गाज़ा वह फ़ीनिक्स पक्षी है जो अपनी राख से फिर उठ खड़ा होगा!

लता

गाज़ा और वेस्ट बैंक की बहादुर जनता सेटलर, उपनिवेशवादी, ज़ायनवादी इज़रायल के ख़िलाफ़ अपने अधिकार, आत्मसम्मान, भविष्य और अस्तित्व की लड़ाई पूरी बहादुरी के साथ लड़ रही है। यह लेख लिखने तक युद्ध के 121 दिन से अधिक बीत चुके थे। भयंकर बमबारी, टैंक और आधुनिक हथियारों के साथ ज़मीनी हमलों के बावजूद फ़िलिस्तीन की जनता अकूत बलिदानियाँ दे कर लड़ रही है। फ़िलिस्तीनी जनता की चीमड़ता और संघर्ष के जज़्बे को देखते हुए हत्यारे नेतन्याहू का गुस्सा मासूम बच्चों, औरतों, बुज़ुर्गों और यहाँ तक कि फिलिस्तीनी जनता के जीविकोपार्जन में काम आने वाले जानवरों और मवेशियों पर निकल रहा है। पूर्ण विजय और हमास को जड़-मूल से समाप्त करने के लक्ष्य का दावा करने वाले हत्यारे नेतन्याहू के लिए युद्ध जारी रखना हर दिन कठिन होता जा रहा है। वह मासूम बच्चों की मौत, स्कूल, अस्पतालों और रिहायशी मकानों की तबाही को जीत की तरह इज़रायली जनता के सामने प्रस्तुत कर रहा है लेकिन आज भी बन्धकों को छुड़ा नहीं सका है। उल्टे गाज़ा फिलिस्तीनी मुक्ति योद्धाओं द्वारा इज़रायली ज़ायनवादी सेना की कब्रगाह में तब्दील हो रहा है। गाज़ा में अपनी हार को देखते हुए हमास को जड़मूल से नष्ट करने के घोषित लक्ष्य को उसने चुपके से बदल दिया है। अब नेतन्याहू और उसके मन्त्रीजनरल कहने लगे हैं कि हमास को हम इतना कमज़ोर कर देंगे कि वह दुबारा ऐसी कार्रवाई नहीं कर सकेगा

7 अक्टूबर को गाज़ा के लड़ाकुओं ने अपमान भरी क़ैद के ख़िलाफ़ इज़रायल की ज़मीन, आसमान व समुद्र की घेरेबन्दी तोड़ कर आज़ादी का परचम तो लहराया ही, लेकिन साथ ही इज़रायल के आयरन डोम’ व तमाम अन्य आधुनिक सुरक्षा उपकरणों के मिथक को भी एक बार फिर खण्डित किया। विश्व में सुरक्षा तकनीक और आधुनिक हथियारों का व्यापार करने वाला इज़रायल इस हार के बाद किस तरह सुरक्षा तकनीक और आधुनिक हथियारों की गुणवत्ता का दावा करेगा? इज़रायल की सैन्य शक्ति और ख़ुफ़िया तन्त्र का मिथक गाज़ा की जनता तोड़ती रहती है लेकिन 2006 में हिज़्बुल्ला से हुई हार इज़रायल के लिए घोर अपमानजनक साबित हुई थी और अब हमास के हाथों हार का सामना उसके लिए सबसे बड़ी ज़िल्लत की वजह बन रहा है। यह सच है कि फिलिस्तीनी जनता इसके लिए भारी कीमत चुका रही है। लेकिन साम्राज्यवादी जब भी हारते हैं, तो इसी तरह बूढ़ों, बच्चों, औरतों का क़त्लेआम करते हैं। यह सिर्फ़ उनकी हताशा को दिखलाता है। और यह भी ग़ौरतलब है कि हर ऐसे हत्याकाण्ड के साथ दुनिया में साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ आम मेहनतकश जनता में नफ़रत बढ़ती जाती है। इज़रायल और अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी साम्राज्यवादी देश आज दुनिया में सबसे घृणा और नफ़रत का पात्र बन चुके देश हैं।  

