हिटलर की तर्ज़ पर अरबों रुपये बहाकर मोदी की महाछवि का निर्माण

प्रियम्वदा

फ़ासीवादी प्रचार का मूलमन्त्र होता है ‘एक झूठ को सौ बार दोहराओ ताकि वह सच बन जाए’। फ़ासीवादी राजनीतिज्ञ झूठ को दोहराने और आम जन में मिथकों को कॉमन सेंस के रूप में स्थापित करते हैं।  हिटलर के प्रचार मन्त्री गोएबल्स ने एक झूठ को सौ बार दोहराने की नीति का बख़ूबी इस्तेमाल कर हिटलर का प्रचार किया। भारत में भाजपा और संघ परिवार ने अपने पुरखों के इतिहास से सीखा है और फ़ासीवादी प्रचार तन्त्र को सशक्त बनाया है। इनके नेता भव्य मंच, लच्छेदार भाषण के ज़रिये अपने झूठ के गुब्बारे को बड़ा करते हैं। फ़ासीवादियों का यह प्रचार रूप किसी भी अन्य चुनावबाज़ पार्टी के प्रचार से अलग होता है।

फ़ासीवादी प्रचार नकली शत्रु खड़ा करने, उसे बेहद बढ़ा-चढ़ाकर ख़तरे के रूप में पेश करने, फ्यूहरर कल्ट (तानाशाह की महाछवि) बनाने और धार्मिक, नस्ली या किसी अन्य अस्मितागत बहुसंख्या के एकमात्र प्रवक्ता के रूप में ख़ुद को पेश करने का काम करता है। इस प्रचार का सार झूठ है इसलिए ही यह इसे भव्यता और एक किस्म का सामूहिक सम्मोहन या यूँ कहे कि इन्द्रजाल रचने की ज़रूरत होती है।  नाज़ी जर्मनी में हिटलर के प्रचार को रेडियो के माध्यम से, उसके भाषण को जगह-जगह भोंपू लगाकर प्रचारित किया जाता था। उसकी रैलियाँ भव्य होती थी और भाषण भी विशालकाय मंच के ज़रिये ही दिये जाते थे। फिल्मों के ज़रिये भी नाज़ियों ने हिटलर की “महानता” को स्थापित करने का काम किया।

ठीक यही सब आज हम अपने देश में भी होते हुए देख रहे हैं। मोदी के मन की बात, सेल्फ़ी पॉइंट, विशाल मंच, भव्य रोड शो से लेकर कला के तमाम माध्यमों का इस्तेमाल पहले से कहीं अधिक अकल्पनीय स्तर पर फ़ासीवादी प्रचार में किया जा रहा है। हिटलर के समय में जर्मनी के प्रसिद्ध लेखक वॉल्टर बेंजामिन के शब्दों में कहें तो फ़ासिस्ट राजनीति का सौंदर्यीकरण करते हैं। फ़ासीवादी अपने प्रचार को भव्य और दिव्य बनाकर पेश करते हैं जिससे कि उसकी चकाचौंध में सच कहीं छुप जाए। उसी दौर के प्रसिद्ध कवि और नाटककार बेर्टोल्ट ब्रेष्ट फ़ासीवादी राजनीति के सौन्दर्यीकरण पर लिखते हैं :

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि फासीवादियों के व्यवहार में अत्यन्त नाटकीयता होती है। उन्हें नाटकीयता से विशेष लगाव होता है। वे खुद कोरेजी‘ (निर्देशन, मंच प्रबन्धन) बोलते हैं, और उन्होंने सीधे तौर पर नाटक की प्रभावी विधा की एक पूरी श्रृँखला अपनाई है  जैसे कि रोशनी और संगीत, कोरस और अप्रत्याशित मोड़। एक अभिनेता ने मुझे कई साल पहले बताया था कि हिटलर ने म्यूनिख के कोर्ट थिएटर में एक्टर फ्रिट्ज़ बेसिल से केवल वक्तृत्व कला की, बल्किकम्पोर्टमेण्टकी भी शिक्षा ली थी। मसलन उसने सीखा कि मंच पर कैसे एक नायक की तरह चलते हैं, जिसके लिए आपको अपने घुटने सीधे रखते हुए पूरे पाँव को ज़मीन पर रखना होता है ताकि आप महान दिखें। और उसने अपनी बाहों को क्रॉस करने का सबसे प्रभावशाली तरीका सीखा और ये भी सीखा कि कैसे सहज दिखना होता है।

