यूक्रेन युद्ध: तबाही और बर्बादी के 500 दिन

आनन्द

रूस और अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो के बीच यूक्रेन में जारी साम्राज्यवादी छद्म युद्ध के 500 दिन बीत चुके हैं। इन 500 दिनों में यूक्रेन को बेइन्तहा तबाही और बेहिसाब बर्बादी का सामना करना पड़ा है। साम्राज्यवादी लुटेरों की आपसी होड़ के नतीजे में होने वाले इस युद्ध का प्रकोप यू्क्रेन की आम जनता को प्रत्यक्ष तौर पर सहना पड़ रहा है। अब तक इस युद्ध के दौरान लगभग दस हज़ार यूक्रेनी नागरिक मारे जा चुके हैं, लाखों लोगों को देश छोड़कर भागना पड़ा है और यूक्रेन का बुनियादी ढाँचा तहस-नहस हो चुका है। जो यूक्रेनी नागरिक अभी भी उस देश के भीतर मौजूद हैं उनके लिए युद्ध का एक-एक दिन बहुत भारी पड़ रहा है। युद्ध की वजह से जान-माल के ख़तरे के अलावा उन्हें भीषण महँगाई व बुनियादी सुविधाओं की भारी किल्लत का भी सामना करना पड़ रहा है। इस भयानक परिस्थिति का सबसे त्रासद पहलू यह है कि इस साम्राज्यवादी युद्ध ने यूक्रेन को जिस काली रात में झोंक दिया है उसकी सुबह नहीं नज़र आ रही है क्योंकि इस युद्ध में लम्बे समय से एक गतिरोध की स्थिति बनी हुई है और युद्धविराम या कूटनीतिक तरीक़े से युद्ध की समाप्ति के आसार दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहे हैं।

युद्ध की मौजूदा स्थिति

पिछले साल 24 फ़रवरी को यूक्रेन पर हमला करने के बाद शुरू में रूस की योजना यूक्रेन की राजधानी कीव व उसके दूसरे प्रमुख शहर खारकीव पर क़ब्ज़ा करने की थी ताकि पूर्वी यूक्रेन के दोनबास क्षेत्र का रूस में विलय करने और यू्क्रेन द्वारा नाटो (उत्तर अटलांटिक सन्धि संगठन) की सदस्यता पाने की आकांक्षा को ख़त्म करने के लिए यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की पर दबाव डाला जा सके। परन्तु अमेरिका के नेतृत्व में नाटो द्वारा यूक्रेन को दी गयी सैन्य मदद की वजह से रूस अपनी इस योजना में कामयाब नहीं हो सका। यह ग़ौरतलब है कि रूस-चीन धुरी की चुनौती से निपटने के लिए नाटो ने लगातार पूर्व की ओर अपने विस्तार को जारी रखा था जो कि किसी खुले भावी साम्राज्यवादी युद्ध की सूरत में रूस के लिए संकट पैदा कर सकता था और चीन-रूस धुरी के लिए एक चिन्ता की बात थी। उभरती चीन-रूस साम्राज्यवादी धुरी के लिए साम्राज्यवादी नाटो के पूरब की ओर विस्तार को रोकना आवश्यक था। यूक्रेन की दक्षिणपन्थी सरकार अमेरिकी साम्राज्यवाद के हाथों में खेल रही थी और यही मसला रूसी साम्राज्यवाद और अमेरिकी साम्राज्यवाद के बीच अन्तरविरोध का मूल मसला बना। यही यूक्रेन युद्ध के शुरुआत का मूल कारण था – अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा, जिसकी कीमत यूक्रेनी जनता चुका रही है।

