अमेरिका है दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी!
भूमण्डलीय आतंकवादी के चुनिन्दा अपराध

 

white-washing-war-crimes_of_zionist_israel_by_americaअमेरिकी साम्राज्यवादी पूरी दुनिया के पैमाने पर आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का दावा करते हैं। सच्चाई यह है कि स्वयं अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी देश है। आज जिन इस्लामी कट्टरपन्थियों से लड़ने के नाम पर इराक़, अफगानिस्तान और दुनिया के कई देशों में अमेरिका बमबारी, नरसंहार और सैनिक कब्ज़ों, का सिलसिला जारी रखे हुए है, वे उसी के पैदा हुए भस्मासुर हैं। अमेरिका आतंकवाद के नाम पर दुनिया की जनता के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए है। वह अपने साम्राज्यवादी वर्चस्व के लिए युद्ध और आतंक का क़हर बरपा  कर रहा है। अमेरिकी सत्ताधारियों के चुनिन्दा ऐतिहासिक अपराधों की एक सूची नीचे प्रस्तुत की जा रही है :

 

अमेरिका के मूल निवासियों का क़त्लेआम : संयुक्त राज्य अमेरिका के संस्थापक जब उत्तर अमेरिका पहुँचे, उस समय से लेकर बीसवीं शताब्दी तक मूल निवासियों के नरसंहार का और उनकी ज़मीनें हड़पने का सिलसिला लगातार चलता रहा। ऐसी बहुतेरी घटनाओं में ”आँसुओं का रास्ता” (ट्रेल ऑफ टीयर्स) नाम से प्रसिद्ध वह ऐतिहासिक घटना भी शामिल है जब दक्षिणपूर्व अमेरिका के हज़ारों मूल वाशिन्दों को दक्षिण-पूर्वी अमेरिका से उजाड़कर ओक्लाहामा की ओर कूच करने के लिए मजबूर किया गया। ऐसे 15000 चेरोकी लोगों में से 4000 यात्रा के दौरान ही मर गये।

अश्वेतों की ग़ुलामी : अफ़्रीका से ले जाये गये अश्वेत ग़ुलामों से फार्मों पर काम कराते समय, उनके साथ पशुवत व्यवहार करने और बर्बर ढंग से यन्त्रणा देने का सिलसिला उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक जारी रहा। दास प्रथा पर रोक के बाद भी अश्वेत आबादी उत्पीड़न और भेदभाव का शिकार बनी रही। अश्वेतों की एक छोटी सी आबादी ऊपर उठकर आज कुलीन मध्यवर्ग में शामिल हो चुकी है, लेकिन बहुसंख्यक अश्वेत आज भी सामाजिक अलगाव और अपमानजनक भेदभाव के शिकार हैं।

मेक्सिको पर हमला, 1846-1848 : अमेरिकी सेनाओं ने मेक्सिको पर हमला करके मेक्सिकी बन्दरगाहों की घेरेबन्दी कर ली और मेक्सिको सिटी पर कब्ज़ा कर लिया। बदले में मेक्सिको को अपना बहुत बड़ा भूभाग अमेरिका को देना पड़ा जिसमें न्यू मेक्सिको, कैलिफोर्निया और उत्तरी मेक्सिको का बहुत बड़ा हिस्सा शामिल था।

स्पेनी-अमेरिकी युद्ध, 1898 : क्यूबा की स्वतन्त्रता को समर्थन देने की आड़ में अमेरिका ने प्रशान्त महासागर और कैरीबियन में स्थित स्पेनी सेनाओं पर हमला किया और उन्हें पराजित करने के बाद स्पेनी उपनिवेशों — क्यूबा, प्यूर्टोरिको, गुआम और फिलिप्पीन्स पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।

फिलिप्पीन्स पर हमला, 1899 : फिलिप्पीन्स की उपनिवेशवाद-विरोधी शक्तियों को अमेरिका ने निर्दयतापूर्वक कुचल दिया। प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन के शब्दों में, ”…उन्हें दफ्न कर दिया गया, उनके खेतों को तबाह कर दिया गया, गाँवों को जला दिया गया, विधवाओं और अनाथ बच्चों को घरों से बाहर धकेल दिया गया, दर्जनों देशभक्त नेताओं को देश निकाला दे दिया गया और बचे हुए लाखों फिलिप्पीन्स निवासियों को ग़ुलाम बना लिया गया।”

