मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण अध्यादेश और मुआवज़े का अर्थशास्त्र

कात्यायनी

असमय बारिश ने फ़सलों का भारी नुक़सान किया है। जो सरकार पूँजीपतियों को इतने बड़े पैमाने पर छूट और सब्सिडी देती रहती है और उनके द्वारा डकारे गये क़र्ज़े को मंसूख करती रहती है, उससे बर्बाद फ़सलों के मुआवज़े की माँग बिल्कुल वाजिब है। अब यह दीगर बात है कि जो भी दर तय करके मुआवज़े दिये जाते हैं उसमें छोटे-मझोले किसानों को तो सौ-दो सौ-हज़ार रुपये के चेक मिलते हैं, जो जले पर नमक छिड़कने के समान ही होता है। यह भी तय है कि इस प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की बन्दरबाँट भी होती है।

लेकिन हम थोड़ी देर के लिए आदर्श स्थिति की कल्पना करें। यदि बेहतर दर पर तय मुआवज़े भ्रष्टाचार-मुक्त ढंग से वितरित हों, तो भी पूँजीवादी व्यवस्था में यह वितरण अन्यायपूर्ण होता है और हर हाल में इसका लाभ उत्पादन के साधनों (ज़मीन, कृषि उपकरण आदि) के उन बड़े मालिकों को ही ज़्यादा मिलता है जो दूसरों की श्रमशक्ति निचोड़कर बाज़ार के लिए पैदा करते हैं। अर्थशास्त्र के आम नियमों के अमूर्त जटिल विस्तार में जाने के बजाय, आइये इस बात को सरल उदाहरणों से समझने की कोशिश की जाये।

cartoon18042015मान लीजिये कोई सरकार बहुत वाजिब दर से मुआवज़े की रक़म तय करती है और उसे भ्रष्टाचार-मुक्त तरीक़े से किसानों में वितरित भी कर दिया जाता है। अब जिस धनी किसान/कुलक/ फ़ार्मर के पास खेती का ज़्यादा क्षेत्रफल है, उसे ज़ाहिरा तौर पर ज़्यादा मुआवज़ा मिलेगा और छोटे-मझोले किसानों को उनकी खेती के क्षेत्रफल के हिसाब से मुआवज़े की कम रक़म मिलेगी। धनी किसानों के पास बीस-पच्चीस बीघे से लेकर कई-कई सौ बीघे तक की ज़मीन होती है। मुख्यतः वे बाज़ार में बेचने के लिए पैदा करते हैं और उनकी कुल उपज का बहुत छोटा हिस्सा – आठवाँ-दसवाँ या पचासवाँ तक हिस्सा ही उनके पारिवारिक इस्तेमाल के लिए होता है। प्रकृति की मार से खेती का भारी नुक़सान होने पर भी उनके खाने के लाले नहीं पड़ते। ज़्यादा से ज़्यादा यही होता है कि वे बाज़ार में बहुत कम अनाज बेच पाते हैं और उस सीजन में उनका मुनाफ़ा कम ‘रियलाइज़’ हो पाता है। हालाँकि बाज़ार में अनाज की आवक कम होने से क़ीमतें ऊपर हो जाती हैं तो इस कमी की भी काफ़ी हद तक भरपाई हो जाती है। यदि फ़सल पूरी तरह बर्बाद हो जाये तो भी धनी किसान कंगाल या दिवालिया नहीं होता। अपनी बचत से वह ख़रीदकर खा सकता है और उत्पादन के साधनों के एक छोटे से हिस्से को बेचकर या गिरवी रखकर अगली फ़सल की लागत का इन्तज़ाम कर सकता है। ऐसे धनी किसान को जब मुआवज़ा मिलता है तो वास्तव में समूची आम जनता से वसूली गयी रक़म से भरे सरकारी ख़ज़ाने से उस धनी किसान के मुनाफ़े में आने वाली कमी की भरपाई हो जाती है।

