चुनाव ख़त्म, मज़दूरों की छँटनी शुरू

बिगुल संवाददाता

“मज़दूर नं. 1” की सरकार दोबारा बनते ही बड़े पैमाने पर मज़दूरों की छँटनी का सिलसिला शुरू हो गया है। अर्थव्यवस्था का संकट जिस क़दर गहरा है, उसे देखते हुए यह तय लग रहा है कि आने वाले समय में छँटनी की तलवार मज़दूरों की और भी बड़ी आबादी पर गिरेगी। मुनाफ़े की गिरती दर के संकट से सारी कम्पनियाँ अपनी लागत घटाने के दबाव में हैं, और ज़ाहिर है कि इसका सबसे आसान तरीक़ा है मज़दूरी पर ख़र्च होने वाली लागत में कटौती करना। किसी एकताबद्ध और जुझारू मज़दूर आन्दोलन के अभाव में पूँजीपतियों के लिए ऐसा करना बेहद आसान हो गया है। जब चाहे मज़दूरों को निकाल बाहर करने के उनके “अधिकार” के रास्ते से हर बाधा को हटाने में सरकारें पूरी मुस्तैदी से जुटी हुई हैं। जब बाज़ार में माँग हो तब मनचाहे तरीक़े से मज़दूरों को काम पर रखो, और जब माँग घटने लगे तब मनमाने तरीक़े से मज़दूरों की छुट्टी कर दो। इसे ही कहते हैं ‘हायर एण्ड फ़ायर’ की नीति जिसे सुगम बनाने में पिछली तमाम सरकारें लगी रही हैं। मोदी सरकार ने इसके लिए रही-सही क़ानूनी अड़चनों को भी ख़त्म कर दिया है।

चुनाव के तुरन्त बाद रिलायंस जियो और बीएसएनएल, यानी देश की सबसे बड़ी निजी टेलीकॉम कम्पनी और सबसे बड़ी सरकारी टेलीकॉम कम्पनी ने हज़ारों मज़दूरों को सड़क पर धकेलकर इसकी शुरुआत कर दी है। इसके अलावा, देश की सबसे बड़ी कार कम्पनी मारुति और उसकी वेण्डर कम्पनियों में भी छँटनी चालू हो गयी है।

रिलायंस जियो ने 5000 को निकाला

मोदी के मालिक नं. 1 मुकेश अम्बानी की कम्प‍नी जियो ने एक झटके में अपने 5,000 कर्मचारियों को बाहर कर दिया है जिनमें करीब 600 परमानेण्ट और बाक़ी कॉण्ट्रैक्ट पर थे। इनमें दफ़्तर के कर्मचारियों से लेकर तकनीकी कर्मचारी तक शामिल हैं। जियो के कर्मचारियों का कहना है कि मैनेजरों को हर जगह कर्मचारियों की संख्या कम करने के लिए कह दिया गया है। यानी छँटनी की यह मार अभी रुकने वाली नहीं है।

जियो में लगभग 20,000 कर्मचारी काम करते हैं। इसके अलावा इससे बहुत बड़ी संख्या ऐसे कामगारों की है जो काम तो जियो के लिए करते हैं लेकिन वे थर्ड-पार्टी यानी किसी और कम्पनी के कर्मचारी हैं जिसका जियो के साथ कॉण्ट्रैक्ट है। सभी कम्पनियों की तरह अब टेलीकॉम में भी कुल पूँजी का बेहद छोटा हिस्सा मज़दूरों पर ख़र्च होता है। माना जाता है कि टेलीकॉम कम्पनियों में 5-6 प्रतिशत लागत कर्मचारियों पर ख़र्च होती है लेकिन संकट आते ही सबसे पहले इसी पर कुल्हाड़ा चलाया जाता है। लाखों-करोड़ों में तनख़्वाहें उठाने वाले ऊँचे अफ़सरों के वेतन में या अम्बानी और लग्गू-भग्गुओं की आलीशान ज़िन्दगी में कोई कमी नहीं आती। नीता अम्बानी अब भी रोज़ सुबह ढाई लाख रुपये की चाय सुड़कती होगी, भले ही जियो के हज़ारों कर्मचारियों के घरों में चूल्हा जलना बन्द हो जाये।‍

सितम्बर 2016 में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की फ़ोटो वाले विज्ञापनों के साथ बाज़ार में उतरने वाली जियो ने सरकारी कृपा से भारी डिस्काउण्ट वाली दरों के चलते बाज़ार के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया और तीन साल से भी कम समय में 30 करोड़ से ज़्यादा ग्राहक बना लिये। टेलीकॉम बाज़ार के 31 प्रतिशत हिस्से पर कम्पनी का क़ब्ज़ा हो गया है और पिछले वित्तीय वर्ष की चौथी तिमाही में इसने 840 करोड़ रुपये का मुनाफ़ा कमाया जबकि वोडाफ़ोन और एअरटेल जैसी कम्पनियाँ भारी घाटे में हैं।

