अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे निहत्थे मज़दूरों पर ठेकेदार के गुण्डों ने बरसायीं गोलियाँ: हिमाचल प्रदेश स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मण्डी में हुए गोलीकाण्ड पर एक रिपोर्ट

बिगुल संवाददाता

हिमाचल प्रदेश के मण्डी ज़िले में स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के कमान्द परिसर में पिछले महीने 19 जून 2015 को अपनी जायज़ माँगों को लेकर शान्तिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों पर ठेकेदार के गुण्डों द्वारा गोलियाँ चलायी गयीं। इस गोलीकाण्ड में जहाँ 14 मज़दूर गम्भीर रूप से घायल हो गये, वहीं दूसरी तरफ़ निहत्थे मज़दूरों पर गोलियाँ बरसाने वाले 4 बाउंसर भी मारे गये। पूरा घटनाक्रम कुछ इस प्रकार घटित हुआ कि आईआईटी कमान्द परिसर के निर्माण कार्य में लगे हुए तकरीबन 242 मज़दूर ठेकेदार द्वारा अपने वेतन तथा ईपीएफ़ का भुगतान न किये जाने के कारण पिछले कुछ समय से हड़ताल पर थे। मज़दूरों के अनुसार केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग ने जिस ठेकेदार को निर्माण कार्य पूरा करने का ठेका प्रदान किया था, वह कभी भी उनके मासिक वेतन का भुगतान तय समय पर नहीं करता था। इसके अलावा, उसने जनवरी 2014 से लेकर जून 2015 तक मज़दूरों का ईपीएफ़ जो तकरीबन 14 लाख के करीब बनता था, उसका भुगतान भी नहीं किया था। इसके अतिरिक्त, निर्माण क्षेत्र में ठेकेदार द्वारा तमाम श्रम क़ानूनों को ठेंगा दिखाते हुए बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के मज़दूरों से ज़बरन 12-14 घण्टे काम करवाया जा रहा था। अपनी इन्हीं सब माँगों को लेकर मज़दूर इस घटना से तकरीबन दो सप्ताह पूर्व से ही काम बन्द करके हड़ताल पर थे। मज़दूरों की लगातार बढ़ रही एकता को तोड़ने के लिए ठेकेदार ने पंजाब से हथियारबन्द बाउंसरों को बुलाया था। वहाँ रहने वाली स्थानीय जनता के अनुसार ये तमाम गुण्डे सरेआम अपने हथियारों के दम पर लोगों को अकसर डराते-धमकाते रहते थे। कमान्द में लगातार बढ़ रहे तनाव तथा अपनी माँगों को लेकर मज़दूरों ने उपायुक्त से मुलाक़ात कर अपना ज्ञापन भी सौंपा था, तथा उन्हें इस बात से अवगत कराया था कि अगर प्रशासन जल्द ही कोई क़दम नहीं उठाता है तो वहाँ कोई भी अप्रिय घटना हो सकती है। परन्तु मज़दूरों के बार-बार चेतावनी दिये जाने के बावजूद भी सरकार और प्रशासन के कान पर जूँ तक न रेंगी। आखि़रकार 19 जून को जब मज़दूर ठेकेदार से बातचीत करने के लिए निर्माण स्थल पर पहुँचे तो वहाँ उसके द्वारा पहले से ही तैनात हथियारबन्द गुण्डों ने उनके साथ गाली-गलौज करना शुरू कर दिया। इस पर मज़दूरों ने जब अपना विरोध दर्ज कराया तो एकाएक गुण्डों ने उन पर गोलियाँ बरसानी शुरू कर दीं, जिसके चलते 14 मज़दूर गम्भीर रूप से घायल हो गये। अपने साथियों पर हुए इस जानलेवा हमले से मज़दूर गुस्से में आ गये तथा उन्होंने गुण्डों को घेर लिया। अपनी ग़लती का एहसास होने पर वे इधर-उधर भागने लगे, परन्तु पहाड़ी रास्तों का अभ्यस्त न होने के कारण उनमें से दो पाँव फिसलने के कारण खाई में जा गिरे जिसके चलते उनकी मौक़े पर ही मौत हो गयी।