गाज़ा और वेस्ट बैंक की वर्तमान स्थिति

 गाज़ा की जनता ज़ायनवादी फ़ासिस्ट सेटलर इज़रायल की क़ैद से मुक्त होना चाहती है और इस लड़ाई को जीतने के लिए वह कमर कसे हुए है। अकूत बलिदानियों और विनाश झेलने के बाद भी हर बार गाज़ा फिर से फ़ीनिक्स पक्षी की तरह अपनी ही राख से जीवित हो उठता है। फ़िलिस्तीनी जनता विनाश और क़ुर्बानियों के बीच जीवन गढ़ती है, नये घर बनाती है, नये गीत रचती है, अपने खुशी के मौकों पर नाचती-झूमती है, उत्पादन करती है और समुद्र की लहरों पर सवार हो मुक्ति के सपने देखती है। किसी भी देश की जनता हमेशा के लिए ग़ुलाम नहीं बनायी जा सकती। जनता लड़ती है, लड़ाकुओं को पैदा करती है और मुक्ति के सपने अगली पीढ़ी को सौंप देती है। फ़िलिस्तीन इसका ज्वलन्त उदाहरण है।

7 अक्टूबर के बाद 23 लाख की आबादी वाली गाज़ा पट्टी में 85 प्रतिशत आबादी विस्थापित हो गई है। यानी इज़रायल ने बमबारी और ज़मीनी हमलों के दौरान उत्तर गाज़ा की आबादी को धकेल-धकेल कर दक्षिण गाज़ा की ओर विस्थापित होने को मज़बूर कर दिया है। ठण्ड और बारिश में यह 85 प्रतिशत आबादी जिसमें बड़ी संख्या बच्चों और औरतों की है सड़कों पर सो रही है। यह आबादी एक समय खाना खा रही है और कभी-कभी वह भी नहीं मिलता। गाज़ा में छोटे-छोटे बच्चे बमबारी, ज़मीनी हमलों के अलावा भयंकर भुखमरी, बीमारी और साफ़-सफ़ाई की कमी का सामना कर रहे हैं। गाज़ा में पीने के पानी की समस्या है, अधिकतर सड़कें और यातायात बमबारी से तबाह हो गये हैं। इज़रायल जानबूझ कर अस्पतालों पर हमले कर रहा है और दवा, चिकित्सा उपकरण, भोजन, पानी, टेण्ट जैसे किसी भी मानवीय मदद को गाज़ा तक नहीं पहुँचने दे रहा है। आँकड़ों के अनुसार हर घण्टे गाज़ा में 15 लोग मारे जा रहे हैं जिनमें 6 बच्चे हैं।अभी तक गाज़ा में 27,365 लोग मारे जा चुके हैं जिनमें 11,500 बच्चे है और 8000 औरतें। घायलों की संख्या 66,630 है जिसमें 8,663 बच्चे हैं और 6,327 औरतें हैं। 8000 से अधिक लोग लापता हैं। वेस्ट बैंक में 382 लोग मारे जा चुके हैं जिनमें 100 बच्चे हैं। यहाँ घायलों की संख्या 4,250 है। अब तक इज़रायल ने 94 पत्रकारों की हत्या की है जिनमें से अधिकतर फ़िलिस्तीनी थे।

नेतन्याहू, इज़रायली जनता और युद्ध

7 अक्टूबर को इज़रायल के आयरन डोम और तमाम ख़ुफ़िया तन्त्रों को भेद कर जब हमास के नेतृत्व में फ़िलिस्तीनी मुक्तियोद्धा इज़रायल पहुँचे तो इज़राइल की पूरी व्यवस्था हिल गई। गाज़ा की ओर से ऐसे किसी हमले की कल्पना इज़रायल ने नहीं की थी। गाज़ा को 2007 से इतनी सख़्त घेरेबन्दी में रखने के बाद ऐसा हमला नींद उड़ा देने वाला था। इज़रायल की सेटलर उपनिवेशवादी ज़ायनवादी आबादी का एक हिस्सा जो ‘आयरन डोम’ और तमाम ख़ुफ़िया तन्त्रों की मौजूदगी में निश्चिन्त सोता था उसकी रातों की नींद उड़ गई। उसके मन में सुरक्षा के सवाल उठ खड़े हुए हैं। बिरले ही किसी मीडिया हाउस ने हमले के बाद इज़रायल छोड़ कर जाने वाले इज़रायलियों की हवाई अड्डे पर भीड़ दिखाई। इज़रायल की एक बड़ी आबादी जिसके पास अभी तक दो देशों में मान्य पासपोर्ट हैं वह हमले के बाद देश छोड़ कर जाना चाह रही थी। तमाम ज़ायनवादी प्रचार के बावजूद इज़रायल की जनता अन्दर से जानती है कि वह एक देश की जनता का हक़ मार कर उनकी जगह-ज़मीन हथिया रही है और ज़बरदस्ती अपने सेटलमेण्ट बना रही है। इस हमले में 1,139 इज़रायलियों की मौत हुई थी। हर दिन हो रहे ज़मीनी युद्ध में इज़रायली सैनिक भी मर रहे हैं और घायल हो रहे हैं लेकिन इज़रायल से कोई आँकड़े नहीं आ रहे। आधिकारिक तौर पर, मरने वाले इज़रायली सैनिकों की संख्या 250 से ऊपर जा रही है, लेकिन वास्तविक आँकड़े बताते हैं कि ये संख्या 1200 से ऊपर हो सकती है। इसके अलावा युद्ध की वजह से इज़रायल की एक बड़ी आबादी भी विस्थापित हुई है चाहे गाज़ा के निकटवर्ती इलाक़े हो या लेबनान हो। इज़रायली आबादी भी विस्थापित हुई है और नेतन्याहू सरकार पर विस्थापितों को सुविधाएँ नहीं देने के भी आरोप हैं। इज़रायली जनता का एक हिस्सा ऐसा भी है जो शान्ति चाहता है और एक काफ़ी छोटा हिस्सा है जो एक सेक्युलर राज्य चाहता है जिसमें मुसलमान, यहूदी व ईसाई सभी चैन से रह सकें। लेकिन यह भी सच है कि अधिकतर आबादी घोर ज़ायनवादी प्रचार के प्रभाव में है।

