ईडब्ल्यूएस आरक्षण : मेहनतकश जनता को बाँटने की शासक वर्ग की एक और साज़िश

लता

भाजपा की मोदी सरकार जनता को बाँटने के एक नये उपकरण के साथ सामने आयी है : ईडब्ल्यूएस आरक्षण। इसका वास्तविक मक़सद जनता के बीच जातिगत पूर्वाग्रहों को हवा देना और सवर्ण मध्यवर्गीय वोटों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करना है। यह आरक्षण की पूरी पूँजीवादी राजनीति में ही एक नया अध्याय है। जातिगत आधार पर मौजूद आरक्षण की पूरी राजनीति का भी देश के पूँजीपति वर्ग ने बहुत ही कुशलता से इस्तेमाल किया है, जबकि निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों के हावी होने के साथ आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में खड़ी राजनीति का आधार लगातार कमज़ोर होता गया है। क्योंकि यह एक ऐसी चीज़ में हिस्सा बाँटने की बात करती है, जो वास्तव में लुप्तप्राय हो चुकी है : सरकारी नौकरी व सरकारी उच्चतर शिक्षा। लेकिन इसके बावजूद पूँजीवादी अस्मितावादी राजनीति आरक्षण के मसले को गर्माकर हमेशा ही अपनी गोटियाँ लाल करती है और सवर्ण जातियों के लिए ईडब्ल्यूएस आरक्षण का मसला भी इसी प्रक्रिया का एक अंग है। आइए, इस पर मज़दूरवर्गीय नज़रिए से थोड़ा विचार करते हैं।