आइए हम निडर होकर (या डरकर भी) अध्ययन करें कि हमारे विचारविमर्श का विषय सहानुभूति के कलात्मक साधनों का उपयोग कैसे करता है! आइए देखें कि वह कौन से कलात्मक विधियों का उपयोग करता है! उदाहरण के लिए, सोचें कि वह लोगों के बीच कैसे बोलता है! भाषणों के दौरान, जो राज्य की नीतियों को समझाने या प्रचार करने के लिए होते हैं, वह ख़ुद को उन निजी भावनाओं के अधीन करता है जिससे जनता को सहजता से प्रभावित किया जा सके। अपने आप में, राजनेताओं के भाषण आवेगवश, स्वतःस्फूर्त निकले शब्द नहीं होते, बल्कि उनके भाषणों का हर तरह से संशोधन किया जाता है और एक विशेष मौके के लिए तैयार किया जाता है। जब वह माइक्रोफोन की ओर बढ़ता है, तो वक्ता तो साहसी, क्रोधित, विजयी, ही कुछ और महसूस करता है। इसलिए सामान्यतः वक्ता अपने भाषण को गम्भीर स्वर में पढ़ने, अपने तर्कों को एक निश्चित तात्कालिकता देने आदि से सन्तुष्ट होता है। हाउस पेण्टर (ब्रेष्ट हिटलर को हाउस पेण्टर के नाम से सम्बोधित करते हैं) और उसके जैसे लोग काफ़ी अलग तरीके से काम करते हैं। सबसे पहले, सभी प्रकार की चालों से, दर्शकों को उत्तेजित किया जाता है और उकसाया जाता है। ऐसी अफ़वाह फैली होती है कि किसी को कुछ पता नहीं कि वह क्या बोलेगा। क्योंकि वह लोगों के नाम पर नहीं बोलता है, और वह केवल वही नहीं कहता है जो लोगों को कहना है। वह एक ऐसा व्यक्ति है, जो नाटक में एक नायक है, और उसका उद्देश्य लोगों (या कहें दर्शकों) को वह कहलवाना है जो वह कहता है।  या बेहतर कहें कि वो महसूस कराना जो वह महसूस करता है। वह व्यक्तियों, विदेश मन्त्रियों या राजनेताओं से लड़ता है।  उनके आचरण से ऐसा लगता है कि वह इन लोगों के साथ किसी निजी विवाद में उलझा हुआ है। वह अपने को किसी होमरीय नायक की तरह उग्र आक्षेपों में खो देता है, अपनी बेगुनाही पर ज़ोर देता है, मानो कि वह अपने प्रतिद्वन्द्वी को अपना गला घोटने से बस रोक ही रहा हो, उसे सीधे सम्बोधित करता है, उसे चुनौतियाँ देता है, उसका उपहास करता है, इत्यादि। इन सब में, उसके श्रोता भावनात्मक रूप से उनका अनुसरण करते हैं, वे वक्ता की जीत में भाग लेते हैं और उसके दृष्टिकोण को अपनाते हैं।  बेशक हाउस पेण्टर (जैसा कि कुछ लोग उसे कहते हैं, क्योंकि वह विध्वंस के लिए तैयार इमारत की दरारों पर केवल सफेदी ही पोत सकता है) ने एक नाटकीय तरीका अपनाया है, जिसके द्वारा वह अपने दर्शकों को लगभग आँख बन्द करके उसका अनुसरण करने के लिए राजी कर सकता है। वह हर किसी को अपने दृष्टिकोण को त्यागने और उसके दृष्टिकोण को अपनाने के लिए प्रेरित करता है, जिससे कि लोग अपने हितों को भूल जाते है और नायक के हितों को अपना हित मान उसे बढ़ावा देते हैं। वह अपने दर्शकों को अपने आन्दोलनों में शामिल करता है, उन्हें अपनी परेशानियों और अपनी जीत मेंभागीदारीलेने देता है, और उन्हें किसी भी आलोचना से रोकता है, यहाँ तक कि अपनी परिस्थिति पर अपने नज़रिए से एक क्षणिक नज़र डालने से भी रोकता है।

ब्रेष्ट का यह कथन हूबहू हम आज के फ़ासीवादी दौर में भी लागू होते हुए देख सकते हैं। मोदी के भाषण पर ब्रेष्ट का विवरण बिल्कुल सटीकता से फिट होते हैं। मोदी का नोटबन्दी करके रोना, काँग्रेस द्वारा मरवा देने की बात कहना आदि कई उदाहरण ब्रेष्ट के फ़ासीवादी नेता के खाके में फिट बैठता है। पिछले कुछ सालों में किया गया मोदी के कल्ट का निर्माण भी इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। प्रधानमन्त्री का अलग-अलग तरीके से प्रभा मण्डल गढ़ने का काम इसलिए किया गया ताकि यह दिखाया जा सके कि वह पुरुष नहीं बल्कि “ महापुरुष ” है, “इन्सान के रूप में ईश्वर है” जो देश को एक नये कालखण्ड में प्रवेश कराने के लिए आये हैं, इत्यादि!! मोदी के कल्ट निर्माण के उदाहरण के ज़रिये उपरोक्त चर्चा की रौशनी में देखें तो यह स्पष्ट है कि भाजपा-आरएसएस की मशीनरी नाज़ियों के तौर-तरीकों को ही लागू कर रही है।

