ, ट्रस्ट, धर्मार्थ सेवा संगठन आदि वास्तव में जनता की सेवा के लिए हैं? ऐसा कैसे हो सकता है कि एक तरफ़ ये पूँजीपति अपने मुनाफ़े के लिए मेहनतकशों की हड्डियों को भी पाउडर बनाकर बेच देंगे, संसाधनों पर कब्ज़े के लिए युद्ध तक छेड़ देंगे, खाद्यानों को बर्बाद करके उसको अपने गोदामों में सड़ा देंगे, भुखमरी का संकट खड़ा कर देंगे, लेकिन इसके बाद वही पूँजीपति, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने ट्रस्ट, एनजीओ के माध्यम से समाजसेवा का काम करेंगे? आखि़र इन पूँजीपतियों की दयालुता, सहृदयता का राज क्या है? दोनों हाथों से जनता को लूटने वाले ये रँगे सियार आखि़र बीच-बीच में समाजसेवी-खैरात की दुकानें क्यों सजाते हैं? अब आप थोड़ा असमंजस में पड़ गये होंगे। इस असमंजस को दूर करने के लिए चलिए एनजीओ आदि की राजनीति, अर्थनीति, समाजनीति पर थोड़ी चर्चा की जाये।

नक़ाब के पीछे की सच्चाई

वैसे देखा जाये तो मानव सेवा, समाज सेवा का काम कोई नया नहीं है। मध्यकाल में धर्म और उससे जुड़ी संस्थाएँ ये काम बख़ूबी किया करती थीं। लेकिन इसके साथ ही ये संस्थाएँ मौजूदा व्यवस्था को वैधता भी प्रदान किया करती थीं। जनता के बीच ये भ्रम बनाने में कि राजा ही हमारा वास्तविक प्रतिनिधि है, राजा की इच्छा ही ईश्वर की इच्छा है और राजा की सेवा ही हमारा धर्म है, ये सोच बनाने में इन्हीं धार्मिक संस्थाओं का ही योगदान होता था। इस कारण इन मठों, मन्दिरों, चर्च आदि को राजे-रजवाड़ों, सामन्तों आदि से अकूत धन-दौलत, ज़मीन इत्यादि मिला करती थी और ये संस्थाएँ पूरी निष्ठा के साथ अपने हुक्मरानों के कि़लों की हिफ़ाज़त किया करती थीं। अब आप कहेंगे कि ये तो पुराने ज़माने की बात है। चलिए नये ज़माने पर आते हैं –

नये ज़माने का पुराना भ्रम

वर्तमान शासकों को इन एनजीओ, ट्रस्ट की क्या ज़रूरत? अभी चर्चा हुई कि धार्मिक संस्थाएँ पुराने शासकों की वैधता की गारण्टी थीं। आज के शासक वैधता किससे प्राप्त करते हैं? ग्राम्शी ने बताया है कि मीडिया से। सिर्फ़ मीडिया से ही! नहीं! ये स्वयंसेवी संगठन, ट्रस्ट, एनजीओ आदि भी आज के शासकों को वैधता के सर्टिफि़केट प्रदान करते हैं। कैसे?

ये जनता के बीच उस भ्रम को पैदा करते हैं कि इस व्यवस्था में छोटे-छोटे सुधार करके इसको बेहतर बनाया जा सकता है। ये बताते हैं कि जनता की तबाही-बर्बादी की जि़म्मेदार यह पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था नहीं बल्कि कुछ शासकों की ग़लत नीतियाँ, भ्रष्टाचार आदि है – जिसको ठीक किया जा सकता है।

आप जानते हैं कि 20वीं शताब्दी क्रान्तियों, जन-संघर्षों और युद्ध की शताब्दी रही है। ये वो दौर रहा है जब भारत सहित तीसरी दुनिया के तमाम देशों की जनता उपनिवेशवाद, अर्द्धउपनिवेशवाद, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ सड़कों पर थी। इसी दौर में रूस के मज़दूरों ने समाजवादी क्रान्ति की। इन संघर्षों और क्रान्तियों ने पूँजीपतियों और साम्राज्यवादी देशों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। अपने लूट के साम्राज्य को बचाये रखने और सम्भावित क्रान्तियों के डर से साम्राज्यवादियों ने अपनी रणनीति को बदला। कुछ देशों में अपने जूनियर पार्टनरों को, कुछ में अपने पिट्ठुओं को, कुछ में सैनिक तानाशाहों को सत्ता सौंपी। नवस्वाधीन देशों में भी पूँजीवादी-साम्राज्यवादी लूट की नीतियाँ बदस्तूर जारी रहीं और इन नीतियों के कारण होने वाली तबाही-बर्बादी, शोषण-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ जन-संघर्ष भी जारी रहे। हमारे देश में भी आज़ादी के बाद तेलंगाना, तेभागा, पुनप्रा-वायलार, नक्सलबाड़ी आन्दोलन के साथ ही आपातकाल के दौर के संघर्षों का इतिहास रहा है। ये जनसंघर्ष कहीं पूँजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी क्रान्तियों में न बदल जायें, इसके लिए ज़रूरी था कि ऐसे संगठन खड़े किये जायें जो जनता के क्रान्तिकारी आन्दोलन को दिशाहीन कर सकें। जनता में इसी व्यवस्था को बेहतर बनाने का भ्रम पैदा कर सकें।

