राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2019 : शिक्षा के नग्न बाज़ारीकरण का घोषणापत्र

– अविनाश

आख़िरकार लम्बे समय से जारी लुकाछिपी का खेल 1 जून 2019 को ख़त्म हो गया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के चार ड्राफ़्ट और हज़ारों जन सुझावों को हज़मकर चुप्पी मारकर बैठ जाने वाली मोदी सरकार ने लोक सभा चुनाव के नतीजे आने के बाद अचानक कस्तूरीरंगन कमेटी द्वारा तैयार नयी शिक्षा नीति की रिपोर्ट सार्वजानिक कर दी। समानता, रचनात्मकता, सृजनात्मकता, स्वायतता, जनवाद, जैसे ढेरों शब्दों की भरमार वाला यह ड्राफ़्ट देखने में बहुत ‘क्रान्तिकारी’ लगता है लेकिन असल में इन शब्दों की चाशनी में लपेटा गया यह ड्राफ़्ट शिक्षा में फ़ासीवादी एजेण्डे को अमली जामा पहनाने का दस्तावेज़ है।

नयी शिक्षा नीति के ड्राफ़्ट में चालाकी दिखाते हुए शिक्षा के ख़र्च के आधार को ‘जीडीपी’ से बदल कर ‘सरकारी ख़र्च (बजट)’ करने की सिफ़ारिश की गयी है। जिसे आज वर्तमान सरकारी ख़र्च के दस प्रतिशत और आने वाले सालों में बढ़ाकर बीस प्रतिशत करने की बात की जा रही है, लेकिन आधार बदलने से यह ख़र्च पहले से भी कम हो जायेगा।

नयी शिक्षा नीति का यह ड्राफ़्ट बात तो बड़ी-बड़ी कर रहा है किन्तु इसकी बातों और इसमें सुझाये गये प्रावधानों में विरोधाभास है। यह ड्राफ़्ट शिक्षा में ग़ैर-बराबरी के आंकड़े पेश करता है कि पहली कक्षा से 12वीं में आते-आते दलितों का प्रतिनिधित्व 17% से घटकर 10% और मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व 15% से घटकर 7% रह जाता है, लेकिन जिन नीतियों से यह ग़ैर-बराबरी पैदा हुई है उसको और मज़बूत करने की कोशिश करता है। एक तरफ़ यह ड्राफ़्ट बदहाल सरकारी शिक्षा का रोना रोता है लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में प्राइवेट स्कूलों द्वारा चल रही भयानक लूट को ख़त्म कर सबके लिए एक सामान व निःशुल्क सरकारी शिक्षा व्यवस्था लागू करने की जगह यह प्रस्ताव देता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कंप्यूटर, प्रयोगशाला, पुस्तकालय आदि सुविधाओं से लैस 12वीं तक का एक बड़ा हायर सेकेण्डरी स्कूल काम्प्लेक्स ब्लाक, तहसील या ज़िला मुख्यालयों पर खोला जाये। आस-पास के अन्य स्कूलों को आपस में प्रशासनिक तंत्र के ज़रिये इस कॉम्प्लेक्स से जोड़ा जायेगा। लेकिन यह ड्राफ़्ट यह नहीं बताता कि उन कॉम्प्लेक्सों तक दूर दराज़ के छात्र पहुँचेंगें कैसे? इससे निजी स्कूलों में जो बच्चे पढ़ रहे हैं वो वापस कैसे आयेंगे? ड्राफ़्ट 50 से कम छात्रों वाले सरकारी स्कूलों का विलय करने या बन्द करने की भी सिफ़ारिश करता है। इस सिफ़ारिश को मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में मोदी की अध्यक्षता में नीति आयोग द्वारा 80% सरकारी स्कूल बन्द करने के फ़ैसले से जोड़कर देखना चाहिए। नयोदय विद्यालय, केन्द्रीय विद्यालय समेत राज्य और केन्द्र सरकार के और हर प्रकार के निजी स्कूल यथावत् चलते रहेंगे, लोग अपनी हैसियत के स्कूलों में अपने बच्चों को भेजते रहेंगे।

कस्तूरीरंगन के ड्राफ़्ट के मुताबिक़ स्कूलों में बच्चे सीख नहीं रहे हैं इसलिए बच्चे बीच में पढ़ाई छोड़ दे रहे हैं (इसकी और भी बहुत सी वजहें हैं, जिनका स्थानाभाव के कारण जि़क्र सम्भव नहीं है)। इनको वापस शिक्षा में लेने के लिए जो एजेण्डा यह नीति प्रस्तावित कर रही है वो पूरी तरीक़े से फ़ासीवादी एजेण्डा है जिसके तहत बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और एनजीओ की मदद ली जायेगी। ज़ाहिर है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग अभी सिर्फ़ आरएसएस के पास हैं। इसीलिए यह मसौदा 3 से 6 वर्ष के बच्चों की पूर्व प्राथमिक शिक्षा पर इतना ज़ोर दे रहा है।

