‘‘किस्सा-ए-आज़ादी उर्फ 67 साला बर्बादी’’
दिल्ली संवाददाता
आज़ादी की 67वीं वर्षगांठ के अवसर पर करावल नगर में गुरूवार शाम को नौजवान भारत सभा, दिशा छात्र संगठन, बिगुल मज़दूर दस्ता व करावल नगर मज़दूर यूनियन के सयुंक्त बैनर तले एक साँस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
उपरोक्त कार्यक्रम की थीम ‘‘किस्सा-ए-आज़ादी उर्फ 67 साला बर्बादी’’ थी। कार्यक्रम की शुरूआत करते हुए करावलनगर मज़दूर यूनियन के नवीन कुमार ने बताया कि इस कार्यक्रम का मकसद आज़ादी के स्याह पहलुओं को उजागर करना है, उन्हानें बताया कि पिछले 67 वर्षों की आज़ादी की कुल जमा बैलेंस शीट यह है कि देश के समस्त संसाधनों पर मुट्ठीभर लोगों का कब्जा है तथा बहुसंख्यक नागरिक आबादी मूलभूत नागरिक सुविधाओं से भी महरूम है ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि ये किसकी आज़ादी है? कार्यक्रम की शुरूआत इप्टा के क्रान्तिकारी गीत ‘‘तोड़ो बन्धन तोड़ो’’ से हुई। इसके बाद मौजदूा संसदीय व्यवस्था की वास्तविकता को उजागर करते हुए गुरुशरण सिंह का प्रसिद्ध नाटक ‘‘हवाई गोले’’ विहान सांस्कृतिक मंच द्वारा प्रस्तुत किया गया जिसमें देश की संसदीय व्यवस्था व भ्रष्ट राजनेताओं के चरित्र को उजागर करते हुए यह दिखलाया गया कि मौजूदा संसद सिर्फ बहसबाजी का अड्डा बनकर रह गयी है। आगे कार्यक्रम में ‘‘मेहनतकश औरत की कहानी’’ नाटक का मंचन किया गया। जिसके फै़ज़ के गीत ‘‘हम मेहनतकश जगवालों से’’ की प्रस्तुति भी की गयी।
कार्यक्रम में बिगुल मज़दूर दस्ता के अजय ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि 15 अगस्त, 1947 को भारत आज़ाद तो हुआ लेकिन ये आज़ादी देश के चन्द अमीरज़ादों की तिजोरियों में कैद होकर रह गयी है। वास्तविक आज़ादी का अर्थ यह कत्तई नहीं है कि एक तरफ तो भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में अनाज सड़ जाता है वहीं दूसरी तरफ रोज़ाना 9000 बच्चे भूख व कुपोषण से दम तोड़ देते हैं। भगतसिंह के शब्दो में आज़ादी का अर्थ यह कत्तई नहीं था कि गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज आकर देश पर काबिज़ हो जायें। अजय ने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि देश की जनता पिछले 66 सालों के सफ़रनामे से समझ चुकी है कि ये आज़ादी भगतसिंह व उनके साथियों के सपनों की आज़ादी नहीं है जहाँ पर 84 करोड़ आबादी 20 रु. प्रतिदिन पर गुज़ारा करती हो तथा पिछले 15 वर्षों में ढ़ाई लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हों, वहीं संसद-विधानसभाओं में बैठने वाले नेताओं मंत्रियों को ऊँचे वेतन के साथ सारे ऐशो-आराम मिल रहे हों।
सांस्कृतिक कार्यक्रम में आगे क्रान्तिकारी कवि गोरख पाण्डेय का भोजपुरी गीत ‘‘गुलमिया अब नाहीं बजईबो’’ को यूनियन के मज़दूर साथियों ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का समापन करते हुए ‘दिशा छात्र संगठन’ के सनी सिंह ने बताया कि आज आज़ादी का जश्न वे लोग मनायें जिनको इस व्यवस्था ने सारी सुख सुविधाएं आम मेहनतकश जनता की क़ीमत पर मुहैया कराई हैं। देश की बहुसंख्यक छात्र युवा आबादी के लिए वास्तविक अर्थों में आज़ादी एक ऐसे समाज में ही सम्भव है जहाँ उत्पादन, राजकाज व समाज के पूरे ढांचे पर मेहनतकश वर्ग का कब्जा हो। एक ऐसा समाज जो शहीद-ए-आज़म भगतसिंह के सपनों का समाज होगा जिसके लिए लोकस्वराज्य पंचायतों का गठन करते हुए फ़ैसला लेने की ताकत जनता के हाथों में देनी होगी न की मुट्ठीभर धनपतियों के हाथों में, तभी सही मायनों में मुकम्मल आज़ादी आयेगी।
मज़दूर बिगुल, अगस्त 2013















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