जीवन, मुक्ति के सपनों, संघर्ष, और सृजन का दूसरा नाम है गाज़ा!
हर मुक्तिकामी, न्यायप्रिय और प्यार से लबरेज़ दिल के अन्दर धड़कता है गाज़ा!
हम सब हैं गाज़ा!

लता

365 वर्ग किलोमीटर में 23 लाख की आबादी वाली गाज़ा पट्टी फ़िलिस्तीन और विश्व में सबसे सघन आबादी वाला क्षेत्र है जो पिछले दो महीने से ज़ायनवादी इज़रायल की बम वर्षा, गोलाबारी, टैंक और मिसाइल हमले का शिकार है। कल्पना करना भी कठिन है कि आसमान से लगातार बरस रही मौत के बीच यह आबादी कहाँ जाती होगी क्योंकि 2006 से इज़रायल ने इसके चारों तरफ़ लौह घेरेबन्दी की हुई है। भोजन, पानी, ईंधन, कपड़े जैसी न्यूनतम ज़रूरतों से वंचित गाज़ा की आबादी लगातार भय, आतंक, दुख और तकलीफ़ में जी रही है। कल तक जो आशियाना था आज धूल और धुएँ के बादलों व मलबे के ढेर में बदल गया है और लोग इस ख़ाक में दबे अपने बेटे-बेटियों, भाई-बहन, माता-पिता या पड़ोसियों के घायल शरीर या शव ढूँढ़ रहे हैं। कहीं बच्चे बेतहाशा अपने माँ-बाप को ढूँढ़ रहे हैं तो कहीं माँ-बाप अपने बच्चों को ढूँढ़ रहे हैं। हर रोज़ कई सौ लोग मारे जा रहे हैं। वर्षों से गाज़ा की इंच-इंच पर सैटेलाइट और ड्रोनों से नज़र रख रहा ज़ायनवादी इज़रायल हमास के नेताओं को मारने के नाम पर एआई की मदद से उन रिहायशी मकानों को निशाना बना रहा है जहाँ अधिक संख्या में लोग रह रहे हैं।

यह अंक प्रेस में जाने तक गाज़ा में लगभग 20,000 फ़िलस्तीनी मारे जा चुके थे। इनमें 70 प्रतिशत बच्चे और औरतें हैं। इसके अलावा पिछले 6 दिसम्बर तक 43,616 घायल और 7,600 लोग लापता थे जिनकी संख्या रोज़ बढ़ रही है। गाज़ा के अलावा वेस्ट बैंक में 301 लोग, जिनमें करीब 80 बच्चे हैं, इज़रायली हमले में मारे जा चुके हैं और 3,600 से ज़्यादा घायल हैं। हर दिन बीतने के साथ सेटलर उपनिवेशवादी इज़रायल की बेचैनी बढ़ती जा रही है क्योंकि इतने आधुनिक हथियारों और दुनिया की सबसे विकसित युद्ध तकनॉलोजी के बावजूद हमास तक पहुँचना या उसे हरा पाना सम्भव नहीं हो पाया है। उल्टे इज़रायली सेना की सूचना के अनुसार ही 120 से ज़्यादा इज़रायली सैनिक गाज़ा में ज़मीनी हमले में फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध योद्धाओं द्वारा मारे जा चुके हैं। वास्तव में, इज़रायल गाज़ा के भीतर हमास से हार रहा है। इसीकी बौखलाहट में हत्यारा इज़रायल बेगुनाह आम फ़िलिस्तीनियों पर अपने हमले कहीं अधिक घातक और आक्रामक करता जा रहा है।