आरटीई एक्ट को धता बताते हुए ड्राफ़्ट सिफ़ारिश करता है कि कक्षा 8वीं से नीचे के बच्चों को भी फ़ेल किया जायेगा और फ़ेल होने वाले बच्चों को वोकेशनल स्ट्रीम में डाला जाये जिसमें बच्चों को छोटे-मोटे काम-धन्धे भी सिखाये जायेंगे जिससे पूँजीपतियों को सस्ते मज़दूर मिल सकें और शिक्षा पर ख़र्च भी कम करना पड़ेगा।

उच्च शिक्षा की बात करें तो लोकतंत्र और जनवाद का ढिंढोरा पीटने वाले इस ड्राफ़्ट में इस बात का कहीं ज़िक्र तक नहीं है कि विश्वविद्यालयों में छात्रों का प्रतिनिधित्व करने वाला छात्रसंघ होगा या नहीं। छात्रों का प्रशासन और अध्यापकों के साथ सम्बन्ध कैसा होगा इसकी कोई चर्चा नहीं की गयी है। बल्कि बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स का एक नया तंत्र सुझाया गया है जो विश्वविद्यालय समुदाय के प्रति किसी भी रूप में जवाबदेह नहीं होगा। ज़रूरी नहीं है कि बोर्ड के ये ‘मानिन्द’ लोग शिक्षा से जुड़े लोग ही हों। इस तरह यह दस्तावेज़ कैम्पसों के बचे-खुचे जनवादी स्पेस का भी गला घोंट देता है।

यह मसौदा शिक्षा संस्थानों को शैक्षिक-प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता देने की बात करता है। लेकिन दूसरी तरफ़ ड्राफ़्ट प्रशासनिक केन्द्रीकरण का पुरज़ोर समर्थन भी करता है। कस्तूरीरंगन के मसौदे के अनुसार विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग गठित किया जायेगा, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री (आख़िरी ड्राफ़्ट में शिक्षा मंत्री) करेंगे, और राज्य सरकारों के संस्थानों पर भी केन्द्र का नियंत्रण होगा। आयोग के सदस्यों का चयन भी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक कमेटी करेगी। यानी पूरे देश में केजी से लेकर पीजी तक – पूरी शिक्षा व्यवस्था पर अकेले प्रधानमंत्री का हुक्म चलेगा। रही बात वित्तीय स्वायत्तता की तो उसके लिए सरकार ने विश्वविद्यालय को पूरी छूट दे रखी है कि पूँजीपतियों, बैंकों, देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों आदि से पैसा माँग लें जिसका मूलधन विश्वविद्यालय को इकट्ठा करना होगा और ब्याज़ सरकार भर देगी। ज़ाहिर है कि जो पैसा देगा वह हमारे संस्थानों पर अपनी शर्तें भी थोपेगा। इस संस्थानों में कोर्स, किताबों व शिक्षकों की क़ाबिलियत और शिक्षकों के मापदण्ड के फ़ैसले भी यही पैसा देनेवाले करेंगे, चाहे वे विद्यार्थियों, समाज व देश के हित में हो या न हो। ड्राफ़्ट में यह प्रस्ताव भी है कि सभी संस्थानों को (सरकारी और निजी संस्थान को) बराबरी का दर्जा देने वाले नियम-क़ानून बनाये जायेंगे। मतलब सरकारी संस्थान को जो सुविधाएँ मिलती हैं, वही प्राइवेट संस्थानों को भी मिलनी चाहिए। सरकार इलाहाबाद विश्वविद्यालय को 1000 करोड़ का अनुदान देती है तो ड्राफ़्ट के लागू होने के बाद से एमिटी विश्वविद्यालय को भी यह रक़म देगी। चूँकि देना किसी को नहीं है इसलिए सरकार सरकारी संस्थाओं को भी आने वाले दिनों में अनुदान देना बन्द कर देगी।

आज मज़दूर वर्ग को शिक्षा से बेदख़ल करके फ़ासीवादी एजेण्डा थोपने वाले इस दस्तावेज़ का विरोध करते हुए समान और निःशुल्क शिक्षा का नारा बुलन्द करना होगा।

मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2019


 

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