काकोरी के शहीदों की क़ुर्बानी हमें आवाज़ दे रही है

काकोरी काण्ड के शहीदों और उनके द्वारा स्थापित हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की विरासत को भगतसिंह-आज़ाद और उनके साथियों ने आगे बढ़ाया और आज़ादी के पौधे को उन्हीं की तरह अपने रक्त से सींचा। उन सभी क्रान्तिकारियों का सपना एक ऐसे आज़ाद देश का निर्माण करना था जहाँ ऊँच-नीच, जाति-धर्म, मालिक-मजूर, किसी तरह की ग़ैरबराबरी नहीं होगी। मगर देश के शासक वर्ग एक ख़तरनाक साज़िश के तहत इन शहीदों की क्रान्तिकारी विरासत को धूल व राख के नीचे दबाते रहे हैं। 1947 के बाद से देश की सत्ता में आयी सभी सरकारें इन शहीदों की क्रान्तिकारी विरासत से डरती थीं और उनके विचारों को लोगों तक पहुँचने से रोकती रहीं। आज भूरे साहबों के हाथों देश की जनता जिस भयंकर दुर्दिन को झेल रही है, उसे देखते हुए ज़रूरत इस बात की है कि देश के नौजवान काकोरी के शहीदों और भगतसिंह-आज़ाद जैसे क्रान्तिकारियों द्वारा छेड़ी गयी लड़ाई के परचम को थामकर निर्णायक जंग के लिए आगे बढ़ें। मगर उन्हें जाति-धर्म के नाम पर आपस में एक-दूसरे से लड़ाया जा रहा है।

अशफ़ाक़उल्ला ने लिखा था, “मैं विदेशी शासन को एक बुराई समझता हूँ पर साथ ही मैं किसी ऐसे हिन्दुस्तानी शासन से भी नफ़रत करता हूँ, जिसमें कमज़ोरों को उनके अधिकारों से वंचित किया जायेगा। या फिर उसमें अमीरों और ज़मींदारों का ही बोलबाला होगा। या फिर सरकार के क़ानून गै़रबराबरी और भेदभाव के आधार पर बनाये जायेंगे।”

आम जनता इन समस्याओं के ख़िलाफ़ न लड़ सके इसके लिए कभी ‘लव जिहाद’ कभी गाय, कभी मन्दिर-मस्जिद तो कभी नागरिकता के नाम पर जनता को आपस में लड़ाने का खेल खेलकर अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो-राज करो’ की नीति को वे लोग आज बख़ूबी आगे बढ़ा रहे हैं जो अंग्रेज़ी राज के समय से इसी गन्दे खेल में लगे रहे हैं। जब इस देश के सभी धर्मों के क्रान्तिकारी नौजवान आज़ादी के लिए हँसते-हँसते जान पर खेल रहे थे, तब आरएसएस और हिन्दू महासभा जैसे संगठनों के लोग अंग्रेज़ों की मुख़बिरी कर रहे थे, जनता को हिन्दू-मुसलमान के नाम पर आपस में बाँट रहे थे और माफ़ीनामे लिखकर अंग्रेज़ हुकूमत से पेंशन ले रहे थे। काकोरी काण्ड के शहीद ऐसी साज़िशों को बख़ूबी समझते थे। फाँसी पर लटकाये जाने से सिर्फ़ तीन दिन पहले लिखे ख़त में अशफ़ाक़उल्ला ने देशवासियों को आगाह किया था कि “सात करोड़ मुसलमानों को शुद्ध करना नामुमकिन है, और इसी तरह यह सोचना भी फ़िज़ूल है कि पच्चीस करोड़ हिन्दुओं से इस्लाम क़बूल करवाया जा सकता है। मगर हाँ, यह आसान है कि हम सब ग़ुलामी की ज़ंजीरें अपनी गर्दन में डाले रहें।”

इसी तरह अशफ़ाक़उल्ला के परम मित्र रामप्रसाद बिस्मिल ने शहादत से पहले जनता के नाम यह वसीयत की थी कि “यदि देशवासियों को हमारे मरने का ज़रा भी अफ़सोस है तो वे जैसे भी हो हिन्दू-मुस्लिम एकता क़ायम करें। यही हमारी आख़िरी इच्छा थी, यही हमारी यादगार हो सकती है।”

इसी माह में 26 दिसम्बर को शहीद ऊधमसिंह का भी जन्मदिवस है। पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम में जन्मे ऊधमसिंह ने पंजाब के गवर्नर रहे माइकल ओ’ड्वायर को लन्दन में 13 मार्च 1940 को गोली मारकर जलियाँवाला बाग़ हत्याकाण्ड का बदला लिया था। उन्होंने भी धर्म के नाम पर जनता को बाँटने की राजनीति का हमेशा विरोध किया। इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आज़ाद रख लिया था।

इन शहीदों की याद हमें हर तरह के कट्टरपन्थ से लड़ने की प्रेरणा देती है। आज़ादी और बराबरी के इन मतवालों को याद करने का मतलब यही हो सकता है कि हम धर्म और जाति के भेदभाव भूलकर इस देश के लुटेरों के ख़िलाफ़ एकजुट हो जायें और इस ख़ूनी निज़ाम को उखाड़ फेंकने की तैयारियों में जुट जायें। आज सभी नौजवानों और आम मेहनतकशों को हमें मज़हब के नाम पर बाँटने और हमारी लाशों पर रोटियाँ सेंकने की साज़िश को समझ लेना होगा। हमें इसका जवाब आपस में फ़ौलादी एकजुटता क़ायम करके और इन्क़लाबी संगठनों में संगठित होकर देना होगा।

मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2019


 

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