गाज़ा की स्थिति

यह लेख लिखने यानी 6 दिसम्बर तक ताज़ा स्थिति के अनुसार गाज़ा की लगभग 18 लाख आबादी को इज़रायल ने धकेलकर पहले दक्षिण गाज़ा, फिर खान यूनुस और अब मिस्र की सीमा पर राफ़ा तक पहुँचा दिया है। मक्कार इज़रायली सेना ने पहले लोगों को दक्षिण गाज़ा में शरण लेने को कहा। उत्तर गाज़ा के लोग दक्षिण की ओर भागे। जब वे औरतों, बच्चों और बुज़ुर्गों के साथ वहाँ पहुँचे तो इज़रायली सेना ने वहाँ भी बमबारी शुरू कर दी। उत्तर गाज़ा और दक्षिण गाज़ा के लोगों को फिर वहाँ से इज़रायली सेना ने खान यूनुस की ओर धकेल दिया, वहाँ भी बमबारी शुरू कर दी और अब पूरी आबादी राफ़ा में धकेल दी गयी है जो गाज़ा का आखिरी इलाका है। यहाँ सबसे घातक बमबारी इज़रायल कर रहा है। यहाँ एक हवाईअड्डे जितने क्षेत्र में गाज़ा की लगभग 18 लाख आबादी सिमटकर रह गयी है। भीषण बमबारी जारी है और खान यूनुस से भी लोगों को निकलने को बार-बार कहा जा रहा है। युद्ध के नियमों के तहत जहाँ-जहाँ बमबारी नहीं की जा सकती है जैसे अस्पतालों, स्कूलों और शरणार्थी शिविरों आदि के आसपास, जहाँ निहत्थी फ़िलिस्तीनी जनता अपने बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती औरतों के साथ बमबारी से बचने के लिए शरण लेते हैं, वहाँ-वहाँ कायर इज़रायली सेना कारपेट बॉम्बिंग कर रही है। गाज़ा के सबसे बड़े अस्पताल अल-शिफ़ा समेत अनेक अस्पतालों को निशाना बनाकर इज़रायल ने मरीज़ों और डॉक्टरों सहित सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी। इज़रायल बार-बार दावा करता रहा है कि इन अस्पतालों के नीचे बनी सुरंगों में हमास के लड़ाके छिपे हैं लेकिन कहीं भी वह अपने दावे साबित नहीं कर पाया। उल्टे, उसके इतने झूठ पकड़े गये कि वह पूरी दुनिया में मज़ाक का पात्र बन गया।

दूसरी ओर, गाज़ा पर हो रहे हमले का फ़ायदा उठाकर वेस्ट बैंक में ज़ायनवादी इज़रायली सेटलर फ़िलिस्तीनियों के घरों और जैतून के बागों को हड़पने में ज़ोर-शोर से लग गये हैं। इज़रायली सेना की मदद से फ़िलिस्तीनियों के घरों में घुस कर ज़ायनवादी सेटलर उन्हें मार रहे हैं। इज़रायल वेस्ट बैंक के शरणार्थी शिविरों में भी ख़ासकर युवा फ़िलिस्तीनियों को गिरफ़्तार कर रहा है। जेनिन शरणार्थी शिविर पर 9 नवम्बर को इज़रायली हमले में 10 लोग मारे गये थे।

गाज़ा की स्थिति भयावह है। सड़कों पर टैंकों से हमले और आसमान से बमबारी हो रही है। पूरे के पूरे शहर को जमींदोज़ कर दिया गया है। लोग टेंटों में बच्चों के साथ सर्दियों की रातें गुज़ार रहे हैं। क्रूर ज़ायनवादी इज़रायल गाज़ा के लोगों तक किसी भी सहायता को पहुँचने नहीं दे रहा, पानी, भोजन, दवा, ईंधन, अस्पतालों के लिए आक्सीजन व अन्य ज़रूरी वस्तुएँ तक गाज़ा में प्रवेश नहीं करने दे रहा है। उपनिवेशवादी इज़रायल ने चारों ओर घेरेबंदी कर गाज़ा को पहले ही खुले जेल में तब्दील कर दिया था और अब उसे नर्क बना दिया है। अस्पतालों के बाहर शवों की कतार लगी है और उन्हें दफ़न करने के लिए भी संसाधन नहीं जुट रहे हैं। सैकड़ों लाशें मलबे में दबी हैं जिन्हें निकालना तक मुश्किल हो रहा है। एक पत्रकार ने जान जोखिम में डालकर गाज़ा में बच्चों के शवों के सड़ने की ख़बर दिखायी तो उसे इज़रायली सैनिकों ने गोली मार दी। लाखों लोग भुखमरी के शिकार हैं। कई अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं ने आरोप लगाया है कि इज़रायल भुखमरी का इस्तेमाल हथियार के तौर पर कर रहा है। आबादी के बीच बीमारियाँ फैल रही हैं।

कहते हैं कि सबसे छोटे ताबूत सबसे भारी होते हैं। गाज़ा में मरने वाले बच्चों की संख्या देख कर फ़िलिस्तीनियों के कन्धों का भार महसूस किया जा सकता है। फ़िलिस्तीन के एक बच्चे से पूछा गया कि वह बड़ा होकर क्या बनना चाहता है तो उसने जवाब दिया : फ़िलिस्तीन में हम बच्चे बड़े नहीं होते!

