आई.ई.डी. की फैक्ट्री में एक और मज़दूर का हाथ कटा

नोएडा। लालकुँआ स्थिति आई.ई.डी. के बारे में छपी रिपोर्टों से ‘बिगुल’ के पाठक परिचित ही हैं। यहाँ काम कर रहे मज़दूर आए दिन दुर्घटनाओं का शिकार होते रहते हैं। कभी उंगलियाँ कटती हैं, तो कभी हथेली। मालिक के मुनाफे की हवस के ताज़ा शिकार गुमान सिंह हुए हैं जिनकी उम्र महज 35 साल है। गुमान सिंह इण्टरनेशनल इलेक्ट्रो डिवाइसेज लि. के फ्रेमिंग डिपार्टमेण्ट — जिसमें पिक्चर टयूबों की फ्रेमें बनती हैं — में काम करते थे। घटना 24 जनवरी, 2011 की रात्रि पाली में हुई। कम्पनी की एम्बुलेंस नामधारी निजी कार से उन्हें डॉक्टरी इलाज के लिए ले जाया गया। शुरुआती कुछ ख़र्च देने के बाद प्रबन्‍धन चुप बैठा है। गुमान सिंह इस उम्मीद में हैं कि इस कम्पनी को मैंने जवानी के 15 बरस दिए हैं, वह हमारा ज़रूर ख्याल करेगी। गुमान सिंह गढ़वाल के रहने वाले हैं। 1995 में गाज़ियाबाद आये कि यहाँ मोटर मैकेनिक का काम सीखेंगे। कई-एक फैक्ट्रियों में काम किया, अन्तत: आई.ई.डी. में 1996 से काम करने लगे। 6 माह बाद 1997 में उन्हें कम्पनी ने स्थायी कर दिया। तब से वे इसी कम्पनी में काम करते रहे हैं। गाज़ियाबाद के ज़नता क्वार्टर में अपने तीन बच्चों व बुजुर्ग बाप के साथ रहने वाले गुमान सिंह के सामने भविष्य की ज़िम्मेदारी सामने खड़ी है। शरीर का सबसे कीमती अंग गँवाकर यह मज़दूर अपने बच्चों का पेट कैसे पालेगा, इसके बारे में मुनाफाख़ोर मालिकान के पास क्या कोई जबाव है?

‘मज़दूर बिगुल’ के पिछले अंकों में हमने बताया था कि पिक्चर टयूब बनाने वाली यह कम्पनी सैमटेल के साथ मिलकर इलेक्ट्रानिक उपकरणों की देश से बाहर भी सप्लाई करती है। ख़ुद आई.ई.डी. में ही क़रीब 1200 मज़दूर काम करते हैं। अलग-अलग समयों में अब तक तक़रीबन 300 से भी ज्यादा मज़दूर अपने अंग गँवा चुके हैं। अगर सीधी भाषा में कहें तो आई.ई.डी. का मालिकान मज़दूरों के अंग काट-काटकर अपनी तिजोरी भरने में लगा है। लगातार मज़दूर दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं, न तो मीडिया में कोई ख़बर बनती है और न ही श्रम-विभाग कोई कार्रवाई करता है। साथ ही स्थानीय प्रशासन मानो उसकी मुठ्ठी में है, नहीं तो अब तक तो ऐसी कम्पनी के मालिकान और प्रबन्‍धन को आपराधिक कृत्य की सज़ा के तौर पर जेलों में होना चाहिए था। मज़दूर जिन मशीनों पर काम करते हैं उनमें सेंसर लगाकर ही चलाने का प्रावधान है, लेकिन मालिकान ने ज्यादा प्रोडक्शन कराने के लिए इन सेंसरों को हटवा दिया, तब से लगातार कभी मज़दूरों की हथेली कटती है, कभी उंगली। प्रबन्‍धन सामान्य दवा-इलाज कराके मज़दूरों को उनके हाल पर छोड़ देता है। कभी-कभार दया दिखाने की ख़ातिर मशीन-मैन को हेल्पर का काम देकर यह समझाने की कोशिश करता है कि शुक्र मनाओ हमने तुम्हें निकाला नहीं! अपने काम-काजू हाथ कटाकर मज़दूर भी बेसहारा हो जाता है। वहीं पिछले दो बरस से मज़दूरों के बीच घुसी अर्थवादी ट्रेडयूनियन सीटू मज़दूरों को थकाकर, निचोड़कर मालिक के पक्ष में समझौता कराने में लगी रही है। संशोधनवादी सीपीएम की इस ट्रेड यूनियन की मज़दूरों से ग़द्दारी से अब व्यापक मज़दूर आबादी काफी अच्छी तरह से वाकिफ हो रही है।