आरक्षण की राजनीति और ईडब्ल्यूएस आरक्षण

आरक्षण के मुद्दे को हर चुनाव के पहले गरमाया ही जाता है। जातिवादी राजनीति को सुलगाये रखने के लिए इसे बीच-बीच में भी मुद्दा बनाया जाता है। जाट आरक्षण, पाटीदार आरक्षण, 13 प्वाइण्ट रोस्टर सिस्टम, आरक्षण के मसले पर गुर्जर-मीणा विवाद और फिर 2019 में ईडब्ल्यूएस आरक्षण का मसला उछालना, यानी सवर्ण जातियों के आर्थिक रूप से कमज़ोर तबक़ों के लिए आरक्षण। चुनावों के इस मौसम में भी एक बार फिर ईडब्ल्यूएस आरक्षण को लेकर राजनीति गरमायी हुई है। मोदी सरकार ने 2019 में संविधान के 103वें संशोधन के बाद आर्थिक आधार पर सवर्ण जातियों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान संविधान में शामिल कर लिया था। संविधान के इस संशोधन को चुनौती दी गयी थी। 41 याचिकाओं में कहा गया कि यह संविधान के सामाजिक न्याय की अवधारणा का उल्लंघन है। संविधान में समाज के ऐतिहासिक तौर पर पिछड़े और उत्पीड़ित तबक़ों, जैसे कि दलितों व आदिवासियों की स्थिति में सुधार के लिए सकारात्मक कार्रवाई के तौर पर आरक्षण का प्रावधान किया गया था। 103वाँ संशोधन उस तबक़े के साथ अन्याय है क्योंकि इस 10 प्रतिशत आरक्षण से इन सामाजिक समुदायों को बाहर रखा जा रहा है। 7 नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण की याचिका पर फ़ैसला देते हुए संविधान के संशोधन को न्यायसंगत कहा है और अनुच्छेद 15(6) और 16(6) को मान्य ठहराया है।
ईडब्ल्यूएस आरक्षण को चुनौती देते हुए 41 याचिकाओं की सुनवाई करते हुए पाँच जजों की बेंच ने खण्डित मत से लेकिन ईडब्ल्यूएस आरक्षण के समर्थन में फ़ैसला दिया है। जस्टिस बेला त्रिवेदी न केवल सबसे मुखर तौर पर ईडब्ल्यूएस आरक्षण का समर्थन कर रही थीं बल्कि भाजपा और आरएसएस की तरह दलित व पिछड़ी जातियों और जनजातियों के आरक्षण को समाप्त करने की बात दुहरा रही थीं। अपने बयान में जस्टिस बेला त्रिवेदी ने कहा कि आरक्षण एक निश्चित समय अवधि के लिए लागू किया गया था, हमेशा के लिए नहीं। देश में जातिगत समानता लाने के लिए चरणबद्ध तरीक़े से दलित व पिछड़ी जातियों और जनजातियों के आरक्षण को समाप्त कर देना चाहिए। जस्टिस बेला त्रिवेदी अपने तर्क के समर्थन में कोई तथ्य नहीं देती हैं। जस्टिस बेला त्रिवेदी के अनुसार दलित व पिछड़ी जातियों को इतना अधिक विशेषाधिकार मिल चुका है कि उसकी वजह से समाज में असमानता है। इसलिए ऊँची जाति के लोगों को आर्थिक आधार पर दिया जाने वाला 10 प्रतिशत आरक्षण जायज़ है। दूसरी बात कि दलित व पिछड़ी जातियों को मिले आरक्षण से जो असमानता पैदा हो रही है उसे रोकने के लिए चरणबद्ध रूप में आरक्षण को समाप्त किया जाना चाहिए। इस तरह की बात कोई सवर्णवादी मानसिकता वाला व्यक्ति ही कर सकता है कि दलित व पिछड़ी जातियों के आरक्षण से समाज में असमानता आ रही है।
इस तरह की ही बात दूसरे जज जे.बी. पर्दीवाला भी कह रहे थे। उनके अनुसार देश में आज़ादी के समय जो जातिगत असमानता थी आज देश में वैसी स्थिति नहीं है। आज दलित व पिछड़ी जातियों की बड़ी आबादी शिक्षा हासिल कर रही है। इसलिए अब उनकी ओर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए जिन्हें असल में आरक्षण की आवश्यकता है। इसलिए आरक्षण पर दुबारा से सोच-विचार करने की आवश्यकता है।
ज़ाहिर है कि पिछड़ी जातियों यानी ओबीसी का मामला दलित जातियों से कुछ भिन्न है। अभी भी शिक्षा व सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जातियों का हिस्सा अपनी आबादी के अनुपात में कम है, लेकिन उनके बीच ही कई ऐसी जातियाँ हैं जिनमें एक अच्छी-ख़ासी आबादी धनी व उच्च मध्यम किसानों में आती है और देश के खेतिहर छोटे पूँजीपति वर्ग का भी अंग हैं। उनके बीच से यदि बहुत-से लोग पढ़ भी रहे हैं, तो सरकारी नौकरियों में उनकी दिलचस्पी भूमिहीन दलित आबादी के मुक़ाबले कम है, हालाँकि पूँजीवादी खेती के संकट के साथ यह लगातार बढ़ रही है और इसी वजह से ओबीसी आरक्षण में अपनी जगह सुनिश्चित करने के लिए तमाम जातियों में