 

अक्टूबर 7 से दिसम्बर 6 तक गाज़ा में हुआ विनाश

3 लाख रिहायशी मकान

339 स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय

167 धार्मिक स्थल

35 में से 26 अस्पताल

87 एम्बुलेंस

 

दूसरा नकबा

1948 में ब्रिटेन के सहारे ज़ायनवादी इज़रायल ने जिस तरह निहत्थे और बेगुनाह फ़िलिस्तीनियों को बन्दूक की नोक पर उनके घरों और ज़मीन से बेदखल कर दिया था और उनकी 78 प्रतिशत ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था आज उसकी तुलना इज़रायल द्वारा गाज़ा और वेस्ट बैंक पर हमले से की जा रही है। 1948 में बर्बरता की सारी सीमाओं को पार करते हुए इज़रायल ने आधिकारिक आकलन के अनुसार 15,000 फ़िलिस्तीनियों को मौत के घाट उतार दिया था, हालाँकि वास्तविक संख्या इससे दोगुनी या यहाँ तक कि तीन-गुनी हो सकती है। साथ ही, करीब 7 लाख फ़िलिस्तीनियों को, जो उस समय फ़िलिस्तीन की अरब आबादी का 80 फ़ीसदी थे, उनके घरों से बेदख़ल कर दिया गया और उनके ही देश में और आस-पास के देशों में शरणार्थी बना दिया गया। फ़िलिस्तीनियों के पास उनके देश का मात्र 22 प्रतिशत भू-भाग रह गया जो गाज़ा और वेस्ट बैंक का हिस्सा है। और आज वास्तव में ये दोनों क्षेत्र भी इज़रायल के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष औपनिवेशिक नियन्त्रण या घेरेबन्दी में हैं।

फ़िलिस्तीनी इतिहास के इस काले दौर को ‘नकबा’ कहते हैं जिसका अर्थ है आपदा। हालाँकि फ़िलिस्तीनी आबादी के लिए 1948 के बाद हर रोज़ नकबा जारी रहा है। लेकिन 7 अक्टूबर के बाद जिस भयावहता के साथ इज़रायल गाज़ा की बेगुनाह जनता को मौत के घाट उतार रहा है और उन्हें पलायन के लिए मजबूर कर रहे हैं उसे देखकर इस बर्बरता को दूसरा नकबा भी कहा जा रहा है जो निश्चित ही अतिशयोक्ति नहीं है। इस जारी हमले का सीधा निशाना फ़िलिस्तीन की जनता है और मकसद उनकी जगह-ज़मीन हड़पना है। कई इज़रायली मंत्री और फ़ौजी जनरल ऐसे बयान देते रहे हैं कि इज़रायल का मकसद फ़िलिस्तीनियों को पूरी तरह ख़त्म कर देना है।

1948 के नकबा के दौरान ब्रिटेन के सहारे फ़िलिस्तीन की 78 प्रतिशत ज़मीन हड़प कर भी सेटलर इज़रायली उपनिवेशवादियों को तसल्ली नहीं थी और वे धीरे-धीरे कर वेस्ट बैंक के भी बड़े हिस्से पर अपने सेटलमेंट यानी रिहायशी कॉलोनियाँ और कल-कारख़ाने बना रहे हैं। फ़िलिस्तीन के पास जो 22 प्रतिशत ज़मीन बची थी उसे भी इज़रायल हड़प रहा है। अब यह ज़मीन 20 प्रतिशत से भी कम रह गयी है।

