हरियाणा विधानसभा चुनाव का परिणाम और प्रदेश की जनता के सामने उपस्थित नयी चुनौतियाँ

– भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI), हरियाणा इकाई

हरियाणा के विधानसभा चुनाव नतीजे आ चुके हैं। प्रदेश में एक बार फिर से भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन चुकी है। भाजपा बहुमत से दूर थी लेकिन जजपा (जननायक जनता पार्टी) ने भाजपा को समर्थन देकर सत्ता तक पहुँचाया। संघियों को नाथ घालने के दमगजे भरने वाला दुष्यन्त चौटाला अमित शाह के हाथों ख़ुद ही नाथ घलाकर बैठ गया है। मुद्दे की बात यह है कि हरियाणा में भाजपा-जजपा की गठबन्धन सरकार बन गयी है।

हालाँकि भाजपा और दलाल मीडिया के 75 सीटें पार करने के सभी दावे धूल-धूसरित हो गये हैं और हरियाणवी में कहें तो ‘संघियों के कड़ तळे की माट्टी लिकड़गी है’। जनता में भाजपा के प्रति ज़बर्दस्त ग़ुस्सा तो था किन्तु प्रदेश के पैमाने पर कोई विकल्प उपस्थित न होने की वजह से इस या उस वोट के व्यापारी का दाँव लगना ही था। 90 विधानसभा सीटों में से भाजपा को 40, कांग्रेस को 31, जजपा (जननायक जनता पार्टी) को 10, इनेलो (इण्डियन नेशनल लोकदल) को एक, हलोपा (हरियाणा लोकहित पार्टी) को एक तथा निर्दलीय विधायकों को सात सीटें मिली हैं। 90 विधायकों में से 12 आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं जिनकी संख्या पिछले सत्र में 9 थी। वहीं इस बार 90 में से 84 विधायक करोड़पति हैं, पिछले सत्र में इनकी संख्या 75 थी।

विभिन्न चुनावबाज़ पार्टियों के लिए ये चुनाव परिणाम दुखद या सुखद हो सकते हैं किन्तु प्रदेश की जनता के लिए नयी-नयी आफ़तें रास्ता तलाश रही हैं। पिछले पाँच साल के दौरान भाजपा ने लूट, झूठ और दमन के जो नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं उन्हें चार चाँद लगना लगभग तय है। चूँकि स्पष्ट बहुमत नहीं होने के चलते विधानसभा में विभिन्न जन-विरोधी बिल पास करने और जन-विरोधी क़ानून बनाने में हुड्डा एण्ड कम्पनी के ज़ुबानी जमाख़र्च (हालाँकि देश स्तर पर कांग्रेस द्वारा सभी दमनकारी क़ानूनों व संशोधनों में मोदी सरकार को मौन या मुखर समर्थन के इतिहास को देखते हुए इसकी उम्‍मीद भी कम ही है) के चलते भाजपा को थोड़ी सी दिक़्क़त हो सकती है किन्तु बुनियादी नीतियों में कोई फ़र्क़ न होने के कारण प्रदेश की जनता पर दुख-तकलीफ़ों के पहाड़ टूटना तय है। लुब्बेलुबाब यह है कि पहले की तरह इस बार भी प्रदेशवासियों को अपनी जुझारू-लड़ाकू एकजुट ताक़त पर ही भरोसा करना चाहिए जिसका प्रदर्शन उन्‍होंने पिछले कुछ समय किया भी है।

ईवीएम पर मात्र दो बातें करके आगे बढ़ेंगे। पहली बात, ईवीएम में छेड़छाड़ के अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल के प्रति सशंकित ज़्यादातर का मानना है कि फ़िलहाल इसका सीमित इस्तेमाल होगा क्योंकि फ़ासीवादी अभी कारपोरेट पूँजी व दलाल मीडिया के भरोसे जीत को लेकर आश्वस्त हैं तथा खुल्लमखुल्ला ईवीएम धाँधली से व्यवस्था की विश्वसनीयता भी संकटग्रस्त हो सकती है। लेकिन सामने आये तथ्‍यों से साफ़ लगता है कि इसका इस्तेमाल किया गया है, चाहे सीमित पैमाने पर ही सही। दूसरा, यदि ईवीएम में छेड़छाड़ असम्भव है तो डालने के बाद और गणना करने से पहले वोटों में अन्तर क्यों पाया जाता है? ईवीएम स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर और अन्दर भाजपाई ही क्यों मक्खियों की तरह भिनभिनाते हुए पाये जाते हैं? ईवीएम रखरखाव में इतनी अनियमितताएँ क्यों पायी जाती हैं? ईवीएम पर सवाल उठाने वाले भाजपाई ही अब शान्त क्यों हैं? हरियाणा में 21 अक्टूबर को 70, 75 और 80 सीटों के दावे करने वाला गोदी मीडिया 23 तारीख़ को ईवीएम अनियमितता पकड़े जाने के बाद और अन्य उम्मीदवारों के स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर सख़्त पहरे के पश्चात अचानक 40, 42 और 45 सीटों पर आकर कैसे सिमट गया?

