नयी आपराधिक प्रक्रिया संहिताएँ, जनता के दमन के नये औज़ार

अनन्त

विगत वर्ष संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन, 11 अगस्त को, केंद्र सरकार ने पहली बार संसद पटल पर अपराध क़ानून सम्बन्धी तीन विधेयक पेश किये। ये विधेयक थे, भारतीय न्याय संहिता विधेयक, 2023; भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023, एवं भारतीय साक्ष्य विधेयक, 2023। ये क्रमशः भारतीय दण्ड संहिता (आइपीसी) 1860; अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), 1967, तथा साक्ष्य अधिनियम, 1872 को प्रतिस्थापित करेंगे। अपनी पहली प्रस्तुति के क़रीब चार महीनों बाद कुछ “औपचारिकताओं”, “विशेषज्ञों” के “सलाह-विमर्श” के बाद, मूल मसौदे में ही मामूली फेरबदल कर के, इन्हें दिसम्बर में दुबारा संसद में पेश किया गया। विपक्ष के सांसदों के निलम्बन के बीच संसद के दोनों सदनों में इन विधेयकों को पारित कर दिया गया। दरअसल, इन संहिताओं की असल रूपरेखा कोविड महामारी के दिनों ही तय की जा रही थी, जिन्हें बस अमली जामा पहनाना था।

मोदी सरकार और उसकी भोंपू मीडिया इस मामले को ऐसे पेश कर रही है कि यह पूरी कवायद अंग्रेजों के समय के दण्ड के विधान के बदले “रामराज्य का न्याय” को लागू करने के लिए है। लेकिन कहने की आवश्यकता नहीं कि फ़ासीवादी मोदी सरकार के राज में, जहाँ हर तरह के जनवादी दायरों को संकुचित किया जा रहा है, तमाम जन पक्षधर आवाजों को कुचला जा रहा है, कश्मीर से लेकर मणिपुर तक आम जनता के जीवन को नर्क बना दिया गया है, यहाँ तक की बुर्जुआ विपक्षी नेताओं, दलों तक पर मोदी सरकार वैमनस्य के साथ कार्यवाही कर रही है, वहाँ न्याय के साथ उसका कोई वास्ता हो ही नहीं सकता। इन विधेयकों के साथ उसकी असल मंशा अंग्रेजों से एक कदम और आगे बढ़कर दमनात्मक दंडात्मक कानून लागू करना है। इन नये संहिताओं पर एक बार नज़र डालने के साथ यह बात स्पष्ट हो जाती।

जनता के बीच हर तरीके से नंगी हो चुकी फ़ासीवादी मोदी सरकार को आगामी आम चुनाव में एक बार फिर से जीतकर आने के लिए तमाम तरीके के हथकण्डों, तिकड़मों के साथ डण्डे के ज़ोर का सहारा है। वह हर तरह के छोटे से बड़े विरोधों को कुचलने के लिए आमादा है। अपनी सत्ता को लेकर असुरक्षा, आशंका में घिरा शासक बल प्रयोग की किसी भी हद तक जा सकता है।

कौन सा कृत्य अपराध की श्रेणी में आता है, और उसके लिए क्या सज़ा हो सकती है, यह परिभाषित करने का काम दण्ड संहिता के तहत होता है। विभिन्न धाराओं के तहत अलग-अलग अपराधों के लिए सज़ा का प्रावधान दण्ड संहिताओं में ही परिभाषित होता है। मोदी सरकार अब इन परिभाषाओं को बदल रही है। पुरानी संहिताओं के बदले नयी संहिताओं को ला रही है। इन संहिताओं में किये बदलावों को अगर देखें तो आने वाले बर्बर समय की आहट महसूस की जा सकती है, जिसकी ज़द में तमाम इन्साफ़पसन्द नागरिक, जनपक्षधर बुद्धिजीवी, पत्रकार, क्रान्तिकारी राजनीतिक कार्यकर्ता से लेकर आम मेहनतकश आबादी आयेगी। इन संहिताओं के कुछ नुक़्तों को ध्यान से देखने से इसकी अन्तर्वस्तु का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है।  