भाजपा के विधायकों-सांसदों द्वारा लगातार मोदी को भगवान के अवतार के रुप में पेश किया जाता रहा है। 22 जनवरी के राम मन्दिर उद्घाटन प्रचार के लिए देशभर में मोदी को इस तौर पर प्रचारित किया गया कि वो “ बालक राम ” को मन्दिर में लाने वाले अवतार हैं। इस अवतार रूप को स्थापित करने का काम मोदी के प्रधानमन्त्री बनने के साथ ही शुरू कर दिया गया था।

भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी के एक प्रस्ताव में कहा गया था कि भगवान शिव की तरह, मोदी ने सभी विपक्षी हमलों को सहन करते हुए भारत और दुनिया के सर्वोच्च और सबसे लोकप्रिय नेता बन गये हैं। भाजपा प्रवक्ता अवधूत वाघ ने कहा कि हमारे पीएम विष्णु के 11वें अवतार हैं और संस्कृत श्लोक ‘यदा यदा हि धर्मस्य’ उद्धृत करते हुए बताया कि जब भी धर्म का पतन होता है, भगवान दुनिया को उठाने के लिए एक अवतार के रूप में प्रकट होते हैं और आज मोदी जी के अवतार रुप में वो हमारे सामने हैं। शिवराज सिंह चौहान के कथन के अनुसार पीएम मोदी में  “भगवान के अंश” हैं और वह “अलौकिक” हैं। जब यह सब चल ही रहा थी कि इसी बीच मोदी जी ने ख़ुद ही इस ईश्वरीय अवतार की भूमिका को स्वीकारा और कहा कि वह “ इस धरती पर महिलाओं को सशक्त करने के लिए अवतरित हुए हैं। ” ( ख़ैर, देश की जनता के लिए यह मज़ाक अप्रत्याशित नहीं था क्योंकि भाजपा के नेता-मन्त्रियों के स्त्री सशक्तिकरण की सच्चाई से भक्तों के अलावा बाक़ी सभी वाकिफ़ हैं!)

अब मोदी जी ईश्वरीय अवतार साबित हो ही चुके हैं तो उनके पूजन के लिए मन्दिरों का निर्माण भी भक्तों ने देशभर में शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी में एक मन्दिर है जहाँ कथित तौर पर शिव के साथ मोदी की पूजा की जाती है। एक महत्वाकाँक्षी भाजपा नेता ने पुणे में एक मोदी मन्दिर बनवाया और उसके साथ मोदी को समर्पित एक कविता को भी प्रदर्शित किया। कथित तौर पर उत्तर प्रदेश के मेरठ में भी पाँच एकड़ ज़मीन पर 10 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से 100 फुट की मोदी मूर्ति वाला एक मन्दिर बनाया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी ने जिस स्कूल में अपनी प्रारम्भिक पढ़ाई की है उसे एक पवित्र ‘प्रेरणा स्थल’ बनाया गया है जहाँ छात्रों को विभिन्न राज्यों से अध्ययन दौरों पर लाया जा रहा है। मोदी कॉलेज और मोदी प्रदर्शनियों के ज़रिये उसकी “महानता” को स्थापित करने के काम में पैसे पानी की तरह बहाये जा रहे हैं। प्रधानमन्त्री के रेडियो शो मन की बात के 100वें एपिसोड को हर स्कूल, कॉलेज, सरकारी से लेकर प्राइवेट दफ़्तरों में सुनने को बाध्यकारी बनाया गया और न सुनने वालों पर जुर्माना लगाया गया। जन औषधि दुकानों से लेकर राशन की दुकानों पर स्कूल-कॉलेजों में भी मोदी को एक ब्रैण्ड, एक कल्ट के रूप में लोगों के दिमाग में बिठाया जा रहा है। एक ऐसा चरित्र जो लोगों के सवालों, उनकी आलोचनाओं से परे हो। इसका ही नतीजा है की आज मोदी का विरोध करने वाले लोगों को देश का विरोध करने वालों में गिना जा रहा है और उनपर देश-विरोधी होने का मुकदमा दर्ज किया जा रहा है। मोदी का कल्ट निर्माण हिटलर सरीखा ही निर्मित किया गया है और दोनों की भावभंगिमा नाटकीयता से परिपूर्ण है।

