नहीं, सर्वोच्च न्यायालय के महामहिमो! वेश्यावृत्ति कोई “पेशा” या “चयन की आज़ादी” नहीं है! ‘देह व्यापार’ स्त्रियों-बच्चों के विरुद्ध शोषण, हिंसा, असहायता और विकल्पहीनता में लिथड़ा पूँजीवादी मवाद है!

– शिवानी

सर्वोच्च न्यायलय द्वारा 19 मई को वेश्यावृत्ति को वैध क़रार दिए जाने सम्बन्धी फ़ैसला दिया गया है जिसकी काफ़ी चर्चा हो रही है। इन फ़ैसले के तहत ‘देह व्यापार’ में लगी स्त्रियों के “पुनर्वास” को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को कुछ दिशानिर्देश दिए गए हैं। साथ ही उक्त फ़ैसले में सर्वोच्च न्यायलय ने वेश्यावृत्ति अथवा ‘देह व्यापार’ को एक “पेशा” य “व्यवसाय” माना है और कहा है कि पुलिस “अपनी इच्छा से” वेश्यावृत्ति कर रही “सेक्स वर्कर्स” के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाई न करे। इसके अलावा आदेश में यह भी कहा गया है कि “स्वैच्छिक तौर पर” की जाने वाली वेश्यावृत्ति ग़ैर-क़ानूनी नहीं है। वैसे भारत में ‘देह व्यापर’ स्पष्ट तौर पर कभी अवैध नहीं था और इसे कभी दण्डनीय अपराध भी नहीं माना गया है। हालाँकि वेश्यालय चलाना, दलाली, स्त्रियों समेत इंसानों की तस्करी इत्यादि ग़ैर-क़ानूनी और दण्डनीय है।
तमाम क़िस्म के उदारवादी व नारीवादी इस फ़ैसले का स्वागत कर रहे हैं और काफ़ी ख़ुशी मना रहे हैं। भारत का यह “प्रगतिशील” तबक़ा इस फ़ैसले को भी “प्रगतिशील” बता रहा है और इसके लिए अदालत की भूरि-भूरि प्रशंसा करते नहीं थक रहा है। ऐसे लोगों का मानना है कि वेश्यावृत्ति के वैधीकरण के साथ स्त्रियों का शोषण ख़त्म हो जायेगा और यह फ़ैसला औरतों द्वारा “अपने शरीर को बेचने की आज़ादी” पर अदालत की मुहर है। यह तर्क सतही तौर पर भी कितना भोथड़ा और दरिद्र है यह स्पष्ट है। वास्तव में “चयन की स्वतन्त्रता” का यह बुर्जुआ व्यक्तिवादी तर्क पूँजीवादी व्यवस्था की ही रुग्ण और पतनोन्मुख वैचारिक पैदावार है जो विकल्पहीनता को ही “चयन की आज़ादी” के तौर पर पेश करती है।
यूं तो भारत में वेश्यावृत्ति से जुड़े आधिकारिक आंकड़े मौजूद ही नहीं है, लेकिन विभिन्न अनाधिकारिक स्रोतों के अनुसार भारत में 30 लाख से लेकर 1 करोड़ औरतें देह-व्यापार में हैं। इनमें से एक ठीक-ठाक संख्या 12 से 15 वर्ष की आयु वाली छोटी बच्चियों की है जो हर साल इस अमानवीय कारोबार में धकेली जाती हैं। यह इनकी “चयन की आज़ादी” नहीं है बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा थोपा गया अभिशाप है। कोई ताज्जुब नहीं कि इनमें से अधिकांश ग़रीब मेहनतकश घरों से आने वाली स्त्रियाँ और बच्चे हैं।
वैसे तो उपरोक्त बातें किसी भी तर्कशील दिमाग़ में भी कई सवाल पैदा करेंगी। मसलन ‘देह व्यापार’ है ही क्यों, क्यों स्त्रियाँ वेश्यावृत्ति के “पेशे” में जाती हैं, क्या कोई भी “अपनी इच्छा से” वेश्यावृत्ति में जाना चाहता है, क्या औरतों-बच्चों के साथ वेश्यावृत्ति के नाम पर होने वाला शोषण और यौन हिंसा मौजूदा सामाजिक-आर्थिक संरचना के बारे में कुछ नहीं बताता? क्या वर्ग समाज और विशेषकर पूँजीवाद ने हर वस्तु की तरह स्त्रियों के शरीर और यौन सम्बन्धों को भी माल में तब्दील कर ख़रीदने-बेचने की चीज़ नहीं बना दिया है? लेकिन अफ़सोस, सर्वोच्च न्यायालय के महामहिम न्यायाधीश इन असुविधाजनक प्रश्नों पर चुप हैं।
वेश्यावृत्ति वर्ग समाज की देन हैं जब समाज के वर्गों में बंटने के साथ ही स्त्रियों की ग़ुलामी की शुरुआत हुई। लेकिन पूँजीवाद ने इसे मुनाफ़ा देने वाले एक व्यापक और संगठित कारोबार में तब्दील कर दिया है। यह वह समाज है जिसमें हर वस्तु बाज़ार में बेची और ख़रीदी जा सकती है, स्त्रियों की देह भी। सवाल तो यह है कि स्त्रियों का शोषण और उत्पीड़न क्या महज़ किसी क़ानून या आदेश से ख़त्म हो सकता है? जिन लोगों को इस फ़ैसले के बाद यह लग रहा है कि अब ‘देह-व्यापार’ में लगी स्त्रियों को इससे सामाजिक सुरक्षा, न्याय या सम्मान मिलेगा, वे बचकानी समझदारी का शिकार हैं। जो सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था यानी कि पूँजीवाद स्त्रियों की सस्ती श्रमशक्ति से लेकर उनके शरीर तक को मुनाफ़े के इस्तेमाल करता है, उसके समूल नाश के साथ ही स्त्रियों के हर प्रकार के शोषण-उत्पीड़न का ख़ात्मा संभव है। वास्तव में, सर्वोच्च न्यायलय का यह फ़ैसला पूँजीवाद की वास्तविकता को ही सामने ला देता है जो मानता है कि देह-व्यापार एक “व्यवसाय” है!
दरअसल, ऐसे तमाम फ़ैसले और दिशानिर्देश पूँजीवाद और वर्ग समाज द्वारा पैदा की गयी तमाम समस्याओं के मूल कारणों पर पर्दा डालने का काम ही करते हैं और व्यवस्था के भीतर ही कुछ पैबन्दसाज़ी करने की नसीहतें देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले को भी इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए।

मज़दूर बिगुल, जून 2022


 

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