एनआरसी लागू नहीं हुआ पर ग़रीबों पर उसकी मार पड़नी शुरू भी हो गयी!
कर्नाटक में सैकड़ों मज़दूरों के घर तोड़े गये, हज़ारों को नागरिकता सिद्ध करने के लिए थाने बुलाया

अमित शाह ने पूरे देश में एनआरसी लागू करने की घोषणा कर दी मगर मोदी ने इसे झूठ बता दिया। रावण दस सिरों से एक साथ बोलता था, मगर एक ही बात बोलता था। भाजपाइयों के अलग-अलग चेहरे अलग-अलग बात बोलते हैं मगर उनका गन्‍दा इरादा एक ही होता है।

सरकार अब कह रही है कि एनआरसी लागू होना ही नहीं है, मगर भाजपा के नेता यहाँ-वहाँ न केवल एनआरसी का डर दिखा रहे हैं, बल्कि कई जगहों पर अभी से अघोषित एनआरसी लागू होना शुरू हो गया है। कहने की ज़रूरत नहीं कि इसकी मार सबसे ज़्यादा ग़रीबों और मज़दूरों पर पड़ रही है।

थाने के बाहर काग़ज़ दिखाने के लिए लाइन में लगे मज़दूर

जनवरी में बेंगलुरु में एक मज़दूर बस्‍ती को बंगलादेशियों की बस्‍ती बताकर उजाड़ दिया गया। मज़दूर बस्ती के ख़िलाफ़ भाजपा सांसद ने शिकायत की थी। बस्‍ती के पास बने आलीशान अपार्टमेंट के लोगों को इन बस्तियों में रहने वाले लोग तो चाहिए थे ताकि वे उनके घरों में कम मज़दूरी पर काम करते रहें, लेकिन जब वे अपनी ऊँची खिड़कियों से बाहर देखते थे तो ग़रीबों की गन्दी बस्तियाँ देखकर उनका मूड ख़राब हो जाता था। इन्हीं लोगों ने जाकर भाजपा सांसद को उकसाया जिसे अपना साम्प्रदायिक‍ एजेण्डा पूरा करने के लिए मुँहमाँगी मुराद मिल गयी। हालाँकि उन सभी मज़दूरों के पास आधार कार्ड, वोटर कार्ड जैसे काग़ज़ात थे लेकिन उनके पास हरे-हरे नोट नहीं थे। सो पुलिस ने उनके काग़ज़ों को देखने की ज़हमत भी नहीं उठायी और सारे घरों को तोड़ दिया।

इसके कुछ ही दिनों बाद कर्नाटक के कोडागु शहर से ख़बर आयी कि पुलिस ने सारे प्रवासी मज़दूरों को दस्तावेज़ दिखाकर अपनी नागरिकता साबित करने को कहा है। वहाँ पाँच हज़ार से भी ज़्यादा असमी बंगाली मज़दूर काम छोड़कर पुलिस थाने पर लाइन लगाकर काग़ज़ दिखाने पर मजबूर हो गये।

पुलिस का कहना था कि अगर मज़दूर ख़ुद आकर काग़ज़ नहीं दिखायेंगे तो फ़रवरी तक छापे मारकर उन्‍हें पकड़ा जायेगा। ये हज़ारों प्रवासी कामगार, जिनमें ज़्यादातर कोडागु ज़‍िले में कॉफ़ी बाग़ानों में कार्यरत थे, पिछली 23 जनवरी को अपने पहचान दस्तावेज़ों के साथ पुलिस के सामने लाइन लगाने को मजबूर हुए।

हालाँकि ज़ि‍ला पुलिस ने दावा किया कि इस अभियान का नागरिकता के मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं था, पर कोडागु में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा कि पूरा अभियान पश्चिम बंगाल और असम के मुस्लिम प्रवासियों को डराने के लिए चलाया गया था।

यह ज़ि‍ला, जो भाजपा और आरएसएस का गढ़ है, संसद में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पारित होने के बाद से ही तनाव में घिरा हुआ है। यहाँ कई ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिनमें संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं ने अपनी ओर से “बंगलादेशी घुसपैठियों” की पहचान करने के नाम पर मज़दूरों को डराया-धमकाया।

21 जनवरी की देर रात को बजरंग दल कार्यकर्ताओं की भीड़ ने नेपोकोलू शहर में एक लॉज में घुसने की कोशिश की, जहाँ लगभग 20 प्रवासी मज़दूर रह रहे थे। लॉज मालिक ने कहा कि भीड़ मज़दूरों को बाहर निकालना चाहती थी। स्थानीय लोगों ने हस्तक्षेप किया और उन्हें इमारत में प्रवेश करने से रोका, वरना कुछ भी हो सकता था।

स्‍थानीय मज़दूर कार्यकर्ताओं के अनुसार, “20 मज़दूरों में से 14 असम के बंगाली मुसलमान थे। इन सभी के पास एनआरसी के क़ानूनी दस्तावेज़ थे। बाक़ी बिहार के थे। लेकिन भीड़ को यह सब जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वे केवल उन्हें निशाना बनाने की कोशिश कर रहे थे क्योंकि वे मुस्लिम थे।

कोडागु में आरटीआई कार्यकर्ता, हारिस अब्दुल रहमान ने कहा कि पुलिस के पास मज़दूरों को बुलाने का कोई क़ानूनी आधार नहीं है और यह कार्रवाई केवल मुसलमानों को डराने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सारे प्रवासी श्रमिक कार्यरत हैं। पुलिस केवल उन क्षेत्रों में ही क्यों जाती है जहाँ मुसलमान मज़दूर ज़्यादा हैं? हमने इसे बेंगलुरु में देखा और अब यह कोडागु में भी हो फैल रहा है।

बेंगलुरु के अपार्टमेंट मालिकों की ही तरह कोडागु के फ़ार्म व बाग़ान मालिक भी चाहते हैं कि ये प्रवासी मज़दूर डरकर रहें। ऐसे में वे मज़दूर के तौर पर अपने वाजिब हक़ की माँग करने की हिम्मत ही नहीं कर पायेंगे।

ये घटनाएँ अभी से संकेत दे रही हैं कि आने वाले दिनों में अगर एनआरसी लागू हो गया तो देश के करोड़ों आम लोगों को किन मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा। नागरिकता साबित करने की इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा शिकार अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी समुदायों के मेहनतकश लोग ही होंगे। उनमें भी जो प्रवासी हैं उनकी ज़ि‍न्दगी तो ग़ुलामों जैसी हो जायेगी।

अभी ही, उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, बंगाल आदि के प्रवासी मज़दूरों के ख़ि‍लाफ़ देश के कई राज्यों में अक्‍सर ही नफ़रत फैलायी जाती है। गुजरात, महाराष्‍ट्र से लेकर पंजाब तक में उन पर हमले किये जाते हैं, उन्‍हें मारा-पीटा और भगाया जाता है। इस सबका मक़सद इन मज़दूरों को डराकर रखना होता है ताकि वे कभी अपने वाजिब हक़ की माँग न कर सकें।

ऐसे में अगर पूरे देश में एनआरसी लागू करने की संघी योजना को रोका नहीं गया तो कल्‍पना की जा सकती है कि ग़रीबों को किस तरह डर-डर कर जीना पड़ेगा। नागरिकता छिन जाने के डर से प्रवासी कामगार सिर झुकाकर मालिकों की मनमानी शर्तों पर काम करने के लिए मजबूर होंगे।

मज़दूर बिगुल, फ़रवरी 2020