जहाँगीरपुरी में हिंसा और मेहनतकशों के घरों पर सरकारी बुलडोज़र फ़ासिस्ट भाजपा सरकार द्वारा देशभर में जारी साम्प्रदायिक षड्यंत्र की एक और कड़ी है

– अनन्त

देशभर में बीते दिनों एक सुविचारित फ़ासीवादी मॉडल के तहत संघी धार्मिक उन्माद फैलाने के काम में जुटे हुए हैं। एक तरफ़ जब महँगाई आसमान छू रही है, बेरोज़गारी चरम पर है, जनता के ऊपर दुख तकलीफ़ों का पहाड़ टूटा हुआ है, तभी लोगों को बाँटने के लिए एक मुहिम के तहत निरन्तर संघी फ़ासीवादी गतिविधि जारी है। पिछले दिनों विक्रम संवत् नववर्ष, रामनवमी से लेकर हनुमान जयन्ती के मौक़े को दंगा भड़काने के मौक़े के तौर पर भुनाया गया। यह मोदी के “अवसर को आपदा में बदलने” की तरकीब का एक हिस्सा है। रामनवमी पर गुजरात के हिम्मत नगर, मध्य प्रदेश के खरगोन, पश्चिम बंगाल के हावड़ा, झारखण्ड के लोहरदग्गा, बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर, इसके अलावा अन्य मौक़ों पर राजस्थान के करौली तथा जोधपुर, उत्तर प्रदेश के गहमर में तथा ओड़िशा में अम्बेडकर जयन्ती के मौक़े समेत कई छोटी-बड़ी धार्मिक तथा जातिगत हिंसा की घटनाएँ घटी हैं।

जहाँगीरपुरी में हुई साम्प्रदायिक हिंसा का संक्षिप्त विवरण

इस कड़ी में ताज़ा मामला देश की राजधानी दिल्ली का है। बीते 16 अप्रैल को हनुमान जयन्ती पर दिल्ली के उत्तर पश्चिमी इलाक़े में स्थित जहाँगीरपुरी में राष्ट्रीय बजरंग दल व अन्तरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद द्वारा विशाल बाइक रैली का आयोजन किया गया, जिसने बाद में हिन्दू-मुस्लिम तनाव का रूप ले लिया। इससे पहले इसी दिन मस्जिद के पास से दो जुलूस निकाले गये थे। पुलिस ने पहले दो की अनुमति दी थी, जो कि अपने आप में दिल्ली पुलिस को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर देता है। पहले दो जुलूस के दौरान भी साम्प्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश की गयी थी। अल्पसंख्यक समुदाय को उकसाने का प्रयास किया गया था, लेकिन पहले दो चक्र में कोई हिंसा नहीं हुई। तीसरे जुलूस के दौरान हिंसा हुई, प्रशासन द्वारा उस जुलूस के लिए कोई अनुमति नहीं दी गयी थी। शाम 6 बजे क़रीब तीसरी रैली मंगल बाज़ार से होते हुए जामा मस्जिद पर पहुँची। यह समय मुस्लिम समुदाय के लोगों के रोज़ा खोलने के नमाज़ का समय था। उस समय 300-400 लोगों की भीड़ मस्जिद के आगे रुकी, जो हाथ मे भगवा झण्डा तलवार, तमंचे आदि थामे हुए थी। गाड़ियों में बड़े-बड़े स्पीकर लगे हुए थे, जिसमें ज़ोर-शोर से उन्मादी-भड़काऊ गाने बजाये जा रहे थे और इसी दौरान उन्मादी भीड़ द्वारा मस्जिद में भगवा झण्डा फहराने की कोशिश की गयी। नतीजतन दोनों पक्षों में पहले बहस फिर झड़प शुरू हो गयी। किसी एक ओर से पथराव शुरू हुआ और फिर दोनों तरफ़ से हिंसा होने लगी। आधिकारिक तौर पर इस झड़प में इलाक़े का एक व्यक्ति तथा 8 पुलिसकर्मी घायल हुए। हिंसा की घटना की जाँच पड़ताल के दौरान पता चला कि साम्प्रदायिक माहौल ख़राब करने वाली इस रैली में शामिल ज़्यादातर उपद्रवी बाहर से आये हुए थे। फ़ासीवादी लफंगों के द्वारा उत्पात मचाने के बाद अगली भूमिका दिल्ली पुलिस की थी।
उस घटना के बाद दिल्ली पुलिस ने “शान्ति-व्यवस्था” बनाये रखने के नाम पर पूरे इलाक़े को क़ैदख़ाने में तब्दील कर दिया। जिस इलाक़े में यह घटना घटी है, यानी जहाँगीरपुरी सी ब्लॉक तथा सी-डी ब्लॉक, वहाँ इन दोनों ब्लॉक के बीच पड़ती है सी ब्लॉक की मार्केट। इन ब्लॉक की सभी गलियों के बाहर पुलिस बैठी थी, मार्केट के दोनों छोर पर बैरिकेड्स खड़े थे, पूरा मार्केट बन्द था। हर गली-नुक्कड़ के बाहर पुलिस बैठी थी। लोगों के सारे कामकाज बन्द थे। घर से ग़ैर-ज़रूरी बाहर निकलने पर पाबन्दी थी। इलाक़े में भी लोगों के अन्दर दहशत का माहौल था। इस इलाक़े में हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदाय की ज़्यादातर ग़रीब मेहनतकश आबादी रहती है। यह अनायास नहीं है कि जिस आबादी के ऊपर इस व्यवस्था की सबसे अधिक मार पड़ रही है, उन्हीं के इलाक़ों में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने के संघी प्रयोग किये जा रहे हैं।
इस पूरी घटना पर पुलिस ने अभी तक दो नाबालिग समेत 32 लोगों को गिरफ़्तार किया है। पुलिस ने पहले चरण में 14 लोगों को गिरफ़्तार किया था, उसमें सभी अल्पसंख्यक समुदाय के लोग थे। मीडिया तथा सोशल मीडिया में तैर रही तस्वीरें चीख़-चीख़कर बता रही थीं कि जुलूस में शामिल लोगों के हाथ में हथियार था। हुड़दंगियों की पहचान सीधे कैमरे पर हो रही थी। फिर भी पुलिस ने एकतरफ़ा कार्रवाई करते हुए एक समुदाय विशेष के लोगों को गिरफ़्तार किया। आख़िरकार, जन दबाव के कारण पुलिस ने जुलूस का आयोजन कर रहे विश्व हिन्दू परिषद के नेता समेत कुछ अन्य लोगों को गिरफ़्तार किया। लेकिन अभी भी हिंसा में शामिल बजरंग दल और अन्य विहिप कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया जाना बाक़ी है। गिरफ़्तारियों के अलावा पुलिस ने 3 तमंचे और 5 तलवारें ज़ब्त की थीं।