यदि इज़रायली जनता के बीच युद्ध समाप्त करने की माँग उठ भी रही है तो इसके पीछे कई वजहें हैं। उनके बीच के एक हिस्से का मानना है कि जब तक युद्ध जारी रहेगा बन्धकों को रिहा नहीं किया जा सकता है। जनता नेतन्याहू पर युद्ध के कुप्रबन्धन का आरोप भी लगा रही है। लेकिन कट्टर ज़ायनवादी आबादी नेतन्याहू से नाराज़ है कि वह गाज़ा पर विजय और हमास के जड़-मूल से नष्ट करने के वायदे से पलट रहा है।

नेतन्याहू सरकार हर दिन हमास के शीर्ष नेताओं को मार गिराने और हमास को कमज़ोर करने के दावे कर रही है लेकिन 4 फ़रवरी को ही गाज़ा के ख़ान यूनुस में हमास और इज़रायली सेना के बीच घमासान युद्ध हुआ है। हार की झुँझलाहट से हत्यारे नेतन्याहू की आक्रमकता बढ़ रही है जो पूरे मध्य-पूर्व को किसी बड़े युद्ध में घसीट सकती है। अमेरिका इसमें बिल्कुल नहीं पड़ना चाहता, लेकिन मध्यपूर्व में इज़रायली लठैत की मौजूदगी उसके लिए ज़रूरी भी है। इसी द्वन्द्व में अभी अमेरिका इज़रायल को तमाम झिड़कियाँ देते हुए भी समर्थन जारी रखे है क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। दूसरी ओर, नेतन्याहू को पता है कि जब तक यह युद्ध जारी है, तब तक उसकी सत्ता क़ायम है।

हमले के पहले से ही नेतन्याहू सरकार इज़रायली जनता के प्रतिरोध का सामना कर रही थी। इज़रायल के शासक वर्ग में भी फूट दिख रही है। नेतन्याहू पर ग़बन, भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी का आरोप था। नेतन्याहू पर अपनी जान बचाने के लिए न्याय व्यवस्था में संशोधन के भी आरोप हैं। 7 अक्टूबर का हमला उसकी झोली में वरदान की तरह साबित हुआ।

फ़िलहाल भ्रष्ट नेतन्याहू सरकार युद्ध बजट के नाम पर कल्याणकारी बजट में बड़ी कटौती की घोषणा कर रही है जिसकी वजह से इनके बीच की फूट और उभर कर सामने आ रही है। वैसे इज़रायल को ज़िन्दा रखने में अमेरिका और यूरोपीय साम्राज्यवादी देश मोटी रक़म की मदद देते हैं। अभी 3 फ़रवरी को ही अमेरिका ने घोषणा की है को वह अगले सप्ताह इज़रायल के लिए 1760 करोड़ डॉलर की मदद राशि संसद से पारित करने जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार यदि युद्ध फरवरी तक चलता है तो कुल खर्च 1400 करोड़ डॉलर का आएगा। वजह यह है कि अमेरिका-नीत साम्राज्यवादी धुरी के लिए मध्य-पूर्व में इज़रायली गुण्डे की मौजूदगी ज़रूरी है। ऊपर से यह गुण्डा इतना डरपोक और कमज़ोर है कि अपने आकाओं के खुले और पूरे समर्थन के बिना इसके मुँह से कूँ भी नहीं निकल सकती।

