लगातार घटती हुई सरकारी नौकरियाँ – 2010 से अब तक सबसे कम

लालचन्द्र

देश की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। स्वाभाविक है कि इस बढ़ती हुई जनसंख्या की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सरकारी अमले का भी विस्तार होना चाहिए, कर्मचारियों की संख्या बढ़नी चाहिए। लेकिन हो रहा है इसका ठीक उल्टा। ग़ौरतलब है कि जनसंख्या में बढ़ोत्तरी अपने आप में समस्या नहीं होती क्योंकि सामाजिक आवश्यकताएँ भी जनसंख्या के साथ बढ़ती हैं, उत्पादन की आवश्यकता बढ़ती है और यदि व्यवस्था ऐसी हो जिसका लक्ष्य सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना हो, तो हर हाथ को काम देना भी सम्भव होता है। साथ ही, प्राकृतिक संसाधन भी किसी कटोरी में रखी शक्कर नहीं है, जिसे इंसानियत खाते-खाते एक दिन ख़त्म कर देगी। यदि एक जनपक्षधर व्यवस्था हो तो वह प्रकृति के साथ एक ऐसा रिश्ता बना सकती है, जिसमें वह जितने संसाधनों का उपभोग करती है, उससे ज़्यादा संसाधनों को पैदा करती है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का संकट भी व्यवस्था का पैदा किया संकट है, न कि यह केवल जनसंख्या के कारण पैदा हुआ है।

बहरहाल, हम देखते हैं कि सरकारी नौकरियों की स्थिति आज क्या हो गयी है।

वित्त मंत्रालय की ओर से जारी नवीनतम ‘वेतन एवं भत्तों पर वार्षिक रिपोर्ट’ के अनुसार केन्द्र सरकार में कुल स्वीकृत पदों की संख्या 39.77 लाख रह गयी है जोकि पिछले 3 वर्षों में सबसे कम है। इनमें से 9.64 लाख पद ख़ाली पड़े हैं, यानी इस वक्त केन्द्र सरकार के कुल कर्मचारियों की संख्या सिर्फ़ 30.13 लाख है। यह संख्या 2010 के बाद से सबसे कम है। इसमें सेना के पद शामिल नहीं हैं।

मोदी सरकार हर साल 2 करोड़ रोज़गार देने का जुमला उछालकर 2014 में सत्ता में आयी थी। लेकिन रोज़गार देने की बात तो दूर, पिछले नौ सालों में सरकारी विभागों, सार्वजनिक क्षेत्रों, निगमों से लेकर प्राइवेट सेक्टर तक में अभूतपूर्व रूप से छँटनी हुई है। जुलाई 2022 में केन्द्रीय कार्मिक राज्य मन्त्री जितेन्द्र सिंह ने लोकसभा में बताया कि मोदी सरकार के 8 वर्षों के कार्यकाल में लगभग 22 करोड़ लोगों ने नौकरी के आवेदन किये थे, जिसमें से केवल 7.22 लाख लोगों को ही नौकरी मिल पायी है।

मार्च 2021 से मार्च 2022 के बीच केन्द्र सरकार के कुल स्वीकृत पदों की संख्या में 58000 की कमी हो गयी। स्वीकृत पदों और कार्यरत कर्मचारियों की संख्या में कमी सभी विभागों में हुई है। रेलवे, रक्षा (नागरिक), गृह, डाक और राजस्व से जुड़े विभागों और मंत्रालयों में केन्द्र सरकार के 92 प्रतिशत पद होते हैं। सबसे अधिक नौकरियाँ देने वाला विभाग रेलवे है जिसमें लगभग 3 दशक पहले 18 लाख से अधिक कर्मचारी होते थे। लेकिन 1 मार्च 2022 को इसके कुल स्वीकृत पदों की संख्या थी 15.07 लाख जबकि कार्यरत कर्मचारी थे मात्र 11.98 लाख। यानी तीन लाख से ज़्यादा पद ख़ाली पड़े थे। इनमें बड़ी संख्या ऐसे पदों की है जो रेलों के संचालन और सुरक्षा से जुड़े हैं। जून में उड़ीसा में हुई भयंकर रेल दुर्घटना और आये दिन होने वाली रेल दुर्घटनाओं के लिए कर्मचारियों की भारी कमी एक बड़ा कारण है।