हालाँकि पूँजीवादी खेल के नियम ऐसे हैं और उसमें इतना झूठ-फ़रेब और परदेदारी है कि सच का पता लगाना बहुत मुश्किल होता है। जैसे, जियो के मुनाफ़े के दावों को ही ले लीजिए। एक तरफ़ यह कम्पनी सैकड़ों करोड़ का मुनाफ़ा पीट रही है, दूसरी तरफ़ 31 मार्च 2019 तक इस पर कुल क़र्ज़ बढ़कर 67,000 करोड़ हो गया था। पर निश्चिन्त रहिए, जियो के फ़्री डेटा के चक्कर में अपनी सुधबुध खो बैठे देशवासियों से ही इसकी भी वसूली होगी।

बीएसएनएल के 30 प्रतिशत ठेका कर्मचारियों को निकालने का फ़रमान जारी

लोकसभा चुनाव के दौरान ही यह ख़बर आयी थी कि मोदी सरकार की उपेक्षा और बदइन्तज़ामी के कारण घाटा झेल रहे बीएसएनएल के 56,000 कर्मचारी निकाले जायेंगे। चुनाव में मोदी की छवि पर कोई आँच न आये, इसलिए ख़बर दबा दी गयी। लेकिन चुनाव नतीजे आने के दो हफ़्ते के भीतर यह आदेश आ गया कि बीएसएनएल के सभी सर्कलों से 30 प्रतिशत ठेका कर्मियों को निकाल बाहर किया जाये। ऐसे कर्मचारियों की संख्या हज़ारों में है। सभी जानते हैं कि पिछले तीन दशकों के दौरान प्राइवेट कम्पनियों में ही नहीं, सरकारी कम्पनियों और विभागों में भी बड़े पैमाने पर ठेकाकरण हुआ है और तकनीकी कामों से लेकर दफ़्तरी कामों तक में नयी स्थायी भर्तियाँ नाममात्र की हुई हैं। ज़्यादा से ज़्यादा काम ठेका और कैज़ुअल कर्मियों से कराया जा रहा है। अब छँटनी की गाज भी सबसे पहले इन्हीं पर गिर रही है। हालाँकि स्थायी कर्मचारी भी बहुत निश्चिन्त न रहें। मोदी सरकार बीएसएनएल में वीआरएस लेकर आ रही है और अच्छी-ख़ासी संख्या में पुराने कर्मियों को रिटायरमेण्ट की पर्ची पकड़ाकर बाहर का रास्ता दिखाया जाने वाला है। बीएसएनएल यूनियन के मुताबिक़ यह निजीकरण की दिशा में एक क़दम है।

जिन कॉण्ट्रैक्ट कर्मियों को बाहर किया जा रहा है उन्हें महीनों से तनख़्वाह भी नहीं मिली है। पूरे देश में लगभग पाँच महीने से कॉण्ट्रैक्ट कर्मियों का वेतन भुगतान रुका है। पश्चिम उत्तर प्रदेश सर्कल में 10-11 महीने से और पूर्वी उत्तर प्रदेश सर्कल में तो एक साल से उन्हें वेतन नहीं मिला है। ये ठेका कर्मचारी विभिन्न ठेका कम्पनियों और छोटे ठेकेदारों के ज़रिये काम पर रखे जाते हैं। लेकिन इन्हें वेतन और अन्य भत्ते आदि बीएसएनएल ही देती रही है। लेकिन पिछले कई महीनों से मैनेजमेण्ट कॉण्ट्रैक्टरों से कह रहा है कि वित्तीय संकट के कारण उसके पास पैसे ही नहीं हैं। नये टेण्डर नहीं दिये जा रहे हैं। जो काम चल रहे हैं, उनके पूरा होते ही उन पर काम कर रहे मज़दूरों की भी छुट्टी कर दी जायेगी।