अब एक औसत मझोले किसान को लें जो अपने खेत में मज़दूर नहीं लगाता और पारिवारिक श्रम तथा अपने ही जैसे किसानों के आपसी सहकार के सहारे गुजारे की खेती करता है, यानी मुख्यतः पारिवारिक खपत के लिए पैदा करता है। जब खेती पर प्रकृति की मार पड़ती है तो ऐसे किसानों के खाने के लाले पड़ जाते हैं। बर्बाद फ़सल की पूरी क़ीमत भी यदि मुआवज़े के रूप में मिल जाये, तो भी उनकी परेशानी कम नहीं होती क्योंकि बाज़ार से जिस क़ीमत पर वह ख़रीदकर खाता है, वह किसान द्वारा बेची जाने वाली फ़सल की क़ीमत से (यानी जिस आधार पर मुआवज़े की रक़म तय होती है) हर हालत में ज़्नयादा होती है। तब ऐसे किसानों को भरण-पोषण के लिए मज़दूरी करनी पड़ती है। प्रायः ऐसे किसानों की खेती घाटे की खेती होती है क्योंकि आधुनिक खेती के ‘इनपुट’ के लिए उनके पास नगदी की कमी होती है और अक्सर उनके ऊपर महाजनों या बैंक का क़र्ज़ लदा होता है। ऐसे में मझोले किसान खेत बेचने या गिरवी रखने के लिए मजबूर हो जाते हैं। उनके उजड़कर सर्वहारा की पाँतों में शामिल होने की रफ्तार तेज़ हो जाती है। आत्महत्या करने वाले ज़्यादातर किसान इसी वर्ग के होते हैं। स्पष्ट है कि वाजिब मुआवज़े का न्यायसंगत, भ्रष्टाचारमुक्त वितरण भी ऐसे किसानों के संकट का बोझ हल्का नहीं कर सकता।

अब ग़रीब किसानों को लें, जिनकी स्थिति कमोबेश अर्द्धसर्वहारा की होती है। ग़रीब किसान अपनी साल भर की ज़रूरतों का बहुत कम हिस्सा ही ख़ुद की खेती से पूरा कर पाते हैं। शेष के लिए उन्हें मज़दूरी करनी पड़ती है, यानी अपनी श्रमशक्ति बेचनी पड़ती है। बर्बाद फ़सलों के मुआवज़े की रक़म से ग़रीब किसानों की स्थिति में बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि उनकी खेती होती ही बहुत कम है।

जो गाँवों और शहरों के मज़दूर हैं और शहरों की ग़रीब व आम मध्यवर्गीय आबादी है, वह सबकुछ बाज़ार से ख़रीदकर खाती है। उच्च मध्यवर्गीय आबादी भी सबकुछ ख़रीदकर खाती है लेकिन अनाज, फलों व सब्जियों की क़ीमतें बढ़ने से उनकी अर्थव्यवस्था पर बहुत असर नहीं पड़ता। फ़सल ख़राब होने या बर्बाद होने की स्थिति में गाँव-शहर के मज़दूरों और शहरों के सामान्य मध्यवर्गीय और ग़रीब तबकों के उपभोक्ताओं के लिए मुआवज़ा या सहायता की बात कभी नहीं उठती, जबकि उन्हें महँगे दामों पर हर चीज़ ख़रीदनी पड़ती है और उनका जीना मुहाल हो जाता है। कृषि उत्पादों की बाज़ार में आवक की कमी से पैदा हुई स्थिति को जमाखोर और वायदा कारोबारी और बदतर बना देते हैं। जिन धनी किसानों को मुआवज़े की रक़म अधिक हासिल होती है, उन्हें आसमान छूती क़ीमतों का भी लाभ मिलता है, बिचौलिये और व्यापारी तो लाभ उठाते ही हैं।

शेष आम उपभोक्ता से धनी किसानों के हितों के टकराव को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि फ़सल बहुत अच्छी होने पर बाज़ार में अनाज सब्ज़ी आदि की क़ीमतें कुछ कम होने से (जमाखोर-बिचौलिये-आढ़तिये क़ीमतों को फिर भी ज़्यादा कम नहीं होने देते) धनी किसानों की पेशानी पर बल पड़ जाते हैं, मुनाफ़े की गिरती दर और कुल मुनाफ़े की कमी से वे बौखला जाते हैं। वे माँग करने लगते हैं कि सरकार अधिक लाभकारी दर पर उनकी उपज का ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सा ख़रीद ले। ज़ाहिरा तौर पर यह सरकारी ख़रीद उसी सरकारी ख़ज़ाने से होती है, जिसका अधिकतम हिस्सा बहुसंख्यक आम आबादी से निचोड़े गये परोक्ष करों से आता है।

