मोदी सरकार के अमृतकाल में दलितों का बर्बर उत्पीड़न चरम पर

प्रसेन

फ़ासिस्टों के दमन-उत्पीड़न का बुलडोज़र आमतौर पर मेहनतकश जनता के सीने पर दौड़ रहा है। लेकिन अल्पसंख्यक, स्त्रियों और दलितों-आदिवासियों के दमन-उत्पीड़न में इस फ़ासीवादी सरकार ने सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं। दलितों द्वारा नाम के साथ सिंह आदि टाइटल लगाना, घोड़ी पर चढ़ना, मूँछ रखना, सवर्णों के बर्तन में पानी पी लेना, काम करने से मना करना, बराबरी से व्यवहार करना आदि ही सवर्णों द्वारा दलितों के अपमान और उनके बर्बर उत्पीड़न की वजह बन जा रहा है। दलित लड़कियों से बलात्कार और बलात्कार के बाद हत्या जैसे जघन्य अपराधों में बहुत तेज़ी आयी है। इसी तरह विश्वविद्यालयों/कॉलेजों में संघ परिवार के बगलबच्चा संगठन एबीवीपी के कार्यकर्ताओं द्वारा दलित प्रोफ़ेसरों के साथ मारपीट, अपमानित करने की कई घटनाएँ सामने आयी हैं।

मार्च 2023 में संसद के दूसरे बजट सत्र में इस बेशर्म सरकार के केन्द्रीय गृह राज्यमन्त्री अजय कुमार मिश्रा ने एक सवाल के जवाब में बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2021 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, चार सालों (2018 से 2021 तक) में दलितों के ख़िलाफ़ अपराधों के कम-से-कम 1,89,945 मामले दर्ज किये गए। पुराने आँकडों के मुताबिक वर्ष 2016 में दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के कुल 40,801 मामले दर्ज किये गये थे, 2017 में 43,203, वर्ष 2018 में 42,793, वर्ष 2019 में 45,961 और 2020 में ये संख्या बढ़कर 50,291 हो गयी। यानी 2016 से 2020 तक दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों में 23 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई। इसी तरह दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के मामलों में साल-दर-साल लगातार बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष 2016 में दलित महिलाओं के बलात्कार के 2,541 मामले दर्ज किये गये थे, वर्ष 2017 में 2,714, वर्ष 2018 में 2,936, वर्ष 2019 में 3,484 और वर्ष 2020 में 3,372 मामले दर्ज किये गये। यानी दलित महिलाओं के बलात्कार के मामलों में 2016 से 2020 तक लगभग 33 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई। हर रोज़ 9 दलित महिलाओं के बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं।

दलितों के साथ होने वाले अपराधों की यह वह संख्या है, जो दर्ज हो पाती है। अगर इसमें उन अपराधों को भी शामिल कर लिया जाये जो पुलिस तक पहुँचने से पहले दबा दिये जाते हैं या फिर पुलिस विभाग द्वारा दबा दिये जाते हैं तो निश्चित तौर पर यह संख्या बहुत अधिक होगी। दलित विरोधी अपराधों के जो मामले दर्ज भी होते हैं, उनमें अपराधियों को सज़ा मिलने का प्रतिशत बहुत ही कम है। वर्ष 2020 में दलितों के ख़िलाफ़ अपराध के कुल 50,291 मामले दर्ज किये गये थे, जिनमें से मात्र 3,241 मामलों में ही सज़ा सुनाई गयी। यानी मात्र 6 प्रतिशत मामलों में ही सज़ा हुई। यही स्थिति दलित महिलाओं के बलात्कार के मामलों की है। वर्ष 2020 में दलित महिलाओं के बलात्कार के कुल 3,372 मामले दर्ज किये गये। जिनमें से मात्र 2,959 मामलों में ही चार्ज़शीट पेश की गयी और सिर्फ़ 225 मामलों में ही सज़ा सुनाई गयी। यानी मात्र 6 प्रतिशत मामलों में। ये सारे आँकड़े भाजपा के दलित प्रेम और रामराज्य के पाखण्ड की सच्चाई खोलकर सामने रख देते हैं।