मोदी के कल्ट निर्माण के ज़रिये तथा अन्य प्रचार के जरिये (चाहे वो मीडिया का हो, फिल्मों के माध्यम से हो, भाषणों व अन्य सांस्कृतिक माध्यमों के इस्तेमाल से हो) फ़ासीवादी ताक़तें अपने राजनीतिक विरोध को लोगों के बीच अकल्पनीय और अविश्वसनीय बनाती हैं और इसी के जरिये ये टुटपुँजिया वर्गों के रूमानी उभार को खड़ा करती हैं। भाजपा-आरएसएस द्वारा अतीत के गौरव से लेकर “हिन्दू राष्ट्र” की महानता का मायाजाल गढ़ने का काम इसी का उदाहरण है। पिछले दस सालों में हमें ऐसे कई प्रचार के नमूने मिल जाएँगे जो यह दिखाने के लिए पर्याप्त है। फ़ासीवादी उभार टुटपुँजिया वर्ग और औपचारिक क्षेत्र के और लम्पट मज़दूर वर्ग के एक हिस्से का ब्रेन वॉश करके नहीं होता बल्कि इस आबादी के बीच असुरक्षा व अनिश्चितता के कारण पैदा होने वाली प्रतिक्रिया की सम्भावना को वास्तविकता में तब्दील करके होता है। पूँजीवादी व्यवस्था जनित सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा और इसके अलावा पूँजीवादी-पितृसत्तात्मक मूल्य-मान्यताएँ इसका सन्दर्भ होती हैं। ठीक इसी वजह से इस आबादी के एक हिस्से के बीच साम्प्रदायिकता और राष्ट्रवाद की रहस्यवादी अपीलें अपनी जड़ें जमाने में कामयाब होती हैं और ये फ़ासीवादियों द्वारा तैयार भीड़ के अगली कतार में होते हैं।

हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि फ़ासीवाद टुटपुँजिया वर्ग का एक प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन होता है। नवउदारवाद के दौर में फ़ासीवाद मन्दी के दौर में पूँजीपति वर्ग के मुनाफ़े की औसत दर को स्वस्थ स्तर पर बनाये रखने के लिए शोषण का बोझ औसत मज़दूरी को तरह-तरह से घटाकर आम मेहनतकश जनता पर बढ़ाता जाता है। इस शोषण के बोझ के ख़िलाफ़ आम मेहनतकश जनता के क्रान्तिकारी आन्दोलन को या उसके उभार की सम्भावना को कुचलने के लिए ही फ़ासीवाद टुटपुँजिया वर्ग के प्रतिक्रियावादी आन्दोलन को खड़ा करता है। आर्थिक संकट के बोझ में तबाह-बर्बाद हो रहे इस वर्ग के असन्तोष का एक नकली समाधान फ़ासीवाद नकली शत्रु पेश कर के देता है। जैसे इस वक़्त भारत में मुसलमान आबादी इस नकली शत्रु के रूप में मौजूद है और जर्मनी में यह यहूदी आबादी के रूप में मौजूद थी।

राजनीति के सौन्दर्यीकरण का इस्तेमाल फ़ासिस्ट ताक़तें पहले भी करती रहीं हैं और आज भी हमारे देश की फ़ासीवादी हुकूमत इसका ही इस्तेमाल कर मिथकों को सच के तौर पर जनमानस में स्थापित कर रही है।

फासिस्टों द्वारा किये जा रहे “राजनीति के सौन्दर्यीकरण” के जवाब में सर्वहारा वर्ग कला और सौन्दर्य का भी राजनीतिकरण करता हैं। सर्वहारा कला-संस्कृति लोगों के जीवन के प्रश्नों को सामने रखती है, वह सच पर आधारित होती है और इसलिए ही उसे किसी नकली भव्यता और खोखली नाटकीयता की ज़रूरत नहीं होती है। वह राजनीति के फासिस्ट सौन्दर्यीकरण का जवाब सौन्दर्य के राजनीतिकरण के ज़रिये देती है। यानी, वह वर्गीय दृष्टि से हर चीज़ पर सवाल खड़ा करती है और सही सवाल पूछती है: यानी, कौन-सी चीज़ किसके वर्ग हित में जाती है, किसकी सेवा करती है। फ़ासीवादियों का राष्ट्रवाद किसी राष्ट्र की बात करता है; उनके “हिन्दू राष्ट्र” में मज़दूरों-मेहनतकशों, दलितों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों की क्या जगह होगी, आदि। यही फासिस्ट सौन्दर्यीकरण का सर्वहारा वर्ग द्वारा राजनीतिकरण के द्वारा दिया जाने वाला जवाब है।

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2024


 

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