ईरान में सत्ता-विरोधी जन आन्दोलन के तीन माह : संक्षिप्त रिपोर्ट

विवेक

सितम्बर माह में ईरान के गश्त-ए-एरशाद द्वारा महसा अमीनी की बर्बर हत्या के बाद से पूरे देश में लोग सड़कों पर उतरकर हिजाब क़ानून व अन्य महिला-विरोधी क़ानूनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं, तथा इनकी बर्ख़ास्तगी की माँग कर रहे हैं। 100 दिन से भी ज़्यादा का समय बीत जाने के बाद भी लोग लगातार इन प्रदर्शनों में भागीदारी कर रहे हैं। ज्ञात हो कि वर्ष 1979 में कट्टरपन्थी इस्लामी शासन के सत्ता में क़ाबिज़ होने के उपरान्त से ईरान में महिलाओं (चाहे किसी भी धर्म से सम्बन्धित हों) के लिए हिजाब पहनना ज़रूरी है। इसका पालन हो, ऐसा पुख़्ता करने के लिए एक विशेष पुलिस बल भी तैनात है, जिसे गश्त-ए-एरशाद कहा जाता है। 16 सितम्बर को महसा अमीनी नामक 21 वर्षीय कुर्द मूल की महिला को गश्त-ए-एरशाद ने हिजाब सही तरह से न पहनने का दोषी पाया और गिरफ़्तार कर लिया गया। गिरफ़्तार करने के उपरान्त महसा अमीनी को बुरी तरह से मारा-पीटा गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी। जाँच में यह बात सामने आयी कि उनकी मौत सर में चोट की वजह से हुई है, इसके बावजूद दोषियों को सज़ा देने के बजाय ईरान की सरकार इस मामले से कन्नी काटती रही। सरकार के इस रवैये के ख़िलाफ़ देशभर में इस घटना के ख़िलाफ़ ग़ुस्से की लहर फैल गयी व विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये। महिलाओं ने इन प्रदर्शनों में आगे रहकर भागीदारी की, सड़कों पर महिलाओं ने हिजाब की होली जलायी, विरोधस्वरूप अपने बाल काटे, तथा ईरान के चौक-चौराहों पर मौजूद अयोतुल्लाह ख़मेनी व अली ख़मेनी के पोस्टरों को फाड़ा गया।
इन प्रदर्शनों में प्रदर्शनकारियों पर ईरान की सरकार द्वारा दमन भी किया गया है। ईरान सरकार के मुताबिक़ क़रीब 200 लोग पूरे देश में इन प्रदर्शनों के दौरान मारे गये है। लगभग 14000 लोगों की गिरफ़्तारी हुई है। हालाँकि वास्तविक तस्वीर इससे भी भयावह हो सकती है। इसी बीच दिसम्बर की शुरुआत में यह ख़बर आयी कि गश्त-ए-एरशाद ख़त्म कर दी गयी है। सनद रहे कि गश्त-ए-एरशाद को ख़त्म करने की माँग पिछले एक दशक से उठायी जा रही है। लेकिन लगातार हो रहे प्रदर्शनों के दबाव के कारण दिसम्बर की शुरुआत में ईरान के अटॉर्नी जनरल ने बयान दिया था कि गश्त-ए-एरशाद ख़त्म कर दी गयी है। हालाँकि ईरान के लोगों ने कहा है कि अभी भी गश्त-ए-एरशाद सक्रिय है और पहले की ही तरह अपना काम कर रही है। किन्तु, प्रदर्शनकारी गश्त-ए-एरशाद के ख़त्म होने को अपनी आख़िरी मंज़िल नहीं मानते हैं। बल्कि वे इस्लामिक शासन का अन्त चाहते हैं। ईरान में सत्ता में क़ाबिज़ अधिसत्तावादी इस्लामिक कट्टरपन्थी शासन के ख़िलाफ़ जनता में आम तौर पर एक ग़ुस्सा बना हुआ। इसी वर्ष के मध्य में अनाज संकट व महँगाई के कारण भी लोग सड़कों पर उतरे थे। वैसे अनाज संकट का मुख्य कारण पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका द्वारा लगाये व्यापार प्रतिबन्ध हैं।