असल में इज़रायल कोई देश नहीं है बल्कि जैसा हमने पहले ही बताया है, यह एक सेटलर उपनिवेशवादी परियोजना है जो आज भी जारी है। यह 1948 में जबरन बन्दूक की नोक पर हड़पकर, हथियाकर और लूटकर बना सेटलर उपनिवेश है जिसकी बुनियाद में है लाखों लोगों का नरसंहार, अपराध, नस्ली उत्पीड़न, ज़ोर-जबरदस्ती और विस्थापन। साम्राज्यवादी देशों की शह पर 1948 के बाद रोज़-रोज़ की लठैती और गुण्डागर्दी के दम पर नकबा जारी है। अरब विश्व में साम्राज्यवादी हितों की बलि चढ़ाकर फ़िलिस्तीन और साम्राज्यवादी हितों की नुमायन्दगी के लिए पैदा हुआ इज़रायल।

फ़िलिस्तीन का संघर्ष और हमास

1917 से ही ब्रिटेन के संरक्षण में फ़िलिस्तीन में ज़ायनवादियों की गुण्डागर्दी की शुरुआत हो गयी थी। इज़रायली फ़िलिस्तीनियों से ज़बरदस्ती उनकी ज़मीनें हथियाने लगे और स्थानीय संस्थानों पर कब्ज़ा जमाने लगे। 1939 में इस जबरन ज़मीन हथियाने और ब्रिटेन द्वारा फ़िलिस्तीन के बँटवारे यानी फ़िलिस्तीन और इज़रायल बँटवारे की बात कही गयी तो इसके ख़िलाफ़ फ़िलिस्तीन में विद्रोह भड़क उठा जिसमें पड़ोसी देशों से आये अरब लोग भी शामिल हुए। यानी फ़िलिस्तीन की जनता हमेशा अपने हक़ के लिए जुझारू संघर्ष करती रही है।

1990 के दशक के बाद जो सेक्युलर, प्रगतिशील व क्रान्तिकारी ताकतें मुक्ति संघर्ष को नेतृत्व दे रही थीं उनकी समझौतापरस्ती और बिखराव की वजह से जनता का विश्वास टूटा और गाज़ा में हमास का नेतृत्व बढ़ता गया। हमास ने फ़िलिस्तीन की जनता की महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप नेतृत्व देने की शुरुआत की, जो था जुझारू संघर्ष का रास्ता। वहीं दूसरी ओर फ़िलिस्तीन की जनता नेतृत्व का अंधानुकरण भी नहीं कर रही है। वास्तव में, स्वयं हमास फ़िलिस्तीनी जनता के मुक्ति संघर्ष के कारण बहुत हद तक बदला है। हमास ने 2008 में इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से अपना रिश्ता तोड़ लिया जिसकी शाखा के तौर पर इसकी शुरुआत फ़िलिस्तीन में हुई थी। साथ ही अब वह इज़रायल के अन्त के लक्ष्य को छोड़कर 1967 के फ़िलिस्तीन-इज़रायल सीमा को स्वीकारने वाले दो राज्यों (इज़रायल व फ़िलिस्तीन) के समाधान को भी स्वीकार करता है। हालाँकि यह स्वीकार एक प्रकार की समझौतापरस्ती है। दो-राज्यों के समाधान को 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वीकारने का अर्थ है, धार्मिक आधार पर एक राज्य के गठन को स्वीकार करना, यानी इज़रायल के गठन को स्वीकार करना। सही कार्यक्रम यह है कि इज़रायल नाम की कोई चीज़ नहीं है और एक ही देश है : फ़िलिस्तीन; इस देश में एक सेक्युलर, आज़ाद राज्य की लड़ाई, उसकी क़ौमी मुक्ति की लड़ाई, एक ऐसे देश के लिए लड़ाई जिसमें मुसलमान, यहूदी, ईसाई व बद्दू कबीलों के लोग साथ में जनवादी उसूलों और कायदों के तहत रह सकें। इसके अलावा, मौजूदा समस्या का कोई समाधान नहीं है। और इस समाधान के रास्ते में बाधा हमास या कोई फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध संगठन नहीं है, बल्कि इज़रायली सेटलर ज़ायनवादी राज्य और पश्चिमी साम्राज्यवाद है।