जातिगत राजनीति लगातार गरमा रही है। दलित जातियों के विपरीत खेतिहर ज़मीन के मालिकाने के मामले में इन पिछड़ी जातियों की स्थिति कहीं बेहतर है। इसलिए केवल सरकारी नौकरी व शिक्षा में उनके हिस्से से कई ओबीसी जातियों की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अन्दाज़ा नहीं चलता। साथ ही, कई जगहों पर आज दलित जातियों की प्रमुख उत्पीड़क जातियाँ ये ओबीसी जातियाँ ही हैं। इसलिए जाति उन्मूलन की लड़ाई में भी ऊपर की ओर गतिमान किसान मध्य जातियों और दलित जातियों के बीच गठजोड़ का सिद्धान्त एक हवा-हवाई सिद्धान्त है और ज़मीन पर यह बिरले ही कहीं व्यवहार में उतारा जा सकता है।
बहरहाल, ईडब्ल्यूएस आरक्षण के पक्ष में दिये गये इन तर्कों को सुनकर ऐसा भान होता है कि दलितों व आदिवासियों की स्थिति न केवल बेहतर हो गयी है बल्कि इतनी दुरुस्त हो गयी है कि अब सवर्ण जातियाँ वंचित की श्रेणी में आ गयी हैं इसलिए अब आरक्षण की ज़रूरत उन्हें है!
यह सच है कि आज सभी जातियाँ वर्गों में विभाजित हैं और सवर्ण जातियों का भी एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा सर्वहारा व अर्द्धसर्वहारा में तब्दील हो चुका है। यह भी सच है कि आज उसे रोज़गार की आवश्यकता है। लेकिन जब सरकारी नौकरियाँ व उच्चतर शिक्षा के अवसर हैं ही नहीं, तो फिर सवर्ण जातियों के ग़रीब तबक़े के लिए सरकारी नौकरी व उच्चतर शिक्षा में आरक्षण से उसे क्या हासिल होने वाला है? जब सरकारी शिक्षण प्रतिष्ठानों में लगातार फ़ीसें बढ़ायी जा रही हैं और सीटें घटायी जा रही हैं, तो वहाँ ईडब्ल्यूएस श्रेणी में आने वाले सवर्ण छात्र को इस आरक्षण से क्या मिलेगा? निजीकरण की जो रफ़्तार है और सरकारी उद्यमों में छँटनी और ठेकाकरण की जो दर है, उससे किसी भी आधार पर मिलने वाले आरक्षण का जो बचा-खुचा मतलब रहता था वह भी समाप्तप्राय है। ऐसे में, ईडब्ल्यूएस आरक्षण का यह जुमला वास्तव में एक ऐसी चीज़ के लिए जनता को आपस में लड़ाने की नापाक साज़िश है, जो कहीं है ही नहीं।
आरक्षण की पूरी राजनीति का ही आज मक़सद जनता को आपस में एक ग़ैर-मुद्दे पर लड़ाना है। आज़ादी के फ़ौरन बाद सरकारी नौकरियों व शिक्षा में आरक्षण एक जनवादी अधिकार के रूप में प्रासंगिकता रखता था। आज जब न तो सरकारी नौकरियों में अवसर मौजूद हैं और न ही सरकारी उच्चतर शिक्षा में, निजीकरण की आँधी ने हर चीज़ को समेट लिया है, तो ऐसे में व्यापक दलित व पिछड़ी जातियों तथा आदिवासी आबादी को यह समझ लेना चाहिए कि जातिगत व जनजातिगत आधार पर होने वाले सामाजिक उत्पीड़न को समाप्त करने और सामाजिक व आर्थिक बराबरी हासिल करने और मुक्ति प्राप्त करने का रास्ता आरक्षण की राजनीति से नहीं जाता है।
साथ ही, जो सवर्णवादी व ब्राह्मणवादी “योग्यता” व “मेरिटोक्रेसी” की बकवास के आधार पर दलितों व आदिवासियों के लिए आरक्षण को समाप्त करने की बात करते हैं, वे शिक्षण संस्थानों में कभी अमीरों को सीटें बेचने, प्रबन्धन कोटा, एनआरआई कोटा का विरोध नहीं करते और न ही वे सरकारी उद्यमों के निजीकरण व सरकारी नौकरियों को समाप्त किये जाने का विरोध करते हैं। इसी से पता चल जाता है कि वे दलितों व आदिवासियों हेतु मौजूद आरक्षण का विरोध केवल और केवल सवर्णवादी और ब्राह्मणवादी मानसिकता के चलते करते हैं। इसलिए जहाँ कहीं सरकारें आरक्षण के तहत सीटों पर भर्ती नहीं करतीं या दाख़िला नहीं देतीं, वहाँ क्रान्तिकारी शक्तियों को एक जनवादी अधिकार के रूप में आरक्षित सीटों पर भर्ती व दाख़िले पर मौजूद भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ना चाहिए, बिना यह मुग़ालता पाले कि आरक्षण के रास्ते सामाजिक असमानता समाप्त हो सकती है या दलित व आदिवासी मुक्त हो सकते हैं। अगर ऐसा होना होता तो आरक्षण के इतने दशकों के बाद हो चुका होता। लेकिन आज भी दलितों की 90 फ़ीसदी आबादी या तो शहरी सर्वहारा व अर्द्धसर्वहारा है या ग्रामीण सर्वहारा व अर्द्धसर्वहारा। और इस प्रतिशत में पिछले कुछ दशकों से अब ज़्यादा अन्तर नहीं आ रहा है।