ईरान में कहने को तो लोगों को वोट देने का अधिकार है, एक चुनी गयी सरकार है लेकिन चुनी गयी सरकार भी सुप्रीम लीडर और उसके नेतृत्व वाली गार्जियन काउंसिल के मातहत ही काम करती है। सुप्रीम लीडर का पद सर्वोपरि माना जाता है। ईरान की सरकार द्वारा कई स्त्री-विरोधी क़ानूनों में से एक हिजाब क़ानून भी है। वर्ष 2021 में ईरान की संसद में पेश घरेलू हिंसा-विरोधी विधेयक को मंज़ूरी अभी तक नहीं मिल पायी है क्योंकि कट्टरपन्थी धड़ा इसे इस्लामी मूल्य-मान्यता के अनुरूप नहीं देखता है। इसके अतिरिक्त ईरान में घोर मज़दूर-विरोधी क़ानून मौजूद हैं। यूनियन से जुड़ी गतिविधियों पर कई तरीक़े की पाबन्दियाँ हैं तथा हड़ताल को ग़ैर-क़ानूनी क़रार दिया गया है।
वर्ष 2019 में भी ईरान की जनता राशन और ईंधन के दामों में बढ़ोतरी तथा तत्कालीन राष्ट्रपति हसन रूहानी के भ्रष्ट शासन के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरी थी। ईरान की सत्ता द्वारा इन प्रदर्शनों का दमन किया गया था, इस दौरान सैंकड़ों प्रदर्शनकारी मारे गये थे और हज़ारों लोगों को क़ैद किया गया था। ईरान में ट्रेड यूनियन में सक्रियता या इससे जुड़े मामलों में दस वर्ष तक सज़ा दी जाती है। जो रहे-सहे अधिकार मज़दूरों के पास थे भी ईरान में इस्लामी शासन के 4 दशकों में वो भी छीन लिये गये हैं। प्रदर्शनों में भागीदारी करते हुए ईरान के ट्रेड यूनियनों व शिक्षकों के साझा काउंसिल ने 26 सितम्बर और 28 सितम्बर को राष्ट्रीय हड़ताल आयोजित की। इस दौरान फ़ैक्टरियाँ, स्कूल व विश्वविद्यालयों में कामकाज ठप्प रहा, कई शिक्षकों ने आन्दोलन के समर्थन में विश्वविद्यालयों से इस्तीफ़ा भी दिया। अभी भी छात्र-शिक्षक व शहरी मज़दूर अपने स्तरों पर हड़ताल आयोजित कर आन्दोलन को जीवित रखे हुए हैं। आन्दोलन की शुरुआत में जहाँ जनता ‘ज़न, ज़िन्दगी, आज़ादी’ के नारे उठा रही थी अब इससे आगे बढ़ते हुए यह नारा दे रही है कि ‘न मुल्ला चाहिए, न शाह चाहिए, हमें सिर्फ़ जनवाद चाहिए’।
हालाँकि, इस आन्दोलन की मुख्य कमज़ोरी इसका संगठित नहीं होना है। मूल रूप से यह स्वत:स्फूर्त तरीक़े से पनपा हुआ आन्दोलन है। इसे दिशा देने के लिए किसी क्रान्तिकारी नेतृत्व का अभाव है। जिसके कारण ईरान की सत्ता को दमन करने में आसानी हुई है। इसके साथ ही आन्दोलन में शाह के शासन के समर्थकों ने घुसपैठ की कोशिश की है। इन सबके बावजूद लोग अपनी मूलभूत माँगों को लेकर जुटे हुए हैं।
वर्ष 1979 में शाह की सत्ता गिरी तो उसका मुख्य कारण सेना के एक बड़े हिस्से का इस्लामी चरमपन्थी समूह के साथ हो जाना था। इस बार के प्रदर्शनों में भी ऐसे वाक़या हुए हैं जब पुलिस प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ी हुई है। पर ऐसा अभी कम ही हुआ है। बढ़ती महँगाई और बेरोज़गारी के कारण जनता के बड़े हिस्से में विरोध की लहर व्याप्त है। पर संगठन के अभाव में यह ऐसे बिखरे विरोध प्रदर्शनों के तौर पर ही दिख रहा है।