एक साल से भी ज़्यादा समय बीतने के बाद आज हालत यह है कि युद्ध में गतिरोध की स्थिति आ चुकी है और कोई भी पक्ष जीत की ओर आगे बढ़ता हुआ नहीं दिख रहा है। राजधानी कीव और खारकीव पर क़ब्ज़ा करने में विफल होने के बाद इस समय रूसी सेना यूक्रेन के पूर्व में द्नीपर नदी के पूर्वी तट पर स्थित दोनबास क्षेत्र पर अपना क़ब्ज़ा जमाने की कोशिशों में लगी है। अभी हाल ही में उसने इस क्षेत्र के दोनेत्ज़ प्रान्त के प्रमुख शहर बखमुत पर क़ब्ज़ा कर लिया। हालाँकि उसके बाद यूक्रेन ने भी जवाबी कार्रवाई कर दी है और यह लेख लिखे जाने तक बखमुत को वापस यूक्रेन के क़ब्ज़े में लेने के लिए जंग जारी है। इस प्रकार इस समय लुहांस्क और दोनेत्ज़ सहित पूर्वी यूक्रेन के दोनबास क्षेत्र के कई हिस्से रूस के क़ब्ज़े में हैं। ग़ौरतलब है कि दक्षिणी यूक्रेन में स्थित क्रीमिया 2014 से ही रूस के क़ब्ज़े में है। सैन्य ताक़त के अतिरिक्त इन क्षेत्रों में रूसी क़ब्ज़े की एक अन्य वजह यह है कि यहाँ की बहुसंख्यक आबादी रूसी मूल की है, जिनका भयंकर दमन यूक्रेन की दक्षिणपन्थी अर्द्धफासीवादी सरकार लगातार कर रही थी। इस प्रकार इस समय यूक्रेन की जंग मुख्य रूप से उस देश के पूर्वी व दक्षिणी हिस्से में लड़ी जा रही है। पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों की मदद से यूक्रेन पश्चिमी व दक्षिणी यूक्रेन में एक बड़े अभियान की तैयारी कर रहा है।        

रूस की निजी सेना वैगनर ग्रुप की सनसनीख़ेज़ बग़ावत

जून महीने के अन्तिम सप्ताहान्त के दौरान रूस में एक नाटकीय घटनाक्रम देखने को आया जब रूस की ओर से यूक्रेन में लड़ रही निजी सेना वैगनर ग्रुप ने बग़ावत का ऐलान कर दिया। ग़ौरतलब है कि इस निजी सेना का मुखिया येवगेनी प्रिगोज़िन रूसी राष्ट्रपति पुतिन का बेहद क़रीबी माना जाता था। वैगनर ग्रुप ने पूर्वी यूक्रेन के बखमुत पर क़ब्ज़ा करने में प्रमुख भूमिका निभायी थी। परन्तु गत 23 जून को अचानक प्रिगोजिन ने बग़ावत का ऐलान करते हुए रूसी शहर रोस्तोव-ऑन-दोन पर कब्ज़ा करने का दावा किया। उसके बाद उसने यह घोषणा की कि वह अपने 25 हज़ार लड़ाकों के साथ राजधानी मॉस्को की ओर मार्च करने वाला है। उसने यहाँ तक कहा कि यू्क्रेन युद्ध ग़ैर-ज़रूरी था क्योंकि यूक्रेन की ओर से कोई उकसावे की हरकत नहीं की गयी थी। उसने यह भी कहा कि यह युद्ध रूस की सत्ता में बैठे कुछ जोकरों की वजह से थोपा गया था। उसका इशारा रूस के रक्षामंत्री शोउगु और रूसी सेना के चीफ़ ऑफ़ स्टॉफ वालेरी गेरासिमोव की ओर था और उसकी मंशा उन्हें पदच्युत कराने की थी।

