कश्मीर समस्या का चरित्र, इतिहास और समाधान
समाजवादी राज्य में ही सम्भव है कश्मीर या अन्य किसी भी राष्ट्रीयता का समाधान

अभिनव

लम्बे समय तक कश्मीर अराजकता की स्थिति में रहने के बाद अपेक्षाकृत सामान्यता की स्थिति में लौटता हुआ नज़र आ रहा है। लेकिन इसका अर्थ कोई भी यह नहीं लगा रहा है कि कश्मीर प्रश्न का समाधान हो गया है। सभी जानते हैं कि एक ज्वार अभी उठकर ठण्डा पड़ा है; जनता लगभग साढ़े तीन महीनों तक सड़कों पर रहने के बाद अब सुस्ता रही है; लेकिन इस उभार ने जो सवाल उठाये थे, वे अभी भी अपनी जगह पर हैं। 1954 से लेकर आज तक ऐसा अनगिनत बार हुआ है कि भारतीय राज्य के दमन की मुख़ालफत करने के लिए कश्मीर की आम जनता सड़कों पर उतरती रही है। कभी सेना के दमन के बूते, कभी सड़कों पर थकाकर तो कभी कूटनीति के ज़रिये जनता के उभार को शान्त करने की कोशिश की जाती रही है। लेकिन इन सबके बावजूद 56 वर्ष में कश्मीर की समस्या का समाधान नहीं हो सका है और यह एक नासूर बनती जा रही है। आख़िर कश्मीर की समस्या क्या है? क्या कारण है कि हर कुछ वर्षों के अन्तराल पर कश्मीर की जनता सड़कों पर उतर आती है?

मौजूदा संकट

kashmir 2कश्मीर में मौजूदा संकट की शुरुआत जुलाई महीने में सशस्त्र बलों द्वारा भीड़ को छितराने के लिए किये गये हमले में एक किशोर तुफैल मट्टू की मौत के साथ हुई। तब से कश्मीर की जनता अभी हाल तक सड़कों पर थी। यह कोई उग्रवादियों की भीड़ नहीं थी। यह आम जनता थी जिनमें सशस्त्र बलों द्वारा किये जा रहे ज़ुल्मों के ख़िलाफ भयंकर ग़ुस्सा उबल रहा था। इस भीड़ में स्कूली बच्चों से लेकर अधेड़ स्त्री और पुरुष, किशोरवय लड़के और नौजवान थे। इस बात को मानने के लिए शासक वर्ग भी मजबूर हुआ कि ये आतंकवादी नहीं थे, जो सशस्त्र बलों पर पथराव कर रहे थे। मनमोहन सिंह ने इस बात पर बहुत अफसोस और चिन्ता जतायी कि इस भीड़ में आम जनता थी। तुफैल मट्टू की मौत तो सिर्फ एक तात्कालिक कारण था। पिछले कई वर्षों से सशस्त्र बलों द्वारा निर्दोष नौजवानों की हत्या, महिलाओं के अपहरण और बलात्कार और यातना की घटनाओं में तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है। अभी शोपियाँ में दो युवा स्त्रियों के बलात्कार और हत्या और उसके बाद दोषियों को बचाने की कोशिश में लगे राज्य और केन्द्र सरकार के कारकूनों को कोई भूला नहीं है। इसके बाद माछिल फर्ज़ी मुठभेड़ में कश्मीर के नौजवानों की हत्या का मसला सामने आया। ये तो कुछ अहम घटनाएँ थीं जो रोशनी में आयीं। कश्मीरी जनता को लगातार जिस तरह फौजी संगीनों के साये और अपमान में जीना पड़ता है, वह किसी भी कौम के लिए दमघोंटू होगा। इस दमघोंटू माहौल के ख़िलाफ बग़ावत के तौर पर ही कश्मीरी जनता सड़कों पर थी। इस संकट की शुरुआत के बाद से कश्मीर के लोग काफी हद तक सैयद अली शाह गिलानी, मसर्रत आलम और अन्द्राबी जैसे इस्लामिक कट्टरपन्थी अलगाववादी नेताओं के मुताबिक चल रहे थे। कश्मीर में चुनावों की तथाकथित सफलता के बाद मीडिया ने जमकर प्रचार किया था कि कश्मीर के लोगों ने भारतीय लोकतन्त्र को स्वीकार कर लिया है और ऐसा लगने लगा था कि गिलानी और मसर्रत जैसे नेताओं के दिन पूरे हो गये। लेकिन इस दावे की पोल कश्मीरी जनता के इस जनउभार के साथ खुल गयी।

