देखो संसद का खेला, नौटंकी वाला मेला

मीनाक्षी

संयुक्त संसदीय समिति की माँग को लेकर चली नौटंकी इतनी लम्बी चली कि बसिया भात हो गयी। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर इतनी हाय-तौबा मची मानो कोई नयी बात सामने आ गयी हो। हमारे यहाँ घपले-घोटालों की हालिया फेहरिस्त भी छोटी नहीं है। आदर्श सोसाइटी, बाहर के देशों में जमा काला धन, कॉमनवेल्थ खेल घोटाला तो इस सूची में बिल्कुल ताज़े हैं और इसके साथ 2जी स्पेक्ट्रम की हेरा-फेरी ने साफ कर दिया है नौकरशाहों और नेताओं के साथ अब पूँजीपतियों का ऐसे मामलों में सीधे-सीधे लाभ पाना कितना आसान हो चुका है। ग़ौरतलब है कि सत्ता के गलियारे में दलाली करने वाली नीरा राडिया के साथ हुई रतन टाटा की बातचीत का टेप जब मीडिया ने उजागर कर दिया तो लोगों को लूटकर ईमानदारी का दम भरने वाले इस पूँजीपति ने इसे अमानत में खयानत और निजता में हस्तक्षेप मानकर सरकार को आड़े हाथों लिया। वैसे, अगर आप अपने बेडरूम में ज़नता की सम्पत्ति में सेंधमारी करने की योजना बनाते हैं तो यह कोई निजी मामला नहीं रह जाता है। लेकिन जिस प्रकार आम मेहनतकश ज़नता की सार्वजनिक सम्पत्ति को पूँजीपतियों ने अपनी निजी सम्पत्ति बना लिया है, वैसे ही आम मेहनतकश ज़नता के सार्वजनिक मसलों को भी पूँजीपतियों ने अपने बेडरूमों में डिस्कस होने वाले निजी मसलों में तब्दील कर लिया है।

घोटालों की इस फेहरिस्त में एक और नाम जुड़ गया है, एस बैंड स्पेक्ट्रम घोटाला। इस घोटाले के तहत हुए सौदे को सरकार ने रद्द कर दिया है क्योंकि बड़ी नाक कट रही थी। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। असली सवाल तो यह है कि ऐसा सौदा हुआ कैसे? ये घपले-घोटाले यूँ तो पूँजी की इस व्यवस्था के चर्म रोग हैं पर ये शासन चलाने वाले मुनीमों के बीच सरगर्मियाँ भी पैदा करते हैं। सत्ता पक्ष समितियों, आयोगों का गठन शुरू कर देता है और विपक्षी दल धरना-प्रदर्शन की बन्दरघुड़की से लेकर बहिर्गमन, बहिष्कार की गीदड़भभकी देने लगते हैं।

इसलिए 2जी स्पेक्ट्रम के मामले में करुणानिधि के दलित वोट बैंक के आधार रहे उनके चहेते ए. राजा को लेकर जब उठापठक शुरू हुई तो जाँच के लिए मनमोहन सरकार लोकलेखा समिति से काम चला लेना चाहती थी (सहयोगी दल को नाराज़ करने की क़ीमत जो चुकानी पड़ती)। लेकिन भाजपा, जो अपने मुख्यमन्त्री येदियुरप्पा के भ्रष्टाचार पर लीपापोती कर ऊँघ रही थी और कश्मीर में तिरंगा झण्डा फहराने का उसका मामला भी सुपर फ्लाप हो गया था, इस मौके को यूँ ही नहीं जाने देती। उसके पास ले-देकर एकमात्र तारनहार मन्दिर का मुद्दा था जो उसे अब तक वोट दिलाता था, और अब तो उसमें भी उतना दम नहीं रहा। सो उसने फौरन स्पेक्ट्रम जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति की माँग कर डाली और नकली वामपन्थी भी मिमियाते हुए उसके साथ हो लिये। पूँजीपतियों के क़ाबिल मुनीम मनमोहन सिंह ने ईमानदार नायक की छवि ओढ़कर ख़ुद को पहले से मौजूद लोकलेखा समिति के सामने, जिसका मुखिया भाजपाई मुरलीमनोहर जोशी थे, पेश होने का प्रस्ताव रखा। लेकिन भाजपा संयुक्त संसदीय समिति की माँग पर अड़ी रही, धरना-प्रदर्शन हुआ, संसद बहिष्कार हुआ, संसद की कार्रवाई ठप करने का तमाशा हुआ। मगर जनतन्त्र के नाम पर इस नौटंकी के क्लाइमेक्स का इन्तज़ार पूरे देश की सम्पदा पैदा करने वाले मेहनतकश अवाम को नहीं, बल्कि खाये-पिये-अघाये मध्य वर्ग को था। इस पढ़े-लिखे और शेयर-बीमा के ज़रिए मुफ्त के हासिल धन से मज़े में ज़िन्दगी बिताने वाले वर्ग को मज़दूरों और आम मेहनतकश लोगों से कुछ लेना-देना नहीं होता। वह ‘राष्ट्रप्रेम’ और देश की ‘प्रगति’ के मिथ्याभ्रम में जीता रहता है। आम तौर से किसी भी विषय पर निठल्ले किस्म की बहस में ख़ुद को उलझाये रखना इसकी फितरत होती है। इसलिए आडवाणी एण्ड कं. ने जेपीसी के गठन के नाम पर जब संसद से बहिर्गमन और बहिष्कार की नौटंकी अपनी जरूरतों से खेली तो यही मध्यवर्ग ‘संसद के न चल पाने’ को लेकर बड़े ज़ोरशोर से बहस में उतर आया और संसद की कार्यवाही में अड़ंगा डालने वालों पर लानतें भेजने लगा। खैर, बाद में मनमोहन सिंह ने जेपीसी की माँग मान ली। इस जेपीसी से भी कुछ निकलने वाला तो है नहीं, और यह माँग मान लेने से देश में मनमोहन सिंह की कुछ वाहवाही भी हो जायेगी। ऐसे में, इसे माँग लेने में कोई नुकसान नहीं था। लेकिन इस बीच इस मसले से एक पूरे सत्र संसद की कार्रवाई नहीं चली और मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों के पेट में इसके कारण काफी दर्द हुआ।