यह समझना बेहद ज़रूरी है कि हिन्दुस्तान के नागरिक के तौर पर फ़िलिस्तीनी जनता की आज़ादी की लड़ाई का समर्थन करने के लिए आपको हमास का विचारधारात्मक तौर पर समर्थन करने की कोई आवश्यकता नहीं है। साथ ही, फ़िलिस्तीनी मुक्ति युद्ध को सिर्फ़ हमास या फ़तह की विचारधारा तक सीमित भी नहीं जा सकता है। ग़ुलाम बनायी गयी क़ौम हमेशा लड़ती है। वह सही लाइन वाले नेतृत्व का इन्तज़ार नहीं करती। जो आज़ादी के लिए ज़मीन पर लड़ने को तैयार है, जनता इस विशिष्ट प्रश्न पर उसके साथ खड़ी होती है, चाहे वह उस नेतृत्व को विचारधारात्मक तौर पर स्वीकार करे या न करे। हमने खुद 200 साल की औपनिवेशिक ग़ुलामी झेली है। हमारा नैसर्गिक जुड़ाव और पक्षधरता फ़िलिस्तीनी जनता के साथ बनती है। फ़िलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। यह कौम की आज़ादी की लड़ाई है और अतीत में औपनिवेशिक गुलामी झेलने वाली जनता के तौर पर भारतीय जनता की नैसर्गिक एकता फ़िलिस्तीन के साथ बनती है, न कि ज़ायनवादी इज़रायली सेटलर राज्य के साथ जो कि उसी ब्रिटिश साम्राज्यवाद की पैदावार है, जिसकी गुलामी स्वयं हमने भी 200 साल झेली है। लेकिन फ़ासीवादी संघ परिवार आज़ादी के पहले भी बर्तानवी औपनिवेशिक हुकूमत के तलवे चाट रहा था और आज भी उसे ज़ायनवादी हत्यारों में अपनी छवि ही नज़र आती है।

इस पूरे प्रसंग से हम कहना चाह रहे हैं कि फ़िलिस्तीन की जनता के संघर्ष के साथ और उनके ख़िलाफ़ हो रहे अन्याय के विरुद्ध हमें अपनी आवाज़ उठानी है, उनके समर्थन में खड़ा होना है। आप इस अन्याय को समझते हैं तो फ़िलिस्तीन की संघर्षशील जनता का साथ दीजिए जो अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है, अपने बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है और जो अन्याय के ख़िलाफ़ समझौताविहीन संघर्ष का उदाहरण बन गये हैं उसका साथ दीजिए।  

आज की दुनिया और फ़िलिस्तीन का संघर्ष

सेटलर उपनिवेशवादी इज़रायल की जारी इस बर्बरता ने हर किसी को अपनी स्थिति स्पष्ट करने को मजबूर कर दिया है। स्पेन और आयरलैण्ड के शासक वर्ग का एक हिस्सा भी गाज़ा पर बमवर्षा शुरू होने के समय से ही गाज़ा की आम जनता, बच्चों, बीमारों, डॉक्टरों, पत्रकारों और गर्भवती महिलाओं के साथ और नरसंहार के विरोध में हैं और उनकी सरकारों की तरफ से इज़रायल के ख़िलाफ़ सख़्त बयान आये हैं। कई लातिन अमेरिकी देशों व अरब देशों ने भी इज़रायल से या तो कूटनीतिक सम्बन्ध तोड़ लिये हैं या अपने राजनयिकों को वापस बुला लिया है।

लेकिन जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका अपने-अपने देशों में प्रदर्शनों के दबाव के बावजूद इज़रायल के समर्थन में खड़े हैं। दबी जुबान से इन देशों के हुक्मरान कुछ-कुछ आम नागरिकों की मौत को कम करने की बात करते हैं लेकिन अभी तक कोई भी निर्णायक कदम नहीं उठाया है। गाज़ा पर चुप्पी बनाये रखते हुए अमेरिका ने वेस्ट बैंक में घरों पर कब्ज़ा करने वालों का वीज़ा रद्द करने की घोषणा की है। पूरा गाज़ा तबाही और मौत का ताण्डव झेल रहा है ऐसे में नेतनयाहू की सरकार पर प्रतिबंध लगाने की जगह मात्र वेस्ट बैंक में उन इज़रायलियों पर प्रतिबंध की बात की गयी है जो घर और बाग पर कब्ज़ा करने का प्रयास कर रहे हैं, हालाँकि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि इन ज़ायनवादी सेटलरों में से अच्छे-ख़ासे लोगों के पास पहले ही अमेरिकी पासपोर्ट व नागरिकता है और उन्हें वीज़ा की कोई आवश्यकता ही नहीं है। असल में, ये दिखावटी कदम है, यह अमेरिका अच्छी तरह से जानता है और दुनिया भी समझती है।