इस पूरे घटनाक्रम में दिल्ली पुलिस पर उठते कुछ सवाल

इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस-प्रशासन पर भी कई सवाल उठते हैं। आख़िर उनकी मौजूदगी में यह घटना कैसे हुई? क्या उन्हें पहले से रैली के रूट की सूचना नहीं थी और अगर थी तो वहाँ मस्जिद के आस-पास रुक कर माहौल क्यों ख़राब करने दिया गया? पुलिस ने अंसार व असलम को मुख्य आरोपी बताया पर रैली की जो वीडियो सामने आयी थी, उसमें साफ़-साफ़ दिख रहा था कि रैली में आये लोगों के हाथ में तलवार, तमंचे व अन्य हथियार थे। उन्हें गिरफ़्तार क्यों नहीं किया गया? दिल्ली पुलिस ने जहाँगीरपुरी से आरोपियों के नाम पर शुरुआत में सिर्फ़ मुसलमानों की गिरफ़्तारी क्यों की? शोभा यात्रा में पिस्तौल, तलवार, चाक़ू और डण्डा लहराने का वीडियो सामने आया है। उसे बनाने वाले चश्मदीद हैं। क्यों दिल्ली पुलिस ने उस वीडियो में दिख रहे अराजक तत्वों की इन हरकतों पर आर्म्स एक्ट में कोई केस दर्ज नहीं किया? क्या उन लोगों की पहचान की गयी? पुलिस पर सवाल तब और उठ जाता है कि एक तरफ़ तो इलाक़े को छावनी में तब्दील कर दिया गया, लेकिन दूसरी तरफ़ भाजपा के नेताओं के ऊपर कोई लगाम नहीं लगायी गयी। घटना के अगले ही दिन पुलिस की मौजूदगी के बावजूद, भाजपा नेताओं ने मस्जिद के ठीक सामने नारेबाज़ी की, जो एक दिन पहले तनाव का केन्द्र था। भाजपा के मन्दिर प्रकोष्ठ प्रमुख करनैल सिंह ने रविवार दोपहर मस्जिद के सामने “जिसको इस देश में रहना होगा, जय श्री राम कहना होगा” के भड़काऊ नारे फिर लगाये। आम लोगों के घर से निकलने तक पर पाबन्दी की जा रही है, और भाजपा नेता खुले में ज़हर उगल रहे हैं। जहाँगीरपुरी सी ब्लॉक, जे जे कॉलोनी में रह रही ग़रीब आबादी संगीन के साये में जीवन जीने के लिए मजबूर है, अभी तक पूरा इलाक़ा छावनी में तब्दील है। उन्हें उनकी ही गलियों में क़ैद कर लिया गया है। भाजपा फ़ासीवादी एजण्डे के तहत पुलिस बल का प्रयोग कर रही है। इस पूरी घटना के गोदी मीडिया के कवरेज में स्थानीय हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही आबादी का पक्ष ग़ायब रहा। मसालेदार ख़बरों के साथ गोदी मीडिया अपने ज़हर उगलने के काम में लगी हुई थी।