APTOPIX India Kashmir Violenceभारत का खाया-पिया-अघाया ”राष्ट्रवादी” और ”देशभक्त” मध्‍यवर्ग इस पूरे दौरान भारत के प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह और गृहमन्त्री पी. चिदम्बरम को काफी ऊल-जुलूल सुनाता रहा। तमाम वेबसाइटों पर जो सर्वेक्षण हो रहे थे, उसमें भारत के खाते-पीते, शिक्षित, शहरी मध्‍यवर्ग के लोग अपनी राय इस तरह की भाषा में दे रहे थे कि ‘गिलानी को पाकिस्तान भेज दो’, ‘कश्मीर के पत्थर फेंकने वालों के साथ नरमी से पेश आना बन्द करो’, ‘पाकिस्तान को बता दो कि दूध माँगोगे खीर देंगे, कश्मीर माँगोगे चीर देंगे’, ‘कश्मीर के आन्दोलनकारियों से सख्ती से पेश आये सरकार’, आदि। इस मध्‍यवर्ग को कश्मीर की जनता की इच्छा-आकांक्षा जानने से कोई मतलब नहीं है। उसके लिए कश्मीर हर हाल में भारतीय नक्शे के भीतर होना चाहिए, चाहे इसके लिए कश्मीर के बच्चों, किशोरों और नौजवानों तक का ख़ून बहाना पड़े। राज्य की जनता की इच्छा चाहे जो भी हो, भारत ‘अपना मुकुट’ यानी कश्मीर अपने से अलग होने नहीं दे सकता। इस पढ़े-लिखे जाहिल मध्‍यवर्ग को पता नहीं है कि एक सैन्य शासन के अन्तर्गत रहने का क्या अर्थ होता है। उसे मालूम नहीं है कि कश्मीर में पिछले डेढ़ दशक में सशस्त्र बलों के हाथों 60,000 कश्मीरी अपनी जान गँवा चुके हैं और 7,000 लापता हैं। हाल ही में तमाम सामूहिक कब्रें बरामद हुई हैं जो इन लापता लोगों का सुराग हो सकती हैं। उन्हें नहीं पता कि इसकी कोई गिनती नहीं कि कितनी औरतों का अपहरण और बलात्कार किया जा चुका है और कितने मासूम अपाहिज हो चुके हैं। उन्हें इससे कोई सरोकार ही नहीं है। उन्हें नहीं पता कि ये मौतें उस दौर में नहीं हुई हैं जब घाटी सशस्त्र आतंकवाद का दंश झेल रही थी। 2003 से लेकर अब तक के दौर में यह सबकुछ हुआ है, जिस दौर के बारे में सरकारी ऑंकड़े ही बताते हैं कि घुसपैठ को ख़त्म किया जा चुका है और घाटी में कुल मिलाकर 1,000 आतंकवादी भी नहीं हैं। लेकिन आतंकवाद का यह दौर ख़त्म होने के बाद भी घाटी में आज सशस्त्र बलों के 7 लाख जवान मौजूद हैं; वहाँ ख़ुफिया एजेंसियाँ इस तरह से काम करती हैं, मानो वे किसी दुश्मन देश के भीतर काम कर रही हों; सड़कों पर घूमने भर से आतंकित कर देने वाली सैन्य उपस्थिति को आप देख सकते हैं। कहीं पर सेना के शासन के बारे में सुनने और उसके तहत रहने में ज़मीन-आसमान का अन्तर होता है। सेना की इस ग़ैर-ज़रूरी उपस्थिति को कश्मीर की जनता भारत द्वारा कब्ज़ा मानती है। यही कारण है कि आज जो कश्मीर में चल रहा है उसके निशाने पर हर वह चीज़ है जो भारत की उपस्थिति का प्रतीक है। चाहे वह स्कूल हो, सरकारी ऑफिस हो, सैन्य छावनी हो, पुलिस स्टेशन हो, या कोई और सरकारी इमारत।

कश्मीर के मौजूदा जनउभार के शुरू होने के साथ ही हर अख़बार के टकसाली स्तम्भ लेखक इस समस्या का हल सुझाने लगे। कोई लोहिया और जयप्रकाश नारायण द्वारा सुझाये गये समाधान की बात कर रहा था तो  कोई गाँधी के सुझाये समाधान की बीन बजा रहा था। जबकि भारतीय बुर्जुआ वर्ग के ये सभी नुमाइन्दे कोई हल सुझा ही नहीं रहे थे। मौखिक तौर पर कश्मीरी जनता के आत्मनिर्णय की बात करते हुए भी, अगर इनके हाथ में सत्ता आती तो निश्चित तौर पर ये कश्मीर को भारत में शामिल रखने के लिए हर सम्भव कदम उठाते, शायद वे सभी कदम जो आज भारतीय राज्य का दमनकारी तन्त्र उठा रहा है। कश्मीर की समस्या के ऐसे समाधान जो एक अख़बार के सम्पादकीय पन्ने पर ही सिमट जाते हैं, कोई अर्थ नहीं रखते। कश्मीर के राष्ट्रीय प्रश्न का हल कैसे होगा यह जानने के लिए इस समस्या के इतिहास पर एक संक्षिप्त निगाह डालनी होगी।

