मारुति मजदूरों के संघर्ष की बरसी पर रस्म अदायगी
अनन्त
बीते 27 नवम्बर को गुडगाँव के हुड्डा ग्राउंड में मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन ने मारुति अधिकार कन्वेंशन आयोजित किया। यह संघर्ष मारुति मज़दूरों के पिछले साढ़े – तीन साल से चल रहे संघर्ष का अगला पड़ाव है। इसके पहले भी इस साल दो बार, 27 फ़रवरी और 18 जुलाई को जेल में बंद मारुति मज़दूरों की रिहाई के लिए सम्मलेन और बरसी आयोजित की गयी थी।18 जुलाई 2012 को घटी घटना के बाद मारुति ने एक झटके में तक़रीबन 2300 श्रमिकों को काम से निकाल दिया था, जिनमें 546 स्थायी तथा 1800 ठेका-कैजुअल कर्मचारी थे। 215 मज़दूरों के ऊपर झूठे मुक़दमे दायर किये गए, और 147 मज़दूरों को जेल के अन्दर ठूंस दिया गया जिनमे से अधिकतर मज़दूर 3 सालों तक जेल में बंद रहे। आज भी 36 मजदूर सलाखों के पीछे बंद हैं। मारुति-सरकार गठजोड़ ने नंगे रूप से मज़दूरों का दमन किया। पैसे के दम पर झूठे गवाह पेश किये गए और एक तरफ़ा तरीके से कार्रवाई की गयी। पूंजीवादी न्याय व्यवस्था ने नंगे तौर पर मारुति प्रबंधन का साथ दिया। अदालत ने यहाँ तक कहा कि मज़दूरों को रिहा नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे विदेशी निवेश पर असर पड़ेगा। मज़दूरों के ऊपर दमन का पाटा चलाते वक़्त मारुति के भार्गव ने कहा था कि मामला 18 जुलाई की घटना का नहीं है बल्कि वर्ग संघर्ष का है।
मज़दूरों के ऊपर इस दमन का प्रतिरोध मारुति के बरखास्त किये गए मज़दूरों ने क्रन्तिकारी संघर्ष की शुरुआत के साथ किया। किन्तु यह संघर्ष भी गद्दार ट्रेड यूनियनों और कुछ अराजकतावादी संघाधिपत्यवादी संगठनों के नेतृत्व में अपने तमाम जुझारूपन के बावजूद, तमाम सम्भावनाओं के बावजूद, घुमावदार रास्तों से गुजरता हुआ विघटित हो गया। कभी हरियाणा के उस वक़्त के मुख्यमंत्री हुड्डा के आवास पर तो कभी कैथल के मंत्री सुरजेवाला के आवास पर धरना प्रदर्शन आयोजित किया गया और फिर कैथल के जिला सचिवालय पर खूंटा डाल कर बैठा गया। तो कभी खाप पंचायत से मदद की गुहार लगायी गयी। नेतृत्वकारी संगठनों ने कभी भी सुसंगतता का परिचय नहीं दिया और संघर्ष को अराजक तरीके से दिशा देते गए। पूरे आन्दोलन के दौरान ‘आगे का रास्ता क्या हो’ यह सवाल सिरे से गायब रहा। इस आन्दोलन को अपनी ही उर्जा शक्ति यानि की पूरे सेक्टर में फैले मज़दूर आबादी से ही काट कर रखा गया। यह आन्दोलन कारखाना केन्द्रित रह गया और मारुति मज़दूरों की चौहादी से बहार नहीं निकल पाया और न ही खूंटा गाड़ कर बैठने की जगह के लिए राजधानियों को यानि दिल्ली या चंडीगढ़ को चुना गया बल्कि हरियाणा के जिलों को चुना गया। आम मज़दूरों में क्रांतिकारी उत्साह व दम होने के बावजूद यह आन्दोलन बिखर गया। निश्चित ही बात सिर्फ मारूति की नहीं है बल्कि आज पूरे मज़दूर आन्दोलन की स्थिति पिछड़ी हुई है। क्रांति पर प्रतिक्रान्ति की लहर हावी है लेकिन साथ ही आज का समय इसके कारकों की पड़ताल