हालाँकि ईरान के इस्लामी शासन के लिए यह पिछले चार दशकों में सबसे मुश्किल वक्त है। ईरान में चरमपन्थी इस्लामी शासन का उभार 1979 में रज़ा शाह की सत्ता को हटाकर हुआ था। रज़ा शाह अमेरिकी कठपुतली भर था, जो ख़ुद 1953 में अमरीका व ब्रिटेन की मदद से जनता द्वारा चुनी गयी सरकार का तख़्तापलट करके सत्ता में आया था। उसके शासन काल में तेल व अन्य प्राकृतिक संसाधन पर विदेशी नियंत्रण को बढ़ावा दिया गया था तथा कई मज़दूर-विरोधी क़ानून लागू किये थे। 1970 के दशक में वामपन्थी पार्टियों के नेतृत्व में ईरान के मज़दूरों ने कई शानदार संघर्ष लड़े तथा कई मसलों पर रज़ा शाह पहलवी को क़दम पीछे खींचने पर मजबूर भी किया। मज़दूर आन्दोलन के बढ़ते दबाव के कारण ईरान के शाह ने कुछ तथाकथित सुधार लागू किये, जिसे उसे उसने श्वेत क्रान्ति का नाम दिया। इस दौरान सीमित अर्थों में भूमि सुधार भी हुए, लेकिन इसके कारण से छोटे किसानों की एक बड़ी आबादी पैदा हो गयी, जो राजनीतिक तौर पर ढुलमुल थी, यही आबादी आगे चलकर इस्लामी चरमपन्थियों की समर्थक भी बनी। इसकी एक वजह यह भी थी कि इस आबादी में कम्युनिस्ट अपने आधार को विकसित नहीं कर पाये और उनके पिछड़ेपन का लाभ इस्लामिक कट्टरपन्थियों को मिला। राज्य द्वारा नियंत्रित कल-कारख़ानों के निजीकरण के कारण भी जनता में असन्तोष बढ़ा, शहरी मध्यवर्ग के बीच बेरोज़गारी बढ़ी, यह आबादी एक हद तक अयोतुल्लाह ख़मेनी के धुर प्रतिक्रियावादी प्रचार से प्रभावित हुई। इस तरह से शहरी व ग्रामीण इलाक़ों मे अयोतुल्लाह ख़मेनी के प्रतिक्रियावादी नेतृत्व का आधार बढ़ता गया तथा नेतृत्व की कमज़ोरियों के कारण ईरान की वामपन्थी पार्टियाँ जनता के बीच अपना आधार खोती चली गयीं। 1979 तक अयोतुल्लाह ख़मेनी के नेतृत्व में ईरान में इस्लामी राज्य की स्थापना हो गयी। प्रख्यात ईरानी इतिहासकार एरवैण्ड अब्रहमियन ने यहाँ तक कहा है कि श्वेत क्रान्ति रज़ा शाह पहलवी द्वारा ईरान में लाल क्रान्ति को रोकने का प्रयास था, लेकिन इसने ईरान में इस्लामी क्रान्ति (पढ़ें ‘प्रतिक्रान्ति’) का रास्ता आसान कर दिया। फलस्वरूप ईरान में इस्लामी चरमपन्थी अधिसत्तावादी राजकीय पूँजीवादी राज्यसत्ता स्थापित हुई।
कहने को तो ईरान में अभी भी वामपन्थी दल मौजूद हैं, लेकिन ईरान में कट्टरपन्थी शासन और दमन के कारण वे बिखरी हुई हैं और उनका नेतृत्व दूसरे देशों में निर्वासित है।
जैसा कि पहले इंगित किया गया है कि इस आन्दोलन में क्रान्तिकारी नेतृत्व का अभाव है। इसी वजह से हो सकता है कि देर-सबेर यह आन्दोलन धीमा पड़ जाये। बहुत मुमकिन है कि ईरान के इस मौजूदा आन्दोलन का हश्र भी 2011 के अरब उभार की तरह हो। पर इन सबके बावजूद ईरान की जनता के इस बहादुराना संघर्ष ने उदाहरण स्थापित किया है। जिस तरह से पिछले 5 सालों में ईरान में व्यवस्था-विरोधी स्वर मज़बूत हुए हैं, उससे वहाँ प्रगतिशील परिवर्तन की उम्मीद तो अवश्य ही जगती है। लेकिन यह भी तभी हो सकेगा जबकि आन्दोलन स्वत:स्फूर्तता से सचेतनता की ओर आगे बढ़े और यह एक कम्युनिस्ट हिरावल पार्टी की मौजूदगी में ही हो सकता है, जिसका निर्माण आज हमारे ही देश की तरह ईरान में भी प्रधान अन्तरविरोध है।

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2023


 

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