हैती पर हमला, 1915 : अमेरिका ने हैती पर हमला करके कब्ज़ा कर लिया। अमेरिकी नौसैनिक सीधे हैतियन नेशलन बैंक में पहुँचे और सोने का समूचा आरक्षित भण्डार उठाकर न्यूयॉर्क सिटी पहुँचा दिया। प्रतिरोध को अमेरिकी सेना ने बर्बरतापूर्वक कुचल दिया। नेताओं की हत्या कर दी गयी, बस्तियाँ जलाकर ज़मींदोज़ कर दी गयीं और 15,000 से 30,000 के बीच हैतीवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया।

तुल्सा नरसंहार, 1921 : पुलिस, कू-क्लक्स-क्लान के फासिस्ट गुण्डों और श्वेत नस्लवादियों की एक भीड़ ने तुल्सा (ओक्लाहामा) में अश्वेत आबादी पर हमला बोलकर सैकड़ों लोगों को मार डाला और घरों को लूट लिया। फिर पुलिस ने छ: जहाज़ों से बम गिराकर पूरी बस्ती को जला कर ख़ाक कर दिया।

हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराना और टोक्यो पर फायरबॉम्बिंग, 1945 : दूसरे महायुद्ध के  अन्त में, जब जापान की पराजय आसन्न थी, उस समय अपनी साम्राज्यवादी चौधराहट सिद्ध करने और समाजवादी शिविर को आतंकित करने के लिए, अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये। इसमें 2 लाख नागरिक तुरन्त मारे गये। लाखों की आबादी वर्षों तक विकिरण जनित बीमारियों से घुट-घुटकर मरती रही और दशकों तक विकिरण जनित विकृतियों से ग्रस्त बच्चे पैदा होते रहे। टोक्यो पर बमबारी से लगी आग में हज़ारों लोग मारे गये और लाखों बेघर हो गये।

कोरिया, 1950-1953 : कोरिया पर हमले के दौरान अमेरिका ने जितने बम और तोप के गोले बरसाये, उतना उसने पूरे दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भी नहीं इस्तेमाल किया था। अमेरिकी वायुसेना के जनरल कर्टिस ल में ने दावा किया था कि अमेरिकी जहाज़ों ने बमबारी करके उत्तर कोरिया के हर छोटे-बड़े शहर को जलाकर खाक कर दिया था।

brutal-american-soldiers-crimes-vietnam-warवियतनाम, 1965-1975 : वियतनामी जनता के मुक्तियुद्ध को कुचलने की कोशिशों के दौरान अमेरिका ने वियतनाम तथा पड़ोसी देशों – कम्पूचिया और लाओस पर कुल 70 लाख टन बम गिराये थे। हज़ारों गाँव सेना ने उजाड़ दिये। ‘माई लाई नरसंहार’ जर्मन नात्सियों द्वारा किये जाने वाले नरसंहारों जैसी ही बर्बर घटना थी। वियतनामी मुक्तियुद्ध के इन दस वर्षों के दौरान लगभग 30 लाख वियतनामी मारे गये।

क्यूबा, 1962 : सी.आई.ए. ने कुछ क्यूबाई आप्रवासियों को ट्रेनिंग और हथियार देकर तोड़फोड़ एवं विद्रोह उकसाने के लिए क्यूबा भेजा। गत आधी सदी से क्यूबा की आर्थिक घेरेबन्दी जारी है। सी.आई.ए. फिदेल कास्त्रो की हत्या की सौ से भी अधिक कोशिशें कर चुकी है।

डोमिनिकन गणराज्य, 1965 : 20,000 अमेरिकी नौसैनिकों ने एक क्रान्तिकारी विद्रोह को कुचलने के लिए हमला किया जिसमें 6000 से 10,000 के बीच डोमिनिकन लोग मारे गये।

ग्वाटेमाला, 1878-1944 : अमेरिका-प्रायोजित मृत्यु-दस्ते (डेथ स्क्वाड) की सत्ता ने 400 माया (मूल निवासी) गाँवों को उजाड़ दिया। नृशंसता और यातना की जघन्यतम मिसालें कायम की गयीं और दसियों हज़ार ग्रामीणों को मौत के घाट उतार दिया गया।

पनामा, 1989 : एक अमेरिकी हमले के दौरान 2000 से 6000 के बीच लोग मारे गये। इनमें ज़्यादातर ग़रीब और मज़दूर बस्तियों के लोग थे जिन्हें सामूहिक क़ब्रों में दफ्न कर दिया गया।