धरा रह गया 75 पार, बड़े-बड़े दिग्गज हुए लाचार!

सरकारी अमला, बिकाऊ गोदी मीडिया, ईवीएम, सीबीआई-ईडी, बेशुमार पैसा और थोक भाव में अन्य पार्टियों के बहरूपियों की ताक़त के बावजूद भी भाजपा बहुमत के 46 के आँकड़े को नहीं छू पायी। मोदी की सात रैलियों, शाह की पाँच रैलियों, जे. पी. नड्डा की तीन, खट्टर की 77, राजनाथ सिंह की नौ, नितिन गडकरी की एक, हेमा मालिनी की नौ, सन्नी देओल की चार जनसभाओं और झूठे वायदों, जाति-पाति की राजनीति के बावजूद 75 पार के दावे करने वाले कमलगट्टे 40 पर ही टाँय-टाँय फिस्स हो गये। हरियाणा खट्टर कैबिनेट के दस में से आठ मंत्री चारों खाने चित्त हो गये। इन तथाकथित कद्दावर नेताओं में वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु, कृषि मंत्री ओम प्रकाश धनखड़, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला, शिक्षा मंत्री रामबिलास शर्मा, परिवहन मंत्री कृष्ण लाल पंवार, महिला एवम बाल विकास मंत्री कविता जैन, सहकारिता मंत्री मनीष ग्रोवर, समाज कल्याण मंत्री कृष्ण कुमार बेदी, खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री करुण देव काम्बोज के नाम शुमार हैं। लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने 79 विधानसभा सीटों पर बढ़त ली थी। उसके बाद धारा 370 भी हट गयी, फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद भी अपनी बुलन्दियों को छू गया, बिना पर्ची-ख़र्ची के नौकरी देने के झूठ का भी ख़ूब यशोगान हुआ, तथाकथित ईमानदार सरकार के भी ख़ूब नगाड़े बजे किन्तु भाजपाइयों को बढ़त मिली मात्र 40 सीटों पर। इससे इतना तो ज़ाहिर है कि भाजपा सरकार जनता में बेहद अलोकप्रिय हो चुकी है और हाँफते-काँपते, ईवीएम धाँधली और वोटों की ख़रीद-फ़रोख्‍़त के बाद 40 के आँकड़े तक ही पहुँच पायी है।

सरकार बनाने के खेल की रेलमपेल!

भाजपा नेतृत्व बहुमत हासिल करने के लिए अभी तीन-तिकड़में शुरू करता कि उससे पहले ही जजपा गठबन्धन हेतु तैयार मिली। कर्नाटक और गोवा के अनुभव से साफ़ है कि भाजपा सत्ता के लालच में किसी भी हद से गुज़र सकती है। वैसे छः निर्दलीय विधायकों को सीधा करना अमित शाह के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी किन्तु उप-मुख्यमंत्री और कुछ अन्य पदों-कुर्सियों के लालच ने चौटाला ख़ानदान के नये चिराग़ दुष्यन्त को 10 विधायकों के साथ खट्टर के चरणों में पहले ही पहुँचा दिया। विधायकों की बोली लगने, पद और कुर्सी के चक्कर में पाला बदल लेने के मामले पूरे देश में ही सुर्खि़यों में रहते हैं किन्तु आयाराम-गयाराम की अवसरवादी राजनीति में हरियाणा अपना विशिष्ट स्थान रखता है।

प्रदेशवासियों को सशक्त पूँजीवादी विपक्ष नहीं बल्कि सशक्त क्रान्तिकारी विकल्प चाहिए!