विश्व का तमाम मुख्य धारा का मीडिया अभी कुछ दिनों पहले तक बस इज़रायल के समर्थन में बातें कर रही थी। लेकिन अब आम बेगुनाह, निहत्थे लोगों पर इज़रायल की बर्बरता देखकर और अपने देशों में फ़िलिस्तीन की आज़ादी के समर्थन में लगातार हो रहे विशाल विरोध प्रदर्शनों को देखकर उनका सुर कुछ बदला है, लेकिन फिर भी वे इज़रायल के आत्मरक्षा के अधिकार और आतंकवाद से लड़ाई की बकवास को दुहराना नहीं छोड़ रहे हैं।

इज़रायल औपनिवेशिक सेटलर राज्य है जो बसा ही है फ़िलिस्तीन की ज़मीन हथिया कर। अगर फ़िलिस्तीनी जनता अपने हक़ के लिए लड़ रही है तो उनपर हमला करने वाले इज़रायल को आत्मरक्षा का हक़ कैसे होगा? जब भारत के क्रान्तिकारी ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे, तो क्या ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता क्रान्तिकारियों और भारतीय लोगों की हत्या करने को अपनी “आत्मरक्षा का अधिकार” और प्रतिरोध योद्धाओं को आतंकवादी कह सकती थी? नहीं।

ख़ैर अपने देश में गोदी मीडिया का क्या कहना! पहले इज़रायली सेना की तकनीक और जाँबाज़ी की गाथा गा रहे थे। अब वे या तो खामोश हैं या बस युद्ध का उन्माद पैदाकर ख़बर को बेचने के लिए इसे रोमांचक बना रहे हैं।

अक़्सर यह कहा जाता है कि फ़िलिस्तीनियों के संघर्ष से अधिकतर पश्चिमी देशों ने मुँह मोड़ लिया है। पहली बात तो यह कि इन पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों ने नहीं बल्कि उनके हुक़्मरानों ने मुँह मोड़ लिया है। लेकिन ये हुक़्मरान कभी फ़िलिस्तीनियों के संघर्ष के साथ थे ही नहीं। फ़्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी जैसे साम्राज्यवादी राष्ट्र तो हमेशा ही इज़रायल के साथ थे। इज़रायल अरब विश्व में साम्राज्यवादी हितों की रक्षा के लिए उनका अपना मिलिट्री चेक-पोस्ट है। अपने हितों के विपरीत जाकर वे फ़िलिस्तीनी संघर्ष का समर्थन भला क्यों करेंगे। लेकिन हुक़्मरानों से इतर चाहे अमेरिका की जनता हो या यूरोप की जनता, हर जगह वह इस घोर अन्याय के ख़िलाफ़ बड़ी संख्या में सड़कों पर निकल रही है और अपने हुक़्मरानों पर दबाव बना रही है। उसी दबाव का नतीजा है कि आज यूरोपीय संघ फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर बँट गया है। सच्चाई यही है : पूरी दुनिया की आम जनता की भारी बहुसंख्या फ़िलिस्तीन के साथ खड़ी है और इज़रायल से नफ़रत करती है।

इज़रायल की बौखलाहट

7 अक्टूबर को गाज़ा की जनता ने इज़रायल की दमघोंटूँ घेरेबंदी को तोड़ा जिसने 2006 से पूरे गाज़ा को खुली जेल में तब्दील कर दिया था। गाज़ा की ओर से ऐसे प्रतिरोध की कल्पना भी इज़रायल नहीं कर कर सकता था क्योंकि 2006 के बाद से जीवन की मूलभूत सुविधाओं से भी लगभग वंचित आबादी उसके आधुनिकतम हथियारों और तकनीक का क्या ही मुकाबला करती! इज़रायल जो अपने बेहद आधुनिक हथियार और खुफ़िया तकनीक बेचने के दौरान अपने ग्राहकों को गारंटी देता है कि तकनीक और हथियार का मात्र प्रयोगशाला में टेस्ट नहीं किया गया है बल्कि असल ज़मीन पर हत्याकाण्ड करने में उसे आजमाया गया है, यानी गाज़ा में आज़माया गया है, आज वह खुद हतप्रभ खड़ा है। अब उसके दावों पर कौन विश्वास करेगा? बौखलाहट में वह रिहायशों, अस्पतालों, स्कूल और शरणार्थी शिविरों पर घमाशान बमबारी किये जा रहा है।

