दुनिया की सबसे बड़ी तकलोलॉजी कम्पनियों में भारी छँटनी
विश्व पूँजीवाद में संकट के नये दौर की आहट से घबराया पूँजीपति वर्ग

आनन्द

जिस समय कोरोना महामारी अपने चरम पर थी, उस समय दुनिया के तमाम देशों में लॉकडाउन की वजह से उत्पादन ठप हो जाने के कारण ज़्यादातर सेक्टरों में कम्पनियों के मुनाफ़े में गिरावट आयी थी। लेकिन उस दौर में चूँकि लोग ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्मों पर पहले से ज़्यादा समय बिताते थे इसलिए कम्प्यूटर व इण्टरनेट की दुनिया से जुड़े कुछ सेक्टरों जैसे आईटी, ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया आदि में चन्द इज़ारेदार कम्पनियों के मुनाफ़े में ज़बर्दस्त उछाल देखने में आया था। लेकिन लॉकडाउन हटने के बाद ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्मों पर लोगों की मौजूदगी के समय में कमी आने की वजह से और विश्व पूँजीवाद के आसन्न संकट की आहट सुनकर इन कम्पनियों को भी अपने मुनाफ़े की दर में गिरावट का ख़तरा दिखने लगा है। यही वजह है कि हाल के दिनों में ट्विटर, मेटा (फ़ेसबुक, व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम की पैरेंट कम्पनी), एमेज़ॉन, माइक्रोसॉफ़्ट, एचपी, स्नैपचैट और इंटेल जैसी शीर्ष प्रौद्योगिकी कम्पनियों ने अपने कर्मचारियों की संख्या में 20 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक की कटौती करने की घोषणा की है।
अमेरिका व पश्चिम यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं पर निर्भरता की वजह से भारत के आईटी सेक्टर में भी इस संकट का असर होना तय है। वास्तव में प्रौद्योगिकी कम्पनियों में छँटनी की यह प्रक्रिया इस साल की शुरुआत से ही शुरू हो चुकी थी। इस साल अब तक दुनिया की 780 प्रौद्योगिकी कॅम्पनियाँ एक लाख 20 हज़ार से भी ज़्यादा लोगों को नौकरी से निकाल चुकी हैं।
ग़ौरतलब है कि विश्व पूँजीवाद के संकट के नये दौर के संकेत कोरोना महामारी के पहले से ही मिलने शुरू हो चुके थे। 2008 के विश्व पूँजीवाद के संकट से निपटने के लिए जो मौद्रिक उपाय लाये गये उन्होंने एक नये संकट की ज़मीन तैयार करने का ही काम किया। अमेरिका सहित दुनिया के तमाम देशों के केन्द्रीय बैंकों ने अर्थव्यवस्थाओं में निवेश को बढ़ाने के मक़सद से ब्याज दरें बेहद कम कर दी थीं और अर्थव्यवस्था में मुद्रा का परिचलन बढ़ा दिया था, परन्तु अर्थव्यवस्था में आयी इस नयी तरलता का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था के वास्तविक क्षेत्र में करके उत्पादन बढ़ाने के बजाय तमाम वित्तीय कम्पनियों ने झटपट मुनाफ़ा कूटने के लालच में सट्टेबाज़ी, शेयर मार्केट और क्रिप्टोकरेंसी जैसे अवास्तविक पूँजी वाले क्षेत्रों में किया जिसकी वजह से पूरी दुनिया में मालों की क़ीमतों के बढ़ने की शुरुआत महामारी से पहले ही हो चुकी थी।
महामारी ने इस संकट को और गहराने का काम किया है। लॉकडाउन की वजह से तमाम मालों की आपूर्ति ज़बर्दस्त ढंग से प्रभावित हुई और लॉकडाउन से हुए नुक़सान से उबरने के लिए तमाम अर्थव्यवस्थाओं में और ज़्यादा मुद्रा झोंकने का काम किया गया जिसकी वजह से मुद्रास्फ़ीति की दर लगातार बढ़ती रही। ऊपर से यूक्रेन युद्ध की वजह से तेल, गैस, गेहूँ, खाद एवं तमाम खाद्य पदार्थों की आपूर्ति में भारी कटौती होने के चलते महँगाई की दर और बढ़ी। अभी भी चीन में ‘ज़ीरो कोविड नीति’ के तहत कई शहरों में लॉकडाउन लगा हुआ है जिसकी वजह से कई अहम मालों की आपूर्ति अभी तक सामान्य नहीं हो पायी है। इन सब वजहों से मुद्रास्फ़ीति की दर ख़तरे की सीमा के पार जा चुकी है। यही वजह है कि वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ़ सहित तमाम पूँजीवादी थिंक टैंक मुद्रास्फ़ीति पर नियंत्रण करने के मक़सद से सरकारों पर ब्याज दरों को बढ़ाने का दबाव बना रहे हैं। परन्तु मुद्रा परिचलन की रफ़्तार घटाने का नुक़सान मन्दी के रूप में आ रहा है क्योंकि उससे निवेश के लिए ज़रूरी मुद्रा की कमी हो रही है। इस प्रकार पूँजीवाद के सामने एक तरफ़ कुँआ है तो दूसरी तरफ़ खाई है। मुनाफ़े का इंजन तेज़ करने के लिए अर्थव्यवस्था में मुद्रा झोंकी गयी, लेकिन उसकी वजह से मुद्रास्फ़ीति की दर बढ़ गयी और मुद्रास्फ़ीति की दर को कम करने के लिए बाज़ार से मुद्रा वापस लेने पर नये सिरे से संकट की आहटें सुनाई देने लगी हैं।