करने और नयी शुरुआत के तरीकों को ढूँढने का समय है। अगर आज मज़दूर वर्ग के हिरावल को गुडगाँव-मानेसर-धारुहेरा-बावल तक फैली इस आद्योगिक पट्टी में मज़दूर आन्दोलन की नयी राह टटोलनी है तो पिछले आंदोलनों का समाहार किये बगैर, उनसे सबक सीखे बगैर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है। अगर बरसी या सम्मलेन से यह पहलू नदारद हो तो उसकी महत्ता का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। अगर ईमानदारी से कुछ सवालों को खड़ा नहीं किया जाय या उनकी तरफ अनदेखी की जाय तो यह किसी भी प्रकार से मज़दूर आन्दोलन की बेहतरी की दिशा में कोई मदद नहीं कर सकता। जहाँ इस घटना के बरसी के अवसर पर आर.एस.एस मार्का नारे लगते हैं, महिला विरोधी प्रसंगों का ज़िक्र किया जाता है वहीँ अभी बीते सम्मलेन से पिछले साढ़े तीन साल के संघर्ष का समाहार गायब रहता है। अपनी गलतियों से सबक सीखने की ज़रुरत पर बात नहीं की जाती है। ‘क्या करें’, ‘आगे का रास्ता क्या हो‘, ये सवाल भी परदे के पीछे रह जाते हैं। हमें लगता है कि आज क्रन्तिकारी मज़दूर आन्दोलन की ज़रूरत है कि दलाल गद्दार ट्रेड यूनियनों को उनकी सही जगह पहुँचाया जाय यानी इतिहास की कूड़ा गाडी में। आम मज़दूर आबादी के बीच उनका जो भी थोड़ा बहुत भ्रम बचा है उसका पर्दाफाश किया जाय। आज भी ये मज़दूरों के स्वतंत्र क्रन्तिकारी पहलकदमी की लुटिया डुबाने का काम बखूबी कर रहे हैं। श्रीराम पिस्टन से लेकर ब्रिजस्टोन के मज़दूरों का संघर्ष इसका उदाहरण हैं। लेकिन मंच पर आज भी इन नेताओं का काबिज होना अपने आप में मारुति के आन्दोलन की विफलता का कारक समझाते हैं। कुछ लोगों का मानना था कि तमाम संगठनों को अपने संकीर्ण हितों से उठ कर एकता बनाने की ज़रुरत है। किन्तु यह नहीं बताया गया की दलाल गद्दार संगठनों के साथ क्रांतिकारी आन्दोलन अपनी एकता कैसे कायम कर सकता है। आम मेहनतकश मज़दूरों को उनके एतिहासिक विरासत से परिचित करने का काम आज के समय में कितनी महत्ता का प्रश्न है इस पर भी इस कार्यक्रम में किसी प्रकार की रौशनी नहीं डाली गयी। इस बरसी कार्यक्रम में एक तरफ राजकीय दमन का खूब ज़िक्र किया गया, यह बात पूरी तरीके से साफ़ थी कि जब कोर्ट, अदालत, पुलिस, सेना ये सब पूंजीपतियों की सेवा के लिए खड़ी है, लेकिन इसके बरक्स मज़दूरों के संगठन की आवश्यकता यानि पार्टी की ज़रुरत का सवाल भी गायब रहा। इस हालत में ऐसे कन्वेंशन, दलाल ट्रेड यूनियनों के एक दिनी हड़ताल की ही तरह, रस्म अदायगी साबित हो जाता है। जहाँ मज़दूर आन्दोलन में सक्रिय कुछ सतरंगी संगठनों का जमावड़ा होता है कुछ गरमागरम बातें होती हैं कुछ घिसे-पिटे प्रस्तावों पर सहमती बनाई जाती है। ‘क्रांति’, ‘एकता’ का जुमला दोहराया जाता है लेकिन मज़दूरों के बीच लगातार व्यवहारिक कार्रवाई नदारद रहती है।
मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2015













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