मोदी सरकार एक तरफ़ जियो के लिए तोहफ़े पर तोहफ़े लुटाये जा रही है – कई राज्यों में बाक़ायदा सरकारी आदेश जारी करके सरकारी कर्मचारियों से कहा गया है कि उनको जियो का ही कनेक्शन लेना है – दूसरी ओर बीएसएनएल का दाना-पानी बन्द करके उसे मौत की नींद सुलाया जा रहा है ताकि बाद में उसकी सारी ज़मीन-जायदाद भी जियो के हवाले की जा सके। इस वर्ष मार्च में, पहली बार ऐसा हुआ कि अपने 1.68 लाख नियमित कर्मचारियों को वेतन देने के लिए जियो के पास पैसे ही नहीं थे। बड़ी मुश्किल से एक महीने बाद मामला हल हुआ। जनवरी 2018 में संचार राज्य मन्त्री मनोज सिन्हा ने घोषणा की थी कि बीएसएनएल को 4जी स्पेक्ट्रम आवंटित किया जायेगा जिसके बिना मैदान में टिकना उसके लिए असम्भव है। लेकिन उसे अब तक 4जी स्पेक्ट्र्म नहीं मिला। दूसरी ओर, संचार मन्त्री रविशंकर प्रसाद बेशर्मी से बयान देते हैं कि बीएसएनएल को प्रतिस्पर्धी बनना होगा।

कारों की बिक्री में भारी गिरावट, बड़े पैमाने पर छँटनी शुरू

आर्थिक संकट के गहराने का एक बड़ा संकट ऑटोमोबाइल उद्योग की ख़स्ता हालत है। पिछली मई में कारों की कुल बिक्री में पिछले साल के मुक़ाबले 20.55 प्रतिशत और उत्पादन में 12.23 प्रतिशत की भारी गिरावट आयी। देश की सबसे बड़ी कार कम्पनी मारुति सुज़ुकी ने पिछले करीब 3 महीने में अपना उत्पादन लगभग 39 प्रतिशत कम कर दिया। इसकी कारों की बिक्री में भी भारी गिरावट आयी है और कम्पनी के पास अनबिकी कारों का बड़ा ज़खीरा इकट्ठा हो गया है। मारुति ने अपनी डीज़ल कारों का उत्पादन अप्रैल 2020 से बन्द कर देने का भी ऐलान किया है।

इसका नतीजा भी जल्दी ही सामने आ गया। ऑटोमोबाइल उत्पादन के देश के सबसे बड़े केन्द्र गुड़गाँव-मानेसर इलाक़े में मारुति के तीनों कारख़ानों और उसके लिए पार्ट्स बनाने वाली वेण्डर कम्पनियों में बड़े पैमाने पर छँटनी होनी शुरू हो गयी है। गुड़गाँव-मानेसर क्षेत्र में मारुति की करीब 400 वेण्डर कम्पनियाँ हैं और करीब 75 वेण्डर कम्पनियाँ गुजरात में हैं। मारुति से ऑर्डर में कमी आते ही लगभग इन सभी ने अपने यहाँ छँटनी शुरू कर दी है।

मारुति के पार्ट्स बनाने वाली मानेसर की बेलसोनिका कम्पनी ने अपने सारे कैज़ुअल कर्मचारियों को निकाल दिया है। अगले चरण में करीब 200 और मज़दूरों को निकालने की तैयारी है। मारुति, होण्डा, हीरो आदि के लिए इलेक्ट्रिक पार्ट्स बनाने वाली मानेसर की डेंसो कम्पनी ने मई में सैकड़ों मज़दूरों को निकाल दिया। बिना किसी क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किये कम्पनी के गेट पर छँटनी की लिस्ट दे दी गयी और मज़दूरों को गेट से ही वापस कर दिया गया। मज़दूरों से कह दिया गया उनकी एक महीने की तनख़्वाह उनके खाते में डाल दी गयी है और अब उनको आने की ज़रूरत नहीं है। ये वे मज़दूर थे जो डेंसो में 3-4 वर्षों से काम कर रहे थे। कहने की ज़रूरत नहीं कि इस अँधेरगर्दी पर भी श्रम विभाग के कानों पर जूँ नहीं रेंगी।

गुड़गाँव और मानेसर में मारुति के तीन कारख़ानों में लगभग 35 हज़ार मज़दूर काम करते हैं जिनमें करीब साढ़े छह हज़ार मज़दूर परमानेण्ट हैं और बाक़ी टेम्परेरी, कैज़ुअल, ट्रेनी या अप्रेण्टिस हैं। अभी कम्पनी के लिए स्थायी मज़दूरों को तो निकालना आसान नहीं है, लेकिन टेम्परेरी, कैज़ुअल, ट्रेनी और अप्रेण्टिस मज़दूरों को कम किया जा रहा है।

गुड़गाँव से लेकर धारूहेड़ा और बावल तक के औद्योगिक क्षेत्र में करीब दो दर्जन कम्पनियों में छँटनी और तालाबन्दी हो चुकी है। अब आने वाले महीनों में यह सिलसिला और तेज़ होगा।


 

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