निःसन्देह, दलितों का उत्पीड़न उन राज्यों में भी बढ़ा है जहाँ भाजपा की सरकार नहीं है (यद्यपि इन राज्यों में भी दलित उत्पीड़न के कई मामलों में भाजपाई ज़िम्मेदार थे)। लेकिन दलितों का सबसे बर्बर उत्पीड़न भाजपा शासित राज्यों में सबसे तेज़ गति से बढ़ा है। नीचे दिये गये ग्राफ़ इस बात की पुष्टि करते हैं।

 दलितों के बर्बर उत्पीड़न में इस तेज़ी का सीधा कारण सत्ता में फ़ासीवादी भाजपा का होना है। हर हाल में सभी जगह फ़ासीवाद वित्तीय पूँजी का चाकर होता है। लेकिन सभी फ़ासीवादी ताक़तें यह काम बहुसंख्यक आबादी के अल्पसंख्यक आबादी के ऊपर धार्मिक, नस्लीय श्रेष्ठता आदि के नकली आभामण्डल में करती हैं। भारत के विशेष सन्दर्भ में फ़ासिस्टों के सामने एक चुनौती हमेशा रहती है। भारत में फ़ासिस्ट ताक़तें अपने जन्म से ही मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक हिन्दू आबादी का निशाना बनाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाती रही है और जिसमें फ़िलहाल उसे बड़ी सफलता भी हासिल हुई है। लेकिन संघ परिवार और भाजपा अपने गठन, अपने चरित्र में जिस ब्राह्मणवादी/सवर्णवादी मानसिकता से ग्रस्त है, वह जिस पुरातनपन्थी प्रतिक्रियावादी विचारों से ख़ुराक पाती है और लोगों के दिमाग़ में जो ज़हर भरती है उससे संघी फ़ासिस्टों को मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिन्दू प्रतिक्रिया को संगठित करने में काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है। फिर चुनावी राजनीति में दलित वोटों का भी महत्व भाजपा अच्छी तरह समझती है। यही वजह है कि दलितों के ख़िलाफ़ उत्पीड़न की घटना पर मोदी कभी यह कहते हुए टेंसुए बहाता है कि – ‘दलित भाइयों को मारने से पहले मुझे गोली मार दो’! कभी उनके साथ बैठकर खाना खाता है। मध्यप्रदेश में एक भाजपाई द्वारा एक आदिवासी पर पेशाब करने के बाद शिवराज सिंह चौहान को उसे बुलाकर पैर धुलने का ड्रामा करना पड़ता है। लेकिन इन सब ड्रामों के बावजूद संघ परिवार जिस ब्राह्मणवादी/सवर्णवादी मानसिकता से ग्रस्त है, वो फोड़े से पीप की तरह आये दिन फूट-फूटकर बहता रहता है।

वस्तुतः आज़ादी के बाद भारत में जो पूँजीवादी व्यवस्था अस्तित्व में आयी, उसने मानवद्रोही जाति-व्यवस्था को अपने हितों के हिसाब से कुछ ज़रूरी बदलाव के साथ अपना लिया। वर्तमान समय में जाति-व्यवस्था शासक वर्ग के हाथ में चुनावी हथकण्डे के रूप में और जनता की वर्गीय एकता को तोड़ने का बहुत महत्वपूर्ण उपकरण है। दलितों का बहुत बड़ा हिस्सा मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था में खेतों-कारखानों में हड्डियाँ गला रहा है और एक हिस्सा साफ़-सफ़ाई जैसे परम्परागत कामों में लगा हुआ है। आर्थिक रूप से सबसे निचले स्तर पर खड़ी यही दलित आबादी सामाजिक तौर पर भी सबसे अधिक अपमान और उत्पीड़न झेल रही है। दूसरी तरफ सवर्णों का एक बड़ा हिस्सा मौजूदा व्यवस्था में मालिकों, नेताओं, नौकरशाहों, अफ़सरों, ठेकेदारों और कुलकों-फ़ार्मरों के रूप शोषक-शासक वर्ग में बैठा है। भारतीय संविधान और कानून व्यवस्था द्वारा दलित उत्पीड़न को रोकने के जो थोड़े-बहुत उपचार हैं भी वो शासन-सत्ता में बैठे इन लोगों की ब्राह्मणवादी/सवर्णवादी मानसिकता के चलते अमल में नहीं आ पाते।