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता जिसे दण्ड प्रक्रिया संहिता के स्थान पर लाया जा रहा है, वह आम नागरिकों की कितनी “सुरक्षा” करेगी इसे पुलिस हिरासत में रखने की अवधि सम्बन्धी उसके प्रावधान से समझा जा सकता है। पहले किसी भी व्यक्ति की गिरफ़्तारी के बाद उसे अधिकतम 15 दिनों तक ही पुलिस हिरासत में रखा जा सकता था, उसके बाद जाँच के दौरान कोई भी रिमांड केवल न्यायिक तौर पर ही हो सकती थी, पुलिस अपनी मर्ज़ी से हिरासत में नहीं रख सकती थी। किन्तु नये “न्याय” संहिताओं के तहत अब पुलिस जाँच की पूरी अवधि के दौरान, जोकि 90 दिनों तक हो सकती है, किसी भी व्यक्ति को हिरासत में रख सकती है। निश्चित तौर पर यह पुलिसिया दमन को बढ़ाने का काम करेगा। पुलिसिया दमन तन्त्र को और मज़बूत करने के लिए विधेयक में एक नया प्रस्ताव जोड़ा गया है, जिसके अनुरूप एक पुलिस अधिकारी को किसी भी सम्पत्ति को कुर्क करने की शक्ति देता है, जिसे वह “अपराध की आय” मानता है। जिस प्रकार से आये दिन अल्पसंख्यकों, मज़लूमों के ऊपर बुलडोज़र चलाने का काम किया जा रहा है, तो यह समझ जा सकता है कि इस प्रकार के प्रावधान का क्या हश्र होने वाला है। अब बस फ़र्क़ यह है कि पहले जो दमन चक्र “अवैधानिक” था अब वह संवैधानिक होगा।

फ़ासिस्टों के “न्याय” में अंग्रेज़ों के काले क़ानूनों से ज़्यादा अँधियारा है। ग़ौरतलब है कि मानसून सत्र में पेश किया गये पहले मसौदे में आतंकवाद के अपराध की परिभाषा, इन नयी “न्याय” संहिताओं के लाने के असल औचित्य को नंगे रूप से रेखांकित करती थी, हालाँकि बाद में उसे संशोधित कर एक पुरानी परिभाषा को ही अंगीकार कर पेश किया गया, जोकि इन नये संहिताओं के मर्म को बखूबी पेश करता है। आने वाले समय में व्यवहार में इन संहिताओं को किस तरह से लागू किया जायेगा, इसका अन्दाज़ा लगाना कोई अन्तरिक्ष विज्ञान का मसला नहीं है।

विधेयक के पहले संस्करण में आतंकवादी कृत्य के दायरे में अस्पष्ट कृत्य शामिल थे जैसे; आम जनता या उसके एक हिस्से को डराना, सार्वजनिक व्यवस्था में खलल डालना, भय का माहौल बनाना या भय का संदेश फैलाना; देश की राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक संरचनाओं को अस्थिर करना या नष्ट करना, या सार्वजनिक आपात स्थिति पैदा करना या सार्वजनिक सुरक्षा को कमज़ोर करना। तदनुसार, एक अहिंसक भाषण को भी इस परिभाषा के तहत आतंकवादी कृत्य के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।

बहरहाल, संशोधन के बाद उसी तथ्य को, जो पहले पेश संस्करण की तुलना में अधिक लच्छेदार भाषा में पहले से ही मौजूद था, उठा लिया गया है। संशोधित विधेयक की धारा 113 ने गैरक़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (यूएपीए) की धारा 15 के तहत मौजूदा परिभाषा को पूरी तरह से अपनाने के लिए आतंकवाद के अपराध की परिभाषा को संशोधित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यूएपीए के तहत सत्ता अपने मन मुआफ़िक किसी भी कृत्य को आतंकवाद की श्रेणी में डाल सकती है। यूएपीए, जैसा काला क़ानून, भारत की एकता, अखण्डता, सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा या सम्प्रभुता के लिए ख़तरा पैदा करने के इरादे या उसे खतरे में डालने की सम्भावना वाले किसी भी कार्य को या आतंक फैलाने के इरादे या आतंक फैलाने की सम्भावना को आतंकवादी कृत्य के रूप में परिभाषित करता है। यानी, इरादे और सम्भावना के आधार पर किसी को भी आतंकवादी घोषित किया जा सकता है!