कश्मीर समस्या : इतिहास के आईने में

kashmir 1कश्मीर का भारत में विलय किसी सामान्य स्थिति में नहीं हुआ था। अंग्रेज़ों की साज़िश, नेहरू के अड़ियल रुख़ और जिन्ना द्वारा साम्प्रदायिक अवस्थिति अपनाये जाने के कारण भारत का विभाजन साम्प्रदायिक आधार पर किया गया था। कश्मीर एक मुसलमान-बहुल राज्य था लेकिन वहाँ का शासन एक हिन्दू राजा के हाथ में था। कश्मीर ऐतिहासिक रूप से साम्प्रदायिकता से काफी हद तक मुक्त रहा था। कश्मीर की जनता में जिस नेता की उस समय सर्वाधिक पकड़ थी, वह थे शेख़ अब्दुल्ला। शेख़ अब्दुल्ला साम्प्रदायिक आधार पर पाकिस्तान में शामिल होने को लेकर सशंकित थे और एक इस्लामिक सिध्दान्तों पर बने राज्य में शामिल नहीं होना चाहते थे। आज़ादी के तुरन्त बाद पाकिस्तान द्वारा समर्थित कबायली हमले से शेख़ अब्दुल्ला पाकिस्तान में शामिल होने पर विचार के स्पष्ट रूप से विरोधी हो गये। लेकिन भारतीय संघ में शामिल होने को लेकर भी उनकी अपनी शंकाएँ थीं। कश्मीरी जनता बिना शर्त भारतीय संघ में शामिल होने को लेकर भी असमंजस में थी और अपनी अलग राष्ट्रीय पहचान को लेकर सचेत थी। काफी चिन्तन-मनन और राजनीतिक उथल-पुथल के बाद 1949 में कश्मीर ने सशर्त भारतीय संघ में होना स्वीकार किया। कश्मीर इस शर्त पर भारतीय संघ में शामिल हुआ कि विदेशी मसलों, सुरक्षा और मुद्रा चलन के अतिरिक्त भारतीय राज्य कश्मीर की स्वायत्तता को बरकरार रखेगा और अन्य सभी मसलों पर निर्णय लेने की शक्ति कश्मीर की सरकार के हाथ में होगी। इसके लिए भारतीय संविधान में विशेष धारा 370 को शामिल किया गया। यह इस बात का प्रावधान करती थी कि कश्मीर का मुख्यमन्त्री प्रधानमन्त्री कहलायेगा और राज्यपाल गवर्नर। कश्मीर के आन्तरिक मामलों में कश्मीर की सरकार को स्वायत्तता प्रदान की जायेगी। इस तरह से भारतीय संविधान के दायरे के भीतर कश्मीर को एक स्वायत्त राज्य के रूप में शामिल किया गया। लेकिन नेहरू को संघीयता का यह ढाँचा स्वीकार्य नहीं था। भारत और पाकिस्तान के विभाजन में अक्सर सारी ज़िम्मेदारी जिन्ना के सिर डाल दी जाती है, लेकिन कम ही लोग यह जानते हैं कि क्रिप्स मिशन के बाद जिन्ना ने अलग पाकिस्तान की माँग छोड़ने का प्रस्ताव नेहरू के सामने रखते हुए कहा था कि एक ऐसे भारतीय संघ में रहना उन्हें मंजूर है जिसमें मुस्लिम-बहुल राज्यों को सापेक्षिक स्वायत्तता हो। लेकिन एक मज़बूत केन्द्रीय राज्य मशीनरी के पक्ष में खड़े नेहरू ने इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया। इस मुद्दे पर नेहरू की गाँधी के साथ भी असहमति थी। पटेल और नेहरू हर कीमत पर एक मज़बूत केन्द्र चाहते थे, चाहे इसके लिए विभाजन का दंश ही क्यों न झेलना पड़े।

कश्मीर के शामिल होने पर कश्मीरी जनता के जनमत संग्रह का भी वायदा किया गया था, जिसे कभी निभाया नहीं गया। इसके लिए नेहरू का तर्क यह था कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1947-48 में पाकिस्तान-समर्थित हमले के बाद यह तय किया गया था कि पाकिस्तान कश्मीर के उत्तर-पश्चिमी हिस्से से अपनी सेनाएँ वापस बुलायेगा और उसके बाद जनमत संग्रह कराया जायेगा। पाकिस्तानी शासकों ने अपना कब्ज़ा छोड़ा नहीं और इसके कारण जनमत संग्रह कराने से भारतीय शासकों ने इनकार कर दिया। लेकिन भारत और पाकिस्तान की क्षेत्रीय महत्तवाकांक्षाओं में पिस गया कश्मीरी अवाम।