इसके बावजूद न सिर्फ़ ख़ाली पदों पर भर्ती नहीं की जा रही है बल्कि पदों को ही कम किया जा रहा है। रक्षा मंत्रालय में कुल स्वीकृत नागरिक पदों की संख्या 5.77 लाख है जिसमें से 2.32 लाख पद ख़ाली पड़े हैं। गृह मंत्रालय के 10.90 लाख स्वीकृत पदों में से 1.20 लाख पद ख़ाली पड़े हैं। डाक विभाग में कुल स्वीकृत पद 2.64 लाख हैं जिसमें से एक लाख से ज़्यादा पद ख़ाली हैं। राजस्व विभाग में 1.78 लाख स्वीकृत पद हैं जिनमें से 74000 पद ख़ाली पड़े हैं।
नरेंद्र मोदी ने पिछले अक्टूबर में 10 लाख सरकारी नौकरियाँ देने की घोषणा की थी लेकिन कहने की ज़रूरत नहीं कि यह भी इस सरकार की तमाम फ़र्ज़ी घोषणाओं में से एक थी। असलियत यह है कि सभी विभागों में लगातार नियमित सरकारी कर्मचारियों की कटौती करके उनका काम बाहरी आउटसोर्सिंग एजेंसियों को दिया जा रहा है। हर विभाग में ठेके पर बेहद कम वेतन देकर काम पर रखे जाने वाले कर्मचारियों की संख्या बढ़ती जा रही है।
राज्य सरकारों की हालत इससे भी बुरी है। शिक्षकों और डॉक्टरों जैसे बुनियादी महत्व के पदों सहित हर विभाग में लाखों पद ख़ाली पड़े हैं जबकि जनता ज़रूरी सेवाओं के अभाव से जूझ रही है और बेरोज़गार नौजवान रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं। उल्टे सरकारें बेरोज़गारों से ही भारी कमाई कर रही हैं। इसी वर्ष मार्च में मध्य प्रदेश विधानसभा में सरकार ने जानकारी दी कि पिछले सात वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले एक करोड़ 24 लाख युवाओं से सरकार ने 424 करोड़ रुपये फ़ीस के रूप में वसूले। अगर सभी राज्यों और केन्द्र सरकार द्वारा वसूली गयी रकम का हिसाब लगाया जाये तो वह लाखों करोड़ में होगी।

ऐसे में नौजवानों को एकजुट होकर रोज़गार के सवाल पर एक बड़ा आन्दोलन खड़ा करना होगा। पिछले मार्च से देश के कई राज्यों में चलायी जा रही ‘भगतसिंह जनअधिकार यात्रा’ ने रोज़गार के सवाल को ख़ास तौर पर उठाया है। इसके माँगपत्रक में कहा गया है कि जिन पदों पर परीक्षाएँ हो चुकी हैं उनमें पास होने वाले उम्मीदवारों को तत्काल नियुक्तियाँ दी जायें। रिक्तियों की घोषणा से लेकर नियुक्ति पत्र देने की समय सीमा तय करके उसे सख़्ती से लागू किया जाये। परीक्षा परिणाम घोषित होने के छह माह में नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य किया जाये। जिन पदों पर भर्ती के लिए परीक्षाएँ आयोजित नहीं की गयी हैं, उन्हें तत्काल आयोजित किया जाये।

इसके अलावा सभी राजकीय व केन्द्रीय विभागों में ख़ाली पड़े लाखों पदों को भरने की प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू की जाये। नियमित प्रकृति के कामों में ठेका प्रथा पर रोक लगायी जाये, सरकारी विभागों व निजी उपक्रमों में नियमित काम कर रहे सभी कर्मचारियों को तत्काल स्थायी किया जाये और ऐसे सभी ख़ाली पदों पर स्थायी भर्ती की जाये।

इसने यह माँग भी की है कि देश में शहरी और ग्रामीण बेरोज़गारों के पंजीकरण की व्यवस्था की जाये और रोज़गार नहीं मिलने तक कम से कम 10,000 रुपये बेरोज़गारी भत्ता दिया जाये। इसे सुनिश्चित करने के लिए सरकार ‘भगतसिंह राष्ट्रीय रोज़गार गारण्टी क़ानून (बसनेगा)’ पारित करे। तब तक ‘मनरेगा’ के तहत सालभर के रोज़गार और काम पर कम-से-कम न्यूनतम मज़दूरी का कानूनी प्रावधान किया जाये। केन्द्र सरकार द्वारा ऐसे कानून को पारित किये जाने तक, राज्य सरकारें प्रदेश के स्तर पर ऐसा रोज़गार गारण्टी कानून बनायें।

बेरोज़गार युवकों से हर वर्ष की जाने वाली हज़ारों करोड़ की कमाई बन्द करने, नौकरियों के लिए आवेदन के भारी शुल्कों को ख़त्म करने और साक्षात्कार तथा परीक्षा के लिए यात्रा को निःशुल्क करने की भी माँग की गयी है।

माँगपत्रक में कहा गया है कि देश में वास्तविक विकास के लिए ज़रूरी है कि शिक्षा, चिकित्सा, बुनियादी ढाँचे के निर्माण, आवास आदि की सुविधाओं के विस्तार के लिए नयी रिक्तियाँ निकाली जाएँ और उन पर भर्तियाँ की जायें।

फ़िलहाल मोदी सरकार इसके ठीक उल्टी चाल चल रही है। ऐसे में हमें भगतसिंह की इस बात को याद करना होगा : “अगर कोई सरकार जनता को उसके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखती है, तो उस देश के नौजवानों का अधिकार ही नहीं बल्कि कर्तव्य है कि ऐसी सरकारें को बदल दें या ध्वस्त कर दें।”

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2023


 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
   
 

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन

Related Images:

Comments

comments