चुनाव परिणाम आते ही हरियाणा प्रदेश के लिबरल, “समझदार” और सामाजिक जनवादी या संशोधनवादी कम्युनिस्ट कांग्रेस के सलाहकार की भूमिका में आ गये और ‘काश’ लगा-लगाकर नसीहतों की बारिश करने लगे। जैसे काश हुड्डा को कुछ पहले कमान मिल गयी होती, काश कांग्रेसी थोड़ा और ज़मीन से जुड़ गये होते, काश जनता थोड़ी और समझदारी दिखाती, काश दुष्यन्त और हुड्डा गलबहियाँ कर लेते, काश दुष्यन्त भाजपा का दामन न थामता आदि-आदि। इनके सभी ‘काश’ पूरे हो जाते और भाजपा हरियाणा में चुनाव हार भी जाती तब भी न तो फ़ासीवाद का ख़तरा कम होना था और न ही कोई अन्य वैकल्पिक सरकार जनता के जीवन में ख़ुशहाली लाने वाली थी। राजस्थान की गहलोत सरकार और मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार की कारगुज़ारियों के बाद किसी शक-शुबहे की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। फ़ासीवाद को चुनावों से नहीं हराया जा सकता क्योंकि वह सत्‍ता में रहे न रहे, आम जनता व ख़ासकर मज़दूर वर्ग का चरम शत्रु बना रहता है। यह बात सच है कि धुर-फ़ासीवादी पार्टी की बजाय कोई भी दूसरी ताक़त सत्ता में आती है तो जनता के लिए स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर होती है और उसे कुछ तात्‍कालिक राहतें मिलने की कुछ गुंजाइश होती है। साथ ही जनता की अगुवा शक्तियाँ आगामी संघर्षों की तैयारी करने के मद्देनज़र भी अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में होती हैं, हालाँकि नवउदारवाद के दौर में कांग्रेस जैसी सेण्‍टर-राइट पूँजीवादी पार्टी के बारे में भी गुलाबी सपने बुनना जनता की क्रान्तिकारी अगुवा ताक़तों के लिए घातक होगा। लेकिन सुधारवादी और  सामाजिक जनवादी सलाहकारों के ‘काश’ और आहों-कराहों में यह सोच झलकती है कि भाजपा की बजाय कोई दूसरी शक्ति के सत्ता में आने से सभी बीमारियों का इलाज हो जाना था। पूँजीवाद-साम्राज्यवाद के मौजूदा उदारीकरण के दौर में सरकार चाहे किसी की भी बने यह बात तय है कि उदारीकरण-निजीकरण की रफ़्तार में कोई गुणात्मक फ़र्क़ नहीं आना है।

आज जनता का सही विकल्प ऐसी ताक़त ही हो सकती है जो न केवल सड़क के संघर्षों को एक सूत्र में पिरो सके और पूँजीवादी चुनावों व संसद-विधानसभा के मंचों पर प्रभावी रणकौशलात्मक हस्तक्षेप कर पूँजीवादी व्‍यवस्‍था के सीमान्‍तों को उजागर कर सके बल्कि मौजूदा व्यवस्था की सीमाओं को इंगित करते हुए एक नयी व्यवस्था का मॉडल और उसे हक़ीक़त में तब्‍दील करने का क्रान्तिकारी रास्ता भी कमेरे वर्गों के सामने रख सके। आरडब्‍ल्‍यूपीआई इसी सोच के साथ पिछले 10 माह से पूँजीवादी चुनावों में मज़दूरों, मेहनतकशों व ग़रीब किसानों के स्‍वतंत्र स्‍वर को पेश करने के प्रयास की शुरुआत कर चुकी है। हरियाणा विधानसभा चुनावों में आरडब्‍ल्‍यूपीआई ने कलायत की सीट से अपने उम्‍मीदवार प्रवीन कुमार को खड़ा किया था।