ऑपरेशन डेज़र्ट स्टॉर्म 1991 : इराक पर पहले अमेरिकी हमले के दौरान लाखों लोग मारे गये या घायल हुए। हमले के दौरान, सिर्फ एक राजमार्ग पर भागते हुए (जिन्हें बाद में ”हाइवे ऑफ डेथ” नाम से ख्याति मिली) 48 घण्टों के भीतर 25,000 नागरिक और सैनिक मारे गये।

सोमालिया, 1993 : अमेरिकी सेना के हेलिकॉप्टर ने एक भीड़ पर मिसाइल दागा जिससे 100 निहत्थे लोग मारे गये और कई घायल हुए। ग्रामीणों की फसलें और घर जला दिये गये और मवेशी मार दिये गये।

ईरानी यात्री विमान को मार गिराना, 1988 : अमेरिकी सेना ने ईरानी क्षेत्र के ऊपर उड़ रहे एक ईरानी यात्री विमान को मार गिराया जिसमें सवार कुल 290 यात्री (66 बच्चों सहित) मारे गये। अमेरिका ने इस घटना पर कोई खेद नहीं जताया। तत्कालीन राष्ट्रपति एच.डब्ल्यू. बुश ने कहा, ”अमेरिका की ओर से मैं कभी भी माफी नहीं माँगूगा। तथ्य जो भी हों, मैं उनकी परवाह नहीं करता।”

Afghanistan - Military - Suspected Taliban Insurgentअफगानिस्तान, 2001 से लेकर अबतक : अमेरिकी नेतृत्व में हुए हमले में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं। अमेरिकी अगुवाई में नाटो सेनाओं ने शादी की पार्टियों तक पर बमबारी की, घर-घर की तलाशी ली गयी, जेलों में हज़ारों बेगुनाह नागरिक टॉर्चर किये गये और तालिबान व अल क़ायदा आतंकियों के छिपे होने के संदेह में गाँव के गाँव तबाह कर दिये गये। यह सिलसिला अभी तक जारी है।

इराक़ पर हमला और कब्ज़ा, 2003 से अब तक : संहारक रासायनिक हथियार रखने (जो कभी नहीं मिले) और अल क़ायदा से साठगाँठ (जो कभी साबित नहीं हुआ) का आरोप लगाकर अमेरिका ने इराक़ पर कब्ज़ा जमाया। इस दूसरे इराकी युद्ध और अमेरिकी कब्जे क़े दौरान एक लाख इराकी नागरिक मारे जा चुके हैं और 40 लाख अपने घरों से उजड़ने को मजबूर हुए हैं।अमेरिकी प्रतिबन्धों के कारण दवाओं के अभाव में दस वर्ष में 5 लाख इराकी बच्चों की मौत पर अमेरिकी विदेशी मंत्री मैडेलिन अलब्राइट का कहना था कि “ये एक जायज़ कीमत है।”

हैती, 2004 : 29 फरवरी 2004 को अमेरिकी सेना ने हैती के राष्ट्रपति अरिस्टाइड का अपहरण कर लिया और उन्हें बलपूर्वक एक विमान में बैठाकर मध्य अमेरिकी गणराज्य भेज दिया। कई दिनों तक अमेरिकी नौसैनिक राजधानी पर कब्ज़ा जमाये रहे।

लीबिया, 2011: लोकतंत्र लाने के नाम पर अमेरिका ने फ्रांस आदि देशों के साथ मिलकर लीबिया पर हमला करके तख़्तापलट कराया और पूरे देश को भयंकर गृहयुद्ध में झोंक दिया जिसमें हज़ारों लोग मारे गये।

सीरिया, 2013: अमेरिकी शह और सीधे हस्तक्षेप के कारण पिछले चार वर्षों से सीरिया में जारी गृहयुद्ध में 5 लाख लोग मारे जा चुके हैं और डेढ़ करोड़ बेघर हो गये हैं। रासायनिक हथियारों का बहाना लेकर एक बार फिर सीरिया पर उसी तरह से हमला करने की तैयारी की जा रही है जैसे इराक पर किया गया था।

टॉर्चर चैम्बर्स : अबू ग़रेब (इराक़), गुआन्तानामो (क्यूबा) और बगराम (अफगानिस्तान) के अमेरिकी टार्चर चैम्बर्स में दुनिया भर के लोगों को पकड़कर लाया जाता है और तरह-तरह से यन्त्रणाएँ दी जाती हैं। और बिना कोई मुकदमा चलाये मार डाला जाता है। ऐसे कई यन्त्रणा शिविर मध्यपूर्व में भी हैं और यूरोप में भी अमेरिका के कई गुप्त जेलख़ाने हैं।