1953 में नेहरू ने शेख़ अब्दुल्ला की चुनी हुई सरकार को बखरस्त कर दिया और शेख़ अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया और कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। शेख़ अब्दुल्ला बीच में बाहर आये लेकिन जनमत संग्रह को लेकर उनकी अपेक्षाकृत नरम अवस्थिति अब भी नेहरू को स्वीकार नहीं थी। कुछ समय बाद उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। 1964में शेख़ अब्दुल्ला जब रिहा हुए तब तक वे कश्मीर में जनमत संग्रह और उसकी स्वायत्तता के मसले को लेकर काफी हद तक समझौतापरस्त हो चुके थे। 1970 का दशक आते-आते धारा 370 का कोई अर्थ नहीं रह गया था। भारतीय शासक वर्ग की इस असुरक्षा भावना ने, कि अगर कश्मीर की जनता को खुला हाथ दिया गया तो वह पाकिस्तान में शामिल हो सकती है, कभी भी कश्मीर की जनता को भारत में अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के साथ शामिल नहीं होने दिया। कश्मीर की जनता अपनी इच्छा से स्वायत्तता की शर्त के साथ भारतीय संघ में शामिल हुई थी। ऐसे में भारतीय राज्य द्वारा उसके साथ ऐसे व्यवहार को कश्मीरी जनता ने एक धोखा और विश्वासघात के रूप में लिया। यही कारण है कि आज फारुख़ अब्दुल्ला जैसे समझौतापरस्त भी 1953 तक की स्थिति को बहाल करने की माँग कर रहे हैं। क्योंकि इतनी माँग किये बग़ैर वे कश्मीरी जनता में अपना हर किस्म का आधार खो बैठेंगे। पहले ही कश्मीरी जनता का एक विचारणीय हिस्सा उन्हें ग़ुलाम बख्शी मोहम्मद जैसा ग़द्दार मानने लगा है। ग़ुलाम बख्शी मोहम्मद शेख़ अब्दुल्ला के हटाये जाने के बाद कश्मीर का मुख्यमन्त्री बना था और पूरी तरह भारतीय राज्य की कठपुतली के रूप में काम करता था।

भारत की पूँजीवादी सत्ता द्वारा किये गये इस ऐतिहासिक विश्वासघात ने कश्मीरी जनता में अलगाव की भावना को और अधिक बढ़ाया। जनमत संग्रह और स्वायत्ता की माँग को लेकर अलग-अलग समय पर अलग-अलग संगठनों ने कश्मीरी जनता के बीच काम किया और उन्हें संगठित किया। इस प्रकार की गतिविधियाँ जिस रफ्तार से बढ़ीं, उसी रफ्तार से भारतीय राज्य का चरित्र अधिक से अधिक दमनकारी होता गया। सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम लागू होने के बाद कश्मीर में एक सैन्य शासन जैसी स्थिति बन गयी। इस पूरे दौर में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने और धार्मिक कट्टरपन्थी आतंकवाद के बढ़ने की प्रक्रिया जारी रही। 1980 के दशक से कश्मीर में आतंकवाद एक बड़ी परिघटना के रूप में अस्तित्व में आ चुका था। इस दशक का उत्तरार्ध्द आतंकवाद की भयंकरता का उत्कर्ष था। 1989 से1991-92 के बीच ही हज़ारों कश्मीरियों ने आतंकवाद और भारतीय राज्य के बीच के टकराव की कीमत अपनी जान देकर चुकायी। धार्मिक कट्टरपन्थी आतंकवाद का कश्मीरी जनता के एक हिस्से में आधार भी तैयार हुआ। सेना द्वारा अकल्पनीय दमन, हत्या, बलात्कार और अपहरण की प्रतिक्रिया में कश्मीरी घरों के नौजवान आतंकवाद के रास्ते पर जाने लगे। भारतीय राज्य द्वारा किये गये धोखे और उसके बाद कश्मीरी जनता के भयंकर दमन ने मिलकर कश्मीरी जनता के अलगाव को नयी हदों तक बढ़ा दिया था। आज़ादी या फिर पाकिस्तान में शामिल हो जाने की बात करने वाले अलगाववादी समूहों की कश्मीरी जनता के बीच ज़बरदस्त पकड़ बन चुकी थी। लेकिन इस बात की सच्चाई यह है कि इसके लिए काफी हद तक भारतीय राज्य का विश्वासघात और सेना-दमन ज़िम्मेदार था। निश्चित रूप से इसमें सहायक योगदान पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी और धार्मिक कट्टरपन्थी गतिविधियों को बढ़ावा देना भी था। एक और महत्त्‍वपूर्ण कारण यह था कि 1970 के दशक में जनसंघ और उसके बाद संघ-समर्थित जम्मू प्रजा परिषद की साम्प्रदायिक गतिविधियों ने भी हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच के तनाव को काफी बढ़ाया। यह अनायास नहीं था कि कश्मीर में सदियों से साथ रह रहे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच 1930 के दशक से तनाव की स्थिति बनने लगी थी। इसके लिए इस्लामिक कट्टरपन्थ और संघ की गतिविधियाँ, दोनों ही ज़िम्मेदार थीं।

अलगाववादी आतंकवाद को कुचलने के लिए भारत की सरकार ने 1980 के दशक के अन्त में एक विशाल अभियान शुरू किया। 1989 से भारतीय राज्य ने कश्मीर घाटी में आतंकवाद के विरुध्द बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया और अपनी सैन्य शक्तिमत्ता के बूते पर 1993 आते-आते आतंकवादी समूहों को काफी हद तक कुचल डाला। बताने की ज़रूरत नहीं है कि यही वह समय था जिस दौरान आतंकवाद को कुचलने के नाम पर कश्मीरी जनता का भी सेना ने भयंकर दमन और उत्पीड़न किया। 1993 में भारत सरकार ने दावा किया कि कश्मीर घाटी में आतंकवाद और पाकिस्तान से होने वाली घुसपैठ को ख़त्म कर दिया गया है और अब घाटी में एक अनुमान के अनुसार केवल 600 से 1,000 सशस्त्र आतंकवादी मौजूद हैं। लेकिन आतंकवाद को कुचलने के लिए जिस ज़बर्दस्त सैन्य उपस्थिति को सही ठहराया जाता रहा था, वह इसके बाद भी मौजूद रही। सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम भी अपनी जगह पर रहा और सेना द्वारा इसका अमानवीय दुरुपयोग जारी रहा।