अमेरिका हर साल इज़रायल को करोड़ों डॉलर अनुदान देता है। अमेरिका राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2016 से 2026 तक 10 वर्ष के लिए हर साल 380 करोड़ डॉलर सैन्य सहायता के रूप में इज़रायल को देने का समझौता किया था। इतना पैसा, सारे साम्राज्यवादियों का समर्थन और पूरे विश्व में हथियार का व्यापार करने वाले इज़रायल को 20 लाख की आबादी वाले गाज़ा के आम लोगों के संघर्ष ने चुनौती दी है। यह सम्भव ही इसलिए हो पाया कि जनता कभी हारती नहीं है। जब तक उसे जीत हासिल नहीं होती तब तक वह आज़ादी की अदम्य चाहत के साथ लड़ती है। आज़ादी के प्रति फ़िलिस्तीन की जनता के इसी अदम्य चाहत से डरता है ज़ायनवादी सेटलर उपनिवेशवादी इज़रायल और इसलिए बौखलाया हुआ है। 

मज़दूर वर्ग और फ़िलिस्तीन का समर्थन

सभी देशों में सर्वहारा वर्ग अन्याय, शोषण, उत्पीड़न, रंगभेद और सत्ता के दमन के विरुद्ध आवाज़ उठाता है। दुनिया के हुक़्मरान चाहे जनता के किसी न्यायपूर्ण संघर्ष को कितना भी बदनाम करने का प्रयास करें, उसपर सवाल उठायें या उसकी विरोधी ताक़तों को सही ठहराने के लिए तीन-तिकड़म करें, सर्वहारा वर्ग न्याय का साथ देता है और अपने देश की आम मेहनतकश आबादी को अन्याय के ख़िलाफ़ जागरूक करता है।

आज हिन्दुस्तान के मज़दूर वर्ग को न केवल फ़िलिस्तीनी संघर्ष को समर्थन देना है बल्कि देश की आम-मेहनतकश आबादी को गाज़ा और वेस्ट बैंक में हो रहे अन्याय के ख़िलाफ़ जागरूक भी करना है।  फ़िलिस्तीन में गाज़ा और वेस्ट बैंक अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारे देश में नरेंद्र मोदी की फ़ासीवादी सत्ता खुलकर इज़रायल का साथ दे रही है। अगर हम फ़िलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष पर सर्वहारावर्गीय दृष्टिकोण नहीं अपनायेंगे तो जनता के बीच मालिकों की सेवा करने वाली फ़ासीवादी राजनीति अपनी जगह बनायेगी। इस तरह मज़दूर वर्गीय दृष्टिकोण की अनुपस्थिति में हमारी एकता कमज़ोर पड़ेगी और मेहनतकशों के बीच भी फ़ासीवादी राजनीति के पनपने के लिए रिक्त स्थान रह जायेगा। इसके अलावा अगर आज हम फ़िलिस्तीन के लिए आवाज़ नहीं उठाते हैं तो कल को जब हमारे देश की फ़ासीवादी सत्ता हमारे न्यायपूर्ण संघर्षों का दमन करेगी तब हमारे लिए भी कोई आवाज़ नहीं उठायेगा। सभी जगह मज़दूर वर्ग दुनिया के मज़दूरों को अपने भाई-बहन मानते हैं और इसलिए हम कभी भी अपने संघर्षों में अकेले नहीं होते। आज फ़िलिस्तीन की आम मेहनतकश आबादी को हमारे समर्थन की ज़रूरत है। हमें डटकर फ़िलिस्तीनी संघर्ष का समर्थन करना चाहिए और गाज़ा व वेस्ट बैंक में हो रहे क़त्लेआम का विरोध करना चाहिए। 

 

मज़दूर बिगुल, दिसम्‍बर 2023


 

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