ड्रोन हमले : 2009 से लेकर अब तक ड्रोन नामक मानवरहित विमानों से आतंकवादियों के सफाये के नाम पर किये जाने वाले हमलों में, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और यमन में हज़ारों निर्दोष नागरिक मारे जा चुके हैं और बस्तियों की भारी तबाही हुई है।

ऊपर जो सूची दी हुई है, वह अमेरिकी साम्राज्यवादियों के चुनिन्दा युद्ध-अपराधों और आतंकवादी कुकृत्यों की एक संक्षिप्त सूची है। अमेरिकी कम्पनियाँ पूरी दुनिया की अकूत प्राकृतिक सम्पदा को और आम मेहनतकश जनता को लूटकर तबाह कर रही हैं। भोपाल गैस त्रासदी में हुए नरसंहार को इतिहास पूँजीवाद के अभिशाप के रूप में हमेशा याद रखेगा। दुनिया के कई हिस्सों में ये कम्पनियाँ पर्यावरण विनाश का ताण्डव रच रही हैं। केवल युद्ध द्वारा ही नहीं, खनिजों के दोहन के चलते और एग्री बिज़नेस कम्पनियों द्वारा उजाड़े जाने के चलते भी तीसरी दुनिया के देशों में सालाना करोड़ों की आबादी विस्थापित होती है और करोड़ों लोगों को भरपेट भोजन तक नसीब नहीं होता।

दूसरी ओर अमेरिकी समृद्ध लोग अपनी विलासिता पर जितना ख़र्च करते हैं उसका पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं है।

ज़ाहिर है कि केवल अमेरिका ही नहीं, सभी साम्राज्यवादी देश मानवता के दुश्मन और अपराधी हैं। साम्राज्यवाद का मतलब है दैत्याकार एकाधिकारी पूँजीपति घरानों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा पूरी दुनिया की अर्थ व्यवस्थाओं और राजनीतिक व्यवस्थाओं तथा पूरी दुनिया की जनता के जीवन को नियन्त्रित करना। साम्राज्यवाद का मतलब उन परजीवी शोषकों से है जो दुनिया के अरबों आम लोगों को निचोड़कर पूँजी-संचय करते हैं। इसका मतलब उन परजीवी वित्तीय लुटेरों से है जो कम्प्यूटर के की-बोर्ड की कुछ कुंजियाँ दबाकर धन की विराट राशि पृथ्वी पर एक जगह से दूसरी जगह स्थानान्तरित कर देते हैं, और लाखों लोगों को सड़कों पर धकेल देते हैं और लाखों के मुँह का निवाला छीन लेते हैं। साम्राज्यवाद का मतलब है युद्धउत्पीड़ितों के प्रतिरोध को कुचलने के लिए युद्ध और प्रतिस्‍पर्द्धी साम्राज्यवादी देशों के बीच युद्ध। इन देशों की सत्ताएँ कम्प्यूटर का एक बटन दबाकर मानवता को अकूत तबाही-बर्बादी के दहाने में झोंक देने की क्षमता रखती हैं। साम्राज्यवाद पूँजीवाद की चरम अवस्था है। मानवता इसे नष्ट करके ही अपने को सुरक्षित कर सकती है और अपनी प्रगति सुनिश्चित कर सकती है।

अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्यवादी है और विश्व पूँजीवाद का चौधरी है। अमेरिकी शासकवर्ग अमेरिकी जनवाद (लोकतन्त्र) को लगातार महिमामण्डित करता है, लेकिन वास्तव में वह ऐसा पूँजीवादी जनवाद है जो न केवल पूरी दुनिया के लिए बल्कि थोड़े से धनपतियों को छोड़कर बहुसंख्यक आम अमेरिकी आबादी के लिए भी एक अपराधी, दमनकारी ख़ूनी तन्त्र है।

