कोरोना की आपदा : मालिकों के लिए मज़दूरों की लूट का अवसर

कोरोना काल को एक बार फिर अवसर में तब्दील करते हुए फासीवादी मोदी सरकार मज़दूरों की श्रम-शक्ति की लूट को तेज़ी से लागू कर रही है। कोरोना महामारी में सरकार की बदइन्तज़ामी की वजह से जब एक तरफ़ आम मेहनतकश आबादी दवा-इलाज़ की कमी और राशन की समस्या की दोहरी मार झेल रही है तब ऐसे वक्त में गोवा की सरकार ने मज़दूरों के काम के घण्टे बढ़ाकर उन पर एक और हमला किया है। कोविड-19 का हवाला देते हुए गोवा में भाजपा की सरकार ने मज़दूरों के काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 कर दिये हैं ताकि मालिकों के मुनाफ़े को बरकरार रखा जा सके।
पिछले साल अप्रैल में महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात, राजस्थान व अन्य राज्यों में भी कोरोना माहामारी का हवाला देकर काम के घंटे बढ़ाकर 12 कर दिये गये थे। और तीन महीने तक मज़दूरों को फैक्टरियों में 12-12 घण्टे फैक्टरियों में खटना पड़ा था। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तो तीन साल तक सभी श्रम क़ानूनों को स्‍थगित करने का क़ानून ही ले आयी थी जिसे हाई कोर्ट के दखल के बाद रोकना पड़ा।
मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद मज़दूर-विरोधी नीतियाँ पूरे देशभर में नंगे रूप से लागू की गयी हैं। जो भी बचे-खुचे श्रम कानून थे उन्हें ख़त्म कर चार लेबर कोड ले आये गये हैं जिनका सिर्फ़ एक ही मकसद है—मज़दूरों के पसीने की एक-एक बूँद को सिक्के में ढालकर मालिकों की तिजोरी में भरना। ये क़ानून न सिर्फ़ मज़दूरों की लूट बल्कि उनके संगठित होने के अधिकार पर भी एक बड़ा हमला है। मज़दूरों ने अपना खून बहा कर जो भी अधिकार हासिल किये थे उन्हें तमाम सरकारें पिछले पच्‍चीस वर्षों के दौरान एक-एक करके ख़त्म करती रही हैं। लेकिन मोदी सरकार ने आते ही इसकी रफ़्तार तेज़ कर दी है। इसकी बेशर्मी और मज़दूरों से नफ़रत की इन्तहा यह है क‍ि कोरोना के दौर में, जब मज़दूर की रोज़ी-रोटी छीनी जा रही है, तब भी वह ऐसे क़ानून लाकर अपनी मालिकपरस्ती साबित कर रही है। पूँजीवादी राज्यसत्ता किस प्रकार अपने मालिक वर्ग के प्रति वफ़ादार होती है और मज़दूर-विरोधी होती है, इस बात को इन नीतियों से साफ़ देखा जा सकता है।
पहले से ही आर्थिक मन्दी के दौर से गुज़र रही पूँजीवादी व्यवस्था का संकट कोरोना काल में और गहरा गया है और इसकी भरपाई यह सरकार मज़दूरों की श्रम-शक्ति को निचोड़कर, उनके हक़ों को छीनकर करना चाहती है।
आज मज़दूर वर्ग को अपने हक़ों के लिए एकजुट होना ही होगा, नहीं तो ये पूँजीपति मुनाफ़े की हवस में हमारे ख़ून का आख़िरी कतरा तक निचोड़ लेंगे। साथ ही, हमें फ़ासीवादी ताकतों से लड़ने की तैयारी भी करनी होगी। इतिहास गवाह है कि मज़दूर वर्ग की फ़ौलादी एकता ने ही फासिस्टों को चकनाचूर किया है और आने वाला वक्त भी फासिस्टों के ख़ात्मे का ही होगा। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि सारे मेहनतकश धर्म और जाति के सवालों पर बँटना और आपस में लड़ना छोड़कर अपने हक़ों के लिए एकजुट होने की तैयारी करें।

मज़दूर बिगुल, जून 2021


 

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