आज क्यों उछाला गया है ईडब्ल्यूएस आरक्षण का मसला और इससे सवर्ण जातियों के मेहनतकशों को क्या हासिल होगा?

भाजपा ने आज ईडब्ल्यूएस आरक्षण का मसला क्यों उछाला है? उसका असली मक़सद है सवर्ण जातियों में मौजूद मध्य व उच्च मध्यवर्ग का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करना। साथ ही, जनता के बीच ब्राह्मणवादी व जातिगत विचारधारा व पूर्वाग्रह के असर को बढ़ाना और उसका इस्तेमाल करके जनता को खण्ड-खण्ड में तोड़ना भी इस क़दम का मक़सद है। यह सब इस समय वास्तव में जारी विधानसभा चुनावों और 2024 में आने वाले लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र किया गया है। बढ़ती महँगाई और बेरोज़गारी पर क़ाबू पाने में नाकाम भाजपा सरकार के पास मन्दिर, लव जिहाद आदि के अलावा कोई मसला नहीं बचा है। उसके एजेण्डा में अब रोज़गार और महँगाई का नाम लेना भी शामिल नहीं रह गया है। ऐसे में, भाजपा सरकार को ऐसे मुद्दे की ज़रूरत थी जो वोटों का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने के साथ सवर्ण जातियों के मध्यवर्गीय वोटों को उसके पक्ष में करे।
ईडब्ल्यूएस आरक्षण के नये नियम के अनुसार जिन परिवारों को किसी अन्य समुदायगत आरक्षण के तहत आरक्षण नहीं मिला है और जिनकी वार्षिक आय रु. 8 लाख तक है, वे इस आरक्षण के अधिकारी हैं! आर्थिक रूप से ग़रीब सवर्ण जाति के लोगों के लिए आरक्षण प्राप्त करने के लिए मुख्य तौर पर पाँच अर्हताएँ होनी चाहिए। पहली, परिवार की सालाना आय 8 लाख रुपये से कम हो, दूसरी है कृषि योग्य भूमि 5 एकड़ से कम हो, तीसरी है रिहायशी मकान 1,000 वर्ग फुट से कम हो, चौथी है नगरपालिका में प्लॉट 100 गज से कम हो तथा पाँचवी है रिहायशी प्लॉट नगरपालिका से बाहर हो तो यह 200 गज से कम हो। अब आप ही सोचिए, यदि कोई प्रतिमाह लगभग रु. 67,000 कमाता है, तो वह आर्थिक रूप से कमज़ोर तबक़े की श्रेणी में किस प्रकार आया? जिस देश में शीर्ष की 10 प्रतिशत आबादी में आने के लिए केवल रु. 25,000 प्रतिमाह कमाना होता है और जिस देश में 82 प्रतिशत पुरुष कामगार और 92 प्रतिशत स्त्री कामगार रु. 10,000 प्रतिमाह से कम कमाते हैं, वहाँ पर रु. 67,000 प्रतिमाह कमाने वाला आर्थिक रूप से कमज़ोर तबक़े में किस प्रकार आया? जाहिर है कि इसका मक़सद भी सवर्ण जातियों के आम मेहनतकश लोगों को फ़ायदा पहुँचाना नहीं है, बल्कि उनमें मौजूद खाते-पीते मध्यवर्गीय परिवारों को लाभ की आशा देना है और उनका वोट बटोरना है। जो अर्हता निर्धारित की गयी है उसमें तो सवर्ण आबादी का क़रीब 80 प्रतिशत आ जायेगा, जिसमें कि आम मेहनतकश आबादी के साथ मध्यवर्गीय आबादी भी शामिल है। ज़ाहिर है, इस ईडब्ल्यूएस आरक्षण का लाभ सवर्ण मेहनतकश आबादी को नहीं मिलने वाला है, हालाँकि उससे भ्रमित वह भी होगी। यह है भाजपा की असली साज़िश जिसके तहत ईडब्ल्यूएस आरक्षण का नया झुनझुना लोगों के हाथों में थमाया जा रहा है।
लेकिन सवर्ण मध्यवर्ग को भी यह क्या वास्तव में शिक्षा या रोज़गार देने के मामले में कोई करामात कर सकता है? जी नहीं! क्योंकि सरकारी नौकरियाँ पैदा ही नहीं हो रही हैं और जो हैं उन्हें या तो समाप्त किया जा रहा है या फिर उनका ठेकाकरण करके उन पर स्थायी भर्तियाँ बन्द की जा रही हैं। यह एक हवाई केक है जिसका एक हिस्सा पाने के लिए हर कोई बेताब है और बेकारी का आलम यह है कि इस हवाई केक की छवि के पीछे भी आम जनता को लड़वाया जा सकता है।