अब फर्ज क़रें कि संसद ठीक से चलती तो क्या होता? जनप्रतिनिधि समझे जानेवाले आधे से अधिक सदस्य तो आते ही नहीं, जो आते वह भी या तो ऊँघते, सोते रहते या निरर्थक बहसबाज़ी और जूतमपैजार करते, और इसी किस्म की एक घण्टे की कार्यवाही पर तक़रीबन 20 लाख रुपये खर्च हो जाते और जब यह सब करने में उन्हें उकताहट और ऊब होती तो वे संसद की कैण्टीन में बाहर की क़ीमत का सिर्फ 10 प्रतिशत देकर तर माल उड़ाते और इस खर्च का बोझ भी मेहनतकश ज़नता पर ही पड़ता। संसद अगर ठीक से चलती भी रहती तो शोषण-उत्पीड़न के नये-नये क़ानून बनते। दिखावे और व्यवस्था का गन्दा चेहरा छिपाने के लिए कुछ कल्याणकारी क़ानून भी बनते जिन्हें लागू करने की ज़िम्मेदारी किसी की नहीं रहती। बेशुमार सुख-सुविधओं और विलासिताओं से चुँधियाये मध्यवर्ग के ऊपरी हिस्से को यह नंगी सचाई दिखायी नहीं पड़ती। संसद और क़ानून की आड़ में मेहनतकशों की हड्डियाँ निचोड़ लिया जाना उसे दिखायी नहीं देता है और न ही उसे उसकी कोई चिन्ता है। अपने में डूबा यह आत्म-सन्तुष्ट वर्ग आसपास की सच्चाइयों से मुँह मोड़कर मीडिया से अपने विचार और राय ग्रहण करता है। ज़ाहिर है सत्ता और संसद के प्रति यह भ्रम का शिकार होता है।

परन्तु देश की मेहनतकश आबादी को संसद को लेकर किसी मुग़ालते में नहीं रहना चाहिए। व्यापक मेहनतकश आबादी को यह बात समझ में आती भी है। वह जनतन्त्र की इस फूहड़ नौटंकी को समझने लगी है। वह जान गयी है कि संसद और कुछ नहीं दलाली की मण्डी है जहाँ संसदी पतुरिया का खेल-तमाशा चलता रहता है। संसद के चलने या नहीं चलने से, पूँजी के इन दल्लों के बहिर्गमन या आगमन-पुन:आगमन से उसे और उसके बच्चों को इस दुख, तकलीफ और ज़िल्लतभरी ज़िन्दगी से छुटकारा नहीं मिलने वाला। सत्ता में कोई भी दल आये-जाये, नीतियाँ बनाने के मामले में इनमें कोई मतभेद न होगा। वह अच्छी तरह समझती है कि इसमें पारित कोई भी क़ानून उसकी बर्बर लूट को ख़त्म नहीं कर सकता। ज़ाहिर है पूँजी की गन्दी लादी ढोने वाले इन गदहों से उसे कोई उम्मीद भी नहीं है। और जिस दिन उसने अपनी ताक़त को संगठित कर लिया इसे उखाड़ने में वह पलभर भी देर न करेगी।

 

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2011

 


 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
   
 

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन

Related Images:

Comments

comments