1990 के दशक को अपेक्षाकृत शान्त माना जा सकता है। सभी उग्रवादी अलगाववादी गुटों को कुचलने में भारत की सरकार कामयाब रही थी। कश्मीरी जनता किसी अन्य विकल्प के अभाव में इन आतंकवादी अलगाववादियों का समर्थन करती थी। कश्मीरी जनता का एक छोटा हिस्सा सेना के दमन की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान तक में शामिल हो जाने का समर्थन करता था। लेकिन घाटी में आतंकवादी संगठनों के दमन के बाद के दस वर्ष, यानी, 1990 का दशक तुलनात्मक रूप से एक चुप्पी का दौर रहा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि कश्मीरी जनता की आकांक्षाएँ और उसकी चाहतें ख़त्म हो चुकी थीं। भारतीय सैन्य शक्तिमत्ता के सामने आतंकवाद या सशस्त्र संघर्ष टिक नहीं सकता था, यह साबित हो चुका था। कश्मीरी जनता के अधिकांश अलगाववादी दलों को न्यूट्रलाइज़ या समाप्त किया जा चुका था। जे.के.एल.एफ. (जम्मू एण्ड कश्मीर लिबरेशन फ्रण्ट) की ताकत काफी कम हो चुकी थी और यासीन मलिक जैसे नेता दमन झेलने के बाद नरम पड़ चुके थे। लेकिन डेढ़ दशक बाद भारतीय शासकों की यह ख़ुशफहमी दूर हो चुकी है कि कश्मीर समस्या का समाधान उसने सैन्य-शक्ति से कर दिया है। नयी सहड्डाब्दि के पहले दशक के मध्‍य से एक बार फिर से कश्मीर में उथल-पुथल शुरू हो चुकी थी।

हुर्रियत कान्फरेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी के नेतृत्व में तहरीक-ए-हुर्रियत का आन्दोलन शुरू हो चुका था। और इस बार आन्दोलन का स्वरूप बिल्कुल भिन्न था। कश्मीरी जनता में सैन्य-दमन और अत्याचार के ख़िलाफ जो भयंकर असन्तोष सुलग रहा था, उसे एक मार्ग मिल गया था। निश्चित रूप से, गिलानी एक इस्लामी कट्टरपन्थी नेता हैं और कई लोग यह भी आरोप लगाते हैं कि आज़ादी या स्वायत्ता की माँग के पीछे उनकी असली मंशा पाकिस्तान में शामिल होने की है। गिलानी के नये सिपहसालार मसर्रत आलम और आसिया अन्द्राबी ने जिस किस्म की गतिविधियों को अंजाम दिया उससे यह शक और पुख्ता हुआ। मसर्रत आलम और ख़ास तौर पर आसिया अन्द्राबी एक इस्लामी कश्मीरी राज्य बनाने के पक्षधर हैं। गिलानी को भारतीय राज्य से बातचीत की टेबल पर भी बैठना होता है, इसलिए वे अपने इस्लामी कट्टरपन्थ को दिखलाते हुए भी आज़ादी की बात तुलनात्मक रूप से बच-बचाकर करते हैं। लेकिन आसिया अन्द्राबी ने गिलानी के नेतृत्व में अपना राजनीतिक कैरियर शुरू ही कट्टरपन्थी गतिविधियों से किया। सबसे पहले अन्द्राबी ने औरतों पर बुरका थोपने और ब्यूटी पार्लरों पर हमले से शुरुआत की। इसके बाद, उन्होंने हर उस चीज़ पर हमला किया जो आधुनिकता का प्रतिनिधित्व करती है। मसर्रत आलम ने भी अपने इस्लामी कट्टरपन्थी रुझान को खुलकर पेश किया। लेकिन साथ-साथ इन लोगों ने भारतीय सेना द्वारा किये जा रहे अत्याचारों पर जमकर हमला बोला और लोगों को इसके विरुध्द गोलबन्द और संगठित करना शुरू किया। इस समय और कोई ऐसी ताकत मौजूद नहीं थी जो इस रैडिकल तेवर और साहस के साथ भारतीय सेना के दमन के ख़िलाफ आवाज़ उठा रही हो। नतीजतन, तहरीक आन्दोलन के पक्ष में जनता ने अपना समर्थन जताना शुरू कर दिया। 2004-05 आते-आते इस आन्दोलन ने कश्मीर घाटी में गहरे तक अपनी जड़ें जमा ली थीं। इसका पहला बड़ा प्रमाण मिला 2009 में अमरनाथ यात्रा के लिए भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ हुए आन्दोलन में। इस आन्दोलन में काफी समय बाद ‘भारत वापस जाओ’ के नारे जमकर लगे। लेकिन इस बार इस प्रतिरोध पर खुलकर सैन्य ताकत का इस्तेमाल सम्भव नहीं था, क्योंकि प्रतिरोध का रूप शान्तिपूर्ण नागरिक प्रतिरोध का था। अधिक से अधिक पथराव किये गये। लेकिन कहीं भी एक भी कारतूस नहीं दाग़ा गया। यह नया प्रतिरोध ज्यादा आकारहीन और शक्तिशाली था। कारण यह था कि इस आन्दोलन की कतारों में सड़क पर आप जिन चेहरों को देख सकते थे, वे कोई लश्कर-ए-तैयबा या हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकवादी नहीं थे, जो ए.के.-47 से लैस हों। इसमें किशोरवय के स्कूल जाने वाले लड़के, विशेष रूप से बेरोज़गार नौजवान, प्रौढ़ और अधेड़ महिलाएँ और आम जनता थी, जो भारतीय सेना के दमन और उत्पीड़न के ख़िलाफ अपनी नफरत के चलते सड़कों पर उतरी थी।