भारत में रोज़गार और शिक्षा की स्थिति

हमारे देश में पूरी आबादी का लगभग 47 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा और रोज़गार के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहा है। 15 से 24 वर्ष की युवा आबादी जिसे हम शिक्षा प्राप्त करने वाली आबादी तथा एक हद तक रोज़गार की क़तार में भी शामिल आबादी की तरह देखते हैं उसकी संख्या 250,203,116 यानी लगभग 25 करोड़ है। यह आबादी का 17 प्रतिशत हिस्सा है। 25 से लेकर 44 वर्ष की युवा आबादी 434,629,949 (लगभग 43.4 करोड़) है। यह पूरी आबादी का लगभग 30 प्रतिशत है। इस आबादी को हम रोज़गार की प्रतिस्पर्धा में प्रमुख तौर पर शामिल कर सकते हैं, हालाँकि श्रम बाज़ार में शामिल होने की मज़दूरों की औसत उम्र 15 से ही आरम्भ हो जाती है। वैसे तो म़जदूर व मेहनतकश वर्ग बचपन से लेकर जीवित रहते तक दो जून की रोटी के लिए रोज़गार की क़तार में शामिल रहता है लेकिन अगर हम प्रमुख तौर पर 15 से 44 वर्ष को काम की तलाश वाली आबादी रखें तो यह आबादी का 47 प्रतिशत होगी जो एक बड़ी संख्या है।
यदि हम 68 करोड़ आबादी की तुलना मौजूदा सरकारी नौकरियों से करें तो नौकरियों की स्थिति नगण्य प्राय नज़र आयेगी। निजी क्षेत्रों में भी नौकरियों की स्थिति बेहद बुरी है। इसकी पुष्टि बेरोज़गारी की बढ़ती दर कर रही है जो सरकारी आँकड़ों के अनुसार भी फ़िलहाल 8 प्रतिशत जा पहुँची है, जिनका मक़सद ही बेरोज़गारी की वास्तविक स्थिति को छिपाना होता है।
सरकारी नौकरियों की सूची देखें तो सबसे बड़ी भर्ती करने वाला रेल विभाग है। यह ग्रुप-डी में सबसे अधिक भर्तियाँ करता है। ग्रुप-डी में लगभग 1 लाख 35 हज़ार नौकरियाँ हैं। इसमें यदि बाक़ी दूसरी श्रेणियों की नौकरियाँ जोड़ दें तो यह संख्या 1 लाख 48 हज़ार होती है। दूसरी सबसे बड़ी भर्ती करने वाले में है सेना और पुलिस। पुलिस में वर्ष 2022 के लिए 25,011 नौकरियाँ हैं जिसमें सभी राज्यों की भर्तियाँ शामिल हैं। सेना में सबसे बड़ी संख्या 10 हज़ार अग्निवीर नौकरियों की दिखा रहे हैं। समझ ही सकते हैं कि ठेका जैसी 4 साल की नौकरी को भी सरकारी नौकरी में शामिल किया जा रहा है। कुल सेना की भर्ती अग्निवीर को शामिल करते हुए 12 हज़ार से ऊपर नहीं जायेगी।
अलग-अलग सरकारी बैंकों की प्रकाशित नौकरियों को देखें तो वर्ष 2022 के लिए इनकी संख्या 2,356 है।  सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की सभी प्रकाशित नौकरियों की संख्या 6,317 है। अगर सभी नौकरियों को जोड़ भी दें और अग्निवीर जैसी ठेका चरित्र वाली नौकरियों को भी जोड़ दें तो यह संख्या 2 लाख भी नहीं पहुँच पायेगी। इसके अलावा सभी राज्यों में औसतन तीन से चार हज़ार नौकरियाँ हैं। कई राज्यों जैसे हरियाणा और पँजाब में नौकरी की स्थिति बेहद बुरी है। वहीं राज्य सरकारों ने तय नौकरियों से 21 प्रतिशत कम नौकरियाँ दी हैं।
वर्ष 2021 में केन्द्र सरकार ने कुल 38 हज़ार नौकरियाँ ही प्रकाशित की थीं जो पहले से प्रकाशित नौकरियों से 27 प्रतिशत कम है। यहाँ पर ही हम लोक सेवा आयोग और राज्य सेवा आयोग की स्थिति को भी दर्शाना चाहेंगे। लोक सेवा आयोग ने वर्ष 2014 में 1364 नौकरियाँ प्रकाशित कीं जो 2015 में कम होकर 1164 रह गयीं, 2017 में 1058 और 2018 में मात्र 812 सीटें ही रह गयीं। वर्ष 2014 से अब तक सीटों में 47 प्रतिशत गिरावट आयी है। इसी प्रकार एसएससी नौकरियों में घटती संख्या देख सकते हैं। 2013 में 20,000 नौकरियाँ, 2018 में यह घट कर 12,000 रह गयीं और अब तो मात्र 8000-9000 ही रह गयी हैं। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर महीने 13 लाख नौकरियों की आवश्यकता है और पूरे साल में कम से कम 80 लाख। बेरोज़गारी की दर 8 प्रतिशत पहुँच गयी है। वर्ष 2022 में बेरोज़गारी दर सबसे ऊँची है जो कोरोना काल की दर को छूने जा रही है। आने वाले दिनों में स्थिति में सुधार के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। उल्टा विश्व के बड़े बुर्जुआ अर्थशास्त्री आने वाली भयंकर मन्दी की ओर इशारा कर रहे हैं।
ज़ाहिर है, नौकरी की तलाश करने वाली संख्या की तुलना में यदि सरकारी नौकरियों की संख्या की बात करें तो वह ऊँट के मुँह में ज़ीरे के समान भी नहीं है।