जहाँगीरपुरी के स्थानीय लोगों से बातचीत का ब्यौरा

शाकिब (बदला हुआ नाम) ने बताया कि उनके भतीजे को, जो नाबालिग है, रात में 2 बजे पुलिस आकर उठा ले गयी।
आगे उन्होंने बताया कि इसी मोहल्ले में उनका बचपन बीता पर आजतक वहाँ कभी हिन्दू-मुस्लिम के झगड़े नहीं हुए। आपस में हिन्दू मुस्लिम सभी त्यौहारों को मिलकर मनाते थे पर ये सारा माहौल तो जानबूझकर ख़राब किया गया है। माहौल ख़राब करने वाले लोग बाहर से आये थे। वहीं हिन्दू समुदाय के एक स्थानीय दुकानदार ने कहा कि यहाँ हर समुदाय के लोग लम्बे समय से शान्ति से रह रहे हैं। जहाँगीरपुरी एक संवेदनशील इलाक़ा है, इसलिए हमें सावधान रहना होगा। उन्होंने शोभा यात्रा में तलवारें और हथियार ले जाने की ज़रूरत पर सवाल खड़ा किया। जुलूस के लिए मस्जिद के सामने का रास्ता चुने जाने तथा वहाँ भड़काऊ नारेबाज़ी किये जाने को ग़लत ठहराया।