mandi-clashबाक़ी बचे गुण्डों को मज़दूरों ने घेरकर पीटना शुरू कर दिया, जिस कारण वे गम्भीर रूप से घायल हो गये। इतना सब हो जाने के बाद सरकार और प्रशासन की कुम्भकरणी नींद टूटी और उन्होंने कमान्द में भारी संख्या में पुलिस फ़ोर्स को भेज स्थिति को नियन्त्रण में लिया। इन तमाम तथ्यों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि मज़दूरों ने जो कुछ भी किया वह अपनी आत्मरक्षा में किया, परन्तु पुलिस ने फिर भी मज़दूरों पर दफ़ा 302 के तहत हत्या का मामला दर्ज कर दिया। इसके विपरीत, पुलिस ने न सिर्फ़ इस घटना के मुख्य आरोपी ठेकेदार को वहाँ से भाग जाने का पूरा मौक़ा दिया, बल्कि इलाज के बहाने इस घटना में घायल हुए गुण्डों को सरकारी सुरक्षा में चण्डीगढ़ स्थित पीजीआई अस्पताल में दाखि़ल करवाया गया। जहाँ से अगले रोज़ ये तमाम अपराधी पुलिस की मौजदूगी के बावजूद फ़रार हो गये। ग़ौरतलब बात यह है कि इन तमाम गुण्डों पर पंजाब में हत्या, लूटमार जैसे कई संगीन मुकदमे दर्ज हैं, परन्तु फिर भी हिमाचल पुलिस ने उनकी निगरानी के लिए सिर्फ़ कुछ कांस्टेबल तैनात किये हुए थे। इस पूरे प्रकरण में जो सबसे महत्वपूर्ण बात निकलकर सामने आयी है, वह यह है कि कमान्द कैम्पस के अन्दर स्थित जिस गेस्ट हाउस में ठेकेदार ने इन गुण्डों को ठहराया हुआ था, वहाँ से पुलिस चौकी की दूरी मात्र 50 मीटर है। पहले तो पुलिस और ज़िला प्रशासन वहाँ हथियारबन्द गुण्डों की उपस्थिति से ही पूरी तरह से इंकार करते रहे, परन्तु बाद में उसी स्थान में तलाशी के दौरान उन्हें भारी संख्या में हथियार बरामद हुए। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि सरकार, पुलिस, और स्थानीय प्रशासन को वहाँ रह रहे इन हथियारबन्द गुण्डों की पूरी जानकारी थी, परन्तु फिर भी उन्होंने सब कुछ जानते हुए भी इन लोगों के खि़लाफ़ कोई भी कारवाई नहीं की। बस जनता की आँखों में धूल झोंकने के लिए आनन-फ़ानन में दोषियों के ऊपर कड़ी कार्रवाई करने तथा मज़दूरों को जल्द से जल्द उनके बकाया वेतन तथा ईपीएफ़ का भुगतान कर देने की घोषणा कर दी। परन्तु न तो अब तक इस घटना के लिए ज़िम्मेदार ठेकेदार पर कोई कार्रवाई की गयी है, और न ही मज़दूरों को उनकी मेहनत की कमाई मिल पायी है। इससे साफ़ पता चलता है कि सरकार अब इस पूरे प्रकरण में मुख्य आरोपी ठेकेदार तथा मज़दूरों पर गोलियाँ चलाने वाले अपराधियों को बचाने में लगी हुई हैं।

mandi-voilenceदरअसल पिछले कुछ समय से हिमाचल प्रदेश की आम मेहनतकश जनता यहाँ चल रही विद्युत परियोजनाओं तथा अव्यवस्थित निर्माण कार्यों के खि़लाफ़ रह-रहकर सड़कों पर उतर रही हैं। जिसका एक उदाहरण हमें अभी कुछ समय पहले किन्नौर में देखने को मिला, जहाँ जेपी कम्पनी के खि़लाफ़ वहाँ की स्थानीय जनता तथा मज़दूरों ने अपनी माँगों को लेकर तकरीबन दो महीने लम्बा संघर्ष लड़ा था। मज़दूरों तथा आम जनता की आवाज़ को दबाने के लिए जहाँ एक तरफ़ क़ानून-व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर सरकार ने ‘वर्दीधारी’ गुण्डों की फ़ौज बैठा रखी है, वहीं दूसरी तरफ़ कम्पनी तथा ठेकेदारों को हथियारबन्द निजी गार्ड रखने की भी खुली छूट दी हुई है। जैसाकि आमतौर पर होता आया है सरकार ने अब शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर कमान्द स्थित आईआईटी कैम्पस में भारी संख्या में पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों की तैनाती करने की घोषणा कर दी है। सरकार द्वारा उठाये गये इस क़दम का मुख्य उद्देश्य मज़दूरों को अपनी माँगों को लेकर एकजुट होने से रोकना है, ताकि भविष्य में होने वाले किसी भी तरह के मज़दूर आन्दोलन को आसानी से कुचला जा सके। अभी हाल ही के कुछ वर्षों में पूरे देश में मज़दूर अपने मूलभूत अधिकारों के लिए रह-रहकर आवाज़ उठा रहे हैं और हिमाचल की वादियाँ भी अब इससे अछूती नहीं रही हैं। परन्तु ये तमाम आन्दोलन एक सही क्रान्तिकारी लाइन के अभाव में अपनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। साथियो, इन तमाम घटनाओं से यह साबित हो चुका है कि सरकार (फिर चाहे वह किसी भी चुनावी पार्टी की सरकार हो) ने अब मज़दूरों द्वारा उठाये जाने वाले प्रतिरोध के हर स्वर को बर्बरता से कुचल डालने की पूरी तैयारी कर ली है। इसलिए अगर हमें अपने अधिकारों को हासिल करना है तो हमें अपने रिहाइशी इलाक़ों तथा काम करने के स्थानों पर अपने जुझारू क्रान्तिकारी संगठन खड़े करने होंगे, क्योंकि केवल तभी हम सरकार-पूँजीपतियों-पुलिस के इस गठजोड़ का सामना कर पायेंगे।

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2015


 

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