हरियाणा प्रदेश की जनता के सामने उपस्थित चुनौतियाँ और कार्यभार

चुनावों में अवसरवाद-धनबल-बाहुबल का ही बोलबाला है। लेकिन यदि चुनाव बिल्कुल साफ़-सुथरे हों तो भी चुनी गयी कोई भी सरकार पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी से ज़्यादा कुछ नहीं होती। केवल अपवादस्‍वरूप स्थिति में ही कोई क्रान्तिकारी शक्ति पूँजीवादी चुनावों में विजयी हो सकती है, हालाँकि इससे भी समाज के क्रान्तिकारी रूपान्‍तरण की प्रक्रिया नहीं पूरी होती। आरडब्ल्यूपीआई का यह स्पष्ट मानना है कि वर्ग संघर्ष के हर मोर्चे और समाज के हर राजनीतिक क्षेत्र में मेहनतकश जनता के स्‍वतंत्र पक्ष की उपस्थिति ज़रूरी है चाहे वह संसद-विधानसभा का ही मंच क्यों न हो। संसद और विधानसभा चूँकि पूँजीवादी-जनवादी क़ानून बनाने वाली संस्थाएँ हैं इसलिए उनके चुनावों तथा उनके मंच पर मेहनतकशों-मज़दूरों के स्‍वतंत्र पक्ष की मौजूदगी के ज़रिये ही पूँजीवादी जनवाद के सीमान्‍तों को उजागर किया जा सकता है। लेकिन आरडब्‍ल्‍यूपीआई की क्रान्तिकारी गतिविधियाँ मुख्‍य तौर पर इस चुनावी संघर्ष से नहीं बल्कि जनता के क्रान्तिकारी जनान्‍दोलनों व वर्ग संघर्ष से निर्धारित होती हैं और चुनावों व संसद-विधानसभा के मंच पर होने वाला संघर्ष भी इसी क्रान्तिकारी वर्ग संघर्ष व जनान्‍दोलनों से निर्धारित होता है व इसके मातहत होता है।

रोडवेज़ के निजीकरण का मुद्दा हो या कॉलेजों की बढ़ी हुई फ़ीसों का, निजीकरण का मुद्दा हो या ठेकाकरण का, सरकारी भ्रष्टाचार हो या नौकरशाही का भ्रष्टाचार, ग़रीब किसानों की लूट हो या मज़दूरों-कर्मचारियों का दमन-शोषण, दलितों के उत्पीड़न-शोषण के मामले हों या स्त्रियों का उत्पीड़न, हरियाणा की जनता ने पग-पग पर सड़कों के संघर्षों में सरकार के नाक में नकेल डालने के प्रयास किये हैं। लाठी-गोली-आँसू गैस-झूठे मुक़दमों के बावजूद मज़दूरों, कर्मचारियों, किसानों, छात्रों, युवाओं, स्त्रियों समेत कमेरों के संघर्षों की बदौलत भाजपा को न केवल कई-कई बार झुकना पड़ा बल्कि कई जनविरोधी फ़ैसले भी बैरंग हुए हैं। अब भी हरियाणा की जनता को अपनी एकजुटता पर ही भरोसा करना चाहिए। साथ में हमें अपना स्वतंत्र क्रान्तिकारी राजनीतिक विकल्प भी खड़ा करना होगा तथा मज़बूत करना होगा जिसमें हम पहले ही बहुत देर कर चुके हैं। एक ऐसा विकल्प जो सड़कों से लेकर संसद तक के संघर्षों में मेहनतकश जनता के हितों की नुमाइन्दगी कर सके। भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) जनता का ऐसा ही विकल्प बनने के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) ने हरियाणा में एक सीट से अपने उम्मीदवार को खड़ा किया था। कलायत विधानसभा क्षेत्र से साथी प्रवीन कुमार कमेरे पक्ष के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ रहे थे। बेहद सीमित संसाधनों और कम समय के प्रचार के बावजूद हमें 512 मत प्राप्त हुए हैं। ये राजनीतिक वोट हैं, जो आरडब्‍ल्‍यूपीआई के कार्यक्रम व विचारधारा के आधार पर दिये गये हैं। पूँजीवादी चुनावों में समर्थन के मतों में रूपान्तरित होने के पीछे बहुत से पहलू काम कर रहे होते हैं, जैसे जातिवाद, धनबल, बाहुबल आदि, जिन्‍हें जनता की राजनीतिक वर्ग चेतना के स्तरोन्‍नयन के साथ ही ख़त्‍म किया जा सकता है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस दौरान हम विधानसभा के लाखों लोगों तक जनता का क्रान्तिकारी एजेण्डा और कमेरे तबक़ों के असली मुद्दे ले जाने में कामयाब रहे हैं। सड़क के हमारे संघर्ष आगे भी लड़े जाते रहेंगे तथा जनता का स्‍वतंत्र राजनीतिक पक्ष खड़ा करने का हमारा प्रयास भविष्य में भी जारी रहेगा।

मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2019


 

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