यह नया आन्दोलन जो वास्तव में एक जनउभार था, भारतीय राज्य के लिए ख़ासतौर पर काफी शर्मिन्दगी पैदा करने वाला था। क्योंकि अभी कुछ समय पहले ही करीब 10 लाख सशस्त्र बलों की स्थिति में कश्मीर में चुनाव करवाये गये थे और कश्मीर में अस्तित्वहीन पार्टियों, जैसे कि सपा, राजद, बसपा आदि से भी पर्चे भरवा कर 60 प्रतिशत तक का मतदान करवाने में सफलता हासिल की गयी थी। इस चुनाव को भारतीय शासक वर्ग ने भारतीय लोकतन्त्र की कश्मीर में विजय के रूप में पेश किया था और खाता-पीता ”राष्ट्रवादी” भारतीय मध्‍यवर्ग इससे काफी प्रसन्न हुआ था और उसे लगा था कि कश्मीर समस्या का समाधान लगभग हो ही गया है। लेकिन 2009 में अमरनाथ यात्रा विवाद और उसके बाद शोपियाँ में दो महिलाओं के साथ सशस्त्र बलों द्वारा बलात्कार और हत्या, माछिल फर्जी मुठभेड़ में कश्मीरी युवकों की हत्या, और फिर जुलाई 2010 में तुफैल मट्टू की सेना की गोलाबारी में मौत के बाद से कश्मीरी जनता जिस तरह से सड़कों पर है, उससे ऐसे सारे भ्रमों का निवारण हो गया है।

कश्मीर समस्या और अन्य राज्यों के राष्ट्रीय प्रश्न के समाधान का सही रास्ता : मेहनतकशों की सत्ता

स्पष्ट है कि इस बार कश्मीर का उभार एक इन्तिफादा या जनविद्रोह का रूप लेकर सामने आया है। भारतीय सैन्य-दमन भी इसे हरा नहीं सकता है। सैन्य-दमन कुछ समय के लिए इसे ठण्डा कर सकता है। भारतीय शासक वर्ग भी इस बात को समझ रहा है। यही कारण है कि सैन्य समाधान की बजाय किसी राजनीतिक समाधान और इस समाधान में पाकिस्तान को भी शामिल करने की बात प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह कर रहे हैं। यह काफी समय बाद है कि किसी भारतीय प्रधानमन्त्री ने खुले तौर पर कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए पाकिस्तान की भागीदारी आमन्त्रित की है। गिलानी की सारी माँगों को मानने के लिए भारतीय शासक वर्ग कतई तैयार नहीं है। कश्मीर पर अपने दमनकारी रुख़ को ख़त्म करने के लिए भी भारतीय शासक वर्ग तैयार नहीं है, क्योंकि उसे भय है कि कश्मीर पर शिकंजा ढीला करते ही वह पाकिस्तान के पास चला जायेगा। लेकिन हाल में दिये गये राजनीतिक पैकेज में भारतीय शासकों ने कुछ बातें मानी हैं। गिरफ्तार लोगों को छोड़ने की बात की गयी है और साथ ही सर्वपक्षीय प्रतिनिधिमण्डल को कश्मीर भेजा गया।