हमारे हितैषी पूँजी के सरपरस्त गुलाम हैं

दूसरे विश्व युद्ध के बाद तीसरी दुनिया के तमाम देशों में स्वयंसेवी संगठन, ट्रस्ट, एनजीओ आदि बहुतायत में उठ खड़े हुए। ये मानवाधिकार के मुद्दे, दलित-उत्पीड़न, आदिवासी उत्पीड़न, जल-जंगल-ज़मीन, पर्यावरण, स्त्री-प्रश्न आदि-आदि पर हस्तक्षेप करते दिखायी देते हैं। लेकिन ये कभी-भी इन सारे सवालों को पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था से जोड़कर नहीं प्रस्तुत करते, बल्कि इन सवालों को अलग-अलग टुकड़ों में हल करने का समाधान प्रस्तुत करते हैं। ये पर्यावरण के विनाश को रोकने के लिए पूँजीपतियों, उनकी सरकारों, और साम्राज्यवादियों से गुहार लगायेंगे! शासकों के दमन-उत्पीड़न की नीतियों के ख़िलाफ़ न्यायपालिका से गुहार लगायेंगे! लेकिन कभी-भी जनता को क्रान्तिकारी संघर्ष के लिए लामबन्द नहीं करेंगे।

    मज़े की बात यह है कि 1960 के दशक में जहाँ अमेरिकी साम्राज्यवाद परस्त सैनिक तानाशाहियाँ क़ायम हुईं या नवस्वाधीन देशों के शासकों ने अपनी नीतियों के लिए जनता का दमन किया, उन देशों में फ़ोर्ड फ़ाउण्डेशन ने जनहित क़ानून के निर्माण की दिशा में ख़ूब काम किया। मुक़दमेबाजी से सम्बन्धित ढेर सारे संगठन उठ खड़े हुए जैसे – विमेंस लॉ फ़ण्ड, एनवायरमेण्टल डिफ़ेंस फ़ण्ड, नेचुरल रिसोर्सेज डिफ़ेंस काउंसिल आदि-आदि। ‘अमेरिकी वॉच’ जैसे संगठन दमन-उत्पीड़न, भ्रष्टाचार, मानवाधिकारों के उल्लंघन पर पैनी निगाह रखने लगे और जनता में इस विचार को स्थापित करने का काम करने लगे कि विद्रोह मूर्ख शासकों की नीतियों का परिणाम होते हैं। लुब्बेलुबाब यह कि जिन्होंने पर्यावरण को तबाह किया उनके द्वारा खड़े किये एनजीओ ने पर्यावरण पर चीख़ना-चिल्लाना शुरू किया, जिन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुँध दोहन किया उनके ट्रस्टों ने प्राकृतिक संसाधनों की हिफ़ाज़त का रोना रोया, जिन्होंने अपने मुनाफ़े के लिए जनता का दमन और क़त्लेआम किया उनके स्वयंसेवी संगठन मानवाधिकारों के पैरोकार हो गये।

अब आप ख़ुद सोचिए कि देशी-विदेशी फ़ण्डिंग एजेंसियों, सरकारों आदि से लाखों-करोड़ों का अनुदान प्राप्त करने वाली इन संस्थाओं की राजनीति क्या है? क्या कारण है कि ये संस्थाएँ तीसरी दुनिया के उन देशों में सबसे ज़्यादा सक्रिय हैं, जहाँ क्रान्तिकारी परिवर्तन की सम्भावनाएँ मौजूद हैं? अपने चेहरे पर मानवीय मुखौटा लगाये हुए ये पूँजी के मालिकों के गुलाम हैं जो यह नहीं चाहते कि जनता एकजुट होकर उनकी बनी-बनायी व्यवस्था को नेस्तनाबूद कर दे। ये जनता को टुकड़ों-टुकड़ों में बाँटकर उसकी वर्गीय एकजुटता को तोड़ने का काम करते हैं। इसके साथ ही ये क्रान्तिकारी बनने की सम्भावना से लैस नौजवानों को सुधारवाद की घुट्टी पिलाकर उन्हें वेतनभोगी समाज-सुधारक बना देते हैं। एनजीओ के इस ख़तरनाक साम्राज्यवादी कुचक्र को समझने और उसे बेनक़ाब करने की आज सख्त ज़रूरत है।

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2019


 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन

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