यही वह परिदृश्य है जिसमें ट्विटर, मेटा, एमेज़ॉन, माइक्रोसॉफ़्ट, एचपी, स्नैपचैट और इंटेल जैसी कम्पनियों ने बड़े पैमाने पर छँटनी की घोषणा की है। इनके अलावा कई अन्य प्रौद्योगिकी कम्पनियों ने मुनाफ़े की दर में गिरावट के संकेत भाँपते हुए नयी भर्ती पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। इनमें ट्विटर के नये मालिक एलॉन मस्क ने सबसे ज़्यादा अपमानजनक तरीक़े से अपनी कम्पनी के लगभग साढ़े सात हज़ार कर्मचारियों में से 50 फ़ीसदी लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया और शेष को नये ‘हार्डकोर’ तरीक़े से काम करने के लिए आगाह किया। दूसरे शब्दों में उन्हें ज़्यादा समय के लिए और प्रबन्धन की ज़्यादा निगरानी में काम करने के लिए तैयार रहना होगा। जो ऐसा करने के लिए तैयार नहीं होंगे उन्हें कम्पनी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। मस्क द्वारा अपमानजनक शैली अपनाये जाने के विरोध में ट्विटर के कई कर्मचारियों ने स्वेच्छा से कम्पनी से त्यागपत्र दे दिया।
ग़ौरतलब है कि ट्विटर जैसी प्रौद्योगिकी कम्पनियों में काम करने वाले इंजीनियर आम तौर पर बहुत मोटी तनख़्वाह पाते हैं और उनका जीवन स्तर आम मज़दूर से काफ़ी बेहतर होता है। इसलिए सामान्य समय में वे पूँजीवादी व्यवस्था के पक्ष में दलील देते हुए नज़र आते हैं, हालाँकि वे होते बौद्धिक मज़दूर ही हैं क्योंकि वे अपनी बौद्धिक श्रमशक्ति बेचकर मालिक के लिए मुनाफ़ा पैदा करने का काम करते हैं। लेकिन वे ख़ुद को मज़दूर वर्ग से अलग समझते हैं और सामान्य परिस्थितियों में पूँजीवाद की वक़ालत करते हुए मिलते हैं। उनमें से कई तो मज़दूरों को हिक़ारत भरी नज़र से भी देखते हैं। लेकिन संकट की परिस्थिति आते ही ऐसे लोगों को भी पूँजीवाद की असलियत से रूबरू होना पड़ता है।
इलॉन मस्क द्वारा अपने कर्मचारियों के साथ किये गये अपमानजक बर्ताव के बाद ऐसे तमाम लोगों ने मस्क के तानाशाहाना और अमानवीय आचरण के ख़िलाफ़ ख़ूब बोला और लिखा। परन्तु सच्चाई तो यह है कि इलॉन मस्क जो कुछ कर रहा है वह पूँजीवाद के तर्क से बिल्कुल जायज़ है। ग़ौरतलब है कि मस्क ने हाल ही में अपनी अन्य कम्पनियों से प्राप्त मुनाफ़े के एक हिस्से से और बैंकों से क़र्ज़ लेकर 44 अरब डॉलर की भारी क़ीमत में ट्विटर को ख़रीदा है जिसका मक़सद ट्विटर पर आने वाले विज्ञापनों की बदौलत मुनाफ़ा कमाने के साथ ही साथ टेस्ला व स्पेसएक्स जैसी अपनी अन्य कम्पनियों का प्रचार करने के लिए ट्विटर के प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल करना है। इस मक़सद को पूरा करने के लिए वो किसी भी हद तक गुज़र सकता है। इलॉन मस्क आज के पतनशील पूँजीवाद का एक प्रातिनिधिक चरित्र है। उसके तानाशाहाना, मानवद्रोही और आत्ममुग्ध व्यक्तित्व का निर्माण वास्तव में इस पूँजीवादी व्यवस्था ने ही किया है जिसकी बदौलत यह सनकी व्यक्ति आज दुनिया का सबसे सफल और सबसे बड़ा पूँजीपति बना है। इसलिए अगर किसी को इलॉन मस्क जैसे शख़्स नाकाबिले बर्दाश्त है तो उसे वास्तव में यह व्यवस्था नाकाबिले बर्दाश्त होनी चाहिए।

मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2022


 

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