समझौते का प्रयास

इज़रायल एक तरफ़ विजय हासिल करने के दावे कर रहा है वहीं दूसरी ओर युद्ध-विराम के प्रयासों का भी हिस्सा बन रहा है। 28 जनवरी को अमेरिका, मिस्र, क़तर, और इज़रायल के आला अधिकारी पेरिस में फ़िलिस्तीन में युद्ध-विराम पर चर्चा करने के लिए मिले। इज़रायल के अधिकारियों का कहना था कि वार्ता “सकारात्मक” रही है। बन्धकों को रिहा करने के बदले इज़रायल ने 2 महीने के युद्ध-विराम की बात कही है। वहीं हमास प्रमुख इस्माइल हानिये 3 फ़रवरी को दोहा में तुर्की अधिकारियों से युद्ध विराम पर चर्चा के लिए मिले। हनिये ने बताया कि पेरिस में जिस प्रस्ताव पर चर्चा हुई वह प्रस्ताव उन्हें भी मिला है। साथ ही बात चीत के लिए उन्हें क़ाहिरा में आमन्त्रित भी किया गया है। यह भी दिखाता है कि नेतन्याहू के लिए युद्ध को जारी रखना मुश्किल है। फ़िलिस्तीनी मुक्तियुद्ध ज़मीनी हमले में इज़रायल को बुरी तरह परास्त कर रहे हैं। यह तो हार की खुले तौर पर स्वीकारोक्ति है। हमास ने स्पष्ट कर दिया है जब तक सारे फ़िलिस्तीनी क़ैदी रिहा नहीं होते और इज़रायल स्थाई युद्ध विराम की घोषणा नहीं करता युद्ध विराम की वार्ता और समझौता मान्य नहीं है। 

हमास, हिज़बुल्ला और हूती

2023-24 गाज़ा युद्ध ने अरब जनता की एकजुटता को गहराई से मज़बूत करने का काम किया है और वह अपने-अपने शासक वर्गों की ग़द्दारी के ख़िलाफ़ जम कर सड़कों पर उतार रही है। अपनी जनता के दवाब में आकर शासक वर्ग कुछ ज़ुबानी जमाखर्च कर रहे हैं लेकिन सऊदी अरब से लेकर जॉर्डन, बहरेन तक अरब लीग के शासक वर्गों का चरित्र उनकी जनता के सामने पूरी तरह से उद्घाटित  हो गया है। कुछ ने प्रतीकात्मक तौर पर अपने राजदूत बुला लिये हैं। लेकिन इज़रायल के साथ उनके सभी कूटनीतिक-व्यापारिक रिश्ते चल रहे हैं। फ़िलिस्तीन की जनता के साथ यह विश्वासघात नया नहीं है। यह 1980 के दशक से चला आ रहा है जब अभी पीएलओ समझौतापरस्ती की राह पर नहीं निकली थी बल्कि जुझारू तरीक़े से लड़ रही थी तब ही इन देशों ने फ़िलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष को समर्थन अपनी शर्तों पर देना शुरू कर दिया था। एक तरफ़ अरब देशों का विश्वासघात और फिर पीएलओ की समझौतापरस्ती फ़िलिस्तीन की जनता के सामने कठिन परिस्थितियाँ उपस्थित होने लगी। अल फ़तह के बाद पीएलओ में पीएफएलपी (फ़िलिस्तीन की कम्युनिस्ट पार्टी) का स्थान था। अल फ़तह के समझौतापरस्त होने के बाद  पीएफ़एलपी को आगे बढ़ कर नेतृत्व अपने हाथों में ले लेना चाहिए था। लेकिन बहुत-से वस्तुगत और मनोगत कारणों से ऐसा नहीं हो सका। प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व की विकल्पहीनता की वजह से हमास, हिज़बुल्ला और हूती जैसे कट्टरपन्थी नेतृत्व मध्य-पूर्व में उभरे। हूती यमन में अमेरिका और सऊदी अरब के पिट्ठू शासक अली अब्दुल्ला सालेह के ख़िलाफ़ लड़ रही थी। 2011 में अरब स्प्रिंग के दौरान सालेह के निरंकुश सत्ता को समाप्त किया लेकिन उसकी जगह उसके ही आदमी अब्दुरबाह मैसूर हादी की सरकार बनी। यह सरकार पहले की तरह ही जनता में अलोकप्रिय रही और 2015 में हूतियों ने उत्तरी यमन पर क़ब्ज़ा कर लिया। उसके बाद अमेरिका की मदद से सऊदी अरब ने यमन पर हमला कर दिया और भयंकर नरसंहार, विस्थापन, भुखमरी को जन्म दिया। यमन में भी जनता निरंकुश शासक के ख़िलाफ़ लड़ी और किसी क्रान्तिकारी विकल्प की अनुपस्थिति में इस्लामिक कट्टरपन्थी ताक़तें नेतृत्व की तरह उभरीं।