पुतिन ने पहले तो इस बग़ावत को देशद्रोह की संज्ञा दी और इससे सख़्ती से निपटने की बात कही। परन्तु अगले ही दिन अचानक प्रिगोज़िन का पुतिन के क़रीबी बेलारूस के राष्ट्रपति लुकाशेंको के साथ समझौता हो गया जिसके बाद प्रिगोज़िन ने मॉस्को की ओर मार्च करने का इरादा बदल दिया। रूस ने प्रिगोज़िन के ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमा दर्ज करके कोई कार्रवाई करने की बजाय उसे बेलारूस में जाने दिया। इस प्रकार यह बग़ावत जितने सनसनीख़ेज़ तरीक़े से शुरू हुई थी उतने ही सनसनीख़ेज़ तरीक़े से अचानक ख़त्म भी हो गयी। परन्तु इस अल्पकालिक बग़ावत से इतना तो स्पष्ट है कि रूसी साम्राज्यवादी सत्ता के भीतर यूक्रेन युद्ध को लेकर असन्तोष पनपने की शुरुआत हो चुकी है। फ़िलहाल पुतिन ने प्रिगोज़िन के नेतृत्व वाले वैगनर ग्रुप की बग़ावत को ख़त्म करने में भले ही कामयाबी पा ली हो, परन्तु जैसे-जैसे यूक्रेन युद्ध लम्बा खिंचता जाएगा (जिसके आसार ज़्यादा हैं) रूसी समाज में इस युद्ध को लेकर जो समर्थन है वह कम होता जायेगा और उसका असर रूसी सत्ता के भीतर अन्तरविरोध बढ़ने के रूप में सामने आयेगा। ऐसी सूरत में पुतिन का सत्ता में बने रहना ज़्यादा से ज़्यादा मुश्किल होता जायेगा। ज़ाहिर है, यह एक सम्भावना मात्र है और इस सम्भावना से इतर कई अन्य सम्भावनाएँ भी मौजूद हैं। यह अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा अन्तत: कौन-सा मोड़ लेगी, यह आने वाला वक़्त ही बतायेगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि इसकी कीमत यूक्रेनी जनता अपनी जान-माल से चुकायेगी और साथ ही आम रूसी सैनिक व जनता भी चुकायेंगे क्योंकि हर ऐसा युद्ध साम्राज्यवादी देशों के भीतर भी हमेशा ही अन्धराष्ट्रवाद और दक्षिणपन्थ की लहर लेकर आता है, जिसका नतीजा होता है युद्ध के नाम पर हर प्रकार के जनप्रतिरोध का बर्बर दमन। पुतिन की दक्षिणपन्थी सरकार रूस में यह कर भी रही है।

इस विनाशकारी युद्ध के लिए ज़िम्मेदार कौन?

पश्चिमी साम्राज्यवादी मीडिया में यूक्रेन युद्ध के लिए केवल एक व्यक्ति यानी पुतिन की सनक को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। साथ ही साथ इस युद्ध की परिस्थिति तैयार करने में अमेरिका व पश्चिमी यूरोपीय साम्राज्यवादी शक्तियों की भूमिका को सिरे से ग़ायब कर दिया जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस युद्ध से होने वाली भीषण तबाही के लिए व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व वाला रूसी साम्राज्यवाद प्रत्यक्ष और औपचारिक तौर पर ज़िम्मेदार है क्योंकि रूसी सेना ने ही गत वर्ष फ़रवरी में यूक्रेन पर हमला किया था। परन्तु इस युद्ध के लिए पश्चिमी साम्राज्यवादी ताक़तों को वही लोग दोषमुक्त कर सकते हैं जो या तो इन साम्राज्यवादी ताक़तों के एजेण्ट हों या फिर जिन्हें हाल के इतिहास व  इन साम्राज्यवादी ताक़तों द्वारा पोषित सैन्य गठजोड़ नाटो की विनाशकारी भूमिका का कोई अन्दाज़ा न हो।

पूर्व सोवियत यूनियन के पतन के बाद के इतिहास पर एक सरसरी नज़र डालने भर से यह दिन के उजाले की तरह साफ़ हो जाता है कि यूक्रेन पर हमला करने की पहल भले ही रूस ने की हो परन्तु हालात को युद्ध के मुकाम तक पहुँचाने में पश्चिमी साम्राज्यवादी ताक़तें किसी भी मायने में कम ज़िम्मेदार नहीं हैं, बल्कि मुख्य ज़िम्मेदारी पश्चिमी साम्राज्यवाद की ही बनती है। नाटो ने अपने वायदे को तोड़ते हुए पूर्व सोवियत यूनियन के पतन और शीतयुद्ध के ख़त्म के होने के बाद भी यूरोप में पूर्व की ओर अपना विस्तार जारी रखा और उसके बाद 15 देशों को नाटो में शामिल किया गया है। अभी इसी वर्ष जहाँ एक ओर यू्क्रेन में भीषण युद्ध जारी था वहीं दूसरी ओर नाटो में फ़िनलैण्ड को भी शामिल कर लिया गया है और स्वीडन को भी शामिल करने की पूरी तैयारी हो चुकी है। इसी प्रकार अमेरिका ने एस्तोनिया, पोलैण्ड व बुल्गारिया जैसे देशों में अपने सैन्य अड्डे बनाये हैं जो रूसी सीमा से बहुत नज़दीक स्थित हैं। इसके अलावा अमेरिका ने यूक्रेन सहित पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहे कई देशों के भीतर सत्ता परिवर्तन के तमाम प्रयास किये हैं। रूस को उकसाने वाले ये तमाम घटनाक्रम इस सच्चाई को बताते हैं कि यूक्रेन युद्ध के लिए अमेरिका के नेतृत्व वाली पश्चिमी साम्राज्यवादी ताक़तें रूस से किसी भी मायने में कम दोषी नहीं हैं।

पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों की ज़िम्मेदारी इससे भी प्रमाणित हो जाती है कि अमेरिका, ब्रिटेन व जर्मनी सहित नाटो के घटक देशों ने मौजूदा युद्ध में यू्क्रेन को मिसाइल, टैंक सहित तमाम हथियारों के साथ ही साथ प्रशिक्षण व ख़ुफ़िया जानकारी जैसी अहम मदद मुहैया करायी है जिनके बिना यूक्रेन इस युद्ध में एक दिन भी टिक नहीं सकता था। यूक्रेन का राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की युद्ध की शुरुआत से ही ज़्यादा से ज़्यादा हथियारों की आपूर्ति सुनिश्चित कराने के लिए इन पश्चिमी देशों की राजधानियों के चक्कर लगाता रहा है। पश्चिमी मीडिया भी उसे युद्ध का नायक घोषित करती रही है, जबकि सच्चाई यह है कि वह इस अन्तरसाम्राज्यवादी युद्ध में पश्चिमी साम्राज्यवादी धड़े के प्यादे की भूमिका निभा रहा है। अमेरिका व अन्य पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों द्वारा अब तक दी गयी अरबों डॉलर की सैन्य मदद भी ज़ेलेन्स्की को नाकाफ़ी लग रही है और वह साम्राज्यवादियों से और ज़्यादा मदद की माँग कर रहा है। उसकी माँग एफ़ 15 और एफ़ 16 जैसे फ़ाइटर जेट की भी है, लेकिन पश्चिमी देशों में अभी उसे फ़ाइटर जेट देने के लिए एक राय नहीं बन पा रही है क्योंकि उन्हें डर है कि युद्ध का दायरा यूक्रेन की सीमा से आगे बढ़कर उनकी सीमाओं के भीतर भी जा सकता है।

नाभिकीय युद्ध का बढ़ता ख़तरा

ख़तरा सिर्फ़ युद्ध के यूक्रेन की सीमा से बाहर फैलने का ही नहीं है; इस बात की सम्भावना से पूरी तरह इन्कार नहीं किया जा सकता है कि साम्राज्यवादियों के बीच की यह अन्धी होड़ भविष्य के किसी मोड़ पर नाभिकीय युद्ध का रूप ले ले। ग़ौरतलब है कि हाल ही में रूस ने अपने नाभिकीय हथियारों को बेलारूस में नाटो देशों की सीमाओं की ओर स्थापित करने की घोषणा की है। उधर ब्रिटेन ने भी अपने नाभिकीय हथियारों को अपग्रेड करने का फैसला किया है। एक अन्तरराष्ट्रीय सुरक्षा संस्था स्टॉकहोम इण्टरनेशनल पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बताया है कि नाभिकीय हथियार रखने वाले नौ देशों में नाभिकीय आधुनिकीकरण और विकास कार्यक्रमों की वजह से दुनिया भर में नाभिकीय हथियारों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। यह भयावह सच्चाई हमें आगाह कर रही है कि पूँजीवाद ने मानवता को इस मंज़िल पर पहुँचा दिया है कि भविष्य में नाभिकीय युद्ध के ख़तरे की वजह से समूची मानवता के सामने अस्तित्व का संकट आन पड़ा है। निश्चित ही, ऐसी किसी भयंकर आपदा दुनिया में भयंकर तबाही अवश्य ला सकती है, लेकिन वह पूँजीवाद के विरुद्ध जनता के वर्ग युद्ध को भी विकराल रूप में भड़का देगी। साम्राज्यवादी भी इस बात को समझते हैं और इस छोर तक जाने से डरते हैं। लेकिन युद्ध के हालात में इस प्रकार सम्भावना से पूर्ण रूप से इन्कार भी नहीं किया जा सकता है।