जो लोग किसान आबादी के विभेदीकरण की सच्चाई को नहीं समझ पाते, वे मुआवज़े के अर्थशास्त्र के इस पूरे गड़बड़ घोटाले को नहीं समझ पाते। वे यह समझ ही नहीं पाते कि धनी किसान के लिए मुआवज़े का मतलब केवल उसके मुनाफ़े में आयी कमी की एक हद तक भरपाई करना है, जबकि मझोले और ग़रीब किसान को जीने के लिए वास्तविक राहत की ज़रूरत होती है। ऐसे में उचित तो यह होता कि मुआवज़े की दर भी विभेदीकृत होती। यानी ज़्यादा खेती वाले धनी किसानों के मुकाबले कम खेती वाले छोटे-मझोले किसानों के लिए मुआवज़े की दर अधिक होती।

इससे भी अहम बात यह है कि धनी किसानों के खेतों में जिन भूमिहीन खेत मज़दूरों के श्रम के बूते उत्पादन होता है, उसके लिए फ़सल ख़राब होने की स्थिति में कोई मुआवज़ा नहीं होता। शहरों के मज़दूरों, दूसरे ग़रीबों और आम मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं के लिए भी किसी प्रकार की सहायता का कोई प्रावधान नहीं होता। सुरसा की तरह मुँह फाड़े विकराल महँगाई के सामने वे पूरी तरह से अरक्षित होते हैं। इंसाफ़ की बात तो यह होती कि धनी किसानों को मुआवज़ा देने के पहले सरकारे आम उपभोक्ताओं को सहायता देने के बारे में सोचतीं। लेकिन हम सभी जानते हैं कि ये सारी बातें परिकाल्पनिक हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में यह सम्भव ही नहीं है। आज तो सबकुछ बाज़ार की शक्तियों के हवाले है, लेकिन कुछ कीन्सियाई नुस्खे यदि लागू भी किये जायें तो उनकी सीमा बनी रहेगी। पूँजीवाद के अन्तर्गत, सरकारें उनके हितों के बारे में सोचती हैं जो उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व के बूते दूसरों की श्रमशक्ति निचोड़ते हैं। शेष को बस उतना ही हासिल हो पाता है कि वे जीवित रहते हुए उत्पादन और पुनरुत्पादन की प्रक्रिया को जारी रख सकें। इसी तरह, पूँजीवाद के अन्तर्गत, कभी मद्धम तो कभी तेज़ गति से, छोटे-मझोले मालिक किसानों का उजड़कर सर्वहारा की पाँतों में शामिल होते जाना उनकी नियति है।

धनी किसान कृषि क्षेत्र के पूँजीपति होते हैं और उनकी मूल समस्या यह होती है कि कृषि उत्पादन की विशेष प्रकृति के कारण उनके मुनाफ़े की दर औद्योगिक वित्तीय पूँजीपतियों के मुकाबले हमेशा कम होती है। कुल निचोड़े गये अधिशेष के, और इसलिए सत्ता के, वे हमेशा ही कनिष्ठ साझेदार होते हैं। जब भी पूँजीवाद का संकट बढ़ता है तो बड़े पार्टनर, यानी उद्योगपति और वित्तीय तन्त्र के स्वामी उसका ज़्यादा से ज़्यादा बोझ अपने छोटे पार्टनर – कृषि क्षेत्र के पूँजीपति पर डालने की कोशिश करते हैं। पूरी खेती यदि कारपोरेट खेती बन जाये, तो भी समस्या हल नहीं होती। फिर खेती का संकट पूरी व्यवस्था के लिए संकट न बन जाये, इसके लिए उन्नत पूँजीवादी देशों में भी लगातार सब्सिडी देकर कृषि-उत्पादन को जारी रखा जाता है।

इस पूरी समस्या का पूँजीवाद के पास कोई समाधान नहीं है। केवल समाजवाद ही समूची खेती का सामूहिकीकरण और राजकीयकरण करके तथा समूचे व्यापार का राजकीयकरण करके कृषि-समस्या को अन्तिम तौर पर हल कर सकता है। लेकिन यह अपने आप में अलग से विस्तृत चर्चा का विषय है।

मज़दूर बिगुल, मई 2015


 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
   
 

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन

Related Images:

Comments

comments