न्यायपालिका के सवर्णवादी पूर्वाग्रह और आरक्षण की सच्चाई

जजों का दावा है कि जातिगत आधार पर दिया जाने वाला आरक्षण समाज की वर्तमान स्थिति को देखते हुए बेमानी होता जा रहा है। उल्टा जातिगत आरक्षण की वजह से समाज में असमानता पैदा हो रही है। उस असमानता को पाटने के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना चाहिए।
अब ज़रा इनके दावों का तथ्यों से मेल करते हैं और देखते हैं कि आरक्षण से समाज में कितना परिवर्तन आया है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के वर्ष 2018 के नियमित लेबर फ़ोर्स सर्वे के अनुसार अनुसूचित जातियों में स्नातकों की संख्या (18 प्रतिशत) उच्च जातियों के स्नातकों (37 प्रतिशत) की तुलना में आधे से भी कम है। इसी प्रकार अनुसूचित जाति के कैज़ुअल मज़दूरों का 33 प्रतिशत है जबकि (पूरी आबादी में उनका हिस्सा मात्र 16 प्रतिशत है) उच्च जाति से कैज़ुअल मज़दूरों में 15 प्रतिशत हैं। 1999 से यह अनुपात लगभग वैसा ही बना हुआ है। अनुसूचित जातियों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध बताते हैं आज भी जातिगत उत्पीड़न किस प्रकार समाज में मौजूद है।  2019 में 45,961 अपराधों, 2020 में 50,291 और 2021 में 50,900 अपराधों के शिकार अनुसूचित जातियों के लोग हुए।
सरकारी दफ़्तरों (कैबिनेट सेक्रेटेरियेट, लोक सेवा आयोग और चुनाव आयोग) में कार्यरत ग्रुप-ए से ग्रुप-सी में कुल 5.12 लाख कर्मचारियों का जातिगत अनुपात राज्यसभा में 17 मार्च 2022 को प्रस्तुत किया गया। इनमें सफ़ाई कर्मचारी भी शामिल हैं। इसमें रेल और डाक विभाग को शामिल नहीं किया गया है। इन 5.12 लाख कर्मचारियों में ग्रुप-ए से ग्रुप-सी तक के कर्मचारियों में 17.70 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 6.72 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और 20.26 प्रतिशत अन्य पिछड़ी जातियों से हैं। ग्रुप-ए के उच्च पदों की बात यदि करें तो वहाँ अनुसूचित जाति से 12.86 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति से 5.64 प्रतिशत और अन्य पिछड़ी जातियों से 16.88 प्रतिशत हैं। ये आँकड़े सरकारी हैं।
इन्हें देखकर हम समझ सकते हैं कि जातिगत असमानता को नकारकर आरक्षण का विरोध करने वाले तथ्यों के आधार पर नहीं बल्कि अपने पूर्वाग्रहों और सवर्णवादी मानसिकता से प्रस्थान कर रहे हैं। यह सच है कि आरक्षण जातिगत असमानता, शोषण, उत्पीड़न और पार्थक्य को तोड़ने में पूरी तरह असफल रहा है और यह किसी भी रूप में जातिगत सामाजिक असमानता को समाप्त नहीं कर सकता है और किसी भी तरह से यह दलित मुक्ति का रास्ता नहीं हो सकता। यह भी सच है कि आज जब सरकारी नौकरियों और उच्चतर शिक्षा के अवसर ही समाप्त होते जा रहे हैं, तो आरक्षण का प्रश्न ही एक ग़ैर-मुद्दा बन गया है। लेकिन यह कहना कि आरक्षण से अब सामाजिक समानता की वह मंज़िल आ गयी है कि अब जातिगत आधार पर मौजूद आरक्षण को समाप्त कर दिया जाये, तथ्यों के साथ बलात्कार है और ऐसा दावा करने वाले के मन के सवर्णवादी कीड़े को ही दिखलाता है।
17 मार्च 2022 को राज्य सभा में प्रस्तुत आँकड़ों में एक आँकड़ा आरक्षण के रिक्त पदों का भी था। यह आँकड़े दस केन्द्रीय विभागों के हैं जिसमें रक्षा सम्बन्धी उत्पादन विभाग, रेल, वित्त सेवाएँ, डाक, रक्षा विभाग, आवास एवं शहरी मामले, गृह विभाग, अणु ऊर्जा, कर विभाग और शिक्षा शामिल है। आँकड़े दर्शा रहे हैं कि आरक्षित पद भारी संख्या में रिक्त हैं। यानी आरक्षित पदों पर नौकरी की घोषणा तो हुई लेकिन उम्मीदवार नहीं मिले जिसकी वजह से पद रिक्त रह गया। इन दसों विभाग में अनुसूचित जातियों के लिए भरे पद 13,202; और रिक्त पद 17,880. अनुसूचित जनजातियों के भरे पद 9,619 और रिक्त पद 14,061 हैं, वहीं अन्य पिछड़ी जातियों के 11,732 भरे पद और 19,283 रिक्त पद। मतलब आरक्षित पदों के लिए कुल 51,224 सीटें थीं जिसमें मात्र 34,553 सीटें ही भरीं बाक़ी रिक्त रह गयीं क्योंकि उम्मीदवार नहीं थे! केन्द्र सरकार की नौकरियों का कुल 90 प्रतिशत इन 10 विभागों से आता है। सामाजिक समानता स्थापित करने के रास्ते के तौर पर आरक्षण को बनाये रखने या इसे बढ़ाने आदि की बात करने वाले आरक्षण के इस पहलू पर चुप क्यों रहते हैं? ऐसा क्यों है कि सात दशक से अधिक आरक्षण लागू होने के बाद भी पद के लिए उम्मीदवार नहीं मिलते? भ्रष्टाचार एक पहलू हो सकता है। लेकिन सिर्फ़ भ्रष्टाचार कहकर इस बात पर पर्दा नहीं डाला जा सकता।