जारी तनाव के बीच चला बुलडोज़र

बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद द्वारा निकाली गयी शोभा यात्रा से शुरू हुए तनाव के बाद अब स्थिति को गम्भीर बनाने की ज़िम्मेदारी प्रशासन तथा गोदी मीडिया ने ले ली थी। वहाँ स्थिति को सामान्य बनाने के बजाय सत्ता में बैठी फ़ासीवादी ताक़तें हालात को और बद से बदतर बनाने में लगी हुई थीं। इसी कड़ी में एनडीएमसी को पूरे इलाक़े को छोड़ ठीक वहीं यानी मस्जिद तथा उसके आस-पास के इलाक़े में “अतिक्रमण हटाने” की सूझी जहाँ तनाव फैला हुआ है। ऐसा करने के पीछे एनडीएमसी का कुतर्क था कि यहाँ पुलिस बल पहले से मौजूद है तो इसी बहाने हम अतिक्रमण हटा रहे हैं। अतिक्रमण हटाने की कोई भी पूर्वसूचना स्थानीय आबादी को नहीं दी गयी। सुबह-सुबह ही जेसीबी अपने काम पर लग गयी, लोगों को अपना सामान तक उठाने की मोहलत नहीं दी गयी। सत्ता कैसे अल्पसंख्यक आबादी को उकसाने तथा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने का काम कर रही है यह इस घटना से पता चलता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस कार्रवाई पर स्टे ऑर्डर आने के बावजूद भी प्रशासन तोड़-फोड़ की कार्रवाई करता रहा। ‘भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी’ के कार्यकर्ताओं तथा वहाँ मौजूद कुछ स्थानीय आबादी व गोदी मीडिया के इतर अन्य पत्रकारों ने जब प्रशासन से जवाब तलब किया कि कोर्ट के आदेश के बाद भी क्यों बुलडोज़र चलाया जा रहा है, तब प्रशासन का जवाब था कि उनतक अभी ऐसा कोई आदेश नहीं पहुँचा है। यहाँ तक कि कुछ लोग आदेश की कॉपी तक लाकर दिखा रहे थे, किन्तु प्रशासन की अपनी योजना तथा मंशा तय थी। मस्जिद के बाहर का अतिक्रमण तोड़ा गया। वहाँ आसपास ज़्यादातर दुकानें अल्पसंख्यक आबादी के लोगों की थी, उन्हें तोड़ा गया। मस्जिद से क़रीब 50/60 मीटर की ही दूरी पर एक मन्दिर स्थित है। उस मन्दिर का भी एक हिस्सा अतिक्रमण के दायरे में था, किन्तु बुलडोज़र उससे ठीक एक इमारत पहले तक चला और मन्दिर के आगे से लौट गया। ज़ाहिर है कि ये बुलडोज़र ग़रीबों की बस्तियों पर बड़ी आसानी से चल जाते हैं, किन्तु वहीं दिल्ली में अमीरों की कॉलोनी में जो अवैध निर्माण हैं वे बिना किसी बाधा के खड़े रहते हैं। इस क्रिया के साथ प्रशासन स्पष्ट तौर पर एक सन्देश दे रहा है, अपने साम्प्रदायिक चरित्र को उजागर कर रहा है। सरकार व प्रशासन की मंशा ज़ाहिर है कि वह तनाव घटाना नहीं बल्कि बरक़रार रखना चाहते हैं।
जहाँगीरपुरी में हुई हिंसा अनायास नहीं हैं बल्कि संघी फ़ासीवादियों द्वारा पिछले एक माह से देशभर में जारी साम्प्रदायिक घटनाओं के क्रम में एक और कड़ी हैं। भाजपा और संघ परिवार अपने फ़ासीवादी एजेण्डे पर काम करते हुए इन घटनाओं को अंजाम देने में लगे हुए हैं। इस घटना के साथ एक बार फिर दिल्ली की सत्ता में बैठे छोटे मोदी उर्फ़ केजरीवाल की असलियत सामने उजागर हो रही है। इस पूरी घटना पर मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने असंवेदनशीलता दिखाते हुए पहले चुप्पी साधी रखी और बाद में भाजपा पर आरोप लगाया कि उसने बंगलादेश के अवैध प्रवासियों को जहाँगीरपुरी में बसने की इजाज़त दी! यानी केजरीवाल को मुसलमान आबादी को निशाना बनाये जाने, दंगे करवाने और ग़रीबों पर बुलडोज़र चलवाने पर एतराज़ नहीं था बल्कि वह भी इस मौक़े पर साम्प्रदायिक राजनीति की मलाई चाटने में लगा हुआ था! सीएए-एनआरसी के विरुद्ध आन्दोलन के बाद हुए दिल्ली दंगे में भी इनका यही रुख़ था। संघी मानसिकता से ग्रस्त केजरीवाल से फ़ासीवादी ताक़तों के विरुद्ध बोलने की उम्मीद करना ही बेमानी है।
दूसरी ओर एक प्रगतिशील आबादी वृन्दा करात के बुलडोज़र के आगे खड़े होने पर भी लहालोट हो रही है। हक़ीक़त यह है कि जब तक वृन्दा करात जहाँगीरपुरी पहुँची थीं, तब तक बुलडोज़र अपना काम कर चुका था। फ़ोटो सेशन के बाद जब वह पुलिस अधिकारियों के साथ उनके तम्बू में बैठी थीं, तभी पुलिस गलियों में घूमकर डण्डे भाँज रही थी। इस समय सारे मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी, लिबरल, सामाजिक जनवादी वृन्दा करात के क़सीदे पढ़ते नहीं थक रहे कि किस तरह वो बुलडोज़र के सामने अकेले खड़ी हो गयीं। यही लोग ‘आम आदमी पार्टी’ को इन सब पर उसकी चुप्पी के लिए कोस रहे हैं। वहीं कुछ समय पहले मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी, लिबरल टाइप लोग फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए केजरीवाल का गुणगान कर रहे थे।