लेकिन सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून और डिर्स्टब्ड एरियाज़ एक्ट को हटाने पर शासक वर्गों में दो-फाड़ हो गया है। भाजपा हमेशा की तरह इसके बिल्कुल ख़िलाफ है और अपनी दक्षिणपन्थी फासीवादी लाइन के अनुसार वह कश्मीर को हमेशा की तरह ऍंगूठे के नीचे रखने की पक्षधर है। कांग्रेस में इस सवाल को लेकर असमंजस की स्थिति है। एक हिस्सा इसे हटाने पर विचार करने की बात कर रहा है, दूसरा इसमें संशोधन की और तीसरा पूरी तरह दक्षिणपन्थी रुख़ का समर्थन कर रहा है। संसदीय वामदल और क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधि बस बातचीत से हल और राजनीतिक समाधान की बात करते हैं। संसदीय वामदल सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को हटाने का जबानी समर्थन करते हैं, लेकिन इसका कोई विशेष अर्थ नहीं है। फिलहाल, भारतीय शासक वर्गों की स्थिति कश्मीर की जनता को थका देने की है। अपने दमनकारी रुख़ में तो वह कोई उल्लेखनीय कमी नहीं ला रहा है लेकिन मीठी बातों की बौछार कर रहा है और साथ में कुछ प्रतीकात्मक कदम उठा रहा है। एक बार कश्मीर के स्थिर होने पर शासक वर्ग सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून में संशोधन पर विचार वाकई कर सकता है। लेकिन इसका अर्थ कश्मीर समस्या का समाधान कभी नहीं हो सकता। चक्रीय क्रम में कश्मीर की जनता सड़कों पर कुछ-कुछ अन्तराल के बाद उतरती रही है और उतरती रहेगी।

सैन्य-दमन का ख़ात्मा कश्मीर में मौजूदा ढाँचे के भीतर कर पाना भारतीय शासक वर्ग की किसी भी पार्टी के लिए बहुत मुश्किल है। जो पार्टी स्वायत्ता या जनमत संग्रह की बात को मानेगी, वह पूँजीवादी राजनीति के दायरे के भीतर अपनी ही कब्र खोदेगी। कश्मीरी जनता की जो मूल माँगें हैं, यानी स्वायत्ता और आत्मनिर्णय का अधिकार, वे सैन्य-दमन के रास्ते से कभी ख़त्म नहीं होंगी। पूँजीवादी व्यवस्था के दायरे के भीतर ये माँगें कभी मानी जायेंगी इसकी सम्भावना काफी क्षीण है और कभी सैन्य-दमन और कभी जनता को सड़कों पर थका देने की रणनीति और कभी इन दोनों रणनीतियों के मिश्रण से भारतीय शासक वर्ग कश्मीर पर अपने अधिकार को कमोबेश इसी रूप में कायम रखने का प्रयास करता रहेगा।

यह भी सच है कि गिलानी, मसर्रत और अन्द्राबी जैसे धार्मिक कट्टरपन्थियों की कश्मीर की आज़ादी की माँग की अनुगूँज पूरे जम्मू-कश्मीर में नहीं है। यहाँ तक कि कश्मीर घाटी में भी जनता का एक विचारणीय हिस्सा उनके साथ सिर्फ इसलिए है क्योंकि भारतीय राज्य के दमन का कारगर विरोध करने वाली और कोई सक्षम ताकत नहीं है। जिस समय जे.के.एल.एफ. मौजूद था, जनता का इससे भी ज़बर्दस्त समर्थन उसे प्राप्त था और जे.के.एल.एफ. को एक सेक्युलर विश्वसनीयता वाला संगठन माना जा सकता है। आज गिलानी की अपील इसी बात में है कि वही भारतीय राज्य के दमन का प्रतिरोध कारगर रूप से करने वाले नेता हैं। गिलानी की अलगाव की माँग का लेह-लद्दाख के बौध्दों, कारगिल के शिया मुसलमानों और जम्मू के सिख और हिन्दुओं में कोई समर्थन नहीं है। हालाँकि गिलानी और मसर्रत आलम दोनों ही बोलते हैं कि उनके आज़ाद कश्मीर में हिन्दुओं और बौध्दों और साथ ही शिया मुसलमानों को अपने तरीके से पूजा और जीवन की पूरी आज़ादी होगी और उनका इस्लाम इन समुदायों के लिए भी कल्याणकारी होगा, लेकिन इस पर कोई भरोसा नहीं करता। ख़ासतौर पर जब उन्हीं के संगठन की आसिया अन्द्राबी इस्लामिक कट्टरपन्थी आतंक फैलाने की गतिविधियों में संलिप्त हों। इसलिए एक बात तो साफ है कि आत्मनिर्णय का अधिकार पूँजीवादी दायरे के भीतर मिल पाने की सम्भावना क्षीण होती जा रही है। इसके कई कारण हैं। एक तो यह कि दुनिया भर में राष्ट्रों के आत्मनिर्णय के अधिकार को लेकर लड़ने वाला वर्ग रैडिकल बुर्जुआ वर्ग रहा है। आज के दौर में दुनिया भर में आत्मनिर्णय के अधिकार की लड़ाई कमज़ोर पड़ने का एक कारण यह है कि विश्व पूँजीवाद की संरचना और कार्यप्रणाली में आये बदलावों के कारण बुर्जुआ वर्ग के ढाँचे और चरित्र में कई परिवर्तन आये हैं और उसकी रैडिकल सम्भावनाएँ लगातार क्षीण हुई हैं। इसीलिए कश्मीर में रैडिकल बुर्जुआ वर्ग का कोई हिस्सा कभी संघर्ष के नेतृत्व में होता है, और फिर वह समझौतापरस्त हो जाता है। फिर कोई नया रैडिकल हिस्सा नेतृत्व में आता है, और फिर वह भी समझौतापरस्त हो जाता है। और यही प्रक्रिया जारी रहती है। दूसरी बात यह कि कश्मीर जैसी राष्ट्रीयता के संघर्ष अगर विजयी हो भी जायें तो उनके स्वतन्त्र अस्तित्व की सम्भावना कम ही होगी। ज्यादा सम्भावना यही होगी कि ऐसा छोटा, भूमि से घिरा, सीमित प्राकृतिक संसाधनों वाला कोई देश किसी पड़ोसी ताकतवर पूँजीवादी देश का उपग्रह राज्य बन जायेगा। यह वही समस्या है जिसका सामना भूटान, नेपाल आदि जैसे देशों को करना पड़ता है। वहाँ जनवादी और राष्ट्रीय प्रश्न के कार्यभारों को पूरा करने के लिए हो रहे जनसंघर्षों की सफलता काफी हद तक भारत जैसे देशों में सर्वहारा वर्ग की मुक्ति की लड़ाई से जुड़ी होती है।