जिस रात की पाली में इस मज़दूर के साथ दुर्घटना हुई, उससे ठीक एक दिन पहले ही संघर्षरत मज़दूरों का आन्दोलन समाप्त हुआ था। जुझारू संघर्षशील मज़दूरों को ‘सीटू’ ने क़ानूनी जमाख़र्ची की ऐसी पट्टी पढ़ाई कि क़रीब महीने भर सड़क पर रहने के बावजूद न तो निकाले गये मज़दूर वापस काम पर रखे गये, न ही इंजीनियरिंग ग्रेड का वेतनमान लागू हुआ न ही अन्य माँगे मानी गयीं। ‘मज़दूर बिगुल’ ने जो आंशका व्यक्त की थी वह एक बार फिर सही साबित हुई । हमने कहा था कि ‘सीटू’ जैसी ग़द्दार ट्रेड यूनियन का पल्लू छोड़कर मज़दूर अपनी यूनियन की ताक़त और मज़दूर साथियों की एकजुटता पर भरोसा करें। फैक्ट्री की यूनियन के कुछ अगुआ या तो दिग्भ्रमित थे या जल्दी ही कुछ पा जाने की लालसा में थे। जो कुछ सीटू कहती गयी वे सब करते गये। पंजीकृत विशालकाय ट्रेडयूनियन के सहारे सब कुछ पा लेने की संकुचित सोच मज़दूरों में काम कर रही थी, ठेका के तहत काम करने वाले मज़दूरों का इनकी माँगों में कहीं ज़िक्र तक नहीं था। लड़ाई को व्यापक मज़दूरों तक विस्तारित करने के बजाय वे महज़ अठन्नी-चव्वन्नी माँगने तक केन्द्रित रहे और अन्तत: वो भी नहीं मिला। आज मज़दूरों को लग रहा है कि समझौते के नाम पर हमारे साथ धोखा हुआ है। वे अपने साथियों को मजबूरन इस्तीफा देकर बाहर जाते देख रहे हैं। आज आई.ई.डी. का मज़दूरों का शानदार संघर्ष पानी में मिल गया है।

शुरुआती सभाओं में सारे मज़दूरों से राय लेकर ‘मज़दूर बिगुल’ के कार्यकर्ताओं ने मूलत: चार माँगों पर मज़दूर साथियों को सहमत कर लिया था कि मशीनों पर सेंसर लगाया जाये ताकि आगे दुर्घटनाएँ न हों; दुर्घटना के शिकार मज़दूरों को उचित मुआवज़ा दिया जाये; इंजीनियरिंग ग्रेड का वेतनमान लागू किया जाये; और निकाले गये मज़दूरों को काम पर रखा जाये। लेकिन ‘सीटू’ इन माँगों को दरकिनार करके महज़ वेतन बढ़ोत्तारी का झाँसा देकर मज़दूरों को बरगलाती रही। सेंसर एवं मुआवज़े का ज़िक्र ही नहीं किया गया। आज आन्दोलन का हश्र हमारे सामने है। ‘सीटू’ की ग़द्दारी भरी भूमिका भी हमारे सामने है। कम्पनी में ठेकाकरण शुरू हो चुका है। ले-ऑफ पर निकाले गये एक-एक मज़दूर इस्तीफा देकर काम से बाहर जा रहे हैं। उनके सामने कोई रास्ता नहीं है। अब हरेक मज़दूर पर प्रबन्‍धन की तलवार लटकी है।

ऐसे में हमें सोचने की ज़रूरत है कि आई.ई.डी. के मज़दूर कब तक अपनी और अपने मज़दूर भाइयों की उंगलियाँ कटाकर मालिकों की तिजोरी भरते रहेंगे? उन्हें ज़रूरत है सीटू को किनारे कर अपनी यूनियन के बूते अपनी माँगों के संघर्ष को आगे ले जाने की। उन्हें इसी दिशा में सोचना होगा और व्यापक मज़दूरों की समझौताहीन और फौलादी एकजुटता पर भरोसा करना होगा।

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2011

 

 


 

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