आँख-कान बन्द करके कभी इधर तो कभी उधर लुढ़कने वालों को तो बताते चलें कि आपके ‘फ़ासीवादी योद्धा’ की पार्टी सीपीआई(एम) ने चुनावों में आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया था। इसके अलावा अलग-अलग समय पर ये दोनों एक साथ खड़े रहे हैं। तो आप भाजपा के ख़िलाफ़ हैं, ‘आम आदमी पार्टी’ भाजपा की बी टीम है और सीपीआई(एम) आम आदमी पार्टी का समर्थन करती है! आख़िर ये रिश्ता क्या कहलाता है?
हमें ये समझना चाहिए कि किसी एक घटना के विरोध करने से समग्र राजनीतिक दिशा का मूल्यांकन नहीं हो सकता। बुर्जुआ राजनीति में भी ऐसे तमाम लोग हैं जो मोदी का विरोध करते हैं। टीएमसी की महिला सांसद महुआ मोइत्रा भी लोकसभा में फ़ासीवाद पर लम्बी चौड़ी बातें करती है, लेकिन क्या टीएमसी फ़ासीवाद-विरोधी पार्टी है? यह मूल सवाल है। यही बात एक दूसरे सन्दर्भ में सीपीआई (एम) पर भी लागू होती है। असल में सीपीआई (एम) फ़ासीवाद को हराने के लिए जो मोर्चा बनाती है, वो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बिना बनता ही नहीं है। एक समय में इतनी बड़ी ट्रेड यूनियन होने के बावजूद भी कभी भी सीपीआई (एम) ने सीधे तौर पर साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ मज़दूर वर्ग को संगठित कर कोई अभियान नहीं छेड़ा।
2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिन्दू-मुस्लिम दंगे मोदी सरकार द्वारा प्रायोजित हिंसा थी, जिसमें फ़ासीवादियों के गिरोह द्वारा अल्पसंख्यकों पर हमला किया गया था। इस तरह के दंगों में हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही धर्म के आम मेहनतकश लोग मारे जाते हैं, घायल होते हैं, उनके घर जलते हैं और इन फ़ासीवादियों द्वारा दोनों ही धर्म के भाइयों और बहनों के बीच डर और नफ़रत फैलाने का काम किया जाता है। यह सारा धार्मिक उन्माद इसलिए फैलाया जाता है कि आम मेहनतकश आबादी यह देख ही न पाये कि सरकार और पूँजीपति वर्ग द्वारा किस प्रकार हमें लूटा जा रहा है। जब साम्प्रदायिकता की यह आग भड़कती है तो हिन्दू आम मेहनतकश आबादी भी उसकी गिरफ़्त में आती है। यह हाल में हुई एक घटना से भी साफ़ हो गया जब एक हिन्दू सिक्योरिटी गार्ड को फ़ासीवादी गौरक्षकों की उन्मादी भीड़ खींचकर ले गयी और उसे जान से मार डाला। इस फ़ासीवादी उन्मादी भीड़ के निशाने पर मुसलमान ही नहीं, बल्कि सारे देश में ग़रीब मेहनतकश हिन्दू आबादी भी आ रही है। और यह सारा प्रपंच रचा ही इसलिए गया है कि आम मेहनतकश आबादी अपने असली दुश्मन यानी फ़ासीवादी मोदी सरकार और समूची पूँजीवादी व्यवस्था को पहचानने की बजाय साम्प्रदायिक उन्माद में बहकर एक-दूसरे के साथ ही सिरफुटौव्वल करती रहे ताकि अम्बानियों-अडानियों को मेहनत और कुदरत की लूट की पूरे छूट देने का काम मोदी सरकार सलीक़े से करती रहे। आम मेहनतकश आबादी का एक हिस्सा भी राजनीतिक चेतना की कमी के कारण इस साज़िश का शिकार हो जाता है। हम वर्ग सचेत मेहनतकशों को अपने सारे भाइयों-बहनों को समझाना होगा कि इस षड्यंत्र में फँसने का अर्थ है आत्महत्या करना।

फ़ासीवाद मोदी सरकार की रणनीति क्या है?

फ़ासीवादी मोदी सरकार की यह रणनीति है कि आम मेहनतकश आबादी को बाँटकर रखो, धार्मिक उन्माद फैलाकर उन्हें आपस में लड़ाओ, किसी नक़ली गौरवशाली अतीत और “रामराज्य” का सपना दिखाओ और इन हथकण्डों से बेवक़ूफ़ बनाकर उसे फ़ासीवादी शासन और पूँजीवाद का विरोध कर पाने में अक्षम बनाओ ताकि पूँजीपतियों-मालिकों-ठेकेदारों और तमाम धन्नासेठों का शासन जारी रहे। दिल्ली सहित देश की मेहनतकश आबादी को फ़ासीवादियों के इस एजेण्डे को कामयाब नहीं होने देना है और हमें अपना वर्ग भाईचारा क़ायम करना होगा, किसी भी प्रकार के धार्मिक उन्माद में नहीं बहना होगा, सभी धर्मों के मेहनतकश लोगों की एकता क़ायम करनी होगी।

मज़दूर बिगुल, मई 2022


 

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