फिर आख़िर कश्मीर समस्या का समाधान क्या है? यह एक जटिल प्रश्न है। कश्मीर समस्या का समाधान और न सिर्फ कश्मीर समस्या का, बल्कि भारतीय संघ में राष्ट्रीयता के प्रश्न जहाँ-जहाँ मौजूद हैं, उनका समाधान एक समाजवादी राज्य के तहत ही सही तरीके से हो सकता है, जो इन इलाकों को अलगावग्रस्त कर दमन के शिकंजे में न रखे। आज से ही इन राष्ट्रीयताओं के मेहनतकश अवाम और नौजवानों के बीच क्रान्तिकारी ताकतों को काम करना होगा और उन्हें राजनीतिक रूप से सचेत बनाते हुए पूरी व्यवस्था के परिवर्तन की लड़ाई का एक अंग बनाना होगा। उन्हें इस प्रक्रिया में ही यह यकीन पैदा होगा और यह समझ आयेगा कि आत्मनिर्णय का अधिकार उन्हें सही और न्यायपूर्ण रूप में तभी मिल सकता है, जब भारतीय पूँजीवादी राज्य को उखाड़ फेंका जाये और एक मेहनतकश सत्ता की स्थापना की जाये जिसमें उत्पादन, राज-काज और समाज के ढाँचे पर उत्पादन करने वाले वर्गों का हक हो। क्रान्तिकारी संघर्ष में इन राज्यों की जनता का साथ और भागीदारी ही इस बात को भी सुनिश्चित करेगी कि इन दमित-उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं को अपने आत्मनिर्णय और अपना भविष्य तय करने का हक मिले और इस संघर्ष की प्रक्रिया में ही एक राजनीतिक एकीकरण भी होगा, जो उन्हें एक ऐसे राज्य में अपनी पृथक राष्ट्रीय पहचान के साथ कायम रखने की ताकत रखता है, जो राजनीतिक, आर्थिक, राष्ट्रीय और सांस्कृतिक शोषण, उत्पीड़न और दमन पर आधारित न हो।

राष्ट्रीयताओं के संघर्षों को पूँजीवाद-विरोधी क्रान्ति का अंग बनाना आज भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के एजेण्डे पर प्रमुखता के साथ मौजूद होना चाहिए। इन संघर्षों का व्यवस्था-विरोधी संघर्ष के साथ मोर्चा उनके संघर्षों को भी शक्ति प्रदान करेगा और पूँजीवाद-विरोधी क्रान्तिकारी आन्दोलन को भी मज़बूत बनायेगा। इन राज्यों में जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार के समर्थन के साथ आम जनता को साथ लेने के साथ ही, कम्युनिस्टों को राजनीतिक प्रचार भी करना चाहिए और साथ ही वहाँ के मज़दूर वर्ग को जागृत, गोलबन्द और संगठित कर भावी क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल करना चाहिए। केवल इस रास्ते से ही हम राष्ट्रीयता के इन संघर्षों को व्यवस्था-विरोधी संघर्षों का हिस्सा बना सकते हैं और केवल इसी रास्ते से हम भविष्य में इन राज्यों की जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार को सुनिश्चित कर सकते हैं।

पिछले 64 वर्षों का भारत का इतिहास एक बात को साफतौर पर दिखला देता है। राष्ट्रीयता के संघर्षों का अलग से भविष्य धीरे-धीरे धूमिल होता जा रहा है। दमित राष्ट्रीयताओं के संघर्षों को अगर सही तरीके से मुकाम तक पहुँचना है तो उन्हें पूँजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी क्रान्ति के संघर्ष से जुड़ना होगा। हमारे देश का ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का आधुनिक इतिहास इस बात को पुष्ट करता है कि ऐसे संघर्ष अब अगर हारे नहीं जायेंगे तो उनका जीता जाना भी मुश्किल होता जा रहा है। आत्मनिर्णय का अधिकार सही मायने में और न्यायपूर्ण तरीके से समाजवाद ही दे सकता है, पूँजीवाद नहीं।

 

मज़दूर बिगुल, दिसम्‍बर 2010