पूँजीवाद में जंग भी मुनाफ़े का सौदा   

यूक्रेन युद्ध में आम लोगों की भले ही कितने भी बड़े पैमाने पर तबाही और बर्बादी हो रही हो, लेकिन मुनाफ़े की होड़ की वजह से पैदा होने वाला युद्ध अपने आप में अकूत मुनाफ़ा कूटने का ज़रिया भी बन रहा है। सबसे ज़्यादा फ़ायदा अमेरिका के मिलिटरी औद्योगिक कॉम्पलेक्स को हो रहा है। लॉकहीड मार्टिन, रेथियॉन और बोइंग जैसी अमेरिकी सैन्य कम्पनियाँ यूक्रेन युद्ध की वजह से सैन्य हथियारों के उत्पादन के पुराने कीर्तिमान तोड़ रही हैं और इस प्रक्रिया में दौरान अभूतपूर्व मुनाफ़ा कमा रही है। इन कम्पनियों के शेयर्स की क़ीमतों में भी ज़बर्दस्त उछाल देखने को आ रहा है।

इसके अलावा तेल व गैस कम्पनियों ने भी युद्ध की वजह से दुनिया भर में तेल व गैस की कम आपूर्ति और बढ़ती माँग और उससे जनित महँगी क़ीमतों का लाभ उठाते हुए जमकर मुनाफ़ा कूटा है। यूक्रेन युद्ध के दौरान एक्सॉन मोबिल, शेल, बीपी और शेवरॉन जैसी कम्पनियों के मुनाफ़े में ज़बर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। यानी लोगों की तबाही और बर्बादी इन कम्पनियों के लिए मुनाफ़ा कमाने का अवसर हैं और वे इस अवसर का जमकर फ़ायदा उठा रही हैं।

यूक्रेन युद्ध की वजह से दुनिया भर में खाद्यान्न व खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में भी ज़बर्दस्त उछाल हुआ है। ऐसे में विशालकाय खाद्य कम्पनियों के अलावा खाद्य पदार्थों की क़ीमतों को लेकर सट्टेबाज़ी कर रहे हेज फ़ण्ड्स भी जमकर मुनाफ़ा कूट रहे हैं। एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़ यूक्रेन युद्ध की वजह से विश्व के स्तर पर खाद्य पदार्थों की बढ़ी क़ीमतों को लेकर सट्टेबाज़ी करने वाली दुनिया के 10 बड़े हेज फ़ण्ड्स ने अब तक 2 अरब डॉलर से ज़्यादा का मुनाफ़ा कमाया है। ग़ौरतलब है कि आपूर्ति में कमी के अतिरिक्त इन हेज फ़ण्ड्स की सट्टेबाज़ी भी खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में आयी उछाल के मुख्य कारकों में से एक है।

इस प्रकार पूँजीवाद के अन्तर्गत पनपने वाली मुनाफ़े की हवस एक ओर युद्ध में लोगों के जान-माल का नुक़सान पहुँचा रही है और दूसरी तरफ़ वह मुनाफ़ाख़ोरों और सट्टेबाज़ों को अकूत मुनाफ़ा कमाने के खुले अवसर प्रदान कर रही है। यह स्पष्ट है कि साम्राज्यवाद के पास मनुष्यता को देने के लिए तबाही, बर्बादी, मुनाफ़ाख़ोरी, कफ़नख़सोटी के अलावा कुछ नहीं है। मनुष्यता को इन साम्राज्यवादी युद्धों से निजात केवल समाजवाद ही दिला सकता है।  

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2023


 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
   
 

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन

Related Images:

Comments

comments