मनुस्मृति जैसे प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणवादी ग्रन्थों का गुणगान करने वाली संघ और भाजपा ब्राह्मणवादी/सवर्णवादी मानसिकता से न केवल ग्रस्त है और बल्कि उसे खाद-पानी दे रही है? और फिर जब इस मानसिकता के लोग शासन-सत्ता में बैठे हों तो दलितों के साथ बढ़ते उत्पीड़न को समझना बहुत ही आसान है। बात-बात पर लोगों के घरों पर बुलडोज़र चढ़ाने वाली उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने कुलदीप सिंह सेंगर जैसे अपराधियों को बचाने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया (बाद में हाई कोर्ट से उसकी ज़मानत भी हो गयी), हाथरस में क़ानून को ताक़ पर रखकर बलात्कार की शिकार दलित लड़की की लाश बग़ैर पोस्टमार्टम के पुलिस प्रशासन द्वारा जलवा दी गयी। और ऐसे ही अनगिनत उदाहरण हैं। इन उदाहरणों से ब्राह्मणवादी/सवर्णवादी मानसिकता के लोगों में क़ानून का जो थोड़ा बहुत भय था उसका ख़त्म होना लाज़िमी है। यह भी ग़ौरतलब है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद ही एससी/एसटीक़ानून को कमज़ोर करने की कोशिश सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी थी। यह एक खुला रहस्य है कि भाजपा कई काम कोर्ट की आड़ में करती है। जजों की नियुक्ति, तबादला और जज लोया जैसों की हत्या से सहज ही समझा जा सकता है कि न्यायालयों की स्थिति क्या है? भाजपा के विधायक से लेकर छुटभैये नेताओं के दलित विरोधी आपराधिक कृत्य पर सरकार, प्रशासन, न्यायालय की भूमिका किसी से छिपी नहीं है।

दलित उत्पीड़न के ख़िलाफ़ हमारी लड़ाई किसी मुक़ाम पर तभी पहुँच सकती है जब हम पूँजीवादी व्यवस्था की सड़ांध पर उगी फ़ासीवादी ताक़तों और जाति-व्यवस्था के चरित्र को ध्यान में रखते हुए अपने तात्कालिक और दीर्घकालिक संघर्ष की रणनीति बनाएँ ।दलित उत्पीड़न और मानवद्रोही जाति-व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ से संघर्ष जुड़े बग़ैर उसी तरह आगे नहीं बढ़ सकता, जिस तरह पूँजीवाद विरोधी संघर्ष जाति विरोधी संघर्ष को नज़रअन्दाज़ करके आगे नहीं बढ़ सकता। समाज के सभी उत्पीड़ित हिस्सों की वर्गीय एकता ही सबसे व्यापक और जुझारू रूप से दलित उत्पीड़न पर लगाम लगा सकता है। हमें यह बात भी कत्तई नहीं भूलना है कि पूँजीवादी विकास की प्रक्रिया में दलित समुदाय के बीच से जो एक छोटा-सा सुविधापरस्त सम्पन्न हिस्सा पैदा हुआ है, जिसकी शासक-शोषक वर्ग में पैठ बनी है वह मेहनतकश दलित आबादी के हक़ों-अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ने वाला है। उसकी अस्मितावादी राजनीति इसी पूँजीवादी व्यवस्था में व्यापक दलित आबादी को भटकाती रहेगी। यह हिस्सा अपने वर्गीय हितों के मद्देनज़र फ़ासीवादी ताक़तों के साथ गँठजोड़ करने तक से बाज़ नहीं आता। पिछले लम्बे समय से चल रही अस्मितावादी राजनीति का फ़ासीवादी ताक़तों के आगे घुटनाटेकू रवैया, उसका हश्र और रामविलासपासवान, उदितराज, रामदास आठवले, मायावती, ओम प्रकाश राजभर जैसों का उदाहरण हमें यही सबक देता है। इस अस्मितावादी राजनीति के पास न तो दलित उत्पीड़न को रोकने का कोई रास्ता है न ही जाति उन्मूलन का कोई वास्तविक प्रोजेक्ट! अन्त में, हमारे समाज में प्रगतिशील मूल्यों और तर्कणा का जो अकाल है उसे सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन की सतत सघन प्रक्रिया में ही ख़त्म किया जा सकता है। प्रगतिशील मूल्यों और तर्कणा का व्यापक प्रचार-प्रसार निःसन्देह ब्राह्मणवादी/सवर्णवादी मानसिकता की जड़ों को खोखला करेगा।

मज़दूर बिगुल, सितम्‍बर 2023


 

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