बोलते आँकड़े चीखती सच्चाइयाँ

संजय

एक रिपोर्ट के अनुसार अरबपतियों की संख्या के मामले में भारत दुनिया में आठवें नंबर पर पहुंच गया है और इस समय भारत में 14,800 अरबपति हैं। पूँजीपतियों की बाँछें खिली हुई हैं, मध्यवर्ग भारत की  इस “तरक्की” पर लहालोट हुआ जा रहा है। पूँजीवादी मीडिया इस विकास का जोर-शोर से गुणगान कर रहा है। दूसरी ओर देश की 77 फीसदी आबादी रोजाना महज बीस रुपये पर गुजारा कर रही है। देश की 80 फीसदी जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मयस्सर नहीं हैं। आज़ादी मिलने के 67 साल बाद की स्थिति यह है कि देश की ऊपर की दस फीसदी आबादी के पास कुल परिसम्पत्ति का 85 प्रतिशत इकट्ठा हो गया है जबकि नीचे की 60 प्रतिशत आबादी के पास महज दो प्रतिशत है। भारत में 0.01 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनकी आय देश की औसत आय से दो सौ गुना अधिक है। देश की ऊपर की तीन फीसदी और नीचे की चालीस फीसदी आबादी की आमदनी के बीच का फासला साठ गुना हो चुका है।

Poor vs richदेश की लगभग सवा सौ करोड़ की आबादी में शासक वर्ग और उससे जुड़े उच्च मध्य वर्ग से लेकर खुशहाल, मध्यम मध्य वर्ग तक की कुल आबादी पंद्रह से बीस करोड़ के बीच है। इनमें पूँजीपति, व्यापारी, ठेकेदार, शेयर दलाल, कमीशन एजेंट, कारपोरेट प्रबंधक, नेता, सरकारी नौकरशाह, डॉक्टर, इंजीनियर, उच्च वेतनभोगी प्रोफेसर, मीडियाकर्मी और अच्छी कमाई वाले वकील आदि शामिल हो सकते हैं। यही वह छोटी सी आबादी है जिसको पूँजीवाद ने समृद्धि के शिखर पर पहुँचा दिया है। इन्हें के लिए तमाम शॉपिंग मॉल्स, मल्टीप्लेक्स, होटल, रिसोर्ट हैं, महंगे कार और दुपहिया वाहन हैं। इसी के बूते शेयर बाजार और मनोरंजन उद्योग चलता है। बाकी करीब 85 फ़ीसदी आबादी इनकी जरूरतें पूरी करने के लिए जिन्दा रहने की बेहद न्यूनतम शर्तों पर गुजर बसर करती है।

भारत समेत दुनिया भर में ऊपर के संस्तरों में आयी समृद्धि और इसके बरक्स नीचे की आम मेहनतकश आबादी की दयनीय हालत का जायजा लेते हैं–

–               भारत में रूस, आस्ट्रेलिया और फ्रांस से ज्यादा अरबपति हैं। अरबपतियों के मामले में भारत दुनिया में आठवें नंबर पर है। न्यू वर्ल्ड वेल्थ की संपत्ति संबंधी ताजा सूची के अनुसार कम से कम एक अरब (सौ करोड़) डॉलर की संपत्ति रखने वाले व्यक्यिों की संख्या के मामले में भारत दुनिया में आठवें नंबर पर है। भारत धनी लोगों की इस सूची में अमेरिका, चीन, जर्मनी और ब्रिटेन से नीचे है लेकिन सिंगापुर और कनाडा से ऊपर है।

–             भारत में 14,800 अरबपति हैं। इसमें मुंबई में सबसे ज्यादा 2700 अरबपति हैं।

–             पिछले दस वर्षों के दौरान विश्व के पैमाने पर करोड़पतियों और अरबपतियों की संख्या में अत्यधिक भिन्न दरों पर इज़ाफ़ा हुआ है। इस दौरान करोड़पतियों की संख्या 58 प्रतिशत और अरबपतियों की संख्या 71 प्रतिशत बढ़ी है।

–             दूसरी ओर हाल ही जारी हुई संयुक्त राष्ट्र की विकास संबंधी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 2.2 अरब से ज्यादा लोग गरीबी के निकट हैं अथवा गरीबी में जीवन बिता रहे हैं। इस अध्ययन में यह भी पाया गया है कि लगभग 1.2 अरब लोग रोजाना 1.25 डॉलर (75 रुपये) अथवा उससे कम पर जीवन व्यतीत करते हैं और दुनिया की बारह फ़ीसदी आबादी भयंकर भुखमरी की शिकार है।

–             तकरीबन डेढ़ अरब लोग चौतरफ़ा गरीबी के शिकार हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवनस्तर के मामले में इनकी स्थिति बेहद दयनीय है। इसके अलावा 80 करोड़ लोग गरीबी के मुहाने पर हैं और कोई भी झटका उन्हें गरीबी के दलदल में धकेल देगा।

–             सबसे ज्यादा निपट गरीबी दक्षिण एशियाई देशों में है जहां 80 करोड़ से ज्याद लोग गरीब हैं और 27 करोड़ लोग गरीबी के निकट पहुंच चुके हैं जो कि यहां की कुल आबादी का 71 फीसदी से ज्यादा है।

–             1990 से 2010 के बीच विकासशील देशों में आय असमानता 11 फीसदी तक बढ़ चुकी थी।

–             दुनिया की कुल आबादी में ग्रामीण आबादी का हिस्सा लगभग पांच फीसदी है लेकिन गरीबी के मामले में ग्रामीण आबादी पंद्रह फीसदी है।

–             लगभग पचास फीसदी बुजुर्ग लोग – 46 प्रतिशत ऐसे लोग जिनकी उम्र साठ साल या ज्यादा है –एक या एक से अधिक शारीरिक अथवा मानसिक व्याधियों से ग्रस्त हैं।

–             तीसरी दुनिया के देशों में बच्चों की स्थिति बेहद नाजुक है। सौ में सात बच्चे पांच साल की उम्र पार नहीं कर पाते, पचास बच्चे अपना जन्म पंजीकरण कराने से पहले ही मौत के मुँह में समा जाते हैं, 68 बच्चे आरंभिक शिक्षा तक नहीं पहुंच पाते, 17 बच्चे प्राथमिक स्कूल में जाने से पहले ही जान गवां बैठते हैं, 30 विकसित नहीं हो पाते और 25 गरीबी में पहुंच जाते हैं।

दरअसल, पूँजीवाद का बुनियादी तर्क ही ऐसा है कि वह धनी-गरीब के बीच अन्तर को बढ़ाता है, क्षेत्रीय असमानता को बढ़ाता है, कृषि और उद्योग की बीच अन्तर बढ़ाता है और गांव व शहर के बीच अन्तर को बढ़ाता है। पूँजीवाद के अन्तर्गत शिखरों पर जो समृद्धि आती है और जो पूँजी का अंबार इकट्ठा होता है वह नीचे के मेहनतकशों के अतिरिक्त श्रम को निचोड़कर ही होता है। इस लिए जबतक पूँजीवाद रहेगा अमीरी और गरीबी के बीच खाई बढ़ती ही जाएगी। पूँजीवाद का नाश किए बिना इस खाई को पाटा नहीं जा सकता।

 

मज़दूर बिगुल, अगस्‍त 2014

 


 

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