पहले साम्राज्यवाद ने इनमें से कई को प्रगतिशील-धर्मनिरपेक्ष नेतृत्व के ख़िलाफ़ खड़ा किया था। हालाँकि आज का  हमास और हिज़बुल्ला निश्चित ही 1980-90 के दशक का हमास और हिज़बुल्ला नहीं है जिसे साम्राज्यवादी ताक़तों ने प्रगतिशील-सेक्युलर शक्तिओं के ख़िलाफ़ खड़ा किया था। आज ये ताक़तें अमेरिकी और यूरोपीय साम्राज्यवाद के नियन्त्रण से निकल चुके हैं और जनता के संघर्षों के सन्दर्भ ने एक सीमित अर्थों में इनके चरित्र में भी परिवर्तन लाया है। वहीं इनका जनता में मज़बूत सामाजिक आधार है। जनता अपनी मुक्ति के लिए लड़ना नहीं छोड़ती है और जो उसकी आकाँक्षाओं, दमन के विरुद्ध उसके संघर्ष के साथ खड़ा होता है वह उसे तमाम एतराज़ के साथ भी नेतृत्व के तौर पर अपना लेती है लेकिन साथ ही वह उसे बदलती भी है जैसा कि हमास के सन्दर्भ में हुआ। आज वेस्ट बैंक में भी हमास का प्रभाव बढ़ रहा है और इसके पीछे की वजह भी पीएलओ का वही ऐतिहासिक विश्वासघात है। आज पीएलओ पूरी तरह इज़रायल के इशारों पर नाच रहा है और वेस्ट बैंक की जनता के सामने इसकी सच्चाई पूरी तरह से खुल गई है।

मध्य-पूर्व विस्फोट की कगार पर

फ़िलिस्तीन की मुक्ति का प्रश्न पूरे अरब जगत में एक गाँठ बना हुआ है। उत्तर-पूर्व में पिछले दस दिनों की घटनाएँ इसे एकबार फिर साबित कर रही हैं। लाल सागर में हूती लड़ाकुओं ने इज़रायल पर दबाव बनाने के लिए इज़राइली, अमेरिकी और इज़रायल समर्थक अन्य देशों के जहाज़ों पर हमले जारी रखे है। इसके प्रतिरोध में अमेरिका और ब्रिटेन ने यमन के नागरिकों पर बमबारी शुरू कर दी है। अब यमन पर हो रहे हमले में ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड और बहरेन भी शामिल हो गये हैं। 3 फ़रवरी को अमेरिका ने यह कहते हुए कि वह ईरानी सैन्य आधार पर हमले कर रहा है उसने इराक़ और सीरिया पर हमले किये। ईरान अमेरिका को चेतावनी दे रहा है। वहीं ईरान की धुरी के साथ खड़ी शक्तियों ने सीरिया और इराक़ में लगातार अमेरिकी ठिकानों पर हमले किये हैं। इराक़ में तो अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों को क़ायम रखना भी मुश्किल हो रहा है। ईरान के साथ रुस-चीन धुरी है। इस तरह अमेरिका-ब्रिटेन धुरी या नाटो देशों की धुरी और रुस-चीन धुरी के बढ़ते आपसी तनाव मध्य-पूर्व में भी किसी बड़े टकराव की ओर जा सकते हैं। अन्तरविरोधों की गाँठ में इज़रायली सेटलर उपनिवेशवाद और फिलिस्तीनी मुक्ति का प्रश्न है। यही वहाँ साम्राज्यवाद की जड़ें खोदने और अन्तत: कब्र खोदने का काम करेगा।

 

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2024


 

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