नवउदारवाद के पिछले दो दशकों के दौरान भारत में भी ख़ुशहाल मध्यवर्ग की वह आबादी तेज़ी से फली-फूली है, जिसकी नज़रों में अमेरिका ”स्‍वर्ग” है। देश की 121 करोड़ आबादी में से   बमुश्‍किल तमाम 12-14 करोड़ लोगों की यह आबादी है, जिसके लिए तमाम शॉपिंग मॉल्स- मल्टीप्लेक्स-अपार्टमेण्ट्स-फॉर्महाउस-पाँच सितारा होटल, क्लब, आरामगाह, भाँति-भाँति की कारें, बाइकें, ए.सी., फ्रिज़, हवाई यात्राएँ आदि सब कुछ हैं। 20 रुपये रोज़ के नीचे जीने वाली 77.5 फीसदी आबादी, कुपोषण के शिकार 40 करोड़ लोगों और 18 करोड़ बेघरों के नारकीय जीवन के सागर में ये उच्च मध्य वर्ग के लोग ऐश्वर्य और विलासिता के टापुओं पर रहते हैं। इनका ऊपरी हिस्सा तो यूरोप और अमेरिका के धनी लोगों के स्तर का जीवन बिताता है। यही वे लोग हैं जो अमेरिकी समाज के जनवाद के गुण गाते हैं और उसके चरित्र और ऐतिहासिक अपराधों की पर्दापोशी करते हैं। अपनी औलादों को बिज़नेस मैनेजमेण्ट का कोर्स कराकर और सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदि बनाकर अमेरिका भेजने के लिए खाते-पीते औसत मध्य वर्ग का आदमी भी सब कुछ कर गुजरने को तैयार होता है। जो ऊपर वाले हैं उनका तो ”स्‍वर्ग” अमेरिका है ही। वे तो भारत में भी अमेरिका का ही जीवन जीते हैं।

अमेरिका के प्रशंसक बुद्धिजीवी इस ऐतिहासिक अपराधी के बौद्धिक एजेण्ट हैं। ऐसे लोगों का अपराध भी अक्षम्य है।

चुनिन्दा अमेरिकी हमले, जिनमें सी.आई.ए. से सहायता-प्राप्त सैन्य कार्रवाइयाँ और कठपुतली सत्ताओं द्वारा छेड़े गये युद्ध भी शामिल हैं

अर्जेण्टीना 1890; चीले 1891; हैती 1891; हवाई 1893; ब्लूफील्ड, निकारागुआ 1894 और 1899; चीन 1894-95; कोरिया 1894-96; कोरिण्टो, निकारागुआ 1896; चीन 1898-1900; फिलीप्पीन्स 1898-1910, क्यूबा और प्यूर्टो रिको 1898-1902; सानजुआन देल सुर, निकारागुआ 1898; समोआ 1899; पनामा 1901-14; पनामा कनाल ज़ोन 1914; होण्डुरास 1903; डोमिनिकन रिपब्लिक 1903-04; कोरिया 1904-05; क्यूबा 1906-09; निकारागुआ 1907; होण्डुरास 1907; पनामा 1908; निकारागुआ 1910; क्यूबा 1912; पनामा 1912; होण्डुरास 1912; निकारागुआ 1912; वे मेक्सिको (हेराक्रूज़) 1914; डोमिनिकन रिपब्लिक 1914; मेक्सिको1914-18; हैती 1914-34; डोमिनिकन रिपब्लिक 1916-24; क्यूबा 1917; सोवियत संघ 1918; पनामा 1918; होण्डुरास 1919; ग्वाटेमाला 1920; तुर्की 1922; चीन 1922; होण्डुरास 1924; पनामा 1925; अल सल्वाडोर 1932; कोरिया 1950-53; प्यूर्टो रिको 1950; ग्वालेमाला 1954; मिस्र 1956; लेबनान 1958; पनामा 1958; क्यूबा 1962; डोमिनिकन रिपब्लिक 1965; वियतनाम 1965-75; ग्वाटेमाला 1967; ओमान 1970; ईरान 1980; अल सल्वाडोर 1981; निकारागुआ 1981; ग्रेनाडा; 1982; लेबनान 1982; होण्डुरास 1983; बोलीविया 1986; पनामा 1989; इराक़ 1991; युगोस्लाविया 1992; सोमालिया 1993; हैती 1994; लाइबेरिया 1996; सूडान 1998; अफगानिस्तान 1998 से अबतक; इराक़ 2003 से अबतक; लीबिया 2011 से अब तक; सीरिया 2013 से अब तक…

 

मज़दूर बिगुल, जूलाई 2011 में प्रकाशित व मजदूर बिगुल, अप्रैल 2017 में कुछ संशोधनों के साथ पुर्नप्रकाशित (अप्रैल 2017 अंक में जोड़े गये पैराग्राफ नीले रंग में दर्शाये गये हैं।)

 

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