उच्च शिक्षा में कुल नामांकन अनुपात मात्र 27 प्रतिशत है। यानी उच्च शिक्षा हासिल कर सकने वाली कुल आबादी से 3.74 करोड़ नौजवान ही उच्च शिक्षा में दाख़िला ले पाते हैं। ऊपर हमने 15 से 24 वर्ष की आयु की गणना दी है। किशोरवय का 50 प्रतिशत माध्यमिक शिक्षा भी नहीं हासिल कर पाता। बचा हुआ 50 प्रतिशत किशोरवय हिस्सा जो लगभग 15 करोड़ के आसपास होगा उसमें से मात्र 3.74 करोड़ छात्रों का उच्च शिक्षा में होना शिक्षा की बदहाली को ही दर्शाता है। गाँव और छोटे शहरों में स्कूलों की जो स्थिति है उससे हम सभी वाक़िफ़ हैं। हम जानते हैं कि भारत के बच्चों-नौजवानों की एक बड़ी आबादी शिक्षा से या अच्छी शिक्षा से वंचित है। ऐसे में उच्च शिक्षा में मिलने वाला आरक्षण इन बच्चों व नौजवानों के काम कैसे आ सकता है?
पहचान की राजनीति करने वाले जो गला फाड़-फाड़कर आरक्षण की माँग करते हैं उनसे यह पूछना होगा कि आरक्षण लागू होने के सत्तर वर्षों बाद भी अनुसूचित जाति और जनजाति की जीवन परिस्थितियों में कोई गुणात्मक परिवर्तन क्यों नहीं आया है? यदि आरक्षण ने उनकी जीवन परिस्थितियों में परिवर्तन नहीं किया है तब भी जाति समस्या का समाधान मात्र आरक्षण कैसे हो सकता है? क्या इस बात की पड़ताल नहीं की जानी चाहिए कि 8-10 प्रतिशत दलित आबादी को छोड़ दें तो बाक़ी 92 प्रतिशत दलित आबादी के लिए आरक्षण बेमानी है। यदि आरक्षण के रास्ते सामाजिक समानता आनी होती तो 70 वर्षों बाद भी यह हालत नहीं होती। आरक्षण से जो हुआ है वह यह है कि दलित आबादी में से 8-10 प्रतिशत हिस्सा ऐसा पैदा हुआ है जो उच्च या उच्च-मध्य वर्ग में तब्दील हो चुका है, राजनीतिक व आर्थिक शक्ति का हिस्सेदार बन चुका है और किसी सवर्ण शासक वर्ग से भी ज़्यादा वफ़ादारी से मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था की हिफ़ाज़त के लिए प्रतिबद्ध है, जो कि दलित मेहनतकश आबादी की शोषक और उत्पीड़क ही है। उसका दर्द सिर्फ़ इतना है कि शासक वर्ग का सवर्ण हिस्सा अपनी ब्राह्मणवादी मानसिकता के चलते उसे आर्थिक व राजनीतिक रूप से शक्तिशाली होने के बावजूद वह सम्मान नहीं देता, जिसका वह अपने आपको अधिकारी महसूस करता है। लेकिन इस ब्राह्मणवादी विचारधारा के ख़िलाफ़ भी दलितों के बीच पैदा हुआ यह तबक़ा सड़कों पर उतरकर रैडिकल लड़ाई लड़ने को तैयार नहीं है। दलित उत्पीड़न की तमाम घटनाओं पर वह चुप रहता है या फिर ज़ुबानी जमाख़र्च करने से आगे नहीं जाता।
दलित आबादी आज भी गाँवों में भयंकर जातिगत उत्पीड़न झेल रही है। बथानी टोला, खैरलांजी, मिर्चपुर (हरियाणा), भीमा कोरेगाँव में होने वाले नरसंहार, रोहित वेमुला और पायल तडवी की आत्महत्या, हाथरस गैंग रेप, इन्द्र मेघवाल की हत्या देश में दलित आबादी के साथ होने वाले भयंकर जातिगत उत्पीड़न के ही प्रमाण हैं। जेलों में सबसे अधिक संख्या में दलितों और मुसलमानों का होना यही दर्शाता है कि आज भी जातिगत उत्पीड़न भारतीय समाज की सच्चाई है।