नयी भारतीय न्याय संहिता के तहत “राजद्रोह” को अपराध के रूप में निरस्त कर दिया गया है। इसे पुरानी भारतीय दण्ड संहिता में सबसे महत्वपूर्ण “सुधारों” में से एक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। काग़ज़ पर सच होते हुए भी, असल में यह जनवादी अधिकारों पर बड़ा हमला है। गृह मंत्रालय ने क़ानून से “राजद्रोह” शब्द (आईपीसी की पूर्व धारा 124 ए) को हटा दिया है, किन्तु उसके एवज में जिन विधानों को स्थान  दिया गया है, वह राजद्रोह के पुराने क़ानून के प्रावधानों से कहीं अधिक ख़तरनाक हैं। भारतीय न्याय संहिता का खंड 150 जिसका शीर्षक ‘भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता को ख़तरे में डालने वाले कृत्य’ हैं, अपने पूर्वर्ती विधान की तुलना में कहीं अधिक अस्पष्ट और व्यापक शब्दावली वाला है।

यह खण्ड “भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता को ख़तरे में डालने वाले कृत्यों (जिसमें इलेक्ट्रॉनिक संचार का उपयोग करना भी शामिल है) को, सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसक गतिविधियों, अलगाव, अलगाववाद को उत्तेजित करने या भारत की एकता, सम्प्रभुता और अखण्डता को ख़तरे में डालने” को अपराध मानता है। असल में राजद्रोह क़ानून से राजद्रोह शब्द को हटा दिया गया है, किन्तु सरकार के ख़िलाफ़ उठाने वाली किसी भी आवाज़ को “देश की सम्प्रभुता पर हमला” के नाम पर दण्डित किया जा सकता है। देश के प्रति वफ़ादारी, अब देश की जनता के प्रति वफ़ादारी नहीं है, बल्कि सरकार के प्रति वफ़ादारी बना दी गयी है। इसकी शब्दावली की अस्पष्टता के कारण सत्ता इसका व्यापक इस्तेमाल करेगी, एक आम राजनीतिक भाषण, या किसी भी प्रकार की असहमति या सोशल मीडिया के पोस्ट को भी “एकता और अखण्डता को खतरे में डालने वाला कृत्य” करार दिया जा सकता है। मजेदार बात यह है कि आईपीसी की धारा 124ए के तहत बतौर सज़ा जुर्माना भरने का प्रावधान था, लेकिन इसके विपरीत, नए खण्ड 150 के तहत सज़ा में सभी परिस्थितियों में कारावास का प्रावधान है।

नयी संहिताओं के तहत अब किसी अभियुक्त पर उसकी अनुपस्थिति में भी मुक़दमा चलाया जा सकता है। साक्ष्य अधिनियम में बदलाव के साथ, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड को अदालत के समक्ष साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। ईमेल, इलेक्ट्रॉनिक सन्देश, सर्वर लॉग, स्थान विवरण आदि सभी को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के हिस्से के रूप में शामिल किया जाएगा, जो अदालत में स्वीकार्य होगा। नया क़ानून स्पष्ट रूप से जाँच के दौरान फ़ोन, लैपटॉप आदि जैसे डिजिटल उपकरणों को ज़ब्त करने की अनुमति देता है। यह अधिनियम लोगों की निजता पर हमला है, यह इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस को वैधता प्रदान करता है। इसकी आड़ में आम लोगों के ऊपर निगरानी रखने का काम किया जायेगा।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नयी आपराधिक क़ानून संहिता जनता के दमन का नया औज़ार है। अव्वलन, भारतीय दण्ड संहिता हो या भारतीय न्याय संहिता, ये सभी संहिताएँ जनता के दमन का ही निकाय हैं। राज्यसत्ता शासक वर्ग के शासन का निकाय है, जो बल-प्रयोग का काम करती है। व्यवस्था अपने संकट के कुचक्र में फँसी हुई है, ऐसे में राजनीतिक बागडोर फ़ासीवादी ताक़तों के हाथ में रहे, इसके लिए उसे और धारदार हथियार की ज़रूरत है, नयी आपराधिक क़ानून संहिता वही हथियार है।

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2024


 

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