निष्कर्ष के तौर पर

देश में रोज़गार और शिक्षा की स्थिति पर हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं। घटती नौकरियों और शिक्षा में बढ़ते निजीकरण को देखते हुए आरक्षण आज किसी भी रूप में पिछड़ी जातियों या जनजातियों की मुक्ति का रास्ता नहीं लगता। इसके लागू होने के सात दशकों से अधिक के बाद भी 92 प्रतिशत दलित आबादी की जीवन परिस्थितियों में कोई बुनियादी सुधार नहीं आया है। आरक्षण का लक्ष्य राहत या सुधार नहीं, बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था को बनाये रखने के लिए एक लुकमा फेंककर जनता को जातिगत आधार पर बाँटना है। इसका समर्थन या विरोध करने वाले जाने-अनजाने एक ही साज़िश का शिकार हो जाते हैं।
ऊपर दिये गये सरकारी नौकरियों की उपलब्धता के आँकड़ों को देखने के बाद हमें यह तो साफ़ दिख रहा है कि बेरोज़गारों की विशालकाय संख्या के सामने यह नौकरियाँ शून्यप्राय ही हैं। आप कह सकते हैं कि नौकरियाँ निजी क्षेत्रों में भी होती हैं। हम उसे यहाँ शामिल नहीं कर रहे हैं क्योंकि आरक्षण वहाँ लागू नहीं होता। लेकिन इतना ज़रूर कहना चाहेंगे कि निजी क्षेत्र में भी नौकरियों की हालत ख़स्ता ही है। तभी तो वर्ल्ड बैंक ने प्रति महीने 13 लाख नौकरियों की आवश्यकता जतायी है। वर्ल्ड बैंक सरकारी और ग़ैर सरकारी नौकरी में फ़र्क़ नहीं करता। वह बस नौकरियों के अवसर की बात कर रहा है जिसमें दोनों शामिल हैं।
सच्चाई यह है कि आज आरक्षण एक ग़ैर-मुद्दा बन चुका है, जिस पर आम मेहनतकश जनता को आपस में लड़वाया जा रहा है। हम ऊपर देख चुके हैं कि दलित मुक्ति के रास्ते के तौर पर आरक्षण को देखना, या सवर्णवादी मानसिकता से आरक्षण को समाप्त करने की बात करना, दोनों ही ग़लत कार्यदिशा है। आज यदि सौ प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाये तो भी दलित व आदिवासी आबादी में से 2 प्रतिशत को भी इसका लाभ नहीं मिलेगा और यदि आरक्षण को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया जाये तो 2 प्रतिशत सवर्ण आबादी को भी इसका लाभ नहीं मिलेगा। इन सभी जातियों के मेहनतकशों को तो इसका लाभ मिलने का सवाल ही नहीं पैदा होता। ईडब्ल्यूएस आरक्षण का भी कोई लाभ सवर्ण जातियों की मेहनतकश आबादी को नहीं मिलने वाला है और यहाँ तक कि इनमें मौजूद मध्यवर्ग को भी इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे में, आरक्षण की समूची राजनीति ही जनता को बाँटकर राज करने की शासक वर्ग की रणनीति का अंग मात्र है। हमें इस बात को समझना चाहिए। ऐसे में, संघर्ष का सही मुद्दा और लाइन यह है कि सभी को समान एवं निःशुल्क शिक्षा और सभी को रोज़गार की माँग को उठाते हुए सभी जातियों की व्यापक मेहनतकश आबादी का एक क्रान्तिकारी और जुझारू जनान्दोलन खड़ा किया जाये। आज का वक़्त इसके लिए सबसे उपयुक्त है। ऐसी राजनीतिक लाइन पर खड़ा जनान्दोलन ही आज आरक्षण और पहचान की राजनीति को शिकस्त दे सकता है और व्यापक मेहनतकश जनता की क्रान्तिकारी एकजुटता को भी स्थापित कर सकता है और साथ ही जनता के बीच मौजूद जातिगत पूर्वाग्रहों के ख़िलाफ़ लड़ने और उन्हें दूर करने का भी रास्ता यही एकजुटता हो सकती है।

मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2022


 

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